By पं. अभिषेक शर्मा
दिवाली का अनंत इतिहास, धर्मों और सामाजिक संदर्भों में उसकी भूमिका

दिवाली का पर्व जब भी आता है, उनके इतिहास के विभिन्न आयाम और समाज में उसकी भूमिका बार-बार चर्चा में आ जाती है। हालांकि अधिकांश लोग इसे श्रीराम के अयोध्या लौटने के उत्सव के रूप में जानने लगे हैं, लेकिन इसके सत्य और परंपरा की गहराई और अधिक व्यापक है। यह त्योहार केवल विजय और मिलन का प्रतीक नहीं बल्कि इसे रचनात्मक परिवर्तन, अज्ञान पर ज्ञान की महत्ता, सामाजिक समरसता और मानव जीवन के उत्सव के रूप में देखा गया है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में दिवाली की अनूठी मान्यताएँ और समारोह हैं, परंतु मुख्य तिथि कार्तिक अमावस्या के आस-पास ही रहती है। गांव, कस्बे और नगर, हर जगह इस पर्व के लिए विशेष तैयारी और विशेष सजावट की जाती है। सदियों से, शुभता, मंगलकामना और सामाजिक सामंजस्य के प्रतीक इस पर्व ने अपने रूप को समय-समय पर बदला है, किंतु इसका मूल संदेश हमेशा प्रकाश, शुभता और आशावादिता से जुड़ा रहा है।
यदि हम पद्म पुराण, स्कंद पुराण, ऋग्वेद और अन्य धर्मग्रंथों में उल्लेखित तथ्यों का अवलोकन करें तो स्पष्ट होता है कि दिवाली केवल श्रीराम के अयोध्या लौटने का प्रतीक नहीं। ऋग्वेद के श्लोकों में "ज्योति" को अज्ञान की समाप्ति और नई चेतना के आरंभ के रूप में वर्णित किया गया है। अग्निहोत्र व वैदिक दीपदान की परंपराएँ भी इस पर्व के पहले से विद्यमान थीं, जिनका स्वरूप समाज में सकारात्मक चेतना विस्तार और आध्यात्मिक विकास के तौर पर देखा गया।
तमसो मा ज्योतिर्गमय - अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो - यह भाव दिवाली के सभी रूपों का सार रहा है।
पद्म एवं विष्णु पुराण में समुद्र मंथन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इस अवसर पर देवताओं ने दीपों की श्रंखला, गीत और विविध अर्पणों के साथ महोत्सव मनाया था। समुद्र मंथन के समय अमृत, रत्नों और लक्ष्मी के साथ सृष्टि में संतुलन और समृद्धि का संचार हुआ। इससे दिवाली के पर्व को न केवल भौतिक संपन्नता बल्कि आध्यात्मिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी माना गया।
इस ऐतिहासिक पर्व की झलक विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में मिलती है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत में बली पाड्यामी के रूप में, जैन धर्म में महावीर निर्वाण के दिन के तौर पर, सिख धर्म में बंदी छोड़ दिवस के रूप में और कृष्ण द्वारा नरकासुर वध की कथा में भी दिवाली को हर्ष और विजय के प्रतीक के रूप में देखा गया है।
| परंपरा / घटना | ग्रंथ या स्थल | मूल शिकारी | प्रक्रिया |
|---|---|---|---|
| वैदिक दीप-यज्ञ | ऋग्वेद, उपनिषद | ज्ञान की विजय, शुद्धिकरण | अग्नि पूजा, दीपदान |
| लक्ष्मी पूजन व समुद्र मंथन | पद्म, विष्णु पुराण | सामूहिक समृद्धि, संतुलन | दीप जलाना, पूजा |
| बली की वापसी | स्कंद पुराण | विनम्रता, संतुलन का उत्सव | दीपावली, स्वागत |
| नरकासुर वध और विजय | भागवत पुराण | भय पर जीत, नैतिकता | दीपों द्वारा उत्सव |
| महावीर का मोक्ष | कल्पसूत्र | आत्मज्ञान, मोक्ष | ज्योति पूजन, जैन धर्म |
| बंदी छोड़ दिवस | सिख परंपरा | स्वतंत्रता, बंधन-मुक्ति | दीप प्रज्ज्वलन, मंदिर सजावट |
| राम का अयोध्या स्वागत | अध्यात्म रामायण, लोककथा | भक्ति, समाजिक हर्ष | दीपों की सजावट, स्वागत |
आज भारत के प्रत्येक कोने में दिवाली को अलग रंग, विविधता और सामाजिक उद्देश्य के साथ मनाया जाता है। गाँवों में बैलों की पूजा और गीतों के साथ दीपदान की जाती है। नगरों में आलीशान रोशनी, उपहारों का आदान-प्रदान और आतिशबाजी के साथ लोगों को जोड़ता है। महिलाएँ रंगोली, अल्पना और लाल-पीले फूलों से घरों को सजाती हैं। व्यापारियों के लिए यह वर्ष का सबसे भाग्यशाली दिन है, जब नई खाता बही शुरू होती है।
दिवाली के समय सामूहिक भोज, पारिवारिक मिलन, भूतपूर्व दुश्मनों के बीच मेल-मिलाप और बच्चों की चहल-पहल के रंग पर्व में नयापन और सामूहिकता भर देते हैं। बाबा, दादी, माता-पिता और परिवार के हर सदस्य का महत्व इस पर्व में अनूठा है, क्योंकि यह केवल संपत्ति या सफलता का नहीं, स्वागत, संवाद और उत्साह का पर्व है।
हर दीया जो जलाया जाता है, वह केवल उत्सव का हिस्सा नहीं बल्कि जीवन के हर अंधकार को मिटाने की प्रेरणा लेकर आता है। यह दीपक हमें धैर्य, विवेक, स्वयं के भीतर के प्रकाश की खोज और बदलाव के प्रयोग का भी संदेश देते हैं। जिसे दीयों की कतार से रोशनी मिलती है, वह केवल गली, मोहल्ला या घर ही नहीं, पूरी चेतना में उजास भर देता है।
दीयों के शब्दहीन संवाद और प्रकाश की ऊर्जा का प्रभाव हर जीवन में सकारात्मकता, आशा और निरंतर नवाचार की प्रेरणा भर देता है। यह पर्व हर वर्ष हमें याद दिलाता है कि भौतिक खुशहाली चाहे जितनी महत्वपूर्ण हो, अंततः मायने भीतर के प्रकाश, जागरूकता और संतुलन का है।
दिवाली का असली उद्देश्य केवल बाहरी सम्पन्नता ही नहीं, भीतर के दिव्य तत्त्व तक पहुँच बनाना है। चाहे राम का स्वागत हो, लक्ष्मी का प्राकट्य, महावीर का निर्वाण या गुरु हरगोबिंद की मुक्ति - हर संदर्भ में दीप प्रकाश, ज्ञान, नैतिकता और स्वाधीनता का प्रतीक रहा है।
यह पर्व प्रेरित करता है कि हरेक व्यक्ति अपने भीतर छिपे दैवीय गुणों को पहचाने, बंधनों को छोड़े और प्रेम, न्याय और सज्जनता के साथ अज्ञान और संकुचितता को हराए। एक छोटा सा दीया भी बड़े अंधकार को कम कर सकता है और यही दिवाली का सबसे बड़ा संदेश है।
प्रत्येक काल, समाज और मान्यता में दिवाली का स्वरूप - चाहे चेतना, चाह, समृद्धि, या स्वतंत्रता हो - परिवर्तित जरूर हुआ है, किंतु उसकी मूल चेतना - दीपों की पंक्ति, प्रकाश का स्वागत और आत्म-जागरण - आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह पर्व हर वर्ष एक नया संदेश, नई ऊर्जा और नई उम्मीद लेकर आता है। हर दीपक प्राचीन इतिहास, परंपरा और हर जीव की आशाओं को जोड़ता है। यही परंपरा, यही आशावाद और यही दिवाली की सबसे सुंदर परिभाषा है।
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