By पं. नरेंद्र शर्मा
क्यों भगवान हनुमान ने वन में भीम से मिलकर उसे विनम्रता और धर्म का पाठ सिखाया

महाभारत में एक प्रसंग ऐसा है जो शक्ति, विनय और धर्म के गहरे संबंध को अत्यंत सरल रूप में सामने रखता है। यह वह क्षण है जब वन में चलते हुए भीम को मार्ग में एक वृद्ध वानर दिखाई देता है और वही वानर वास्तव में भगवान हनुमान होते हैं।
“न हि बलं बलिनां श्रेष्ठं विनयेन विनाकृतम्।
विनयेन विहीनं तु बलं च भवति दुर्बलम्॥”
इस श्लोक का अर्थ है कि विनय के बिना बल का कोई मूल्य नहीं होता और जो शक्ति विनय से रिक्त हो जाती है वह अंततः दुर्बल सिद्ध होती है। भीम और हनुमान का यह मिलन इसी सत्य को जीवंत रूप देता है, जहां बाहरी बल के सामने अंतर्मुखी विनम्रता का महत्व प्रकट होता है।
पांडव जब वनवास में थे तब एक समय द्रौपदी के लिए दिव्य सुवासित कमलों को लाने के उद्देश्य से भीम गहरे वन में चले गए। इसी यात्रा के दौरान उन्हें मार्ग में एक वृद्ध वानर दिखाई दिया जिसका विशाल पूंछ मार्ग के बीच में पड़ी थी। वहीं से इस दिव्य मिलन की शुरुआत होती है।
भीम वायु पुत्र माने जाते हैं। भगवान हनुमान भी वायु देव के ही पुत्र हैं, अतः दोनों में आध्यात्मिक और दैहिक संबंध पहले से ही विद्यमान था। फिर भी भाग्य ने इन दोनों को अलग अलग युगों में जन्म दिया, हनुमान त्रेता युग के नायक और भीम द्वापर युग के वीर। उनका मिलन दो कालों का संगम भी बन गया।
वायु तत्व तेज गति, प्राण शक्ति और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। हनुमान और भीम दोनों ही वायु से उत्पन्न शक्ति के प्रतिनिधि रूप हैं। वायु का गुण जब संयमित होता है तो वह प्राणशक्ति बनकर योग, सेवा और भक्ति में रूपांतरित होता है और जब असंतुलित होता है तो वह आवेग, क्रोध और अहंकार के रूप में भी प्रकट हो सकता है।
भीम की प्रकृति में जहां अद्भुत पराक्रम था वहीं कहीं न कहीं कठोरता और उद्वेग भी दिखता है। हनुमान का रूप उसी वायु शक्ति का संतुलित, भक्तिपूर्ण और पूर्णतया विनम्र स्वरूप है। इस दृष्टि से भी उनका मिलन केवल दो वीरों का नहीं बल्कि एक ही तत्व के दो स्तरों का मिलन कहा जा सकता है।
भीम का बल महाभारत में अद्वितीय माना जाता है। राक्षसों, दैत्यों और अपार शक्ति वाले योद्धाओं को उन्होंने अपने गदा बल से परास्त किया। किंतु शक्ति का स्वभाव है कि यदि वह निरंतर विजय देखे तो उसके भीतर गर्व प्रवेश कर सकता है।
जब भीम ने वृद्ध वानर को देखा तो स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा की कि वह रास्ता छोड़ दे। वृद्ध वानर ने शांत भाव से कहा कि थकान के कारण शरीर हिल नहीं रहा, यदि इच्छा हो तो पूंछ को स्वयं हटाकर आगे निकल जाए। भीम के लिए यह सामान्य बात थी, पर जब उन्होंने भारी परिश्रम के बाद भी पूंछ को तनिक भी न हिला पाया तब उन्हें पहली बार लगा कि संसार में केवल उनका बल ही सबसे बड़ा नहीं। यहीं से विनम्रता का पहला बीज अंकुरित हुआ।
भीम का बल भविष्य में धर्म की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक था। यदि वही शक्ति अहंकार से ढक जाती तो वह विनाशक भी बन सकती थी। हनुमान ने पूंछ के माध्यम से जो लीला की वह केवल परीक्षण नहीं, बल्कि शिक्षा थी कि शक्ति का सच्चा सौंदर्य विनय और संयम से ही प्रकट होता है।
भीम जब नतमस्तक होकर इस अद्भुत शक्ति के स्रोत के बारे में पूछते हैं तब हनुमान अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय कराते हैं। वे बताते हैं कि वही रामभक्त हनुमान हैं जिन्होंने लंका में प्रवेश किया, समुद्र लांघा और राम सेवा में जीवन अर्पित किया। इस क्षण में भीम को समझ आता है कि वास्तविक महानता शक्ति के प्रदर्शन में नहीं बल्कि सेवा, भक्ति और विनम्रता में छिपी होती है।
यह प्रश्न अपने आप उठता है कि इतने विशाल वन में, इतने लंबे वनवास के बीच, हनुमान ने उसी समय भीम से मिलना क्यों चुना। उत्तर यही है कि यह केवल संयोग नहीं बल्कि नियति थी। उस समय पांडवों का जीवन निर्णायक मोड़ पर था। भविष्य में कुरुक्षेत्र युद्ध आने वाला था और कई कठिन निर्णय भीम के सामने थे।
हनुमान का आगमन भविष्य के युद्ध के लिए मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी जैसा था। एक ओर उन्होंने भीम को विनम्रता सिखाई, दूसरी ओर यह आश्वासन भी दिया कि उनका बल अकेला नहीं रहेगा। यह संदेश भी था कि जब तक शक्ति धर्म से जुड़ी रहेगी तब तक दिव्य सहायता भी उपस्थित रहेगी।
महाभारत मूलतः युद्ध की कथा नहीं बल्कि चुनावों की कथा है। प्रत्येक पात्र के सामने बार बार यह प्रश्न आता है कि वह किस पक्ष में खड़ा रहेगा और उसकी शक्ति किस उद्देश्य के लिए प्रयोग होगी।
हनुमान ने भीम को यह स्मरण कराया कि उनकी शक्ति व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए प्रदान की गई है। उन्होंने यह संकेत दिया कि जिस दिन शक्ति केवल अहंकार के लिए उपयोग होगी, उस दिन वह सुरक्षात्मक अस्त्र न रहकर विनाशकारी हथियार बन जाएगी। भीम के भीतर यह समझ गहराई से बैठ जाए, यही इस मिलन का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा सकता है।
हनुमान केवल पराक्रमी योद्धा नहीं, बल्कि उच्च कोटि के योगी भी हैं। उनकी शक्ति का मूल उत्साह, तप और अविचल भक्ति मानी जाती है। जब उन्होंने भीम को आशीर्वाद दिया कि कुरुक्षेत्र युद्ध में वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहेंगे तो वास्तव में उन्होंने पांडवों को एक अदृश्य सुरक्षा कवच प्रदान किया।
अर्जुन के ध्वज पर हनुमान का विराजमान होना केवल प्रतीक नहीं था। यह संकेत था कि युद्ध के कठिनतम क्षणों में भी रामभक्त हनुमान की ध्वनि और उपस्थिति पांडवों की हिम्मत को बनाए रखेगी। भीम के लिए यह आश्वासन बहुत गहरा था, क्योंकि अब वह यह जानते थे कि उनके परिवार के साथ स्वयं वायु पुत्र हनुमान रक्षा के लिए उपस्थित रहेंगे।
अनेक पाठक भूल जाते हैं कि भीम और हनुमान दोनों वायु देव के पुत्र हैं। जब हनुमान ने यह तथ्य भीम के सामने प्रकट किया तो यह मुलाकात देव और मनुष्य की नहीं, बल्कि दो भाइयों की भेंट बन गई।
हनुमान ने भीम को केवल पराक्रम का उत्तराधिकारी नहीं माना, बल्कि सेवा, नम्रता और भक्ति की परंपरा का संवाहक भी माना। उन्होंने संकेत दिया कि वायु की संतति का वास्तविक गौरव केवल बल नहीं बल्कि उस बल का उपयोग धर्म, सेवा और करुणा में है।
| पहलू | हनुमान | भीम |
|---|---|---|
| देविय उद्गम | वायु देव के पुत्र | वायु देव के पुत्र |
| प्रमुख गुण | भक्ति, विनम्रता, अचल शौर्य | पराक्रम, साहस, गदा युद्ध कौशल |
| युग | त्रेता युग, राम कथा | द्वापर युग, महाभारत कथा |
| मुख्य ध्येय | राम कार्य, सेतु निर्माण, दूत के रूप में सेवा | पांडवों की रक्षा, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष |
इस तालिका से स्पष्ट होता है कि दोनों का मूल स्रोत एक है, पर जीवन में अभिव्यक्ति का तरीका अलग है। हनुमान का आगमन मानो भीम को यह स्मरण कराने के लिए था कि वायुपुत्र होने का अर्थ केवल बलशाली होना नहीं बल्कि करुणामय और धर्मनिष्ठ होना भी है।
जब भीम पूरे बल से हनुमान की पूंछ उठाने का प्रयास करते हैं और फिर भी वह तनिक भी नहीं हिलती, तो उस क्षण उनका अहंकार टूटता है। उन्हें समझ आता है कि किसी भी युग में कोई न कोई उनसे बड़ा अवश्य है।
हनुमान ने यह दिखाया कि सच्चा बल केवल शरीर की मांसपेशियों में नहीं होता, बल्कि जाग्रत चेतना में होता है। नियंत्रण, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण के बिना बल अधूरा है। महाभारत के अनेक प्रसंग यही संदेश देते हैं कि बाहरी पराक्रम से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक परिपक्वता है। हनुमान ने भीम को इसी सत्य का अनुभव कराकर आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार किया।
आने वाले समय में भीम को भीषण युद्धों का सामना करना था। केवल गदा बल से ही नहीं, बल्कि धैर्य, सहनशीलता और मानसिक स्पष्टता से ही वह परीक्षा पार कर सकते थे। हनुमान ने इस मिलन के माध्यम से उन्हें संयमित क्रोध, नियंत्रित शक्ति और धर्मनिष्ठ निर्णय की दिशा दिखाई।
जब भीम को यह विश्वास हो गया कि युद्धक्षेत्र में उनकी सेना के साथ रामभक्त हनुमान की उपस्थिति भी रहेगी तब उनका भय काफी हद तक कम हो गया। यह मानसिक दृढ़ता ही वास्तविक विजय का आधार बनती है।
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि रामायण के नायक हनुमान महाभारत के युद्ध में क्यों दिखाई देते हैं। इसका उत्तर यह है कि धर्म किसी एक युग या एक कथा तक सीमित नहीं होता।
हनुमान का भीम से मिलना मानो यह संदेश है कि रामायण और महाभारत दो अलग कथाएं नहीं, बल्कि एक ही प्रवाह की दो धाराएं हैं। एक में भगवान राम मर्यादा के रूप में प्रकट होते हैं, दूसरे में भगवान कृष्ण नीति और करुणा के रूप में। हनुमान दोनों सेतु का कार्य करते हैं और यह दिखाते हैं कि जहां भी धर्म की रक्षा होती है, वहां उनका आश्रय और आशीर्वाद उपलब्ध रहेगा।
भीम और हनुमान की यह लीला केवल प्राचीन कथा भर नहीं, बल्कि आज के जीवन के लिए भी दर्पण है। हर व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी रूप में शक्ति होती है। कहीं धन की शक्ति, कहीं ज्ञान का बल, कहीं पद, कहीं संबंधों का प्रभाव।
प्रश्न यह है कि उस शक्ति के साथ विनम्रता है या नहीं। यदि बल के साथ विनय और धर्म नहीं जुड़ते तो वही शक्ति स्वयं के लिए और दूसरों के लिए कष्टकारी बन सकती है। हनुमान का संदेश यही है कि शक्ति का सर्वोच्च उपयोग तब है जब वह धर्म, सेवा और करुणा की दिशा में प्रवाहित हो।
जो व्यक्ति भीम की तरह अपने भीतर के अहंकार को पहचानकर उसे हनुमान जैसे आदर्शों के सामने झुका देता है, वह जीवन के बड़े युद्धों के लिए तैयार हो जाता है। वहां विजय केवल बाहरी अर्थ में नहीं, बल्कि अंतर्मन की शांति के रूप में भी मिलती है।
भीम हनुमान से मिलकर वही योद्धा रहे, उनका बल भी वैसा ही रहा, उनकी गदा भी वैसी ही रही, पर उनके भीतर दृष्टि बदल गई। अब उनकी शक्ति के साथ विनम्रता और जागरूकता जुड़ चुकी थी। अब उनका पराक्रम केवल क्रोध का साधन नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का उपकरण बन गया।
हर साधक के लिए यह कथा संकेत देती है कि यदि जीवन के किसी मोड़ पर भीतर अहंकार, अधैर्य या असंतुलित शक्ति महसूस हो तो हनुमान जैसे आदर्शों की शरण लेकर उसे सही दिशा दी जा सकती है। वही शक्ति जब धर्म से जुड़ती है तब वह वास्तव में दिव्य बन जाती है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, करियर
इनके क्लाइंट: पंज., हरि., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें