By पं. सुव्रत शर्मा
क्यों हनुमान जी को सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है?

हिन्दू धर्म के अतुलित देव-संसार में असीम शक्तियों, दिव्य योद्धाओं तथा विराट महापुरुषों की लम्बी परम्परा मिलती है, किन्तु यदि शक्ति स्वरूप, चिरजीवी और अजेयता की परम उपासना का विषय हो तो हनुमान जी का चरित्र श्रेष्ठतम है। श्रीरामजी के प्रति पूर्ण समर्पित, पवनसुत, शिवांश तथा योग-बल और भक्ति में विलक्षण हनुमान जी के अद्वितीय स्वरूप को समझना महान चेतना का विषय है। केवल भौतिक बल ही नहीं, उनकी शक्ति की पहुँच लौकिक, पारलौकिक, योगिक तथा आध्यात्मिक प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोच्च है। वे अपने गुणों में सर्वयुगीन, धर्मसंरक्षक तथा कठिनतम तपस्या के प्रतीक हैं। किन्हीं अन्य वीरों या देवों के मुकाबले में हनुमान जी अपराजेय हैं और इसका रहस्य सात गहरे आयामों में छिपा है।
हनुमान जी की उत्पत्ति स्वयं में विलक्षण है। वे केवल वानरकुल में जन्मे नहीं माने जाते बल्कि पुराणों के अनुसार स्वयं भगवान शिव के अंश से अवतरित हुए, जिन्हें भगवान विष्णु के रामावतार में धर्मसंस्थापन हेतु भेजा गया था। उनकी उत्पत्ति में वायु देव से प्राप्त प्राणशक्ति और शिव के संहार-तत्त्व का अद्वितीय संयोग सतत रहता है।
हनुमान जी में उपरोक्त सभी तत्व अप्रतिम संतुलन में विद्यमान हैं, अतः जिनका तुल्य अन्य किसी भी देव या योद्धा में एक साथ नहीं है। उनका अस्तित्व ही अद्वितीय दिव्यता का परिचायक है।
हनुमान जी के बाल्यकाल के विविध लीला-प्रसंगों में उनकी चंचलता के साथ-साथ दिव्यता स्वयं प्रकट होती है। देवी-देवताओं ने बालक हनुमान जी पर प्रसन्न होकर उन्हें ऐसा आशीर्वाद दिया जो उन्हें अखंड्य, अभेध्य और अभय बनाता है।
तालिका : विभिन्न देवताओं से प्राप्त आशीर्वाद
| देवता का नाम | वरदान | महत्व |
|---|---|---|
| अग्निदेव | अग्नि से पूर्ण रक्षा | किसी भी अग्नि से अघात्य |
| वरुणदेव | जल से सुरक्षा | जल-तत्त्व से अविनाशी |
| सूर्यदेव | अपूर्व ज्ञान | समस्त शास्त्रों में पारंगत |
| वायु देव | अनंत ऊर्जा | गंभीर वेग, सशक्तता, असंशय गतिशीलता |
| विश्वकर्मा | दिव्यास्त्रों से रक्षा | साधारण पराजय से परे, दिव्यास्त्रों का निराकरण |
| ब्रह्मा | शस्त्रों से मृत्यु से रक्षा | किसी भी शस्त्र का प्रभाव निष्फल |
इन वरदानों के समुच्चय ने हनुमान जी को बाल्यावस्था से ही ऐसे दिव्य अस्तित्व में बदल दिया जिसकी तुलना साधारण या अलौकिक योद्धाओं से नहीं हो सकती।
हनुमान जी ने केवल देव-सिद्धियाँ ही नहीं, अपितु योग के परम शिखर पर स्थित अष्टसिद्धियों का पूर्ण स्वामीत्व भी अर्जित किया। ये सिद्धियाँ भौतिक प्रपंच की सीमाओं से परे जाकर अपने साधक को प्रत्यक्ष देवतुल्य बना देती हैं।
मुख्य अष्ट सिद्धियाँ :
हनुमान जी ने रामकाज हेतु इन सिद्धियों का विविध अवसरों पर अनुपम प्रयोग किया , सीता की खोज में अनिमाषता, लंका-प्रवेश में लघुता, पहाड़ का वहन करने में गरिमा, समुद्र-लांघन में महिमा एवं लघिमा, तथा संपूर्ण समीकरण में परिपूर्ण योगिक नियंत्रण।
विशेष दिव्य सत्ताओं को ही चिरंजीविता का वरदान प्राप्त होता है। हनुमान जी को यह सर्वोच्च पद प्राप्त है कि जब तक श्रीराम का नाम सृष्टि में रहेगा तब तक वे इस धरा पर स्वयं विद्यमान रहेंगे।
हनुमान जी की शक्ति लोक, काल और योगत्व तक ही सीमित नहीं; अपितु वे नवग्रहों के कर्म-चक्र और भाग्य-प्रवाह पर भी नियंत्रण रखते हैं। लंका-विजय के समय शनिदेव को रावण की कैद से हनुमान जी ने मुक्त किया। कृतज्ञ शनिदेव ने वचन दिया कि हनुमान जी के आराधकों पर उनकी विशेष दृष्टि कभी कष्टकारी न होगी।
हनुमान जी भक्तों के लिए बाधारहित, भाग्योन्नायक तथा संकटहर्ता माने जाते हैं, जिसका खगोलीय अधिपत्य अन्य किसी योद्धा या देवता में इतनी गहराई से नहीं है।
हनुमान जी के बचपन में ऋषियों ने उन्हें यह शाप दिया था कि वे अपनी अद्भुत शक्तियों को भूल जाएँगे और आवश्यकता पड़ने पर किसी अन्य के स्मरण से ही वे प्रकट होंगी। यह शाप वास्तव में वरदान जैसा सिद्ध हुआ ,
जैसे, जांबवान के द्वारा समुद्र-लाघव का स्मरण कराया जाना, लक्ष्मण के संजीवनी हेतु पर्वत उठाना, या भीम को पाँव से रोकना , प्रत्येक कृत्य में केवल धर्म और विनम्रता ही थी।
हनुमान जी की सर्वोच्च शक्ति का रहस्य उनकी भगवान श्रीराम के प्रति अविचल प्रीति, अखंड निष्ठा और पूर्ण समर्पण में निहित है। उनकी भक्ति केवल भावनात्मक नहीं, अपितु उनकी समग्र सत्ता और अस्तित्व का आधार है।
मूल्यांकन तालिका
| शक्ति का आयाम | हनुमान जी | अन्य प्रमुख योद्धा/देवता |
|---|---|---|
| उत्पत्ति | शिवांश और वायुतत्त्व | एकल तत्त्व या यदा कदा दिव्यता |
| अभेद्यता | समस्त तत्त्वों और शस्त्रों से रक्षा | सीमित सुरक्षा, कुछ कमजोरियाँ शेष |
| योगसिद्धियाँ | अष्टसिद्धियों का सम्पूर्ण तत्व | आंशिक या विशिष्ट योगबल |
| काल अस्तित्व | चिरंजीविता, युगातीत | एक युग या सीमित अवधि तक जनित |
| ग्रहाधिपत्य | नवग्रहों पर नियन्त्रण | विशिष्ट क्षेत्र या तत्त्व में अधिपत्य |
| संयम | विनम्रता, सीमित बल का प्रयोग | कभी कभी अभिमान का विकार |
| शक्ति स्रोत | पूर्ण भक्ति, आत्मसमर्पण | व्यक्तिगत बल या दैवीय वरदान |
भीम, अर्जुन जैसे वीर पूर्ण भौतिक शक्ति या दैवी अस्त्रों के कारण प्रसिद्ध हैं परन्तु हनुमान जी का समग्र स्वरूप, योग-संपन्नता, कालातीतता और असाधारण भक्ति-विनय अन्य किसी भी चरित्र में दिखाई नहीं देती।
हनुमान जी की शक्ति सिर्फ बल, विवेक और योगिक सामर्थ्य का विषय नहीं अपितु परम सत्य, सेवा, समर्पण और प्रेम-मूल्य का शाश्वत आदर्श है। उनका चरित्र यह प्रमाणित करता है कि शाश्वत शक्ति सेवा, त्याग और भक्ति में निहित होती है , जिसे संसार के कौन-सा भी विरोध या संकट परास्त नहीं कर सकता। चिरंजीवी हनुमान जी भक्तों के हृदय में आज भी वैसे ही जीवंत एवं प्रेरणादायी हैं जैसे युगों-युगों से रहे हैं।
प्रश्न 1: हनुमान जी को सर्वाधिक शक्तिशाली क्यों माना जाता है?
उत्तर: उनकी दिव्य उत्पत्ति, देवताओं के सर्वश्रेष्ठ आशीर्वाद, योग-संपन्नता, चिरंजीविता, नवग्रह पर नियंत्रण, संयमित शक्ति और परम भक्ति उन्हें अनुपम बनाती है।
प्रश्न 2: अष्टसिद्धियाँ क्या हैं और हनुमान जी ने उन्हें कहाँ उपयोग किया?
उत्तर: अष्टसिद्धियाँ योगबल की आठ विशेष उपलब्धियाँ हैं , वे सीता की खोज, समुद्र-लाघन, पर्वत उठाने आदि कार्यों में उपयोग की गईं।
प्रश्न 3: शनिदेव और हनुमान जी का संबंध क्या है?
उत्तर: हनुमान जी ने शनिदेव को लंका में रावण की कैद से मुक्त किया था, जिससे शनिदेव ने उनके भक्तों को दुष्प्रभाव से बचाने का वचन दिया।
प्रश्न 4: हनुमान जी की शक्ति का प्रमुख स्रोत क्या है?
उत्तर: परम भक्ति, सेवा और श्रीराम के प्रति निरन्तर समर्पण , यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।
प्रश्न 5: हनुमान जी चिरंजीवी क्यों कहलाते हैं?
उत्तर: उन्हें अमरता का वरदान मिला है; सृष्टि में जब तक श्रीराम का नाम रहेगा, वे जीवित रहेंगे।
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