By अपर्णा पाटनी
व्रत का महत्व और जीवन से दुख दूर करने की विधि

सावन मास की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या के रूप में विशेष स्थान दिया जाता है। इस दिन प्रकृति हरीतिमा से भर जाती है और वातावरण में पवित्रता तथा शांति की भावना प्रबल होती है। मान्यता है कि इस शुभ तिथि पर भगवान शिव, माता पार्वती और पीपल वृक्ष की श्रद्धा से पूजा करने से जीवन के कष्ट हल्के होते हैं और घर में सुख समृद्धि के नए द्वार खुलते हैं। परंपरा के अनुसार हरियाली अमावस्या के दिन व्रत रखा जाता है, पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाया जाता है और अमावस्या व्रत कथा का श्रवण किया जाता है, जिससे व्रत का फल पूर्ण माना जाता है।
अमावस्या तिथि पर पीपल की पूजा का विधान बहुत प्राचीन है। सावन मास की हरियाली अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष को देव स्वरूप मानकर उसके नीचे दीपक जलाया जाता है, जल अर्पित किया जाता है और परिक्रमा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि पीपल की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शीर्ष पर भगवान शिव का वास माना जाता है, इसलिए पीपल की पूजा से त्रिदेव का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है।
यह भी विश्वास है कि हरियाली अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा के बाद अमावस्या व्रत कथा को श्रद्धा से सुनने या पढ़ने भर से ही जीवन के संकट, अपयश और अचानक आने वाली बाधाओं का नाश होता है। धन, स्वास्थ्य और पारिवारिक सौहार्द में वृद्धि होती है। इस दिन महिलाएं और पुरुष दोनों व्रत रखकर संकल्प लेते हैं कि किसी पर झूठा आरोप नहीं लगाएंगे और सत्य के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे।
हरियाली अमावस्या के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ, हल्के या हल्के हरे रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। घर के पूजा स्थल तथा आंगन को शुद्ध जल से छिड़ककर पवित्र किया जाता है। इसके बाद निकट के किसी पीपल वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में जल अर्पित किया जाता है। हल्दी, कुंकुम, अक्षत और फूल चढ़ाए जाते हैं। पीपल के चारों ओर सात, ग्यारह या इक्कीस परिक्रमा की जाती हैं और भगवान शिव तथा माता पार्वती का ध्यान किया जाता है।
व्रत करने वाला दिनभर संयमित भोजन रखता है। अनेक लोग इस दिन एक समय फलाहार ही ग्रहण करते हैं। संध्या समय पीपल के नीचे या घर के पूजा स्थान पर दीया जलाकर हरियाली अमावस्या व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। कथा सुनने के बाद गुड़, गेहूं या गुड़धानी का भोग लगाया जाता है और वही प्रसाद के रूप में घर परिवार तथा आसपास के लोगों में बांटा जाता है।
| हरियाली अमावस्या व्रत का चरण | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| स्नान और शुद्धि | प्रातः स्नान, स्वच्छ वस्त्र, घर और पूजा स्थान की शुद्धि |
| पीपल पूजा | जल, हल्दी, कुंकुम, अक्षत, फूल, परिक्रमा |
| व्रत और संयम | दिनभर संयमित भोजन, अनेक लोग केवल फलाहार करते हैं |
| दीपक और कथा पाठ | संध्या में दीपक जलाकर हरियाली अमावस्या कथा का श्रवण |
| भोग और प्रसाद | गुड़धानी या मिठाई का भोग, फिर प्रसाद वितरण |
हरियाली अमावस्या की प्रसिद्घ कथा एक ऐसे राजघराने से आरंभ होती है जहां एक राजा अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक महल में निवास करता था। राजा का एक पुत्र था और उसका विवाह हो चुका था। राजा की पुत्रवधू रूपवान थी और महल के आराम और ऐश्वर्य में रहती थी। एक दिन वह रसोईघर में गई तो वहां उसे स्वादिष्ट मिठाई रखी हुई दिखाई दी। अकेलेपन और लोभ के कारण वह स्वयं को रोक न सकी और उसने सारी मिठाई खा ली।
कुछ समय बाद जब रसोई में पूछा गया कि मिठाई कहां गई तब पुत्रवधू ने सत्य छिपाने के लिए सहज ही कह दिया कि सारी मिठाई तो चूहे खा गए। यह बात केवल मनुष्य ने ही नहीं, रसोई में घूमते चूहों ने भी सुन ली। असत्य आरोप सुनकर वे अत्यंत क्रोधित हो गए और सोचने लगे कि बिना अपराध के दोष उन पर मढ़ दिया गया है।
चूहों ने मन में निश्चय किया कि राजा की बहू को उसके झूठ का परिणाम अवश्य दिखाया जाएगा। प्रत्यक्ष बदला लेने का समय वे धैर्य के साथ तलाशते रहे।
कुछ दिनों के बाद एक अवसर आया जब महल में कुछ सम्मानित मेहमान ठहरने के लिए आए। चूहों को लगा कि अब समय उपयुक्त है। उन्होंने विचार किया कि यदि इस समय कोई गंभीर स्थिति उत्पन्न की जाए तो महल में रहने वाले सभी लोग बहू के चरित्र पर प्रश्न उठाएंगे और उसे कष्ट अवश्य मिलेगा।
रात के समय जब सब सो गए तो चूहे चुपके से राजा की पुत्रवधू के कक्ष में गए। वहां रखी उसकी साड़ी को उन्होंने खींचकर निकाला और उसे अतिथियों के ठहरने वाले कमरे में ले जाकर रख दिया। सुबह जब सेवक और अन्य लोग अतिथि कक्ष को व्यवस्थित करने आए तो वहां बहू की साड़ी देखकर हैरान रह गए।
देखते ही देखते यह बात महल में फैल गई कि राजा की बहू की साड़ी अतिथि के कक्ष में कैसे पहुंची। लोगों ने बिना सच्चाई जाने उसके चरित्र पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए। ऐसे ही बातें जंगल की आग की तरह पूरे नगर में फैल गईं। जब यह बात राजा के कानों तक पहुंची तो उसने बिना जांच पड़ताल किए अपनी पुत्रवधू के चरित्र पर संदेह कर लिया और क्रोध में आकर उसे महल से निकाल देने का आदेश दे दिया।
राजा की बहू महल से निकाल दी गई। अपमान और दुख से भरी वह अकेली एक छोटी सी झोपड़ी में रहने लगी। परंतु उसके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा बनी रही। उसने निश्चय किया कि अब शरण केवल भगवान के चरणों में ही है। वह प्रतिदिन निकट के एक पीपल वृक्ष के नीचे जाकर दीया जलाने लगी।
वह पीपल के वृक्ष की नियमित पूजा करती, वहां दीपक प्रज्वलित करती, भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करती, फिर घर लौटकर गुड़धानी का भोग बनाती और लोगों में प्रसाद बांटती। दिन बीतते गए, परंतु वह अपने ऊपर लगे कलंक के कारण उदास रहते हुए भी पूजा और सेवा के कार्य में कमी नहीं होने देती।
एक दिन संयोग से राजा उसी मार्ग से गुजरा जहां पीपल का वह वृक्ष था। अंधेरी रात में भी वृक्ष के चारों ओर दीयों की चमकती रोशनी देखकर राजा चकित रह गया। उसे लगा कि इस स्थान पर कोई विशेष रहस्य है। महल लौटकर उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस रोशनी का कारण जानकर उसे सब विस्तार से बताएं।
सैनिक रात के समय उस पीपल वृक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि वहां जल रहे दीपक मानो आपस में बातें कर रहे हैं। प्रत्येक दीपक अपनी अपनी कहानी सुनाने लगा। तभी एक दीपक बोला कि वह राजा के महल का दीपक है।
उसने कहा कि महल से निकाल दिए जाने के बाद राजा की पुत्रवधू प्रतिदिन उसकी पूजा करती है और प्रेम से उसे जलाती है। अन्य दीपकों ने उससे पूछा कि राजा की बहू को महल से क्यों निकाला गया। तब उस दीपक ने पूरा प्रसंग सुनाया कि कैसे उसने मिठाई खाकर झूठा आरोप चूहों पर लगा दिया और उसी के बदले के रूप में चूहों ने उसकी साड़ी अतिथि के कमरे में रख दी। यह देखकर राजा ने बिना सत्य जांचे उसे महल से निकाल दिया।
सैनिक यह सब सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरंत महल लौटकर राजा के समक्ष यह कथा सुना दी।
सैनिकों से पूरी बात सुनकर राजा के हृदय में गहरा पश्चाताप जागा। उसे अहसास हुआ कि बिना सच्चाई जाने पुत्रवधू पर दोषारोपण कर उसे निकाल देना बड़ा अन्याय था। उसने तुरंत दूत भेजकर अपनी बहू को वापस बुलाने का आदेश दिया।
बहू जब महल में वापस लौटी तो राजा ने उसे सम्मान के साथ स्वीकार किया। घर परिवार के बीच उसकी प्रतिष्ठा दोबारा स्थापित हुई। इस प्रकार पीपल के वृक्ष के नीचे नियमित दीपक जलाने, पूजा करने और व्रत पालन करने का फल उसे मिला और उसका जीवन पुनः सुख और सम्मान से भर गया।
यह कथा संकेत देती है कि हरियाली अमावस्या के दिन सच्चे मन से किया गया व्रत, पीपल की पूजा और दीपक जलाने का साधारण कार्य भी मनुष्य के दुख दूर कर सकता है और सामाजिक अपमान से मुक्ति दिला सकता है।
हरियाली अमावस्या का व्रत क्यों रखा जाता है?
हरियाली अमावस्या का व्रत पीपल की पूजा, भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने तथा जीवन से कष्ट और अपयश दूर करने के लिए रखा जाता है।
क्या केवल कथा सुनने या पढ़ने से भी लाभ होता है?
हाँ, मान्यता है कि हरियाली अमावस्या के दिन पीपल पूजा के बाद व्रत कथा सुनने या पढ़ने मात्र से भी संकट कम होते हैं और सुख समृद्धि बढ़ती है।
पीपल के नीचे दीपक जलाने का क्या महत्व है?
पीपल के नीचे दीपक जलाकर प्रार्थना करने से त्रिदेव की कृपा प्राप्त मानी जाती है और यह साधना जीवन में प्रकाश, ज्ञान और सही निर्णय क्षमता बढ़ाती है।
क्या हरियाली अमावस्या व्रत केवल महिलाओं को करना चाहिए?
ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। स्त्री और पुरुष दोनों श्रद्धा के साथ हरियाली अमावस्या का व्रत रख सकते हैं और पीपल की पूजा कर सकते हैं।
इस व्रत से जीवन में कौन से परिवर्तन देखे जा सकते हैं?
नियमित व्रत और पीपल पूजा से मन में शांति आती है, परिवार में सम्मान और सामंजस्य बढ़ता है और अचानक आने वाले कष्ट धीरे धीरे कम होने लगते हैं।
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