By पं. अभिषेक शर्मा
प्रकृति की कृतज्ञता और व्रत का धार्मिक महत्व

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह वही समय होता है जब वर्षा ऋतु अच्छी तरह जम जाती है और धरती हर ओर हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। यह श्रावण मास की पहली अमावस्या होती है, इसलिए धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना की जाती है और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
हरियाली अमावस्या केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में इसकी विशेष धूम रहती है। महाराष्ट्र में यही तिथि गटारी अमावस्या के रूप में मनाई जाती है। आंध्र प्रदेश में इसे चुक्कला अमावस्या कहते हैं और ओडिशा में चितलागी अमावस्या के रूप में सम्मान दिया जाता है। नाम भले भिन्न हों, पर भाव एक ही रहता है कि इस दिन हरियाली, जल और देवताओं की कृपा के लिए प्रार्थना की जाए।
हरियाली अमावस्या, हरियाली तीज से तीन दिन पूर्व पड़ती है। पूरा श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस समय वर्षा का जल खेती के लिए आधार बनता है। अच्छी वर्षा से अनाज की समृद्धि होती है और सूखे जैसी विपत्तियों से बचाव होता है। इसीलिए हरियाली अमावस्या का संबंध केवल पूजा तक सीमित न होकर कृषि, जल और पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।
हिंदू परंपरा के अनुसार श्रावण मास देवताओं की विशेष कृपा का काल माना जाता है। इस महीने में किए गए व्रत, पूजन, दान और जप सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक फलदायी माने जाते हैं। हरियाली अमावस्या के दिन पितृ तर्पण और दान पुण्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विशेष महत्व है, क्योंकि पीपल को त्रिदेव का वास स्थान माना गया है।
हरियाली अमावस्या की सुबह भक्त शीघ्र उठकर स्नान करते हैं। इसके बाद गंगाजल या स्वच्छ जल से घर के पूजा स्थान को शुद्ध किया जाता है। फिर निकट के किसी पीपल वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में जल, दूध या जल मिश्रित दूध अर्पित किया जाता है। हल्दी, कुंकुम, अक्षत और फूल चढ़ाए जाते हैं। पीपल के चारों ओर परिक्रमा कर भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्मा का ध्यान किया जाता है।
इस दिन पितृ तर्पण की भी परंपरा है। पितरों के नाम से तिल, जल और तर्पण अर्पित किया जाता है और यह भावना रखी जाती है कि पूर्वजों की आत्मा प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करे। बहुत से लोग इस दिन ब्राह्मण भोजन, गाय को चारा, पक्षियों को दाना और जरूरतमंदों को वस्त्र या अन्न का दान भी करते हैं।
| हरियाली अमावस्या के प्रमुख कार्य | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| पितृ तर्पण | तिल और जल से पूर्वजों का स्मरण और तर्पण |
| पीपल पूजा | पीपल की जड़ में जल, दूध, हल्दी, कुंकुम, फूल अर्पण |
| शिव पूजन | रुद्राभिषेक, बिल्वपत्र, धूप दीप, मंत्र जप |
| दान पुण्य | ब्राह्मण, गौ, पक्षी और गरीबों को अन्न एवं वस्त्र दान |
हरियाली अमावस्या के दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करने का विधान है। भक्त प्रातः स्नान के बाद सफेद या हल्के हरे वस्त्र धारण कर शिवालय में जाते हैं। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक किया जाता है। इसके साथ बिल्वपत्र, धतूरा, भस्म, चंदन और फूल अर्पित किए जाते हैं।
शिव पूजन करते समय कई भक्त पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जप करते हैं। इसे Om Namah Shivaya कहा जाता है, जिसका अर्थ है "प्रभु शिव को नमस्कार"। इस दिन रखा गया व्रत सामान्यतः निर्जल न होकर फलाहार या एक समय के सात्त्विक भोजन के रूप में रखा जाता है। भोजन पूजा और संध्या आरती के बाद ही ग्रहण किया जाता है।
शिव मंदिरों में इस दिन विशेष दर्शन, रुद्राभिषेक और भजन संकीर्तन का आयोजन होता है। महिलाएं अपने पति की आयु, स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन के लिए शिव पार्वती से प्रार्थना करती हैं।
जिन लोगों को जीवन में बार बार बाधा, विवाद और आर्थिक उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ता है, वे हरियाली अमावस्या पर सरल उपाय कर सकते हैं। सुबह पीपल की जड़ में जल के साथ थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाकर अर्पित करें। तीन या सात परिक्रमा कर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का मानसिक जप करें। इस मंत्र को Om Namo Bhagavate Vasudevaya बोला जाता है, जिसका अर्थ है "भगवान वासुदेव को नमस्कार"।
संध्या के समय घर के मुख्य द्वार पर दो दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है। एक दीपक तिल के तेल का और दूसरा घी का रखा जाता है। इससे घर के भीतर की नकारात्मकता कम मानी जाती है और लक्ष्मी कृपा की संभावना बढ़ती है।
गुजरात में हरियाली अमावस्या को दिवासो के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घी का एक विशेष दीपक प्रज्वलित किया जाता है, जिसे लगभग छत्तीस घंटे तक जलाए रखने का प्रयास किया जाता है। यह दीपक आध्यात्मिक जागृति और अंधकार नाश का प्रतीक माना जाता है।
यह दिन वहां अव्रत जीव्रत व्रत से भी जुड़ा माना जाता है, जो माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। महिलाएं निरंतर जलते दीपक के सामने बैठकर प्रार्थना करती हैं और परिवार की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख की कामना रखती हैं।
कर्नाटक में हरियाली अमावस्या को भीमाना अमावस्या या ज्योति भीमेश्वर व्रतम के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। अविवाहित लड़कियां योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति, भाई और पिता के उत्तम स्वास्थ्य तथा दीर्घायु के लिए उपवास करती हैं।
इस व्रत को प्रायः लगातार नौ वर्षों तक करने का विधान है। इस दिन विशेष रूप से आटे के दीपक, जिन्हें थम्बिट्टु दिया कहा जाता है, तैयार किए जाते हैं। इन दीपकों में घी या तेल भरकर उन्हें शिव और पार्वती के समक्ष जलाया जाता है।
महाराष्ट्र में हरियाली अमावस्या को गटारी अमावस्या कहा जाता है। यह दिन एक प्रकार से उत्सव और उल्लास का प्रतीक माना जाता है। कई स्थानों पर लोग इस दिन स्वादिष्ट भोजन, विशेष रूप से मांसाहारी पकवान भी बनाते हैं। इसका अर्थ यह होता है कि अब अगले श्रावण मास के दौरान भोजन में संयम रखा जाएगा और व्रत, साधना तथा पूजा पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।
श्रावण मास में बहुत से भक्त दिन भर व्रत रखकर केवल एक समय भोजन करते हैं या केवल फलाहार ही ग्रहण करते हैं। गटारी अमावस्या को पुरानी बुरी आदतों को अलविदा कहने और आगे के पवित्र समय का स्वागत करने का प्रतीक माना जाता है।
कई स्थानों पर हरियाली अमावस्या की संध्या दीप पूजा को समर्पित होती है। घरों को सुंदर रंगीन दीयों और lamps से सजाया जाता है। दीप पूजा में अपने इष्ट देव, देवी लक्ष्मी, देवी पार्वती, देवी सरस्वती तथा पंच महाभूत अर्थात वायु, जल, अग्नि, आकाश और पृथ्वी को प्रणाम किया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि दीप पूजा से अष्ट ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इन ऐश्वर्यों में धन, धान्य, संतति, सुख, आरोग्य, कीर्ति, ज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति का संकेत देखा जाता है। दीपक की रोशनी मन के अंधकार, भय और नकारात्मक विचारों को दूर कर जीवन में नए उत्साह और सकारात्मकता का संचार करती है।
हरियाली अमावस्या का मुख्य आध्यात्मिक उद्देश्य क्या माना जाता है?
हरियाली अमावस्या का मुख्य उद्देश्य प्रकृति, वर्षा और हरियाली के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना, पितृ तर्पण द्वारा पूर्वजों को स्मरण करना और भगवान शिव सहित देवताओं की कृपा प्राप्त करना माना जाता है।
क्या हरियाली अमावस्या का व्रत सभी लोग रख सकते हैं?
हाँ। स्त्री, पुरुष, विवाहित, अविवाहित सभी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रख सकते हैं और पीपल पूजा, शिव पूजन तथा दान का संकल्प ले सकते हैं।
इस दिन विशेष तौर पर कौन सा दान शुभ माना जाता है?
अन्न दान, वस्त्र दान, तिल और गुड़ का दान, गौ सेवा, पक्षियों को दाना और पितरों के नाम से तर्पण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
क्या हरियाली अमावस्या पर केवल शिव की ही पूजा करनी चाहिए?
मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा की जाती है, परंतु साथ में माता पार्वती, पीपल वृक्ष, दीप पूजा और पितृ पूजन भी इस दिन के महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं।
क्या दीप पूजा और पीपल पूजा घर की नकारात्मकता को कम करने में सहायक मानी जाती है?
परंपरागत मान्यता है कि नियमित दीपक, पीपल पूजा और सत्य आचरण से घर का वातावरण शुद्ध होता है, नकारात्मकता कम होती है और परिवार में शांति तथा समृद्धि बढ़ती है।
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