By पं. नरेंद्र शर्मा
विवाहिक सुख और स्थिर परिवार के लिए व्रत का महत्व

सावन की हरियाली में मन और प्रकृति दोनों का स्वभाव कोमल हो जाता है। ऐसे समय में आने वाली हरियाली तीज केवल त्योहार नहीं मानी जाती बल्कि सुहाग, सौभाग्य और वैवाहिक जीवन में प्रेम की दीर्घता से जुड़ा हुआ एक बहुत ही पवित्र व्रत समझा जाता है। इस दिन देवी पार्वती का विशेष पूजन किया जाता है और मान्यता है कि इस व्रत की कथा को श्रद्धा से सुनने या पढ़ने से विवाह योग्य कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी और विवाहित स्त्रियों को स्थिर और सुखी गृहस्था का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भविष्य पुराण में हरियाली तीज का विस्तृत वर्णन मिलता है। तृतीया तिथि पर रखा गया यह व्रत देवी पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। परंपरा है कि सावन मास की हरियाली तीज को स्त्रियां व्रत रखकर शिव पार्वती की आराधना करती हैं। इस व्रत के पीछे केवल एक अनुष्ठानिक परंपरा ही नहीं बल्कि देवी पार्वती के अनेक जन्मों की तपस्या और भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने की अद्भुत कथा छिपी हुई है।
हरियाली तीज सावन मास में आने वाला एक प्रमुख त्योहार है जो संपूर्ण रूप से देवी पार्वती को समर्पित माना जाता है। तीज का अर्थ है चंद्र मास की तृतीया तिथि। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि पर रखा गया व्रत देवी पार्वती को शीघ्र प्रसन्न करने वाला होता है।
पुराणों में उल्लेख आता है कि चंद्रमा की सत्ताईस पत्नियां हैं, जिनमें रोहिणी को सबसे प्रिय माना गया। कथा के अनुसार रोहिणी ने तृतीया तिथि का विशेष व्रत किया था, जिसके प्रभाव से चंद्रमा का स्नेह अन्य के मुकाबले रोहिणी पर अधिक हो गया। इसी आधार पर तीज का व्रत प्रेम, लगाव और वैवाहिक सौभाग्य की वृद्धि करने वाला माना जाता है।
सावन के मास में जो कुंवारी कन्याएं और सुहागन स्त्रियां तृतीया तिथि को हरियाली तीज की कथा सुनती हैं और देवी पार्वती के साथ भगवान शिव की पूजा करती हैं, उन्हें मनोनुकूल जीवनसाथी और दीर्घ सुहाग का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है। कहा जाता है कि इसी दिन से शिव पार्वती ने इस व्रत को कन्याओं और सुहागिनों के लिए विशेष रूप से कल्याणकारी घोषित किया।
हरियाली तीज की कथा को समझने के लिए पहले देवी पार्वती के पूर्वजन्म, देवी सती की कथा को जानना आवश्यक है। पुराणों में वर्णन है कि देवी पार्वती अपने पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं। उस समय दक्ष प्रजापति भगवान शिव के विरोधी स्वभाव के थे। वे चाहते थे कि अपनी कन्या सती का विवाह भगवान विष्णु से करें, जबकि सती अपने चित्त से शिव को ही पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं।
अंततः परिस्थितियों और पुत्री के आग्रह के आगे झुककर दक्ष प्रजापति को सती का विवाह भगवान शिव से करना पड़ा। मन से सहमति न होने के कारण दक्ष के हृदय में शिव के प्रति द्वेष बना रहा। समय बीतने पर दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवता, ऋषि, नाग, गंधर्व और अन्य लोकों के विशिष्ट जनों को निमंत्रित किया, परंतु भगवान शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया।
जब इस महायज्ञ की चर्चा त्रिलोक में होने लगी तो समाचार देवी सती के कानों तक भी पहुंचा। उन्हें यह जानकर अत्यंत दुख हुआ कि उनके पिता ने उन्हें और उनके पति को यज्ञ में बुलाने की आवश्यकता तक नहीं समझी। फिर भी पुत्री भाव के कारण उनका मन पिता के यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल होने लगा।
देवी सती ने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की इच्छा प्रकट की। महादेव ने अत्यंत शांत भाव से कहा कि बिना बुलाए पिता के घर जाने से सम्मान घटता है और जहां किसी का आदर न हो वहां जाना उचित नहीं होता। उन्होंने सती को रोकने का प्रयास किया और समझाया कि इस यज्ञ में जाना अपमान का कारण भी बन सकता है।
लेकिन सती का मन पिता के प्रति स्नेह और जिद में इतना दृढ़ था कि उन्होंने शिव की बात न मानते हुए अकेले ही मायके जाने का निश्चय कर लिया। वे बिना आमंत्रण के पिता के महायज्ञ में पहुंच गईं।
यज्ञ स्थल पर पहुंचने पर उनका सम्मान और स्नेह से स्वागत होने के स्थान पर उल्टा अपमान हुआ। दक्ष प्रजापति ने न केवल भगवान शिव की आलोचना की बल्कि सती के वहां आने को भी अस्वीकार कर दिया। अनेक कटु वचन कहकर उन्होंने सती के हृदय को गहराई से आहत किया।
उस समय सती को महादेव के वे सारे वचन स्मरण हो आए, जिनमें उन्होंने बिना बुलाए जाने से रोकते हुए अपमान का संकेत दिया था। देवी सती को लगा कि उन्होंने स्वयं आकर उस अपमान को आमंत्रित किया है और अपने कारण अपने अराध्य पति का तिरस्कार सहन किया है।
वह अत्यंत दुख और क्रोध से व्याकुल हुईं। उन्होंने निश्चय किया कि जिस देह ने भगवान शिव का अपमान सहा है, उस शरीर के साथ जीना उचित नहीं। शिव का ध्यान करते हुए उन्होंने उसी यज्ञ कुंड में प्रवेश कर आत्माहुति दे दी। इसी प्रकार सती ने पिता के यज्ञ में देह त्याग कर सतीत्व की सर्वोच्च मर्यादा निभाई।
देवी सती के अग्नि में प्रवेश की सूचना भगवान शिव तक पहुंचते ही उनका क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने केश से वीरभद्र नामक प्रचंड गण को प्रकट किया और उसे आदेश दिया कि दक्ष के यज्ञ को विध्वंस कर दे। वीरभद्र ने यज्ञ स्थल पर पहुंचकर समस्त व्यवस्था को नष्ट किया और दक्ष के गौरव को धूल में मिला दिया।
इसके बाद भगवान शिव गहरे वैराग्य में चले गए। वे सती के वियोग से व्याकुल होकर घोर तपस्या में लीन हो गए। इधर देवी सती को अपने ही निर्णय का फल भी भोगना पड़ा। उन्हें भगवान शिव की आज्ञा का उल्लंघन करने का परिणाम अनेक जन्मों के रूप में सहना पड़ा।
कथा के अनुसार देवी सती के कुल सौ आठ जन्म हुए। इनमें से पहले एक सौ सात जन्मों तक उन्होंने शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए विविध लोकों और देहों में कठोर तपस्या की।
सौ आठवें जन्म में देवी सती ने हिमालय के घर जन्म लेकर पार्वती के रूप में अवतार लिया। इस जन्म में भी उनका मन बचपन से ही भगवान शिव की ओर सहज रूप से आकर्षित रहा। वे उन्हें ही अपने भावी पति के रूप में चाहती थीं।
कथा के अनुसार सावन के पावन मास में देवी पार्वती ने मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण किया। वे निर्लिप्त होकर उसी शिवलिंग की पूजा और निरंतर तपस्या में लीन हो गईं। पर्वत राज हिमालय भी पुत्री की इस कठोर साधना को देखकर आश्चर्य करते थे, पर पार्वती का संकल्प अटल था कि इस जन्म में भी उन्हें वही महादेव पति रूप में प्राप्त हों।
कई वर्ष की तपश्चर्या और भक्ति के बाद हरियाली से भरे इस पावन समय में, हरियाली तीज के दिन भगवान शिव पार्वती के सामने प्रकट हुए। उन्होंने पार्वती की तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वे उनकी अर्धांगिनी बनेंगी। इस प्रकार देवी पार्वती को हरियाली तीज के दिन अपने मनचाहे वर, भगवान शिव की प्राप्ति हुई।
यही वह क्षण माना जाता है जब हरियाली तीज का व्रत स्त्रियों के लिए विशेष रूप से फलदायी घोषित हुआ। शिव ने स्वयं पार्वती से कहा कि जो भी कन्या श्रद्धा से हरियाली तीज का व्रत रखेगी और शिव पार्वती की आराधना करेगी, उसे भी योग्य पति की प्राप्ति होगी।
हरियाली तीज की कथा केवल अविवाहित कन्याओं के लिए ही नहीं बल्कि विवाहित स्त्रियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि जो सुहागिन स्त्रियां हरियाली तीज का व्रत रखकर शिव पार्वती की पूजा करती हैं, उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम, सम्मान और स्थिरता बनी रहती है।
यह व्रत स्त्री के संकल्प, संयम और समर्पण का प्रतीक है। देवी पार्वती ने अनेक जन्मों तक तपस्या कर, हरियाली तीज के दिन शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया। इसी आदर्श के आधार पर स्त्रियां यह विश्वास रखती हैं कि सच्चे मन से किए गए इस व्रत से पति पत्नी के बीच विश्वास और स्नेह गहरा होता है और जीवन की बाधाएं धीरे धीरे हल्की हो जाती हैं।
| हरियाली तीज व्रत से जुड़ा संकेत | आध्यात्मिक अर्थ |
|---|---|
| पार्वती की तपस्या | धैर्य, समर्पण और एकनिष्ठ प्रेम |
| शिव का प्रकट होना | सही समय पर कृपा और मनोकामना की पूर्ति |
| कन्याओं के लिए वरदान | योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति की आशा |
| सुहागिनों के लिए संदेश | दांपत्य में प्रेम, सम्मान और दीर्घ सुहाग |
हरियाली तीज का व्रत मुख्य रूप से किसके लिए शुभ माना जाता है?
हरियाली तीज का व्रत कुंवारी कन्याओं और सुहागिन स्त्रियों, दोनों के लिए शुभ माना जाता है। कन्याएं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए और विवाहित स्त्रियां स्थिर, सुखी दांपत्य और दीर्घ सुहाग की कामना से यह व्रत रखती हैं।
इस कथा में देवी सती और देवी पार्वती का क्या संबंध बताया गया है?
कथा के अनुसार देवी पार्वती, देवी सती का ही अगला जन्म हैं। सती ने अनेक जन्मों तक तपस्या की और अंततः हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर फिर से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।
देवी सती के यज्ञ में आत्मदाह का प्रसंग हरियाली तीज से कैसे जुड़ता है?
सती के आत्मदाह के बाद ही उनके पुनर्जन्मों का क्रम शुरू होता है और अंत में पार्वती के रूप में वे हरियाली तीज के दिन शिव को पुनः प्राप्त करती हैं। इसलिए हरियाली तीज व्रत को सती पार्वती के तप और समर्पण से जुड़ा पवित्र दिन माना जाता है।
हरियाली तीज व्रत में सबसे महत्वपूर्ण भाव क्या माना जाता है?
इस व्रत में दिखावे से अधिक भाव, श्रद्धा और निष्ठा को महत्व दिया गया है। पार्वती की तरह दृढ़ संकल्प, संयम और देव प्रति विश्वास ही इस व्रत की आत्मा समझे जाते हैं।
क्या हरियाली तीज का व्रत केवल महिलाओं को ही करना चाहिए?
मुख्य रूप से यह व्रत स्त्रियों के लिए माना गया है, परंतु पुरुष भी इस दिन शिव पार्वती की पूजा कर पारिवारिक सुख, दांपत्य की स्थिरता और जीवन में सौभाग्य की प्रार्थना कर सकते हैं।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, करियर
इनके क्लाइंट: पंज., हरि., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें