By पं. संजीव शर्मा
जानिए ऋग्वेद के गूढ़ रहस्यों, ब्रह्मांडीय रचनात्मकता और देवताओं के संघर्ष की अनसुनी कथाएँ

भारतीय संस्कृति के सबसे प्राचीन और आधारभूत ग्रंथों में ऋग्वेद का स्थान विशिष्ट है। संस्कृत के इन सूक्तों में प्रार्थना, यज्ञ और देवताओं की स्तुति के साथ साथ ब्रह्मांड, सृष्टि और अस्तित्व की गहरी खोज भी निहित है। ऋग्वेद केवल मंत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि मानव चेतना की उस जिज्ञासा का प्रारंभ है जिसने सृष्टि, ऊर्जा, अराजकता और संतुलन के रहस्यों को समझने की चेष्टा की।
प्रारंभ में न प्रकाश था न अंधकार; केवल असीम शून्य था।
इसी रिक्तता से प्रकट हुआ हिरण्यगर्भ, ‘स्वर्ण अंडा’, जिसने सृष्टि की पहली चिंगारी जगाई।
यहीं से प्रकाश, अंधकार, जीवन, मृत्यु, स्थायित्व और लय जैसे सभी तत्व एक ही स्रोत में समाहित हुए।
ऋग्वेद इस प्रथम स्पंदन को सृजन और विनाश के संतुलन की प्रारंभिक तह के रूप में वर्णित करता है।
हिरण्यगर्भ के उद्भेदन से प्रकट सूर्य जीवन का केंद्र बना।
ऋग्वेद में सूर्य केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि ऋत अर्थात् ब्रह्मांडीय नियमों का अधिष्ठाता है।
इंद्र, अग्नि, वायु, वरुण, सोम जैसे देवता सृष्टि की रक्षा, व्यवस्था और संतुलन के स्तंभ हैं।
ये देवता केवल पूजनीय रूप नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्तियों के जीवंत प्रतीक हैं।
ऋग्वेद में देव (व्यवस्था, सत्य) और असुर (अराजकता, स्वार्थ) के मध्य सतत संघर्ष दिखाई देता है।
असुरों को ‘बुराई’ नहीं, बल्कि असंतुलन, अव्यवस्था और भौतिक प्रवृत्तियों के रूपक के रूप में देखा गया।
सबसे प्रसिद्ध कथा है इंद्र और वृत्र का युद्ध, जिसमें इंद्र वज्र से वृत्र का संहार कर जलधाराओं को मुक्त करते हैं।
यह युद्ध ‘ऋत’ की रक्षा और जीवन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
ऋग्वेद में सोम का स्थान अत्यंत पवित्र है।
सोम केवल एक पेय नहीं, बल्कि चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने वाली दिव्य ऊर्जा है।
देवता और ऋषि दोनों सोम का सेवन कर ऊर्जस्वित, प्रबुद्ध और प्रेरित होते हैं।
सोम को शक्ति और अमरता का स्रोत माना गया, परंतु उसका अनुचित प्रयोग विनाश का कारण भी बन सकता है—इसीलिए इसे दोधारी शक्ति कहा गया है।
ऋग्वेदिक धर्म में यज्ञ ब्रह्मांड की धुरी है।
यज्ञ केवल देवताओं को अर्पण नहीं, बल्कि सृष्टि की निरंतर गति और संतुलन का प्रतीक है।
पुरुष सूक्त के अनुसार, प्रथम पुरुष के यज्ञ से ही आकाश, पृथ्वी, समाज-व्यवस्था, जीवन और प्रकृति की रचना हुई।
यज्ञ में बलिदान केवल अर्पण नहीं, बल्कि परिवर्तन, नवसृजन और अनंत प्रवाह का संकेत है।
नासदीय सूक्त ऋग्वेद का सबसे दार्शनिक और रहस्यमय सूक्त है।
यह कहता है—“सृष्टि कैसे बनी? क्या देवता भी इसका स्रोत जानते हैं?”
यह सूक्त स्वीकार करता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति तर्क से परे एक अद्भुत रहस्य है।
मानव चेतना को अपने अस्तित्व की तहों को देखने का निमंत्रण यही से मिलता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| हिरण्यगर्भ | सृष्टि का प्रथम बीज, स्वर्ण अंडा |
| सूर्य व देवता | सूर्य समय और जीवन का केंद्र; अन्य देवता व्यवस्था के रक्षक |
| देव-असुर संघर्ष | अराजकता बनाम व्यवस्था का संतुलन |
| सोम | अमरता और दिव्यता की चेतना |
| यज्ञ | ब्रह्मांड का रचनात्मक बलिदान |
| नासदीय सूक्त | सृष्टि का अनुत्तरित रहस्य |
ऋग्वेद हमें स्मरण कराता है कि ब्रह्मांड केवल देखा हुआ संसार नहीं, बल्कि सतत परिवर्तनशील, रहस्यमय और असीम चेतना का विस्तार है। सूर्य, वायु, जल, अग्नि, सोम—सब सृष्टि का वह नृत्य हैं जिसमें हम भी सहभागी हैं।
ऋग्वेद हमें यह आमंत्रण देता है—इस विराट रचना में अपना स्थान पहचानो, क्योंकि तुम भी उसी प्रथम स्पंदन का अंश हो।
1. ऋग्वेद को सबसे प्राचीन ग्रंथ क्यों माना जाता है?
क्योंकि यह वैदिक काल की सबसे पुरानी संरचित काव्य परंपरा है जिसमें मानव सभ्यता की शुरुआती आध्यात्मिक सोच दिखाई देती है।
2. हिरण्यगर्भ का अर्थ क्या है?
‘स्वर्ण अंडा’ जिससे सृष्टि की पहली ऊर्जा प्रकट हुई।
3. देव और असुर के संघर्ष का क्या अर्थ है?
यह व्यवस्था और अराजकता, सत्य और अव्यवस्था के बीच संतुलन का प्रतीक है।
4. सोम को अमृत क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह चेतना को ऊर्जस्वित बनाता है और देवताओं के लिए शक्ति का स्रोत माना गया।
5. नासदीय सूक्त क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर प्रश्न उठाता है और अस्तित्व की अनिश्चितता को स्वीकार करता है।
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