By पं. अमिताभ शर्मा
जब आप दूसरों को नहीं अपने मन को जीतने लगते हैं तो दूरी भी बदला नहीं आत्म-सम्मान और स्पष्टता बन जाती है

कभी वह समय आता है जब आप उस व्यक्ति को अपना दर्द समझाने की कोशिश छोड़ देते हैं जिसने आपको चोट पहुँचाई हो। आप यह कहना बंद कर देते हैं “मैंने यह नहीं चाहा था” क्योंकि धीरे धीरे समझ आता है कि घाव इस बात से नहीं भरते कि सामने वाला आपकी कीमत मान ले घाव तब भरते हैं जब आप चुपचाप अपनी शांति वापस लेने लगते हैं। गीता का भाव है जो अपने मन को जीत लेता है वह बाहरी युद्धों में हज़ार जीतने वाले से भी ऊपर है। अपनी ऊर्जा की रक्षा करना वही inner विजय है।
यह दूरी कठोर या पत्थरदिल होने की शिक्षा नहीं बल्कि भीतर की जिम्मेदारी लेने की शिक्षा है। आप दूसरों के बदलने पर निर्भर रहना छोड़कर अपने विचारों प्रतिक्रियाओं और आसक्तियों के साथ संबंध बदलना सीखते हैं ताकि कोई भी व्यक्ति आपकी शांति का मालिक न बन सके।
जब किसी को साँप काट ले तो समझदार व्यक्ति साँप के पीछे यह पूछने नहीं भागता कि “तूने ऐसा क्यों किया।” वह सीधे घाव पर ध्यान देता है ज़हर निकालने की मरहम ढूँढ़ने की कोशिश करता है। रिश्तों में चोट लगने पर हम अक्सर उलटा करते हैं। हम उसी इंसान के पीछे दौड़ते हैं स्पष्टीकरण माफ़ी और मान्यता माँगते हैं लम्बे संदेश बहसें परोक्ष ताने बार बार अपनी कहानी सुनाते हैं ताकि वह मान ले कि वह गलत था।
गीता वाला दृष्टिकोण यह कहता है ध्यान साँप से हटाकर घाव पर लाओ। जो हुआ उसे सच मानो लेकिन उपचार की दिशा भीतर रखो। जितनी बार आप “तुमने ऐसा क्यों किया” वाले चक्कर में पड़ते हैं उतनी बार अपने ही घाव को फिर से खोलते हैं। भावनात्मक दूरी का पहला कदम यह स्वीकार है “मुझे चोट लगी है और उसे भरना मेरी जिम्मेदारी है सामने वाला कैसा है यह उसकी कहानी है।”
इस चुप्पी को ठंडा व्यवहार समझना नहीं यह समझना है कि अब मैं बहस नहीं उपचार चुन रहा हूँ।
गीता के अनुसार इंद्रियाँ और मन अनियंत्रित रहें तो वे ज्ञान और विवेक दोनों को नष्ट कर देते हैं। भावनात्मक स्तर पर यह तब दिखता है जब हम जानते हैं कि कोई संबंध हमें तोड़ रहा है फिर भी बार बार वहीं लौटते हैं। हम लगातार सजग या असजग रूप से संदेश पढ़ते रहते हैं पुरानी बातें दोहराते हैं सोचते रहते हैं कि सामने वाला अब क्या कर रहा होगा मन ही मन उससे बहस करते रहते हैं। शरीर तो वहीं है पर भीतर का जीवन लगातार उसी व्यक्ति के इर्द गिर्द घूम रहा होता है।
विरक्ति की शुरुआत यह देखने से होती है कि मेरी ऊर्जा वास्तव में कहाँ जा रही है। क्या वह शरीर साधना काम सीखने और विश्राम में लग रही है या शिकायत कल्पना और बदले की इच्छा में जल रही है। जितनी ऊर्जा आप पुराने प्रसंगों और “क्यों” पर खर्च करते हैं उतना ही भीतर से खाली महसूस करते हैं।
गीता हमें बाहर के नियंत्रण से हटाकर भीतर की स्पष्टता की ओर मोड़ती है। जिसका स्वभाव वैसा ही है उसे आप बदल नहीं सकते लेकिन उसे लेकर अपने भीतर क्या जन्म ले रहा है उसे पहचानकर आप अपने चक्र को बदल सकते हैं।
एक सरल अभ्यास यह हो सकता है कि रात को सोने से पहले थोड़ी देर चुपचाप बैठें। मन में देखें कि आज दिन भर वह किन लोगों यादों या कल्पनाओं पर सबसे अधिक अटका रहा। फिर शांत मन से यह भाव रखें
“मैं अपनी ऊर्जा उन सभी लोगों स्थितियों और स्मृतियों से वापस बुलाता हूँ जहाँ अब मेरी उपस्थिति ज़रूरी नहीं। जो दर्द उम्मीदें और बोझ मैं अपने हिस्से से अधिक उठा रहा था उसे आज यहीं रखता हूँ। मेरी पहली निष्ठा मेरे भीतर बैठे ईश्वर के प्रति है।”
इसके साथ हल्का सा ध्यान करें कि पतली रोशनी के धागे उन जगहों से निकलकर आपके हृदय में लौट रहे हैं। इससे बाहर कुछ अद्भुत हो या न हो पर भीतर एक निर्णय बनता है “अब मैं खुद को उन स्थानों में नहीं उलझाऊँगा जहाँ मेरी गरिमा और शांति सुरक्षित नहीं।” धीरे धीरे यह आदत बनती है और मन का स्वभाव “भागकर वहाँ जाने” से “लौटकर यहीं आने” की ओर बदलने लगता है।
जितना आप अपने भीतर रस भरते हैं उतना ही कम आप दूसरों से अपने आप को सिद्ध कराने की लालसा रखते हैं और उतना ही स्वाभाविक आकर्षण आपकी उपस्थिति में आ जाता है।
जब गीता इंद्रियों को नियंत्रित करने की बात कहती है तो ज़्यादातर लोग भोजन भोग या वस्तुओं की तरफ सोचते हैं। भावनात्मक दूरी में सबसे बड़ा “भोग” कई बार मन का होता है बार बार देखना जाँचना कल्पना करना बहस को भीतर दोहराते रहना। आप कुछ खा नहीं रहे खरीद नहीं रहे पर आपकी पूरी चेतना उसी व्यक्ति को “खाती” रहती है।
इंद्रियनिग्रह यहाँ छोटे छोटे तय नियमों की तरह दिख सकता है जैसे
यह दमन नहीं यह स्वीकार है कि मैं जानता हूँ कि कौन सा व्यवहार मेरे घाव को फिर से ताज़ा कर देता है इसलिए मैं स्वयं को उससे धीरे धीरे दूर रखूँगा। गीता किले के द्वारों की तरह इंद्रियों को दिखाती है जब द्वार पर पहरा होता है भीतर शत्रु प्रवेश नहीं कर पाता। आपके लिए यह “शत्रु” वह पुरानी आदत है जो बार बार आपको उसी चोट की ओर खींचती है।
अक्सर हम ऐसे घरों में बड़े होते हैं जहाँ ज़रूरत से अधिक देना सबको खुश रखने के लिए स्वयं को मिटा देना चुपचाप सहते रहना या अपराधबोध के कारण रिश्ते ढोना सामान्य बात रही हो। गीता का वाक्य कि “अपना कर्म भले दोषयुक्त हो पर दूसरों का कर्म सुन्दर रूप से करने से बेहतर है” रिश्तों में भी लागू होता है।
आपका स्वधर्म यह हो सकता है कि आप पहली बार स्पष्ट “ना” कहना सीखें भले ही कुछ लोग इसे स्वार्थ कहें। किसी अन्य का स्वधर्म यह हो सकता है कि वह अपने कर्मों के फल को देखे और उससे सीखे। जब आप हमेशा बचाने समझाने या घसीटकर जोड़ने की भूमिका निभाते हैं तो आप अपने नहीं किसी और के हिस्से का काम उठा लेते हैं और भीतर थकान गुस्सा और खालीपन पनपता है।
पीढ़ीगत पैटर्न तोड़ना शुरू में गलत सा लगता है क्योंकि वह नया है। पर जब आप देखते हैं कि इस दूरी से आपके भीतर अधिक शांति स्पष्टता और स्वाभिमान आ रहे हैं तो धीरे धीरे समझ आता है कि आप केवल अपने लिए नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्वस्थ सीमा रेखा बना रहे हैं।
चोट लगने के बाद मन का पहला सवाल होता है “उन्होंने ऐसा क्यों किया।” इस “क्यों” का कोई संतोषजनक उत्तर प्रायः नहीं मिलता और हम उसी घेरे में घूमते रहते हैं। गीता की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है “अब मेरे सामने क्या धर्मसम्मत कदम है।”
भावनाओं को दबाए बिना थोड़ा शांत होकर अपने आप से पूछना “अगर मैं अपने भीतर के सत्य के प्रति ईमानदार रहूँ तो अभी मुझे क्या करना चाहिए” यही कर्मयोग की शुरुआत है। कभी उत्तर होता है खुलकर बातचीत कभी होता है थोड़ी दूरी कभी होता है सम्बन्ध समाप्त करना पर हर बार आधार होता है “मैं अपने आत्मसम्मान और भीतर के ईश्वर का अनादर नहीं करूँगा।”
यह परिवर्तन आपको पीड़ित की जगह कर्ता की स्थिति में खड़ा करता है।
जब आप उस व्यक्ति के पीछे बार बार दौड़ते हैं जिसने बार बार अनादर किया हो तो आप अनजाने में अपने भीतर को यह संकेत दे रहे होते हैं कि “मेरी कीमत तुम्हारे व्यवहार से तय होती है।” गीता आत्मा को पूर्ण स्वप्रकाश और नित्य कहती है। जब आप बाहर की मान्यता के पीछे भागते हैं तो अपने भीतर के इस प्रकाश को अनदेखा कर देते हैं।
अपने भीतर की दिव्यता को सम्मान देने का अर्थ बाहर चिल्लाना नहीं कि “जानते नहीं मैं कौन हूँ” बल्कि भीतर धीरे से याद दिलाना है “मैं इस व्यवहार के लायक नहीं हूँ और मैं खुद अपने को इस स्थिति से निकालूँगा।” जब आप ऐसी दूरी बनाते हैं जो नफ़रत से नहीं आत्मसम्मान से जन्मी हो तो वह दूरी पूजा जैसी हो जाती है जिसमें आप स्वयं के भीतर बसे ईश्वर की रक्षा कर रहे होते हैं।
बहुत लोग समझते हैं कि सीमा का मतलब है सामने वाले को अपमानित करना उसे सबके सामने दोष देना या अचानक काट देना। गीता का मार्ग सिखाता है कि सीमा पहले भीतर बनती है फिर व्यवहार में दिखती है। भीतर से आप यह तय करते हैं कि “मैं अब अपने को इतना भी सस्ता उपलब्ध नहीं रखूँगा कि हर समय किसी और की मनःस्थिति के हिसाब से टूटता जाऊँ।”
व्यवहार में इसका मतलब है
आप उनके लिए बुरा नहीं चाहते पर उनके साथ पहले जैसा रहना भी नहीं चाहते। आप पुराने अच्छे क्षणों को नकारते नहीं पर उन्हें भविष्य का बंधन बनने नहीं देते। दूरी यहाँ घृणा नहीं चयन है जहाँ आप यह चुनते हैं कि आपका मन किन वातावरणों में रहकर पनपेगा।
1. क्या भावनात्मक दूरी का मतलब किसी को पूरी तरह जीवन से निकाल देना है
हर बार ऐसा ज़रूरी नहीं। कई बार दूरी का अर्थ है उस व्यक्ति को अपने भावनात्मक केंद्र से हटाना ताकि आपका मन निर्णय और दिन भर की ऊर्जा उसकी प्रतिक्रिया पर टिकी न रहे। कभी इसका अर्थ है कम मिलना-जुलना कभी केवल भीतर से कम जुड़ाव रखना।
2. यदि सामने वाले ने सचमुच गलत किया है तो बिना गुस्से के दूरी कैसे बनाऊँ
आप स्पष्ट देख सकते हैं कि उसने सीमा तोड़ी है और इस clarity से दूरी बना सकते हैं बिना बदले की भावना के। गुस्सा छोड़ने का अर्थ यह नहीं कि आप अन्याय को उचित मान रहे हैं बल्कि यह कि आप अपने शरीर और मन को लंबे समय तक जलते रहने से बचा रहे हैं।
3. बिना स्पष्ट उत्तर और माफ़ी के आगे बढ़ पाना संभव है क्या
हाँ क्योंकि बहुत बार सामने वाला वही उत्तर या माफ़ी दे ही नहीं पाता जिसकी आपको ज़रूरत होती है। inner closure तब आता है जब आप स्वीकार करते हैं कि “मुझे जितनी स्पष्टता मिल सकती थी मिल चुकी अब मैं अपने मन में यह अध्याय बंद कर रहा हूँ” और अपनी ऊर्जा को नए जीवन की ओर मोड़ते हैं।
4. practically अपनी ऊर्जा वापस बुलाने का छोटा तरीका क्या हो सकता है
एक छोटे से कदम से शुरू करें दिन भर में देखें कि कौन सा thought या आदत आपकी सबसे ज़्यादा ऊर्जा खा रही है जैसे बार बार संदेश देखना या लगातार वही कहानी सुनाना। तय करें कि आज केवल इसी एक आदत को थोड़ा कम करूँगा और उस समय को लिखने ध्यान प्रार्थना या शरीर की देखभाल में लगाऊँगा। यह छोटा परिवर्तन भी भीतर बहुत फर्क लाता है।
5. क्या दूरी और प्रेम साथ चल सकते हैं
हाँ गीता का वैराग्य प्रेम को समाप्त नहीं स्वच्छ करता है। आप किसी के लिए भला सोच सकते हैं उसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं और फिर भी उसके साथ ऐसे व्यवहार या पैटर्न में हिस्सा न लेने का निर्णय ले सकते हैं जो दोनों के लिए हानिकारक हों। letting go का अर्थ यह नहीं कि आपने कभी प्रेम नहीं किया इसका अर्थ केवल इतना है कि अब आप उस प्रेम की कीमत में खुद को खोने के लिए तैयार नहीं हैं।
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