By पं. सुव्रत शर्मा
वेदांत सिखाता है कि सच्चा वैराग्य भावनाओं को दबाने से नहीं उन्हें साक्षीभाव से देखने और आसक्ति छोड़कर भी प्रेम बनाए रखने से आता है

आज का जीवन हर तरफ़ से भावनात्मक भागीदारी माँगता है। रिश्तों में संवेदनशील रहना है काम पर समर्पित होना है और सामाजिक जगत में भी हमेशा प्रतिक्रिया देनी है। ऐसे में बहुत से लोग भीतर से थके हुए महसूस करते हैं उन्हें शांति चाहिए पर ऐसा नहीं कि वे पूरी तरह भावहीन या कठोर हो जाएँ। यहाँ वेदांत एक अलग नज़रिया देता है जो “दूर रहो” नहीं कहता बल्कि “अलग तरह से जुड़े रहो” सिखाता है।
वेदांत के अनुसार असली समस्या भावनाएँ नहीं उन पर हमारी पकड़ और उनसे हमारी पहचान है। हम दुख इसलिए नहीं झेलते कि हमने प्रेम किया बल्कि इसलिए कि हमने परिणाम अपेक्षा और “सब कुछ मेरे हिसाब से हो” जैसी आसक्ति बाँध ली। वेदांत कहता है भावनाएँ आएँ-जाएँगी पर तुम उनसे बड़े हो।
वेदांत भावनाओं या रिश्तों से भागने को नहीं कहता। वह “वैराग्य” की बात करता है जिसका सामान्य अर्थ है विराग या आसक्ति का कम होना। इसका मतलब दिल को पत्थर बना लेना नहीं बल्कि हर भाव को देखते हुए भी उसका दास न बने रहना है।
वेदांत का मूल कथन है कि हमारा सच्चा आत्मा मन विचार भाव और शरीर से अलग उनसे ऊँचा है। वह न सुख से बढ़ता है न दुख से घटता है। जब हम इस गहरे “मैं कौन हूँ” पर थोड़ा-थोड़ा टिकने लगते हैं तब भावनाएँ पूरी तरह गायब नहीं होतीं पर उनकी पकड़ ढीली हो जाती है। यही भावनात्मक वैराग्य है ठंडापन नहीं बल्कि विवेक से भरी स्वतंत्रता।
अक्सर यह भ्रांति होती है कि जो व्यक्ति detached हो गया वह दूसरों के दर्द से कटा-कटा रहता है मुस्कुराता कम है और हर बात पर बस “माया है” कहकर निकल जाता है। वेदांत के गुरुओं ने स्पष्ट कहा है कि ऐसा “सूखा वैराग्य” अधूरा है। सच्चा वैराग्य वाला व्यक्ति अक्सर ज़्यादा प्रेमशील उदार और ध्यान से सुनने वाला होता है क्योंकि उसकी खुशी केवल परिणामों या प्रशंसा पर नहीं टिकी रहती।
कल्पना कीजिए कोई दोस्त गहरे दुख में है। अगर आप खुद भी भीतर से टूटकर रोने लगें और अपने पुराने घावों में खो जाएँ तो उसके लिए जगह कम रह जाती है। लेकिन यदि आप मन से स्थिर हैं अपने भावों को भीतर संभाल पा रहे हैं तो आप पूरी करुणा और ध्यान के साथ उसके साथ बैठ सकते हैं। यही वेदांतिक detachment है जिसमें आप भावनात्मक रूप से उपलब्ध हैं पर अपनी ही लहर में बह नहीं गए।
भगवद्गीता बार-बार यह बताती है कि बंधन का कारण प्रेम नहीं परिणामों और धारणाओं से चिपक जाना है। हम तभी टूटते हैं जब हम यह मान लेते हैं कि “मेरी शांति इस रिश्ते इस नौकरी इस छवि पर टिकी है।” तब व्यक्ति वस्तु या स्थिति थोड़ी भी हिले तो भीतर तूफ़ान उठता है।
वेदांत हमें यह देखने को कहता है कि
दो अलग बातें हैं। आप किसी को गहराई से प्रेम कर सकते हैं और फिर भी उसका रास्ता चुनने के अधिकार को स्वीकार कर सकते हैं। यह प्रेम की कमी नहीं प्रेम की शुद्धता है जहाँ “तुम मेरे हो इसलिए तुम ऐसे चलो” वाली पकड़ ढीली हो जाती है।
वेदांत की एक बुनियादी साधना है “साक्षीभाव” यानी खुद को मन और भावनाओं का दर्शक मानकर देखना। इसका अभ्यास बहुत सरल तरीक़े से शुरू किया जा सकता है। अगली बार जब गुस्सा डर या जलन उठे ज़रा रुककर खुद से कहें
“यह गुस्सा है मैं इसे देख रहा/रही हूँ।”
“यह डर है मैं इसका साक्षी हूँ।”
यह छोटा-सा वाक्य एक बड़ा बदलाव लाता है। पहले हम कहते थे “मैं बहुत गुस्से में हूँ” अब हम कहते हैं “गुस्सा आ रहा है और मैं इसे देख पा रहा हूँ।” भावना को दबाया नहीं बस उससे अपना पूरा “मैं” खींच लिया। इससे मन और आत्मा के बीच थोड़ा-सा अंतर खुलता है जिसमें से शांति की हवा आने लगती है।
नियमित अभ्यास से धीरे-धीरे समझ आता है कि विचार भाव मूड सब आते-जाते मेहमान हैं और मैं वह “घर” हूँ जिसमें ये कुछ समय ठहरते हैं।
वेदांत कहता है कि सुख-दुख आकर्षण-विरक्ति सब अस्थायी तरंगें हैं। कोई भी महसूस होने वाली अवस्था स्थायी नहीं होती। हम सुबह जो बात पर टूटते हैं वही शाम तक हल्की लगने लगती है। यदि हमें यह गहराई से याद रहे कि हर भाव “लहर” है तो हम खुद को “समुद्र” के रूप में महसूस करना सीखते हैं।
इस समझ से दो फायदे होते हैं
इसका मतलब भावनाएँ महसूस न करना नहीं बल्कि उन्हें आकर जाने की पूर्ण अनुमति देना है बिना यह मान लिए कि “यही मैं हूँ।”
एक और गहरा कारण भावनात्मक पीड़ा का यह है कि हम भीतर से मान लेते हैं कि मैं ही सबका नियंता हूँ मुझे ही सब सही करना है। वेदांत कर्तापन (मैं ही कर्ता हूँ) पर हल्का प्रहार करता है और कहता है “तुम साक्षी हो कर्ता नहीं।”
इसका अर्थ यह नहीं कि हम कर्म छोड़ दें बल्कि यह कि हम अपना सर्वोत्तम प्रयास करें पर परिणाम और दूसरों की प्रतिक्रिया पर अद्भुत पकड़ न रखें। काम करते रहें पर हर चीज़ के सफल-असफल होने से अपनी पहचान न जोड़ें। इससे जिम्मेदारी भी रहती है और भीतर का तनाव भी कम होता है।
वेदांत “विवेक” यानी वास्तविक और अवास्तविक में भेद करने की शक्ति को महत्वपूर्ण मानता है। भावनात्मक क्षण में खुद से दो छोटे प्रश्न पूछे जा सकते हैं
जब हम बार-बार ऐसा पूछते हैं तो स्वतः ही कई अनावश्यक प्रतिक्रियाएँ गिरने लगती हैं। ग़ैरज़रूरी बहस बेवजह साबित करना हर बात पर सफाई देना धीरे-धीरे कम होता है। भावनाएँ तो होती हैं पर उनका “ड्रामा” कम हो जाता है।
वेदांत केवल ज्ञान की बात नहीं करता वह भक्ति को भी महत्त्व देता है। भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें ऊर्ध्वगामी दिशा देना यानी उन्हें किसी उच्चतर भाव में अर्पित करना बहुत मदद करता है। इसे सरल रूप में यूँ समझ सकते हैं
जब हम अपनी चिंता और आसक्ति को किसी ऊँचे भरोसे के हवाले करते हैं तो हृदय नरम बना रहता है पर पकड़ हल्की हो जाती है। यह detachment नहीं बल्कि surrender युक्त detachment है।
वेदांत केवल संन्यासियों के लिए नहीं है। माता-पिता साथी नौकरी करने वाले सब इसका अभ्यास कर सकते हैं। कुछ उदाहरण
यही वेदांतिक detachment है जिसमें हाथ काम में लगे हैं पर दिल किसी एक परिणाम की जंजीर में नहीं बँधा।
वेदांत के अनुसार detachment भावनात्मक कमजोरी नहीं भावनात्मक परिपक्वता है। इसमें
शामिल है। इससे हम प्रतिक्रिया कम और उत्तर ज़्यादा देने लगते हैं। प्रेम होता है पर पकड़ हल्की होती है। सेवा होती है पर अहं कम होता है। दुःख आता है पर कड़वाहट स्थायी नहीं होती।
1. क्या भावनात्मक रूप से detached होकर भी सच में किसी की परवाह कर सकता/सकती हूँ
हाँ। वेदांत कहता है कि जब आप परिणामों और अपेक्षाओं की पकड़ ढीली करते हैं तभी आपका प्रेम ज़्यादा शुद्ध और स्वतंत्र होता है। आप दूसरे की भलाई चाहेंगे पर अपने स्वार्थ के हिसाब से उसे मोड़ने की कोशिश कम होगी।
2. क्या detachment का मतलब भावनाओं से बचना या उन्हें avoid करना है
नहीं। यह तो उलटा suppression बना देगा। वेदांतिक detachment का मतलब है कि भावना को ईमानदारी से महसूस करें पर उसे “मैं ही हूँ” मानकर उसमें डूब न जाएँ। आप उसे साक्षीभाव से देखते हैं ताकि वह आए-जाए और आप भीतर से साफ़ रहेँ।
3. ठंडेपन और वेदांतिक वैराग्य में सबसे बड़ा अंतर क्या है
ठंडापन दिल को बंद कर देता है संवेदना घटाता है और दूर भागने जैसा होता है। वेदांतिक वैराग्य दिल को खुला रखता है पर पकड़ और चिपकाव घटाता है। ठंडापन “मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता” के रूप में प्रकट होता है जबकि वैराग्य “मुझे फर्क पड़ता है पर मैं इसके कारण टूटूँगा नहीं” के रूप में।
4. साक्षीभाव practically कैसे शुरू करूँ
दिन में 2-3 बार खासकर जब भाव ज़्यादा तेज़ हो बस दो पल रुककर मन में कहें “यह क्रोध है/यह डर है/यह दुख है मैं इसे देख रहा/रही हूँ।” यदि संभव हो तो कुछ गहरी साँसें लें। धीरे-धीरे यह आदत बनेगी कि हर भाव उठते ही आप में देखने वाला हिस्सा भी सक्रिय हो जाता है।
5. क्या detachment का मतलब रिश्ते छोड़ देना या कम invest करना है
ज़रूरी नहीं। कई बार detachment का मतलब केवल इतना है कि आप “अत्यधिक नियंत्रण” छोड़ दें अपनी side की ईमानदारी रखें और बाकी को समय तथा जीवन पर छोड़ दें। कुछ स्थितियों में दूरी बनाना भी ज़रूरी हो सकता है पर वह निर्णय भी तब ज़्यादा स्पष्ट होगा जब आप भीतर से शांत और साक्षीभाव में होंगे न कि केवल आहत होकर भाग रहे होंगे।
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