By पं. नीलेश शर्मा
विष्णु और लक्ष्मी के दिव्य युग्म से पूर्णत्व, समृद्धि और पूरकता की गहरी व्याख्या

वैष्णव परंपरा में विष्णु को संपूर्ण, सर्वव्यापक और धर्म के पालनकर्ता रूप में देखा जाता है। शास्त्र बताते हैं कि उनमें किसी प्रकार की कमी नहीं है, वे स्वयं ही पूर्ण हैं। फिर भी हर चित्र, हर कथा और हर आरती में उनके साथ लक्ष्मी की उपस्थिति अनिवार्य सी दिखती है।
पहली नज़र में यह प्रश्न स्वाभाविक लगता है कि यदि विष्णु पूर्ण हैं तो उन्हें किसी की आवश्यकता क्यों। गहराई से देखने पर समझ आता है कि यहां “ज़रूरत” का अर्थ कमी नहीं बल्कि पूर्णत्व के प्रकटीकरण से है। विष्णु और लक्ष्मी का युग्म यह दिखाता है कि सृष्टि में स्थिरता और सौंदर्य, आधार और समृद्धि, अस्तित्व और अभिव्यक्ति एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
पुराणों में विष्णु को वह आधार माना गया है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। वे पालन और संरक्षण के देव हैं, जो धर्म की धुरी को थामे रहते हैं। यह पूर्णत्व स्वरूप का है, जिसमें किसी प्रकार की कमी या निर्भरता नहीं होती।
लक्ष्मी इस पूर्णत्व की शक्ति और प्रस्फुटन के रूप में समझी जाती हैं। परंपरा में अक्सर कहा जाता है
इस प्रकार उनका साथ किसी कमी की भरपाई नहीं बल्कि यह दिखाने के लिए है कि दिव्यता केवल मौन अस्तित्व नहीं बल्कि आनंद, सौंदर्य और कल्याण रूप में भी बहती है।
समुद्र मंथन के प्रसंग में क्षीर सागर से अनेक दिव्य रत्नों के साथ लक्ष्मी का प्राकट्य बताया गया है। देवों और दैत्यों के संयुक्त प्रयास, हलचल, संघर्ष और संतुलन के बीच से जो दिव्य संपदा निकली, उसका सार लक्ष्मी के रूप में सामने आया।
लक्ष्मी ने विष्णु को अपना वरण किया। यहां एक सूक्ष्म संकेत छिपा है
सृष्टि के लिए केवल अस्तित्व पर्याप्त नहीं। जीवन को अर्थ देने के लिए
इन सबकी भी आवश्यकता होती है। यह सब जिस तत्त्व में संगठित दिखता है, उसे परंपरा ने लक्ष्मी नाम दिया। इसलिए कहा जाता है कि लक्ष्मी का प्राकट्य विष्णु की कमी के कारण नहीं, सृष्टि की आवश्यकता के कारण हुआ।
| आयाम | विष्णु | लक्ष्मी |
|---|---|---|
| मूल तत्त्व | आधार, पालन, स्थिरता | समृद्धि, सौंदर्य, विकास |
| प्रतीक | धर्म की रक्षा, संतुलन | अनुग्रह, धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य |
| भूमिका | संरक्षक, धारण करने वाला | पोषक, पुष्ट करने वाली |
| आंतरिक अर्थ | “होना” - अस्तित्व में स्थिर रहना | “खिलना” - उसी अस्तित्व का सुंदर प्रस्फुटन |
मानव मन अक्सर सोचता है कि जो पूर्ण है उसे किसी की आवश्यकता नहीं। शास्त्रीय दृष्टि में पूर्णत्व का अर्थ यह नहीं कि वह किसी से संबंध नहीं रख सकता। दिव्य पूर्णत्व का अर्थ है
विष्णु और लक्ष्मी का युग्म यही दिखाता है कि
इसलिए यहां “need” का आशय dependence नहीं, complementarity है। जैसे दीपक में तेल और ज्योति साथ हों तो प्रकाश होता है, वैसे ही विष्णु का आधार और लक्ष्मी की कृपा मिलकर सृष्टि को संतुलित और समृद्ध बनाते हैं।
हर व्यक्ति के भीतर भी दो धाराएं चलती हैं
यदि कोई केवल “विष्णु” पक्ष पर टिक जाए
तो जीवन बोझिल हो जाता है। यदि कोई केवल “लक्ष्मी” पक्ष पर रहे
तो समृद्धि टिक नहीं पाती।
विष्णु-लक्ष्मी का संबंध यह सिखाता है कि
वैदिक और पुराण परंपरा में कहा जाता है कि जहां विष्णु हैं, वहां लक्ष्मी भी होती हैं। दोनों को अलग अलग नहीं, युगल रूप में पूजने की परंपरा है - श्री विष्णु और श्री लक्ष्मी नारायण के रूप में।
इसका अर्थ यह नहीं कि विष्णु स्वयं अपूर्ण हैं बल्कि यह कि
कभी कहा जाता है
अर्थात
मानव जीवन में यह युग्म कई स्तरों पर लागू होता है
कार्य और विश्राम
आधार और विस्तार
अंतरंग और बहिरंग
यही विष्णु-लक्ष्मी संतुलन है जो ज्योतिषीय दृष्टि से भी कुंडली में धन भाव और धर्म भाव, चंद्र और शुक्र, गुरु और शुक्र के तालमेल में झलकता है। जब व्यक्ति केवल भोग के ग्रहों को महत्व देता है और आधार देने वाले ग्रहों की उपेक्षा करता है तब समृद्धि टिकती नहीं। जब केवल त्याग और कठोरता को साधता है और सौंदर्य, प्रेम और आनंद को दबा देता है तब भीतर सूखापन आ जाता है।
| जीवन क्षेत्र | विष्णु पक्ष (आधार) | लक्ष्मी पक्ष (अभिव्यक्ति) |
|---|---|---|
| करियर | कौशल, अनुशासन, जिम्मेदारी | पहचान, आय, उन्नति, प्रतिष्ठा |
| संबंध | भरोसा, स्थिरता, समर्पण | स्नेह, आनंद, उपहार, साझा समय |
| आध्यात्मिकता | साधना, नियम, स्वाध्याय | कृपा की अनुभूति, सहज आनंद, भक्ति |
| धन प्रबंधन | बचत, योजना, संयम | दान, अनुभवों पर व्यय, घर का सौंदर्य |
| भावनात्मक जीवन | धैर्य, संतुलन, आत्मसंयम | भावनाओं की अभिव्यक्ति, कोमलता, सहानुभूति |
यदि विष्णु पूर्ण हैं तो क्या अकेले विष्णु की पूजा पर्याप्त नहीं
शास्त्र बताते हैं कि परम सत्य एक ही है, भिन्न रूप केवल हमारे समझने के लिए हैं। केवल विष्णु की पूजा भी पूर्ण हो सकती है। फिर भी परंपरा में विष्णु-लक्ष्मी को युगल रूप में स्मरण करने से यह भाव मजबूत होता है कि जीवन में आधार और समृद्धि, दोनों का संतुलन आवश्यक है।
लक्ष्मी की पूजा के समय विष्णु का स्मरण क्यों ज़रूरी माना गया
यह संकेत है कि समृद्धि को हमेशा किसी उच्च मूल्य और आधार के साथ जोड़ा जाए। जब धन और वैभव धर्म, संतुलन और जिम्मेदारी से जुड़े हों तब वे स्थायी सुख देते हैं। केवल भोग के लिए लक्ष्मी की आकांक्षा जीवन में असंतुलन और बेचैनी भी ला सकती है।
क्या यह युग्म केवल पति-पत्नी के रूप में समझना सही है
दांपत्य रूप एक प्रतीक है। वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। विष्णु-लक्ष्मी हमारे भीतर के दो तत्त्व हैं - स्थिरता और प्रस्फुटन, कर्तव्य और आनंद, आधार और सौंदर्य। यह समझ संबंधों को भी गहराई देती है, पर केवल वैवाहिक स्तर तक सीमित नहीं रहती।
ज्योतिषीय दृष्टि से विष्णु-लक्ष्मी का संतुलन कैसे देखा जा सकता है
कुंडली में गुरु, चंद्र, नवम और चतुर्थ भाव जैसे तत्त्व आधार और धर्म के संकेत देते हैं, जबकि शुक्र, द्वितीय और एकादश भाव समृद्धि, आनंद और वैभव का संकेत देते हैं। जब दोनों समूह संतुलित हों और पाप प्रभाव से अत्यधिक पीड़ित न हों तब जीवन में विष्णु-लक्ष्मी जैसा सामंजस्य अधिक सहज होता है।
व्यवहारिक जीवन में इस समझ से क्या लाभ होता है
यह समझ देते हुए कि पूर्णता अलग थलग रहकर नहीं बल्कि पूरकता और सहभागिता से प्रकट होती है। व्यक्ति अपने जीवन में यह देख पाता है कि कहां केवल कठोरता बढ़ गई है, कहां केवल भोग। वहां से वह सचेत प्रयास कर सकता है कि कर्तव्य के साथ आनंद और समृद्धि के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ जाए। यहीं से भीतर वास्तविक संतोष का बीज अंकुरित होता है।
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