By पं. अमिताभ शर्मा
ऐसा पवित्र एकादशी व्रत जो पूर्वजों को मोक्ष और साधक को पुण्य प्रदान करता है

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आने वाली इंदिरा एकादशी को पितरों की मुक्ति देने वाली अत्यंत पुण्यकारी एकादशी माना गया है। इस व्रत का महत्व केवल व्यक्तिगत पुण्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन पितरों के कल्याण से भी जुड़ा है जो किसी कारणवश शुभ गति प्राप्त नहीं कर सके। इसलिए इस दिन व्रत, श्राद्ध कर्म, भगवान विष्णु की उपासना और पद्म पुराण में वर्णित इंदिरा एकादशी व्रत कथा का पाठ विशेष फलदायी माना गया है।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि इस एकादशी के प्रभाव से बड़े से बड़े पापों का नाश होता है और नीच योनि में स्थित पितरों को भी उत्तम गति प्राप्त हो सकती है। इस कारण यह व्रत केवल एक तिथि का अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्मरण, कृतज्ञता, प्रायश्चित और पितृऋण से मुक्ति का आध्यात्मिक अवसर है। जो साधक इस दिन श्रद्धा, संयम और विधिपूर्वक व्रत करता है, उसके लिए यह व्रत पितरों की शांति के साथ साथ आत्मकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
इंदिरा एकादशी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि पितृपक्ष के वातावरण में आने के कारण और भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इस समय पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध और मोक्ष की कामना से जुड़े अनुष्ठान विशेष फलदायी बताए गए हैं। इंदिरा एकादशी इसी भावभूमि में पितरों की सद्गति का दिव्य माध्यम बनती है।
इस व्रत का मुख्य महत्व यह है कि यदि किसी पितर को किसी दोष, व्रतभंग या कर्मबंधन के कारण शुभ लोक प्राप्त न हुआ हो, तो इस एकादशी के पुण्य से उसे स्वर्ग या वैकुण्ठमार्ग की प्राप्ति कराई जा सकती है। यही कारण है कि इस दिन केवल व्रत रखना ही पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि पितरों के नाम से श्राद्ध, भगवान विष्णु का पूजन और कथा पाठ भी आवश्यक बताया गया है।
धर्मग्रंथों में वर्णित है कि कृष्ण पक्ष की यह एकादशी इंदिरा नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रभाव इतना महान माना गया है कि यह बड़े बड़े पापों का नाश कर सकती है। साथ ही, जो पितर किसी निम्न अवस्था में पड़े हों, उन्हें भी यह एकादशी उत्तम गति देने वाली कही गई है। इसीलिए यह व्रत केवल सांसारिक कल्याण का नहीं, बल्कि लोक और परलोक दोनों की शुद्धि का साधन माना जाता है।
पद्म पुराण में इसका जो महात्म्य वर्णित है, उसमें एक राजा, उनके पिता, देवर्षि नारद और यमलोक का प्रसंग आता है। यह कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि संतान के पुण्य और श्रद्धा से पितरों का उद्धार संभव है। इसी कारण इस कथा का पाठ इंदिरा एकादशी के दिन अत्यंत आवश्यक और पुण्यदायक माना गया है।
प्राचीन काल में सत्ययुग के समय इन्द्रसेन नाम से विख्यात एक धर्मात्मा राजा थे। वे माहिष्मतीपुरी के शासक थे और धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते थे। उनका यश चारों दिशाओं में फैला हुआ था। वे केवल राज्य संचालन में कुशल नहीं थे, बल्कि भगवान विष्णु की भक्ति में भी अत्यंत तल्लीन रहते थे। वे गोविन्द के मोक्षदायक नामों का जप करते हुए अपना समय व्यतीत करते और अध्यात्मतत्त्व के चिंतन में लगे रहते थे।
एक दिन वे राजसभा में सुखपूर्वक विराजमान थे। उसी समय आकाश मार्ग से देवर्षि नारद वहाँ पधारे। नारदजी को देखते ही राजा इन्द्रसेन हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन्होंने विधिपूर्वक पूजन किया, उन्हें आसन ग्रहण कराया और अत्यंत विनम्र भाव से उनकी कुशल पूछी। राजा ने कहा कि उनके दर्शन से उनकी सारी यज्ञ क्रियाएँ सफल हो गईं। इसके बाद उन्होंने देवर्षि से उनके आगमन का कारण जानने का निवेदन किया।
देवर्षि नारद ने राजा से कहा कि वे ब्रह्मलोक से यमलोक गए थे। वहाँ यमराज ने उनका बड़े आदर से स्वागत किया और उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बैठाकर पूजा की। उसी समय यमराज की सभा में नारदजी ने राजा इन्द्रसेन के पिता को भी देखा। वे वहाँ किसी गंभीर दोष के कारण उपस्थित थे। नारदजी ने बताया कि राजा के पिता व्रतभंग के दोष के कारण यमलोक में स्थित थे।
इसके बाद नारदजी ने वह संदेश सुनाया जो राजा के पिता ने अपने पुत्र के लिए भेजा था। उन्होंने कहा था कि उनका पुत्र इंदिरा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य उन्हें अर्पित करे ताकि उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। इस प्रकार देवर्षि नारद एक दैवी संदेशवाहक बनकर राजा इन्द्रसेन के पास आए थे। यह प्रसंग बताता है कि संतान के पुण्य और श्रद्धा से पितरों का उद्धार कितना महत्वपूर्ण माना गया है।
अपने पिता की अवस्था का समाचार सुनकर राजा इन्द्रसेन अत्यंत गंभीर हो गए। उनका भाव केवल पुत्रधर्म तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें श्रद्धा, करुणा और धर्म का समन्वय था। उन्होंने देवर्षि नारद से विनती की कि वे कृपा करके इंदिरा एकादशी व्रत की पूरी विधि बताएँ। उन्होंने पूछा कि यह व्रत किस पक्ष में, किस तिथि को और किस प्रकार करना चाहिए ताकि उनके पिता को स्वर्गलोक की प्राप्ति हो सके।
राजा का यह प्रश्न केवल औपचारिक नहीं था। वह एक ऐसे साधक का प्रश्न था जो विधि, भावना और फल तीनों को समझकर व्रत करना चाहता था। यही कारण है कि आगे नारदजी ने इस व्रत की अत्यंत स्पष्ट और अनुशासित विधि बताई।
देवर्षि नारद ने बताया कि कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करना चाहिए। उसके बाद मध्याह्न के समय एकाग्र चित्त होकर केवल एक बार भोजन करना चाहिए। रात्रि में भूमि पर शयन करना चाहिए। फिर रात्रि के अंतिम प्रहर के बाद जब निर्मल प्रभात हो, तब एकादशी के दिन उठकर दातून और मुखशुद्धि करनी चाहिए।
इसके बाद भक्तिभाव से उपवास का नियम ग्रहण करना चाहिए। इस अवसर पर भगवान विष्णु के समक्ष यह संकल्प किया जाता है कि आज सब भोगों से दूर रहकर निराहार व्रत किया जाएगा और अगले दिन पारण किया जाएगा। यह संकल्प केवल भोजन का त्याग नहीं है, बल्कि मन, वाणी और इंद्रियों को संयमित करने का भी व्रत है।
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत।।
इस मंत्र का भाव है कि आज सब भोगों का त्याग करके निराहार रहा जाएगा और अगले दिन भोजन किया जाएगा। हे कमलनयन भगवान, हे अच्युत, कृपा करके शरण प्रदान करें।
नारदजी ने कहा कि व्रती को एकादशी के दिन मध्याह्न के समय पितरों की प्रसन्नता के लिए शालग्राम शिला के सामने विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। दक्षिणा देकर ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराना चाहिए। पितरों को अर्पित अन्नमय पिंड को स्वयं सूँघकर गौ को खिला देना चाहिए। इस विधान में पितृस्मरण, तर्पण भावना और दान तीनों का सुंदर समन्वय है।
इसके बाद भगवान हृषीकेश का धूप, गंध और अन्य पूजन सामग्री से पूजन करना चाहिए। रात्रि में भगवान के समीप जागरण करना चाहिए। जागरण का अर्थ केवल जागते रहना नहीं, बल्कि भगवान के स्मरण, नामजप, स्तुति और कथा चिंतन में रात्रि बिताना भी है। इस प्रकार एकादशी केवल उपवास की तिथि नहीं रहती, बल्कि भक्ति और पितृसाधना का अखंड पर्व बन जाती है।
नारदजी के अनुसार अगले दिन द्वादशी पर पुनः भगवान श्रीहरि का भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। तत्पश्चात भाई, बंधु, नाती, पुत्र और अन्य परिजनों के साथ स्वयं मौन रहकर भोजन करना चाहिए। यह मौन भोजन केवल पारण की क्रिया नहीं, बल्कि व्रत से उत्पन्न पवित्रता और संयम की रक्षा का भी एक हिस्सा माना गया है।
द्वादशी का पारण इस व्रत को पूर्णता देता है। यदि एकादशी संयम की तिथि है, तो द्वादशी कृतज्ञता और विनम्रता की तिथि है। यह साधक को सिखाती है कि व्रत का फल केवल त्याग में नहीं, बल्कि उचित विधि से पूर्ण करने में भी है।
देवर्षि नारद से सारी विधि सुनकर राजा इन्द्रसेन ने उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक इंदिरा एकादशी व्रत का अनुष्ठान किया। उन्होंने अपनी रानियों, पुत्रों और सेवकों सहित इस उत्तम व्रत का पालन किया। उन्होंने आलस्य छोड़ा, विधि का पालन किया और पितरों की मुक्ति की भावना से व्रत को पूर्ण किया। यह प्रसंग यह भी बताता है कि जब व्रत सामूहिक श्रद्धा से किया जाता है, तो उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।
व्रत पूर्ण होने पर आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी। यह उस दिव्य स्वीकृति का संकेत था कि अनुष्ठान सफल हुआ है। कथा में वर्णन आता है कि राजा इन्द्रसेन के पिता गरुड़ पर आरूढ़ होकर श्रीविष्णुधाम को चले गए। यह उस पुण्य का परिणाम था जो पुत्र ने श्रद्धा और विधिपूर्वक व्रत करके अर्पित किया था।
इंदिरा एकादशी व्रत का पुण्य जब राजा इन्द्रसेन ने अपने पिता के लिए समर्पित किया, तब उनके पिता को यमलोक की अवस्था से मुक्ति मिली और वे गरुड़ पर बैठकर भगवान विष्णु के धाम को चले गए। यह प्रसंग इस व्रत का सबसे बड़ा महात्म्य प्रकट करता है कि यह केवल पुण्य देने वाला व्रत नहीं, बल्कि पितरों की सद्गति और मोक्ष का भी कारण बन सकता है।
कथा आगे यह भी बताती है कि राजा इन्द्रसेन ने राज्य का सुख भोगने के बाद अपने पुत्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं भी श्रेष्ठ गति को प्राप्त हुए। इससे यह संदेश मिलता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा, धर्म और व्रत के माध्यम से पितरों का कल्याण करता है, उसका अपना जीवन भी कृपामय हो जाता है।
पितृपक्ष और आश्विन कृष्ण एकादशी का यह संगम अत्यंत गहरा माना गया है। इस समय किया गया व्रत पितरों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और आध्यात्मिक सहारा बनता है। जो पितर किसी दोष या अधूरे कर्मफल के कारण उत्तम लोक को प्राप्त नहीं कर सके हों, उनके लिए यह व्रत आशा का माध्यम बनता है। इसलिए इंदिरा एकादशी को पितरों के मोक्षदायक व्रत के रूप में विशेष सम्मान दिया गया है।
यह व्रत यह भी सिखाता है कि पितरों का उद्धार केवल तर्पण से नहीं, बल्कि श्रद्धा, विधि, व्रत, दान, पूजन और कथा श्रवण के समन्वय से होता है। इसी कारण इसका महत्व आज भी जीवित है।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत का माहात्म्य बताते हुए कहा कि जो मनुष्य इंदिरा एकादशी व्रत कथा को पढ़ता या सुनता है, वह पापों से मुक्त हो सकता है। यहाँ कथा केवल कहानी नहीं है। यह धर्म का बोध कराती है, व्रत की विधि समझाती है, पितृश्रद्धा का महत्व बताती है और साधक को यह स्मरण कराती है कि उसका जीवन केवल स्वयं तक सीमित नहीं है। उसके भीतर अपने पूर्वजों के प्रति भी एक उत्तरदायित्व है।
कथा का श्रवण मन को विनम्र बनाता है। यह व्यक्ति को यह समझने में मदद करता है कि व्रत केवल शरीर का कष्ट नहीं, बल्कि भावना की शुद्धि है। और जब वही भावना पितरों की मुक्ति के लिए समर्पित होती है, तब उसका फल और भी अधिक दिव्य हो जाता है।
आज के समय में बहुत से लोग व्रत को केवल अनुष्ठान समझते हैं, पर इंदिरा एकादशी इससे कहीं अधिक गहरा संदेश देती है। यह सिखाती है कि मनुष्य अकेला नहीं है। वह अपने पूर्वजों, संस्कारों और वंश परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह भी सिखाती है कि धर्म केवल उत्सव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। यदि किसी के जीवन में पितरों का स्मरण कम हो गया हो, तो यह एकादशी उस स्मरण को पुनः जीवित कर सकती है।
यह व्रत यह भी सिखाता है कि मोक्ष केवल अपने लिए नहीं माँगा जाता, बल्कि प्रेमवश पितरों के लिए भी साधा जा सकता है। यही इसकी सबसे सुंदर बात है कि इसमें भक्ति और कर्तव्य एक हो जाते हैं।
इंदिरा एकादशी का व्रत एक ऐसा दिव्य अवसर है जिसमें पितृकृपा, विष्णुभक्ति, श्राद्ध, दान, उपवास और कथा श्रवण सब एक सूत्र में बंध जाते हैं। जो साधक इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, उसके लिए यह केवल तिथि पालन नहीं, बल्कि अपने जीवन को अधिक पवित्र और अधिक सार्थक बनाने का माध्यम बन जाता है।
यदि यह व्रत श्रद्धा से किया जाए, तो यह पितरों की मुक्ति, स्वयं की शुद्धि और भगवान विष्णु की कृपा का सेतु बन सकता है। यही कारण है कि इंदिरा एकादशी का व्रत आज भी धर्मपरायण लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इंदिरा एकादशी का व्रत किस तिथि को रखा जाता है
इंदिरा एकादशी का व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है।
इस व्रत का सबसे बड़ा फल क्या माना गया है
इस व्रत का सबसे बड़ा फल पितरों की सद्गति और मोक्ष माना गया है, विशेषकर उन पितरों के लिए जो कष्टदायक अवस्था में हों।
इंदिरा एकादशी के दिन क्या केवल उपवास करना पर्याप्त है
नहीं, इस दिन श्राद्ध कर्म, भगवान विष्णु का पूजन, ब्राह्मण सत्कार और व्रत कथा का पाठ भी करना चाहिए।
राजा इन्द्रसेन के पिता को मुक्ति कैसे मिली
राजा इन्द्रसेन ने विधिपूर्वक इंदिरा एकादशी व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित किया, जिससे उन्हें विष्णुधाम की प्राप्ति हुई।
क्या इस कथा को पढ़ने और सुनने से भी पुण्य मिलता है
हाँ, धर्मग्रंथों के अनुसार इंदिरा एकादशी व्रत कथा का पाठ और श्रवण करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो सकता है।
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