By पं. नीलेश शर्मा
जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण के जीवन और दिव्यता का उत्सव

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक त्योहार भर नहीं, धरती पर विष्णु अवतार के आगमन का वह पावन क्षण है जिसने पूरे युग की दिशा बदल दी। इस तिथि पर भक्त श्रीकृष्ण के जन्म की कथा का स्मरण करते हैं, व्रत रखते हैं और यह अनुभव करने का प्रयास करते हैं कि किस प्रकार ईश्वर स्वयं अन्याय और भय से ग्रस्त संसार को संतुलन देने के लिए अवतरित होते हैं।
जन्माष्टमी की रात्रि को अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और आधी रात के समय श्रीकृष्ण का अवतरण माना गया है। जब मथुरा की कारागार में देवकी और वसुदेव बंधे हुए थे, ठीक उसी घड़ी में अद्भुत घटनाओं की शृंखला ने यह सिद्ध कर दिया कि जब दिव्य समय आता है तो प्रकृति की हर शक्ति मिलकर ईश्वरीय योजना को पूरा करती है।
भौगोलिक दृष्टि से श्रीकृष्ण का जन्मस्थान मथुरा माना जाता है, जो आज उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। मथुरा में यादव समुदाय के प्रमुख उग्रसेन नामक वृद्ध राजा का शासन था। उग्रसेन के पुत्र कंस में महत्वाकांक्षा तो थी, पर धर्म और करुणा की भावना अत्यंत क्षीण हो चुकी थी।
कंस ने सत्ता पाने के लिए अपने ही पिता को कारागार में डाल दिया और स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया। शक्ति के विस्तार के लिए उसने पूर्व दिशा के एक क्रूर सम्राट जरासंध से भी मैत्री कर ली। जरासंध का लक्ष्य था कि वह पूरी ज्ञात पृथ्वी पर अधिकार कर ले। कंस ने उसके साथ रहकर अपने साम्राज्य को अजेय बनाना चाहा।
| पात्र | भूमिका |
|---|---|
| उग्रसेन | यादवों के वृद्ध राजा, कंस के पिता |
| कंस | सिंहासन हड़पने वाला अत्याचारी शासक |
| जरासंध | पूर्व दिशा का क्रूर सम्राट, कंस का सहयोगी |
| मथुरा | श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और अत्याचार का केंद्र |
कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल के ही एक श्रेष्ठ पुरुष वसुदेव के साथ हुआ। विवाह के बाद जब देवकी विदा होकर ससुराल जा रही थीं, स्वयं कंस ही रथ हाँकते हुए उन्हें विदा कर रहा था। उसी समय आकाश से एक दिव्य वाणी सुनाई दी।
उस वाणी ने कहा कि हे कंस, जिस बहन को तू इतनी प्रसन्नता से विदा कर रहा है, उसी के गर्भ से जन्म लेने वाला आठवाँ पुत्र ही तेरे मृत्यु का कारण बनेगा। यह सुनते ही कंस क्रोध और भय से भर उठा। उसे लगा कि भविष्य के संकट को मिटाने का सरल उपाय यही है कि देवकी को उसी क्षण मार दिया जाए।
कंस ने तलवार निकालकर अपनी बहन का वध करने का निश्चय कर लिया। यह देखकर वसुदेव ने करबद्ध प्रार्थना की और कहा कि देवकी निर्दोष है, उसका कोई अपराध नहीं। यदि संकट उसके पुत्र से है तो वह हर पुत्र को जन्मते ही कंस के हवाले कर देगा, पर अभी देवकी का वध न किया जाए।
कंस ने यह प्रस्ताव स्वीकार तो कर लिया, पर भय से प्रेरित होकर उसने देवकी और वसुदेव दोनों को मथुरा में ही कारागार में बंद कर दिया, ताकि उन पर हर समय निगरानी रखी जा सके।
समय बीतता गया और कारागार में देवकी की गोद भरती रही। पहला पुत्र जन्मा तो पहरेदारों ने कंस को सूचना दी। देवकी और वसुदेव ने रो रो कर प्रार्थना की कि अभी तो केवल पहला पुत्र हुआ है, विनाश की बात तो आठवें से जुड़ी है।
कंस ने कहा कि उसे अपनी सुरक्षा के विषय में कोई जोखिम स्वीकार नहीं। उसने नवजात शिशु को पैरों से पकड़कर कठोर पत्थर पर दे मारा। उसी प्रकार दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ और छठा, कुल छह पुत्र एक एक करके निर्दयता के साथ मार दिए गए।
इस निर्मम कर्म से कंस की क्रूरता पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गई। प्रजा भय में जी रही थी, पर भीतर ही भीतर राजकाज के इस अन्यायी स्वरूप से असंतोष भी बढ़ रहा था। देवकी और वसुदेव के हृदय में लगातार पीड़ा थी, पर वे जानते थे कि यह सब किसी गहरे ईश्वरीय विधान का भाग भी है।
जब सातवें गर्भ का समय आया तो जैसे जैसे दिन निकट आते गए, कारागार में भी एक अद्भुत हलचल महसूस होने लगी। शास्त्रों में कहा जाता है कि देवकी के गर्भ से सातवाँ अंश किसी दिव्य लीला से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया, जो वसुदेव की दूसरी पत्नी थीं और गोखुल में निवास करती थीं।
बाह्य रूप से यह ऐसा दिखाई दिया मानो देवकी का गर्भपात हो गया हो और शिशु मृत हो गया हो। कंस को लगा कि सातवाँ गर्भ अपने आप नष्ट हो गया, इसलिए उसने कोई विशेष जाँच नहीं की।
उधर गोखुल में रोहिणी के यहाँ जो शिशु जन्मा, वही आगे चलकर बलराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बचपन में ही बलराम की देह, शक्ति और पराक्रम सामान्य बालकों से कहीं अधिक था। श्रीकृष्ण के साथ मिलकर बलराम ने भी आगे अनेक लीला प्रसंगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अब क्रम में आठवाँ गर्भ आया। चूँकि भविष्यवाणी का संकेत इसी गर्भ से था, इसलिए कंस की चिंता और कठोरता दोनों बढ़ गईं। पहले जहाँ देवकी और वसुदेव एक प्रकार की गृह नज़रबंदी में थे, अब उन्हें लोहे की जंजीरों से बाँधकर गहरी कारागार में डाल दिया गया।
आठवें गर्भ का नवमी, दशमी, एकादशी से लेकर अष्टमी तक का समय अत्यंत रहस्यमय रूप से व्यतीत हुआ। कंस ने आदेश दिया कि जन्म के समय के आसपास कोई भी कारागार में भीतर बाहर न जा सके। उसने अपनी विश्वसनीय स्त्री संबंधी पुतना को दाई के रूप में नियुक्त किया, ताकि जैसे ही बालक जन्म ले, वह तुरंत सूचना दे और शिशु को कंस के हाथों में सौंप दे।
अष्टमी की रात्रि आई। श्रावण भाद्रपद के उस काल में आकाश में बादल घिर आए। तेज वर्षा, बिजली की गर्जना और चारों ओर घनघोर अंधकार छा गया। कारागार के भीतर देवकी प्रसव पीड़ा से व्याकुल थीं और वसुदेव जंजीरों में बँधे हुए, मन ही मन भगवान को पुकार रहे थे।
कथा में आता है कि जैसे ही आधी रात का वह पावन क्षण आया, कारागार में एक दिव्य प्रकाश फैल गया। उसी समय श्रीकृष्ण ने चार भुजाओं वाले दिव्य रूप में देवकी के समक्ष प्रकट होकर अपने असली स्वरूप का दर्शन कराया और आश्वासन दिया कि वे ही वह विष्णु हैं जो जगत के कल्याण के लिए अवतरित हुए हैं।
फिर देवकी की प्रार्थना पर उन्होंने अपना बाल रूप धारण किया, ताकि लीला मानव रूप में आगे बढ़े और कारागार की सुरक्षा व्यवस्था भी कोई संदेह न करे।
जैसे ही श्रीकृष्ण ने बाल रूप लिया, कारागार की भारी जंजीरें अपने आप खुलने लगीं। पहरेदारों की आँखें गहरी नींद में बंद हो गईं, द्वार के ताले स्वतः खुल गए और चारों ओर फैली जंजीरें ढीली पड़कर गिरने लगीं।
वसुदेव ने यह देख स्पष्ट समझ लिया कि यह सब किसी दिव्य संकेत का परिणाम है। अंदर ही अंदर एक प्रेरणा हुई कि इस बालक को अभी, इसी समय मथुरा के बाहर सुरक्षित स्थान पर ले जाना है।
कारागार के बाहर वर्षा और बाढ़ का दृश्य भयंकर था, पर वसुदेव ने बालक को टोकरी में रखकर सिर पर उठाया और सुरक्षित मार्ग की खोज में चल पड़े।
वसुदेव कारागार से निकलकर यमुना नदी की ओर बढ़े। वर्षा के कारण नदी उफान पर थी, पर जैसे ही वसुदेव नदी के तट पर पहुँचे, जल का स्तर वहाँ इतना घट गया कि एक मार्ग दिखाई देने लगा। ऐसा लगा मानो यमुना भी बालक के चरणों को छूना चाहती हो, इसलिए क्षण मात्र को उफान लेकर फिर शांत हो गई।
वसुदेव ने सावधानी से पानी में कदम रखा, एक हाथ से टोकरी संभाली और दूसरे से संतुलन बनाए रखा। कथा में यह भी वर्णित है कि आसपास नाग के फन के समान संरक्षण का भाव था, ताकि वर्षा की धाराएँ शिशु को स्पर्श न कर सकें। धीरे धीरे वे यमुना पार कर गोखुल की दिशा में बढ़ते गए।
कुछ ही समय बाद वे नंद और यशोदा के घर पहुँचे। उस समय वहाँ भी एक बालिका का जन्म हुआ था और प्रसव वेदना के बाद यशोदा अचेत अवस्था में थीं। वसुदेव ने बालिका को उठाया और उस स्थान पर श्रीकृष्ण को रख दिया, जहाँ अभी अभी पुत्र जन्म का आभास था।
फिर वे उसी मार्ग से लौटते हुए पुनः मथुरा की कारागार में आए। लौटने पर भी कारागार के द्वार वैसे ही खुले मिले, पहरेदार अब भी सो रहे थे। वसुदेव ने बालिका को देवकी के पास रख दिया और जैसे ही यह हुआ, जंजीरें फिर से कस गईं और द्वार अपने आप बंद हो गए।
कुछ समय बाद जब वह बालिका रोई तो कारागार के पहरेदार जागे और तुरंत कंस को सूचना दी कि देवकी के यहाँ आठवाँ शिशु जन्म चुका है। कंस तत्काल कारागार की ओर दौड़ा।
वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि जन्मा हुआ शिशु कन्या है। देवकी और वसुदेव ने विनती की कि यह तो लड़की है, जबकि भविष्यवाणी पुत्र के विषय में थी। उन्होंने कहा कि यह कन्या उसे कैसे मार सकती है, अतः इसे जीवन दान दे दिया जाए।
कंस के मन में संशय था कि कहीं यह छल न हो, पर भय इतना प्रबल था कि उसने कहा कि वह किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाएगा। उसने बालिका को पैरों से पकड़कर पत्थर पर पटकने के लिए ऊपर उठाया।
कथा के अनुसार उसी क्षण वह बालिका उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और दिव्य रूप धारण कर कहने लगी कि हे कंस, तुझको मारने वाला कहीं और जन्म ले चुका है। यह सुनते ही कंस की चिंता और बढ़ गई, पर सत्य यह था कि श्रीकृष्ण अब गोखुल में सुरक्षित थे।
उधर गोखुल में नंद बाबा और यशोदा के घर बाल रूप में श्रीकृष्ण का पालन पोषण प्रारंभ हो चुका था। वे बाह्य रूप से एक साधारण ग्वाल बाल के रूप में पले बढ़े, पर भीतर दिव्यता का प्रकाश उनके प्रत्येक कार्य में दिखाई देता था।
ग्वालों की बस्ती में पलते हुए उन्होंने गायों की सेवा, वंशी की मधुर ध्वनि, गोचारण और सखा भाव के माध्यम से जीवन का ऐसा सरल और आनंदपूर्ण चित्र खींचा, जिसमें भक्तों को धर्म और प्रेम दोनों की एक साथ झलक मिलती है।
आगे चलकर यही बालक वृंदावन की लीलाएँ, कंस वध, धर्म की स्थापना और गीता के उपदेश तक, अनेक अध्यायों में समूचे युग का मार्गदर्शक बना, पर यह सब उसी रात से आरंभ हुआ जब जन्माष्टमी की अंधेरी कारागार में प्रकाश ने पहली बार श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया।
श्रीकृष्ण के जन्म की यह कथा केवल ऐतिहासिक या पौराणिक वर्णन भर नहीं, गहरा आध्यात्मिक संकेत भी है। कंस के रूप में अहंकार, अत्याचार और भय से भरा मन दिखाई देता है, जो अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है।
देवकी और वसुदेव की शांत, सहनशील और ईश्वरभक्त वृत्ति यह बताती है कि जब मनुष्य धर्म पर स्थिर रहकर पीड़ा भी स्वीकार करता है तब ईश्वर उसकी परिस्थिति को स्वयं अपने हाथ में लेकर परिवर्तन की राह खोलते हैं।
यमुना की लहरों का शांत होना, कारागार के द्वारों का स्वयं खुल जाना और शिशु का सुरक्षित गोखुल तक पहुँचना यह सब इस बात का प्रतीक है कि जब दिव्य समय आता है, तो प्रकृति की हर शक्ति भी सत्य और धर्म का साथ देती है।
श्रीकृष्ण का जन्मस्थान कहाँ माना जाता है?
श्रीकृष्ण का जन्मस्थान मथुरा को माना गया है, जहाँ कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद रखा था और वहीं अष्टमी की रात्रि में श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ।
कंस ने देवकी के पहले छह पुत्रों को क्यों मार दिया?
आकाशवाणी में यह भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवाँ पुत्र ही कंस का वध करेगा। भय और स्वार्थ में अंधे हो गए कंस ने किसी भी जोखिम से बचने के लिए पहले छहों पुत्रों को जन्मते ही पत्थर पर पटककर मार डाला।
बलराम गोखुल कैसे पहुँचे?
देवकी के सातवें गर्भ से जो बालक था, वह दिव्य लीला से वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में चला गया। वहीं गोखुल में उसका जन्म हुआ और वही आगे चलकर बलराम कहलाए, जो श्रीकृष्ण के बड़े भाई के रूप में प्रसिद्ध हुए।
वसुदेव श्रीकृष्ण को जेल से बाहर कैसे ले जा सके?
जन्माष्टमी की रात स्वयं कारागार के द्वार खुल गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और वसुदेव की बेड़ियाँ ढीली पड़ गईं। इसे दिव्य हस्तक्षेप माना गया। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार की और गोखुल में नंद यशोदा के घर पहुँचा दिया।
यशोदा की बेटी का क्या हुआ और कंस को क्या संदेश मिला?
नंद के घर जन्मी कन्या को वसुदेव ने मथुरा लाकर देवकी के पास रखा। कंस जब उसे मारने लगा तो वह कन्या देव रूप धारण कर आकाश में चली गई और उसने कहा कि कंस को मारने वाला बालक कहीं और जन्म ले चुका है। इससे कंस व्याकुल तो हुआ, पर श्रीकृष्ण अब उसकी पहुँच से बाहर हो चुके थे।
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