By पं. संजीव शर्मा
परिवार में सुख, संतान और विवाहिक समृद्धि के लिए व्रत का महत्व

जयापार्वती व्रत उन सुहागिन और अविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत पावन माना जाता है, जो उत्तम वैवाहिक जीवन, अखंड सौभाग्य और संतान सुख की कामना रखती हैं। इस व्रत में विशेष रूप से माता पार्वती की पूजा की जाती है और उनकी कृपा से जीवन में स्थिरता, संरक्षण और पूर्णता आने का विश्वास रखा जाता है। इस व्रत की कथा का श्रवण और पाठ, दोनों ही रूपों में, साधक के जीवन में विशेष आध्यात्मिक बल और आश्वासन भरते हैं।
जयापार्वती व्रत प्रायः पांच दिन तक श्रद्धापूर्वक किया जाता है। कुछ परंपराओं में इसे आषाढ़ मास के विशेष दिनों में मनाया जाता है, जहां सुहागिन महिलाएं और कन्याएं मिलकर माता पार्वती की पूजा, व्रत और कथा श्रवण करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से विवाह से जुड़ी बाधाएं शांत होती हैं और संतान प्राप्ति की राह में आई रुकावटें धीरे धीरे दूर होने लगती हैं।
जयापार्वती व्रत की मूल कथा एक सरल, किन्तु अत्यंत मार्मिक परिवार की कहानी के माध्यम से माता पार्वती की करुणा को दिखाती है।
एक समय की बात है, कौडिन्य नगर में वामन नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सत्या के साथ निवास करता था। उनके घर में किसी भौतिक वस्तु की कमी नहीं थी। धन, अन्न, वस्त्र, गृह और सम्मान, सब कुछ पर्याप्त था, लेकिन एक कमी उनके मन को हमेशा विचलित रखती थी। उनके कोई संतान नहीं थी और यही बात उन्हें भीतर से दुखी किए रहती थी। वर्षों तक संस्कारों और पूजा पाठ के बावजूद, संतान सुख न मिल पाने के कारण दोनों मन ही मन व्यथित रहते थे।
इसी बीच एक दिन देवऋषि नारद भ्रमण करते हुए उनके घर पहुंचे। ब्राह्मण दंपत्ति ने अत्यंत श्रद्धा से उनका सत्कार किया, आसन दिया और यथाशक्ति उनके भोजन और सेवा का प्रबंध किया। जब अवसर मिला, तो उन्होंने folded hands के साथ नारद जी से अपनी पीड़ा व्यक्त की और संतान न होने का कारण जानने की विनती की। उनकी सच्ची व्यथा सुनकर नारद जी ने उन्हें एक पावन उपाय बताया।
नारद जी ने ब्राह्मण दंपत्ति से कहा कि उनके नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में एक पवित्र बिल्व वृक्ष स्थित है। उस बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंग रूप में विराजमान हैं। उन्होंने समझाया कि यदि पति पत्नी दोनों मिलकर उस शिवलिंग की श्रद्धा और नियम पूर्वक पूजा करेंगे, तो उनकी संतान प्राप्ति की मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।
यह सुनकर वामन और सत्या के हृदय में एक नई आशा जाग उठी। वे दोनों तुरंत ही वन की ओर निकल पड़े। कुछ खोजने के बाद उन्होंने बिल्व वृक्ष के नीचे स्थित शिवलिंग को पहचान लिया। वहां का वातावरण शांत, पवित्र और गहन था। उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया कि अब से नित्य वे दोनों मिलकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करेंगे।
ब्राह्मण दंपत्ति ने विधि विधान से पूजा आरंभ की। प्रतिदिन वे स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, बिल्वपत्र, पुष्प, जल और भक्ति के साथ शिवलिंग के समक्ष उपस्थित होते। यह केवल कुछ दिनों की बात नहीं थी। कथा के अनुसार पूरे पांच वर्ष तक वामन और सत्या ने बिना कोई अंतर डाले, नियमित रूप से शिव पार्वती की उपासना जारी रखी। यह समय उनके धैर्य, विश्वास और समर्पण की परीक्षा जैसा था।
एक दिन की बात है। वामन पूजा के लिए फूल तोड़ने के उद्देश्य से वन में गए हुए थे। सामान्य दिन की तरह उन्हें जल्दी लौट आना था, ताकि समय पर पूजा हो सके। लेकिन उस दिन जब वे पुष्प चुन रहे थे, तभी दुर्भाग्य से उन्हें सर्पदंश हो गया। विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि वहीं वन में उनकी मृत्यु हो गई।
घर पर सत्या प्रतीक्षा करती रही। समय बीतता गया, पर पति का कोई समाचार नहीं मिला। चिंता बढ़ती गई और अंततः वह उन्हें ढूंढने के लिए वन की ओर निकल पड़ी। कुछ दूरी पर पहुंचकर उसने अपने पति को निर्जीव अवस्था में भूमि पर पड़े देखा। वह दृश्य देखकर सत्या का हृदय चीत्कार के साथ टूट गया। वह विलाप करने लगी। अत्यंत दुःख और असहाय अवस्था में उसने माता पार्वती का स्मरण किया और रोते रोते देवी से अपने पति के प्राण वापस देने की विनती की।
ब्राह्मणी की यह करुण पुकार, उसका वर्षों का व्रत, उसका निष्कपट विश्वास, सब मिलकर जैसे आकाश तक पहुंच गया। कथा के अनुसार, सत्या के आर्तनाद को सुनकर स्वयं माता पार्वती वहां प्रकट हुईं। उन्होंने ब्राह्मणी की दशा देखी, उसके साधना मार्ग और विश्वास को समझा और उसके दुख को दूर करने का निर्णय लिया।
माता पार्वती ने स्नेह से ब्राह्मणी की ओर देखा और उसके पति की ओर बढ़ीं। उन्होंने मृत पड़े ब्राह्मण के मुख में अमृत प्रविष्ट किया। अमृत का स्पर्श होते ही वामन का शरीर हिलने लगा और धीरे धीरे वे पुनः जीवित हो गए। कुछ ही क्षणों में उनके प्राण वापस लौट आए। यह अद्भुत दृश्य देखकर सत्या की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, पर अब उन आंसुओं में दुख से ज्यादा कृतज्ञता और विस्मय था।
पति को जीवित पाकर ब्राह्मण दंपत्ति ने बड़े प्रेम से माता पार्वती की स्तुति की और उनका पूजन किया। उनकी भक्ति और स्थिरता से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें वर मांगने को कहा। दोनों ने विनम्रता से माता के सामने वही पुरानी मनोकामना रखी। उन्होंने संतान प्राप्ति का वरदान मांगा, ताकि उनका गृहस्थ जीवन पूर्ण हो सके और वंश आगे बढ़ सके।
माता पार्वती ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की, पर साथ ही एक मार्ग भी बताया। उन्होंने कहा कि यदि वे दोनों श्रद्धा पूर्वक जयापार्वती व्रत करेंगे, तो उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी और संतान का सुख उनके जीवन में आएगा। यह केवल वरदान नहीं बल्कि एक व्रत मार्ग की ओर प्रेरणा भी थी, जिसमें भक्ति, नियम और विश्वास का समन्वय था।
ब्राह्मण दंपत्ति ने माता की आज्ञा को आदरपूर्वक स्वीकार किया। समय आने पर उन्होंने विधि विधान के साथ जयापार्वती व्रत किया। व्रत के दौरान उन्होंने संयम, पूजा, कथा श्रवण और माता पार्वती की स्मृति को अपने जीवन का केंद्र बना लिया।
व्रत पूर्ण होने के पश्चात, माता पार्वती की कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। संतान के जन्म से उनका घर आनंद और पूर्णता से भर गया। जहाँ पहले रिक्तता थी, वहां अब उल्लास और संतोष का वातावरण था। इस प्रकार जयापार्वती व्रत उनके लिए संतान सुख की चाबी बनकर आया।
जयापार्वती व्रत कथा साधक को केवल संतान प्राप्ति का मार्ग नहीं समझाती बल्कि भक्ति और धैर्य का वास्तविक रूप भी दिखाती है।
इस कथा के माध्यम से यह भाव भी उभरकर आता है कि जयापार्वती व्रत केवल संतान के लिए नहीं बल्कि दांपत्य जीवन में एक दूसरे के प्रति विश्वास, त्याग और साथ निभाने की प्रेरणा भी देता है।
क्या जयापार्वती व्रत केवल संतान की कामना के लिए किया जाता है?
मुख्य रूप से यह व्रत संतान प्राप्ति और संतान से जुड़े दुख दूर करने के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन अनेक स्त्रियां इसे अच्छे दांपत्य जीवन, पति की दीर्घायु और गृहस्थ सुख के लिए भी श्रद्धा से करती हैं।
क्या इस व्रत के लिए विवाहित होना आवश्यक है?
ऐसी मान्यता है कि विवाहित स्त्रियां, विशेष रूप से संतान की इच्छा रखने वाली, इस व्रत को अधिक करती हैं। फिर भी कई परंपराओं में अविवाहित कन्याएं भी अच्छे वर और सुखी गृहस्थ जीवन की कामना से जयापार्वती व्रत रखती हैं।
क्या जयापार्वती व्रत पांच दिन तक ही करना अनिवार्य है?
लोक परंपरा में प्रायः इसे पांच दिन का व्रत माना गया है, पर क्षेत्र विशेष के अनुसार कुछ स्थानों पर दिन संख्या में थोड़ा अंतर भी मिलता है। मूल भाव यह है कि जिस अवधि के लिए संकल्प लिया जाए, उसे पूरे नियम और श्रद्धा के साथ पूरा किया जाए।
क्या केवल कथा पढ़ने से भी व्रत का फल मिलता है?
कथा का श्रवण और पाठ दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं। यदि कोई व्यक्ति पूरा व्रत न रख सके, पर श्रद्धा से कथा पढ़े या सुने, तो भी उसे माता पार्वती की कृपा का कुछ न कुछ अंश अवश्य प्राप्त होता है। फिर भी, व्रत, पूजा और कथा तीनों का संगम सर्वोत्तम माना जाता है।
क्या पुरुष भी जयापार्वती व्रत कर सकते हैं?
कथा में स्वयं ब्राह्मण वामन को भी माता पार्वती के व्रत का मार्ग बताया गया है। व्यवहार में यह व्रत अधिकतर स्त्रियां करती हैं, पर यदि कोई पुरुष श्रद्धा से इसे करे और नियमों का पालन करे, तो उसके लिए भी यह व्रत शुभ और फलदायी माना जा सकता है।
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