By अपर्णा पाटनी
भक्ति, त्याग और संतान संरक्षण की भावनाओं से जुड़ी जितिया व्रत की आध्यात्मिक गाथा

जिउतिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, केवल एक पारंपरिक उपवास नहीं है, बल्कि मातृत्व, संतान सुरक्षा, तप, निष्ठा और ईश्वर कृपा का अत्यंत भावपूर्ण पर्व है। इस व्रत में स्त्रियाँ अपनी संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य, सुरक्षा और मंगल की कामना से निर्जला या कठोर नियमों सहित उपवास रखती हैं। परंपरा में यह भी माना जाता है कि इस व्रत की पूर्णता केवल उपवास से नहीं होती, बल्कि उससे जुड़ी व्रत कथा को श्रद्धापूर्वक सुनना या पढ़ना भी उतना ही आवश्यक होता है। यही कथा व्रत को केवल रीति नहीं रहने देती, बल्कि उसे भाव, त्याग और आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करती है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में प्रायः तीन कथाएँ सुनाई जाती हैं। पहली कथा चील और सियारिन की है, जो व्रत की निष्ठा और संकल्प पालन का महत्व समझाती है। दूसरी कथा राजा जीमूतवाहन की है, जो त्याग, करुणा और दूसरे की संतान के लिए अपने प्राण तक अर्पित कर देने की महिमा को प्रकट करती है। तीसरी कथा भगवान श्रीकृष्ण, उत्तरा, अश्वत्थामा और अजन्मे परीक्षित से जुड़ी है, जो इस व्रत के जीवित्पुत्रिका नाम के गहरे भाव को सामने लाती है। इन तीनों कथाओं का आधार अलग है, पर इनका सार एक ही है, संतान रक्षा के लिए मातृ संकल्प, व्रत की सत्यनिष्ठा, धर्मपूर्ण त्याग और दिव्य संरक्षण।
परंपरा के अनुसार इस व्रत के दिन भगवान श्रीगणेश, माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। शिवप्रिय प्रदोषकाल में पूजा का विशेष महत्व माना गया है और व्रत का पारण अगले दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के बाद किया जाता है। यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन कथा, श्रद्धा और संतान मंगलकामना का भाव हर स्थान पर समान रहता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की पहली कथा चिल्हो सियारो, अर्थात चील और सियारिन की कथा के रूप में सुनाई जाती है। कहा जाता है कि एक घने वन में सेमर के एक बड़े वृक्ष पर एक चील रहती थी और पास की झाड़ी में एक सियारिन का निवास था। दोनों में बड़ा स्नेह था। चील जो कुछ भी खाने को लाती, उसमें से सियारिन के लिए अवश्य हिस्सा रखती। सियारिन भी उसी आत्मीयता से चील का ध्यान रखती। इस प्रकार दोनों का जीवन प्रेम, साथ और सहजता में बीत रहा था।
एक दिन वन के पास गाँव की स्त्रियाँ जिउतिया व्रत की तैयारी कर रही थीं। चील ने बड़े ध्यान से उनकी पूजा व्यवस्था, उपवास का भाव और संतान मंगलकामना का संकल्प देखा। उसने सियारिन को भी इसके बारे में बताया। दोनों ने निश्चय किया कि वे भी यह व्रत करेंगी। दोनों ने संकल्प लिया और पूरे दिन भूखी प्यासे रहकर व्रत का पालन किया। दिन तो किसी तरह बीत गया, पर रात होते होते सियारिन को भूख और प्यास बहुत सताने लगी।
जब उससे सहन नहीं हुआ, तब वह जंगल में गई और वहाँ जाकर मांस और हड्डियाँ खा आई। लौटते समय चील ने हड्डी चबाने की आवाज सुन ली और पूछा कि यह कैसी आवाज है। सियारिन ने बात छिपाने के लिए कहा कि यह आवाज भूख से उसके पेट के गुड़गुड़ाने की है। पर चील समझ गई कि व्रत भंग हो चुका है। उसने सियारिन को डाँटा और कहा कि जब व्रत निभाना ही नहीं था तो संकल्प क्यों लिया। सियारिन लजा गई, पर जो हो चुका था वह बदल नहीं सकता था। चील ने रात भर धैर्य रखकर अपना व्रत पूरा किया।
अगले जन्म में दोनों मनुष्य रूप में सगी बहनें बनीं। सियारिन बड़ी बहन बनी, जिसका विवाह एक राजकुमार से हुआ। चील छोटी बहन बनी, जिसका विवाह उसी राज्य के मंत्रीपुत्र से हुआ। समय के साथ बड़ी बहन के जो भी बच्चे होते, वे जीवित नहीं रहते, जबकि छोटी बहन के बच्चे स्वस्थ, सुरक्षित और सुखी रहते। इससे बड़ी बहन के मन में ईर्ष्या भर गई। उसने छोटी बहन के बच्चों और उसके पति को हानि पहुँचाने के अनेक प्रयास किए। यहाँ तक कि एक बार उसने बच्चों का सिर कटवाकर डब्बे में बंद करा दिया, पर वह शीश मिठाई बन जाता और बच्चों का बाल तक बाँका न होता। कई बार उसने षड्यंत्र किए, लेकिन वह कभी सफल नहीं हुई।
अंततः दैवयोग से उसे अपनी भूल का बोध हुआ। उसने अपनी छोटी बहन से क्षमा माँगी। फिर उसकी सलाह से उसने विधि विधान सहित जीवित्पुत्रिका व्रत किया। तब उसके पुत्र भी जीवित रहने लगे। इस कथा के माध्यम से व्रत की निष्ठा, व्रत भंग के परिणाम, ईर्ष्या का दुष्परिणाम और पश्चाताप के बाद सुधार की संभावना को समझाया जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की दूसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण कथा राजा जीमूतवाहन की है। यह कथा त्याग, परोपकार और दूसरे की संतान की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर देने की चरम करुणा का प्रतीक मानी जाती है। कथा के अनुसार गंधर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे स्वभाव से बड़े उदार, दयालु और परोपकारी थे। जब उनके पिता वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम की ओर जाने लगे, तब उन्होंने जीमूतवाहन को राजसिंहासन सौंपना चाहा। पर जीमूतवाहन का मन राजपाट में नहीं लगता था। उन्होंने राज्य का भार अपने भाइयों को सौंप दिया और स्वयं पिता की सेवा के लिए वन चले गए।
वन में ही उनकी भेंट मलयवती नामक राजकन्या से हुई और दोनों के बीच प्रेम उत्पन्न हुआ। एक दिन वन में घूमते हुए जीमूतवाहन बहुत आगे निकल गए। वहाँ उन्होंने एक वृद्धा को विलाप करते देखा। पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया कि वह नागवंश की स्त्री है और उसका एक ही पुत्र है, जिसका नाम शंखचूड़ है। उसने बताया कि पक्षीराज गरुड़ के कोप से मुक्ति पाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है कि वे प्रतिदिन एक युवा नाग को गरुड़ के भक्षण के लिए सौंपते हैं। आज उसके पुत्र की बलि का दिन है। वह कहती है कि एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र उससे छिन जाए।
जीमूतवाहन यह सुनकर अत्यंत व्यथित हुए। उन्होंने उस माँ को आश्वासन दिया कि उसका पुत्र नहीं मरेगा। उन्होंने शंखचूड़ के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और स्वयं उसे ओढ़कर वध्य शिला पर जाकर लेट गए, ताकि गरुड़ उन्हें ही शिकार समझकर ले जाएँ। निर्धारित समय पर गरुड़ बड़े वेग से आए और लाल वस्त्र में ढके जीमूतवाहन को पंजों में दबोचकर पर्वत शिखर पर ले गए। वहाँ गरुड़ ने अपनी कठोर चोंच से उनके शरीर पर प्रहार किया और मांस नोचने लगे। पीड़ा से जीमूतवाहन की आँखों से आँसू बह निकले और वे कराह उठे।
गरुड़ आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। उन्होंने परिचय पूछा। तब जीमूतवाहन ने पूरी कथा बता दी कि वे एक माँ के पुत्र की रक्षा के लिए अपने प्राण देने आए हैं। उन्होंने गरुड़ से कहा कि वे उन्हें खाकर अपनी भूख शांत करें। जीमूतवाहन की बहादुरी, त्याग और दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर देने की भावना से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्हें स्वयं पर पछतावा हुआ कि एक मनुष्य दूसरे के पुत्र के लिए अपने प्राण देने को तैयार है और वे स्वयं दूसरों की संतान को खाकर जीवन जी रहे हैं।
गरुड़ ने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि वे उनके त्याग से प्रसन्न हैं और उन्हें कोई वरदान माँगना चाहिए। जीमूतवाहन ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने कहा कि यदि गरुड़ सचमुच प्रसन्न हैं, तो वे सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें और जिन जिन प्राणियों का अब तक उन्होंने हरण किया है, उन्हें पुनः जीवन प्रदान करें। गरुड़ ने ऐसा ही किया। उन्होंने नागों को अभय दिया और कहा कि जो स्त्री जीमूतवाहन के इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत करेगी, उसकी संतान मृत्यु के मुख से भी बच सकती है। तभी से पुत्र रक्षा के लिए जीमूतवाहन पूजा और इस कथा के श्रवण की परंपरा मानी जाती है। यह भी कहा जाता है कि यह कथा कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी।
तीसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है। महाभारत युद्ध के बाद, अपने पिता की मृत्यु से दुखी और प्रतिशोध की अग्नि से भरे अश्वत्थामा ने पांडवों से बदला लेने का संकल्प लिया। वह रात में पांडवों के शिविर में घुसा और सोते हुए पाँच लोगों को पांडव समझकर मार डाला, किंतु वे वास्तव में द्रौपदी के पाँच पुत्र थे। इस घोर अपराध के कारण अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली।
इसके बाद क्रोध और अपमान से भरे अश्वत्थामा ने पांडव वंश को समाप्त करने के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रही अजन्मी संतान को मारने हेतु ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उस अस्त्र को निष्फल करना असंभव माना गया। उत्तरा की गर्भस्थ संतान का जीवित रहना आवश्यक था, क्योंकि वही वंश की अंतिम आशा थी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समस्त पुण्यों का फल उस अजन्मी संतान को समर्पित कर दिया और उसे गर्भ में ही पुनः जीवित कर दिया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित बना।
कथा का भाव यह है कि जो बालक गर्भ में मृत्यु के बाद पुनः जीवित हुआ, उसी कारण जीवित्पुत्रिका नाम प्रतिष्ठित हुआ। इस प्रकार यह कथा इस व्रत को दिव्य संरक्षण, संतान रक्षा और भगवान की करुणा से जोड़ती है। जिउतिया व्रत केवल मातृत्व का संकल्प नहीं रह जाता, बल्कि ईश्वर कृपा से जीवन रक्षा के विश्वास का पर्व भी बन जाता है।
यद्यपि इन तीनों कथाओं के पात्र और संदर्भ अलग हैं, पर इनके भीतर एक समान आध्यात्मिक धारा प्रवाहित होती है। चील और सियारिन की कथा व्रत की निष्ठा और संकल्प का महत्त्व सिखाती है। जीमूतवाहन की कथा त्याग, दया और जीवन रक्षा का आदर्श देती है। भगवान श्रीकृष्ण की कथा दिव्य कृपा, संतान जीवन रक्षा और पुनर्जीवन का भाव प्रकट करती है। यही कारण है कि जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा में इन तीनों कथाओं को समान श्रद्धा से स्थान दिया जाता है।
इन कथाओं को साथ सुनने से व्रत करने वाले को यह समझ आता है कि
आज के समय में बहुत से लोग परंपरा को केवल रीति मानकर निभाते हैं, जबकि कुछ लोग बिना समझे उसे छोड़ देते हैं। ऐसे समय में जिउतिया व्रत की कथा हमें यह समझाती है कि परंपरा केवल बाहरी आचरण नहीं होती, उसके भीतर मनुष्य के अनुभव, पीड़ा, करुणा, आशा और विश्वास छिपे रहते हैं। इन कथाओं में मातृ हृदय की चिंता है, बच्चे के जीवन के लिए प्रार्थना है, करुणा की शक्ति है और ईश्वर पर गहरा भरोसा है।
यही कारण है कि यह कथा आज भी उतनी ही स्पर्श करती है। हर माँ की चिंता आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी। हर संतान की सुरक्षा की प्रार्थना आज भी उतनी ही गहरी है। इसीलिए जिउतिया व्रत की कथा समय के साथ पुरानी नहीं हुई, बल्कि और भी अधिक भावपूर्ण लगती है।
जिउतिया व्रत कथा को केवल सूचना की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। इसे भावना, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पढ़ना चाहिए। जब कथा पढ़ी जाए, तो यह भाव रहे कि यह मातृत्व की करुणा, त्याग और रक्षा का पाठ है। चील और सियारिन की कथा हमें अनुशासन सिखाती है। जीमूतवाहन की कथा हमें अपना हृदय विस्तृत करना सिखाती है। भगवान श्रीकृष्ण की कथा हमें यह भरोसा देती है कि जब सब मार्ग बंद हो जाएँ, तब भी दिव्य कृपा का मार्ग शेष रह सकता है।
इसलिए कथा पढ़ते समय ये भाव विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं
इस व्रत का सबसे गहरा संदेश यही है कि जीवन रक्षा केवल चिकित्सा, शक्ति या साधन से ही नहीं, बल्कि संकल्प, श्रद्धा, त्याग और ईश्वर कृपा से भी जुड़ी हुई मानी गई है। इन कथाओं में बार बार संकट आता है, मृत्यु की छाया भी आती है, लेकिन हर बार उसके सामने मातृत्व, व्रत, प्रार्थना, बलिदान और दिव्य संरक्षण खड़े दिखाई देते हैं। यही इस कथा का आध्यात्मिक सौंदर्य है।
जिउतिया व्रत कथा भय नहीं देती, बल्कि आश्वासन देती है। यह केवल नियम नहीं सिखाती, बल्कि धर्म का जीवित भाव दिखाती है। यह बताती है कि सच्चा व्रत वही है जिसमें शरीर का संयम, मन की निष्ठा और हृदय की करुणा तीनों साथ हों।
जिउतिया व्रत कथा में कौन कौन सी मुख्य कथाएँ शामिल होती हैं
जिउतिया व्रत कथा में सामान्यतः चील और सियारिन की कथा, राजा जीमूतवाहन की कथा और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा सुनाई जाती है।
राजा जीमूतवाहन की कथा का मुख्य संदेश क्या है
इस कथा का मुख्य संदेश त्याग, परोपकार, करुणा और दूसरे की संतान की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर देने की भावना है।
चील और सियारिन की कथा किस बात पर जोर देती है
यह कथा व्रत की निष्ठा, संकल्प पालन, ईर्ष्या के परिणाम और पश्चाताप के बाद परिवर्तन की संभावना पर जोर देती है।
भगवान श्रीकृष्ण की कथा का जीवित्पुत्रिका व्रत से क्या संबंध है
इस कथा में भगवान श्रीकृष्ण उत्तरा की गर्भस्थ संतान को पुनः जीवित करते हैं, जिससे जीवित्पुत्रिका नाम का भाव जुड़ता है।
इस व्रत की सबसे बड़ी सीख क्या है
इस व्रत की सबसे बड़ी सीख यह है कि मातृ श्रद्धा, सत्यनिष्ठा, त्याग, करुणा और ईश्वर कृपा मिलकर संतान रक्षा का गहरा आध्यात्मिक आधार बनाते हैं।
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