By पं. सुव्रत शर्मा
भाद्रपद महीने में गौरी माता की पूजा और व्रत की विधियाँ

भाद्रपद मास में मनाया जाने वाला जेष्ठा गौरी अवाहन महाराष्ट्र की अत्यंत मंगलमय और पारिवारिक परंपरा वाला व्रत माना जाता है। इस व्रत में गौरी रूप में माता पार्वती का विशेष पूजन किया जाता है और घर घर में सौभाग्य, समृद्धि तथा आनंद का आवाहन होता है। यह व्रत जेष्ठा नक्षत्र के दौरान आने के कारण जेष्ठा गौरी व्रत या जेष्ठा गौरी पूजा के नाम से प्रसिद्ध है।
जेष्ठा गौरी व्रत सामान्यतः भाद्रपद शुक्ल पक्ष के उस दिन से शुरू होता है जब जेष्ठा नक्षत्र का संयोग बनता है। यह पर्व अधिकतर तीन दिनों तक चलता है जिसमें अवाहन, मुख्य पूजन और अंत में गौरी विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। मुख्य रूप से विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत को करती हैं, हालांकि अविवाहित कन्याएँ भी उचित जीवनसाथी की प्रार्थना के साथ देवी की आराधना में सम्मिलित होती हैं।
| जेष्ठा गौरी व्रत पक्ष | महत्व और संकेत |
|---|---|
| समय | भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, जेष्ठा नक्षत्र के दौरान |
| मुख्य साधक | विवाहित स्त्रियाँ, साथ में अविवाहित कन्याएँ |
| प्रमुख उद्देश्य | सौभाग्य, वैवाहिक सुख, समृद्धि और रक्षा की कामना |
| मुख्य देवी | गौरी रूप में माता पार्वती, कई स्थानों पर महालक्ष्मी भाव |
जेष्ठा गौरी पूजा मुख्य रूप से महाराष्ट्र में अत्यधिक लोकप्रिय व्रत के रूप में मनाई जाती है। भाद्रपद मास में जब गणेश चतुर्थी का उत्सव आरंभ होता है, उसी अवधि में जेष्ठा गौरी व्रत भी विशेष उत्साह से मनाया जाता है।
यह व्रत तीन दिन तक चलने वाला पर्व माना जाता है। इन तीन दिनों में गौरी आवाहन, गौरी पूजन और गौरी विसर्जन की क्रमबद्ध परंपरा निभाई जाती है। घरों में सजावट, पुष्प, दीप और रंगोली के साथ वातावरण को अत्यंत मंगलमय बनाया जाता है और स्त्रियाँ आपस में मिलकर इस उत्सव का आनंद साझा करती हैं।
जेष्ठा गौरी व्रत को स्त्रियाँ माता शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए करती हैं। देवी को विश्व की सर्वोच्च शक्ति माना गया है, इसलिए यह व्रत शक्ति उपासना का एक प्रमुख रूप भी बन जाता है। विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत के माध्यम से अपने दांपत्य जीवन में सुख, पति की रक्षा, घर परिवार की उन्नति और स्थिर समृद्धि की कामना करती हैं।
अविवाहित कन्याएँ इस दिन देवी पार्वती की पूजा विशेष रूप से करती हैं। वे प्रार्थना करती हैं कि उन्हें भी योग्य, सत्पुरुष और सदाचार वाले जीवनसाथी की प्राप्ति हो। गौरी को शिव की अर्धांगिनी माना जाता है, इसलिए वे इच्छाओं को पूरा करने वाली और भक्तों के हृदय को समझने वाली देवी के रूप में पूजित होती हैं।
कई परंपराओं में जेष्ठा गौरी पूजा को देवी लक्ष्मी की उपासना से भी जोड़ा गया है। कथा के अनुसार एक समय देवताओं पर असुरों का प्रकोप बढ़ गया। देवता बार बार पराजित हो रहे थे और अत्यंत पीड़ित थे।
तब देवताओं ने श्रीमहालक्ष्मी की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर श्रीमहालक्ष्मी ने भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी तिथि को असुरों का नाश किया और देवताओं को भय और संकट से मुक्त किया। इस घटना की स्मृति में और अपने पतियों की रक्षा की भावना से स्त्रियाँ भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन जेष्ठा गौरी व्रत रखती हैं और देवी की कृपा प्रार्थना करती हैं।
इस प्रकार जेष्ठा गौरी पूजा को माता पार्वती और महालक्ष्मी दोनों के दर्शन की संगम साधना माना जा सकता है। एक ओर वैवाहिक सुख और प्रेम का आशीर्वाद, दूसरी ओर धन, प्रतिष्ठा और रक्षा की शक्ति का आशीर्वाद, दोनों का संयुक्त भाव इस व्रत में प्रकट होता है।
जेष्ठा गौरी अवाहन के दिन घर में दो गौरी प्रतिमाओं का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है। इन्हें कई परिवारों में जेष्ठा और कनिष्ठा के नाम से जोड़ा जाता है। सामान्यतः ये प्रतिमाएँ गणेश चतुर्थी शुरू होने के लगभग दो दिन बाद घर लाई जाती हैं।
अवाहन के समय दो विवाहित स्त्रियाँ गौरी की प्रतिमाएँ लेकर घर आती हैं। एक स्त्री घर के मुख्य द्वार से प्रवेश करती है और दूसरी घर के पीछे की ओर से। यह प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है कि देवी गौरी हर दिशा से घर में समृद्धि और शुभता लेकर आ रही हैं।
घर की देहरी से लेकर भीतर तक हल्दी और कुमकुम से गौरी के चरणचिह्न बनाए जाते हैं। प्रत्येक पदचिह्न पर प्रतिमा रखते समय हल्दी, कुमकुम और अक्षत अर्पित किए जाते हैं और स्वागत के मंगल मंत्र बोले जाते हैं। इसी प्रक्रिया को जेष्ठा गौरी अवाहन माना जाता है।
अगले दिन जेष्ठा गौरी का मुख्य पूजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन सोलह प्रकार की सब्ज़ियाँ बनाकर देवी को अर्पित की जाती हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के मीठे पकवान, चावल से बने व्यंजन और अनेक फल भी नैवेद्य के रूप में चढ़ाए जाते हैं।
पारंपरिक भोजन में पूरण पोली जैसी विशिष्ट व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गौरी को सुहाग की सामग्री, चूड़ियाँ, बिंदी, कुमकुम, हल्दी, श्रृंगार वस्तुएँ, साड़ी या वस्त्र इत्यादि अर्पित करके उन्हें सुहाग और समृद्धि की अधिष्ठात्री माना जाता है। शाम के समय घर की गृहिणी आस पड़ोस और रिश्तेदारी की सुहागिन स्त्रियों को घर बुलाती है और हल्दी कुमकुम का विधिवत कार्यक्रम करती है।
यह मिलन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आपसी स्नेह, आशीर्वाद और स्त्री शक्ति के सम्मान का सुंदर माध्यम भी बनता है।
तीसरे दिन जेष्ठा गौरी का विसर्जन किया जाता है। यदि घर में लाई गई प्रतिमाएँ मिट्टी की हों, तो उन्हें जल में विसर्जित करने का विधान है। विसर्जन से पहले दही भात या अन्य सरल नैवेद्य अर्पित कर गौरी से अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रार्थना की जाती है।
कुछ परिवारों में गौरी की धातु या पुनः उपयोग योग्य प्रतिमाएँ होती हैं। ऐसी स्थिति में वे विसर्जन के स्थान पर केवल दही भात का नैवेद्य देकर, आरती करके, प्रतिमाओं को सम्मान से उतार लेते हैं और सुरक्षित स्थान पर रख देते हैं।
पूरे तीन दिन घर में विशेष व्यंजन, उत्सव का वातावरण और पूजा पाठ का क्रम चलता है। कई परंपराओं में जेष्ठा गौरी पूजा को लक्ष्मी उपासना के रूप में भी किया जाता है, इसलिए अर्थिक स्थिरता और व्यवसाय में उन्नति की प्रार्थना भी साथ ही की जाती है।
जेष्ठा गौरी व्रत की सबसे विशेष बात यह है कि इसकी विधि अक्सर कुल परंपरा के अनुसार तय होती है। हर परिवार में कुछ विशेष नियम, भोग, मंत्र या रीति चलती हुई आ रही होती है।
इसी कारण एक ही नगर में भी अलग अलग घरों में जेष्ठा गौरी की पूजा शैली थोड़ा भिन्न दिखाई दे सकती है। कहीं सोलह प्रकार की सब्ज़ियों पर अधिक जोर होता है, कहीं विशेष प्रकार की मिठाई या नैवेद्य पर, तो कहीं भजन और महिला मंडली के सामूहिक कीर्तन पर। परंतु मूल भावना हर स्थान पर एक ही रहती है, वह है गौरी के रूप में देवी शक्ति का सम्मान और सौभाग्य की प्रार्थना।
जेष्ठा गौरी पूजा का समय गणेश चतुर्थी पर्व के बीच माना जाता है। सामान्यतः गणेश स्थापना के कुछ दिन बाद गौरी का आगमन होता है और दोनों की संयुक्त उपासना से घर में माता और पुत्र दोनों के आशीर्वाद की अनुभूति होती है।
गौरी को गणेश की जननी माना जाता है, इसलिए कई भक्त उन्हें गणेश के साथ ही पूजते हैं। कुछ लोग गौरी को महालक्ष्मी भाव से भी संबोधित करते हैं और मानते हैं कि गणेश के साथ लक्ष्मी का संयुक्त आगमन बुद्धि और धन दोनों के संतुलन का सूचक है।
जेष्ठा गौरी व्रत किस नक्षत्र और किस मास में किया जाता है?
यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में जेष्ठा नक्षत्र के संयोग के समय किया जाता है। इसी कारण इसे जेष्ठा गौरी व्रत या जेष्ठा गौरी पूजा कहा जाता है और महाराष्ट्र में विशेष रूप से लोकप्रिय है।
जेष्ठा और कनिष्ठा गौरी की प्रतिमाएँ क्या दर्शाती हैं?
आमतौर पर दो गौरी प्रतिमाएँ साथ लाई जाती हैं जिन्हें जेष्ठा और कनिष्ठा कहा जाता है। यह बड़ी और छोटी बहन जैसे मंगल रूपों का प्रतीक मानी जा सकती हैं, जो घर में दोहरी कृपा, सौभाग्य और समृद्धि के भाव को दर्शाती हैं।
हल्दी कुमकुम कार्यक्रम का जेष्ठा गौरी पूजा में क्या महत्व है?
हल्दी कुमकुम के लिए सुहागिन स्त्रियों को आमंत्रित किया जाता है। यह सौभाग्य साझा करने, एक दूसरे को आशीर्वाद देने और देवी के नाम से भगिनियों के बीच प्रेम और सम्मान बढ़ाने का माध्यम है।
जेष्ठा गौरी को सोलह प्रकार की सब्ज़ियाँ क्यों अर्पित की जाती हैं?
सोलह प्रकार की सब्ज़ियों का भोग जीवन के विविध रस, समृद्धि और अन्न की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। देवी को सोलह कलाओं से सम्पन्न शक्ति माना गया है, इसलिए सोलह प्रकार के व्यंजन अर्पित करके पूर्णता और समग्रता का भाव प्रकट किया जाता है।
जेष्ठा गौरी पूजा को माता लक्ष्मी की उपासना क्यों कहा जाता है?
कथा के अनुसार श्रीमहालक्ष्मी ने भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन असुरों का नाश कर देवताओं की रक्षा की थी। उसी स्मृति में स्त्रियाँ जेष्ठा गौरी व्रत करती हैं। कई स्थानों पर गौरी को महालक्ष्मी रूप मानकर धन, रक्षा और परिवारिक समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
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