By अपर्णा पाटनी
ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व, व्रत और पूजा विधि

सनातन परंपरा में ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनोकामना पूर्ण करने वाली अत्यंत शुभ तिथि माना जाता है। मान्यता है कि इसी पवित्र दिन सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। इस कारण यह दिन दांपत्य सौभाग्य, दीर्घायु और पारिवारिक सुख शांति के लिए विशेष माने जाने लगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, व्रत, जप और दान पुण्य करते हैं, उनकी अनेक मनोकामनाएं धीरे धीरे पूर्ण होने लगती हैं। यह पूर्णिमा पितृ दोष शमन के लिए भी शुभ मानी जाती है और इस दिन किया गया स्नान दान पितरों की शांति के लिए अत्यंत हितकारी समझा जाता है।
हिंदू पंचांग में सामान्यतः वर्ष भर में 12 पूर्णिमाएं आती हैं। कभी अधिकमास के कारण यह संख्या 13 भी हो जाती है, पर ज्येष्ठ पूर्णिमा का अपना विशिष्ट स्थान है। गर्मी के चरम समय में आने वाली इस पूर्णिमा पर जल, अन्न और छाया का दान अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान, संकल्प और पितरों व देवताओं का स्मरण करना शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी विशेष रूप से गंगा में स्नान करके तर्पण और दान करना श्रेष्ठ माना गया है। जो साधक घर पर रहते हैं वे स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु, शिव, देवी और पितरों का स्मरण कर सकते हैं।
व्रत की दृष्टि से ज्येष्ठ पूर्णिमा पर दिन भर संयमित आहार या फलाहार रखते हुए सावित्री सत्यवान की कथा सुनना और बरगद के वृक्ष के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर विवाहित स्त्रियां बरगद के वृक्ष की परिक्रमा कर, उसके तने पर धागा बांधकर दीर्घ सुहाग की कामना करती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के साथ कई पारंपरिक मान्यताएं जुड़ी हैं। उनमें से प्रमुख कुछ इस प्रकार समझी जाती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा की व्रत कथा का संबंध विदित रूप से राजा अश्वपति, उनकी पुत्री सावित्री और उनके भावी पति सत्यवान से जुड़ा है। यह प्रसंग प्राचीन काल की पृष्ठभूमि में घटित माना जाता है।
कथा के अनुसार बहुत समय तक संतान रहित रहने के बाद राजा अश्वपति के घर एक दिव्य तेजस्विनी कन्या ने जन्म लिया। राजकुमारी का नाम सावित्री रखा गया। समय के साथ सावित्री बुद्धि, सौंदर्य और चरित्र में अनुपम हो गईं। जब वह विवाह योग्य आयु तक पहुंचीं तो राजा अश्वपति ने उसके लिए योग्य वर की खोज आरंभ की, पर उन्हें कोई भी वर अपनी पुत्री के योग्य पूर्ण रूप से नहीं लगा।
राजा की चिंता देखकर सावित्री ने पिता की परेशानी कम करने का निश्चय किया। उन्होंने स्वयं ही वर की तलाश के लिए विभिन्न स्थानों की यात्रा की। इस प्रकार कथा का एक नया चरण प्रारंभ होता है।
वर खोजने के दौरान सावित्री की दृष्टि एक दिन वन में तपस्वी और तेजस्वी युवक सत्यवान पर पड़ी। सत्यवान का स्वभाव सरल, हृदय धर्मनिष्ठ और वाणी मधुर थी। वह अपने अंधे माता पिता की सेवा में पूर्ण रूप से समर्पित रहता था।
सत्यवान का तेज, विनम्रता और सेवाभाव देखकर सावित्री ने मन ही मन उसे अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया। जब वह वापस अपने पिता के पास लौटीं तो उन्होंने स्पष्ट रूप से बता दिया कि उनके मन ने सत्यवान को ही वर रूप में चुन लिया है।
यद्यपि राजा अश्वपति को सावित्री के निर्णय पर विश्वास था, फिर भी परंपरा के अनुसार उन्होंने देवर्षि नारद से सत्यवान के विषय में विस्तार से जानकारी प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।
जब यह बात नारद जी तक पहुंची तो उन्होंने ध्यान करके सत्यवान के जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त की। उन्होंने राजा अश्वपति और सावित्री को बताया कि यद्यपि सत्यवान गुणों से भरपूर, धर्मनिष्ठ और आदर्श पुरुष है, पर उसकी आयु बहुत कम है। अल्पायु होने के कारण नारद ने सावित्री को दूसरा वर चुनने की सलाह दी।
उन्होंने समझाया कि छोटी आयु वाला वर चुनने से भविष्य में अत्यधिक दुख और कष्ट झेलने पड़ सकते हैं। पर सावित्री ने अत्यंत शांत और दृढ़ स्वर में कह दिया कि वह सत्यवान को ही अपना पति स्वीकार कर चुकी हैं। एक बार पति के रूप में हृदय से जिसे स्वीकार कर लिया जाए, उसे छोड़कर दूसरा वर चुनना उनके लिए संभव नहीं।
इस प्रकार सावित्री ने अल्पायु की आशंका और भविष्य के भय से ऊपर उठकर अपने पतिव्रता धर्म और अडिग निष्ठा को प्राथमिकता दी। अंततः पिता ने भी उनकी इच्छा को स्वीकार कर लिया और सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ सम्पन्न हुआ।
विवाह के पश्चात सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ वन में उनके माता पिता की सेवा के लिए रहने लगीं। सत्यवान के पिता अपने राज्य और दृष्टि दोनों खो चुके थे और वन में साधारण जीवन व्यतीत कर रहे थे। सावित्री ने सास ससुर की सेवा को ही अपना सर्वश्रेष्ठ धर्म मानकर पूर्ण समर्पण से उनका मन जीता।
अब दोनों पति पत्नी सादगी भरा पर संतोषपूर्ण जीवन जी रहे थे। समय के साथ सावित्री को नारद की वाणी याद रहती, पर उन्होंने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जब सत्यवान की आयु समाप्त होने का अनुमानित समय नजदीक आने लगा तब सावित्री ने भीतर ही भीतर व्रत, तप और जप से अपने को तैयार करना प्रारंभ कर दिया।
ज्येष्ठ पूर्णिमा का दिन नजदीक आया। सावित्री ने इस दिन विशेष व्रत, उपवास और प्रार्थना करने का संकल्प लिया, क्योंकि उन्हें दिव्य संकेतों से यह आभास हो चुका था कि यह दिन किसी बड़े मोड़ का साक्षी बनेगा।
कथा के अनुसार उस दिन सत्यवान अपने पिता की परंपरा के अनुसार वन में लकड़ी काटने गए। सावित्री ने भी संकेत पाकर उनसे अनुरोध किया कि आज वह उनके साथ वन तक चलें। सत्यवान ने सहमति दी और दंपती साथ साथ चले।
कुछ समय बाद सत्यवान के सिर में अचानक तीव्र पीड़ा होने लगी। वह दुर्बल होकर सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। सावित्री प्रेम से उनके सिर को सहलाती रहीं और भीतर ही भीतर ईश्वर से प्रार्थना करती रहीं। तभी वहां यमराज प्रकट हुए और सत्यवान की आत्मा को शरीर से अलग करके ले जाने लगे।
सावित्री ने यह दृश्य देखा तो शांत लेकिन दृढ़ मन से यमराज के पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उसे कई बार वापस लौटने के लिए कहा और समझाया कि मृत शरीर के साथ रहना उचित नहीं, पर सावित्री ने विनम्रता से कहा कि जहां पति जाएगा, वही उसका मार्ग होगा। इस प्रकार वह यमराज के पीछे पीछे चलती रहीं।
सावित्री के अद्भुत धैर्य, निष्ठा और पतिव्रता धर्म को देखकर यमराज के हृदय में सम्मान की भावना उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि बिना किसी शिकायत के, बिना भय के, यह पतिव्रता स्त्री केवल सच्चे प्रेम और धर्म के आधार पर उनके साथ चल रही है। यमराज ने उसकी परीक्षा लेने के बजाय उसे सम्मान देने का निश्चय किया।
उन्होंने सावित्री से कहा कि वह प्रसन्न हैं और उसे तीन वरदान प्रदान करेंगे परन्तु वरों में पति का जीवन नहीं मांग सकती। सावित्री ने पहले वरदान में अपने अंधे सास ससुर की नेत्र ज्योति वापस देने की प्रार्थना की। दूसरे वरदान में ससुर को उनका खोया हुआ राज्य और राजपाट वापस मिलने की कामना की।
तीसरे वरदान में सावित्री ने बड़ी बुद्धिमानी से कहा कि उन्हें पति सत्यवान के पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो। यमराज ने तीनों वरदान देने की स्वीकृति दे दी। परंतु जब उन्होंने तीसरे वरदान पर विचार किया तो ध्यान आया कि यदि सत्यवान जीवित ही न रहे तो सावित्री कैसे पुत्रवती हो पाएंगी।
यमराज ने स्वयं अनुभव किया कि उन्होंने सावित्री की पतिव्रता निष्ठा के प्रभाव में जो वरदान दिया है, उसके फलित होने के लिए सत्यवान का जीवित रहना अनिवार्य है। सावित्री ने प्रत्यक्ष रूप से पति को मांगने की बजाय ऐसी प्रार्थना की थी जिसका फल अपने आप पति के जीवन से जुड़ता था।
वरदानों के न्यायपूर्ण पालन के लिए यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। उन्होंने सावित्री की अटूट निष्ठा, बुद्धि और धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की और सत्यवान को पुनः जीवनदान देने का निश्चय किया।
सावित्री यमराज को प्रणाम करके उसी बरगद के वृक्ष के पास लौट आईं, जहां सत्यवान का निष्प्राण शरीर रखा था। जैसे ही वरदान का प्रभाव प्रकट हुआ, सत्यवान ने धीरे धीरे नेत्र खोले और पूर्ण जीवन के साथ पुनः उठ खड़े हुए।
सत्यवान के जीवित होने के साथ ही उनके सास ससुर की आंखों की रोशनी वापस लौट आई। उनकी स्मृति और शक्ति भी पहले जैसी हो गई। वरदान के फलस्वरूप सत्यवान के पिता को खोया हुआ राज्य और राजसत्ता भी लौट आई। समस्त परिवार दुःख से निकलकर पुनः समृद्धि और आनंद के मार्ग पर आ गया।
कथा में कहा गया है कि यह पूरा चमत्कार उसी बरगद के पेड़ के सानिध्य में घटित हुआ, जिसके नीचे सत्यवान का शरीर रखा था और जहां सावित्री ने पति की गोद थामकर यमराज तक का रास्ता तय किया था। बरगद की विशाल जड़ें, व्यापक छाया और दीर्घायु वृक्ष स्वरूप को देखते हुए इसे स्थिरता और अक्षय सौभाग्य का प्रतीक माना गया।
तभी से ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन बरगद के वृक्ष की पूजा, परिक्रमा और उसके तने पर धागा बांधने की परंपरा चली आ रही है। विवाहित स्त्रियां सावित्री की भांति अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना करते हुए इस व्रत को श्रद्धा से निभाती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत और कथा से साधकों को कई स्तरों पर शुभ फल की प्राप्ति मानी जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा का सबसे मुख्य धार्मिक महत्व क्या माना जाता है
ज्येष्ठ पूर्णिमा का मुख्य महत्व सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा है। इसी दिन सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म, बुद्धि और निष्ठा के बल पर यमराज से सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए। इसी कारण यह तिथि दांपत्य सौभाग्य, दीर्घायु और मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष मानी जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन कौन से कार्य विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं
इस दिन प्रातः स्नान, विशेषकर गंगा स्नान संभव हो तो, पितरों के लिए तर्पण, अन्न दान और जल दान शुभ माने जाते हैं। विवाहित स्त्रियां बरगद के वृक्ष की पूजा, परिक्रमा और धागा बांधकर पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। सावित्री सत्यवान की कथा श्रवण और पाठ भी अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
बरगद के पेड़ की पूजा का संबंध सावित्री सत्यवान की कथा से कैसे जुड़ता है
कथा के अनुसार सत्यवान की मृत्यु और पुनर्जीवन दोनों घटनाएं बरगद के वृक्ष के नीचे ही घटित हुईं। सावित्री ने वहीं पति का सिर गोद में रखा और वहीं यमराज से वरदान पाकर लौटीं। इसी कारण बरगद को अक्षय सौभाग्य, दीर्घायु और स्थिर जीवन का प्रतीक मानकर ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन उसकी विशेष पूजा की जाती है।
क्या ज्येष्ठ पूर्णिमा पितृ दोष से मुक्ति के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है
हां, ज्येष्ठ पूर्णिमा पर गंगा स्नान, तर्पण और दान को पितृ दोष शमन के लिए शुभ माना गया है। जो साधक इस दिन श्रद्धा से पितरों का स्मरण, जल अर्पण और अन्न दान करते हैं, उनके लिए पितरों की शांति और कुल की उन्नति की कामना की जाती है।
सावित्री सत्यवान की कथा से जीवन के लिए क्या सीख मिलती है
यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम, पतिव्रता धर्म, धैर्य और धर्मनिष्ठ बुद्धि मिलकर असंभव प्रतीत होने वाली स्थितियों को भी बदल सकते हैं। सावित्री ने भय, भविष्य और अल्पायु की आशंका के सामने भी अपने निश्चय को नहीं छोड़ा और सम्मानजनक ढंग से यमराज से संवाद करके अपने परिवार को पुनः सुख समृद्धि दिलाई। यह कथा जीवन में निष्ठा, संयम और सच्चे संकल्प की शक्ति का सुंदर उदाहरण है।
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