कजली तीज व्रत कथा और तीज माता के आशीर्वाद

By पं. नरेंद्र शर्मा

वैवाहिक सुख, समृद्धि और सौभाग्य के लिए व्रत और पूजा

कजली तीज व्रत कथा और महत्व

भाद्रपद महीने में आने वाली कजली तीज सुहाग, समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ा अत्यंत श्रद्धापूर्ण व्रत माना जाता है। इस दिन स्त्रियां तीज माता का व्रत रखकर परिवार के सुख, पति की दीर्घायु और घर में धन धान्य की वृद्धि की मनोकामना करती हैं। कजली तीज विशेष रूप से उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में भक्ति, आस्था और कथा श्रवण के साथ मनाई जाती है।

मान्यता है कि कजली तीज की व्रत कथा को पूर्ण श्रद्धा से सुनने और तीज माता की पूजा करने से विपरीत परिस्थितियां बदलने लगती हैं। जैसे एक साधारण गरीब ब्राह्मण और उसकी पत्नी पर कजली माता की कृपा हुई, उसी प्रकार यह व्रत श्रद्धा से करने वालों के जीवन में भी सौभाग्य के नए मार्ग खोलने वाला माना जाता है।

कजली तीज के व्रत का भाव और महत्व

कजली तीज का व्रत भाद्रपद मास में रखा जाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियां और युवतियां तीज माता की पूजा करती हैं। सुहागिनें अपने दांपत्य जीवन की रक्षा और उन्नति की प्रार्थना करती हैं, वहीं युवतियां योग्य जीवनसाथी की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं।

कजली तीज के व्रत में सातु का विशेष महत्व माना जाता है। कथा के अनुसार चने के सातु के बिना व्रत की पूजा पूर्ण मानी ही नहीं जाती। इसीलिए कई घरों में इस दिन चने के सातु का भोग लगाकर ही तीज माता की पूजा की जाती है।

कजली तीज का पक्ष संकेत और भाव
तीज माता का व्रत सुहाग, सौभाग्य और परिवार की रक्षा
चने का सातु व्रत की पूर्ति और कथा का मुख्य प्रसाद
कथा श्रवण कठिनाई मिटाकर भाग्य बदलने का संकेत

गरीब ब्राह्मण और उसकी पत्नी की कथा कहाँ से शुरू होती है

कजली तीज की पौराणिक व्रत कथा के अनुसार एक गाँव में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। जीवन की परिस्थिति सरल नहीं थी, पर दोनों पति पत्नी धर्म और आस्था से जुड़े रहने का प्रयास करते थे।

भाद्रपद महीने की कजली तीज का दिन आया। ब्राह्मण की पत्नी, जो स्वयं भी धर्मनिष्ठ और व्रत उपवास करने वाली थी, उसने निश्चय किया कि चाहे परिस्थितियां जैसी भी हों, तीज माता का व्रत अवश्य रखा जाएगा। उसने तीज माता के व्रत का संकल्प लिया और दिन भर नियमपूर्वक व्रत का पालन किया।

ब्राह्मणी की शर्त और सातु की मांग

संध्या होते होते ब्राह्मणी ने अपने पति ब्राह्मण से कहा कि आज उसका तीज माता का व्रत है और इस व्रत की पूर्ति के लिए चने के सातु की आवश्यकता है। उसने पति से विनती करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार से चने का सातु लाकर दे, ताकि वह तीज माता की विधि पूर्ण कर सके।

ब्राह्मण ने असहाय होकर कहा कि वह अत्यंत गरीब है और उसके पास सातु लाने के लिए धन नहीं है। तब ब्राह्मणी ने भावावेश में कह दिया कि चाहे चोरी करनी पड़े या डाका डालना पड़े, पर आज के दिन तीज माता के व्रत के लिए चने का सातु अवश्य लाना होगा।

यह वाक्य सुनकर ब्राह्मण द्वंद्व में आ गया। एक ओर धर्म, दूसरी ओर पत्नी की अटल श्रद्धा। अनेक सोच विचार के बाद वह रात के समय घर से निकला। उसके मन में केवल यही भाव था कि किसी प्रकार पत्नी का व्रत अधूरा न रह जाए।

साहूकार की दुकान और सातु बनाने की घटना

रात का समय था। गाँव के साहूकार की दुकान में सब लोग सो चुके थे। ब्राह्मण चुपचाप दुकान में घुस गया। वहाँ उसे चने की दाल, घी और शक्कर दिखाई दी। उसने इन्हीं से सवा किलो तोलकर चने का सातु तैयार कर लिया ताकि ब्राह्मणी तीज माता की पूजा विधि पूर्ण कर सके।

जब वह सातु बनाकर बाहर निकलने लगा तो उससे थोड़ी सी आवाज हो गई। आहट सुनकर दुकान के नौकर जाग गए। उन्होंने तुरंत चोर चोर चिल्लाना शुरू कर दिया।

शोर सुनकर साहूकार भी वहाँ पहुँच गया और ब्राह्मण को पकड़ लिया। यह घटना देखकर सबको लगा कि कोई बड़ा चोर पकड़ा गया है। पर वास्तविकता कुछ और ही थी।

ब्राह्मण की व्यथा और सच्चाई

साहूकार ने ब्राह्मण से कड़ाई से पूछा कि रात के समय दुकान में घुसकर उसने क्या चुराया है। ब्राह्मण ने भयभीत मन से कहा कि वह चोर नहीं बल्कि एक गरीब ब्राह्मण है। उसने विनम्रता से बताया कि उसकी पत्नी ने आज तीज माता का व्रत रखा है और व्रत की पूर्ति के लिए चने के सातु की मांग की थी।

उसने स्वीकार किया कि उसी आग्रह के कारण वह साहूकार की दुकान में आया, चने की दाल, घी और शक्कर लेकर सवा किलो सातु बना रहा था, ताकि पत्नी का व्रत अधूरा न रह जाए। उसने यह भी कहा कि उसके पास सातु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, न सोना, न चाँदी, न कोई और वस्तु।

साहूकार ने जब उसकी तलाशी ली तो वास्तव में उसके पास केवल सवा किलो सातु ही मिला। इससे यह स्पष्ट हो गया कि वह लालच में नहीं, केवल अपनी पत्नी के व्रत की पूर्णता के लिए आया था।

चांद निकलने पर ब्राह्मणी की प्रतीक्षा

उधर घर पर ब्राह्मणी चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा कर रही थी। तीज माता के व्रत में चांद निकलने के बाद ही सातु ग्रहण करने और पूजा विधि पूर्ण करने का विधान माना जाता है।

चांद तो आसमान में चमक उठा, पर ब्राह्मण अभी तक घर नहीं लौटा था। ब्राह्मणी मन ही मन तीज माता से प्रार्थना करती रही कि उसका व्रत सफल हो, पति सकुशल लौट आए और सातु भी किसी प्रकार मिल जाए।

साहूकार का हृदय परिवर्तन और धर्म बहन का संबंध

जब साहूकार ने ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी गरीबी दोनों देखीं, तो उसका हृदय पिघल गया। उसे समझ में आ गया कि यह व्यक्ति स्वार्थवश नहीं बल्कि व्रत की मर्यादा निभाने के लिए आया था।

साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि आज से वह उसकी पत्नी को अपनी धर्म बहन मानता है। उसने न केवल सवा किलो सातु उसे दे दिया बल्कि साथ में गहने, रुपए, मेहंदी, लच्छा और बहुत सारा धन भी भेंट के रूप में दिया, ताकि बहन की तीज सुगंधित और पूर्ण हो सके।

इस प्रकार ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक विदा किया गया। जो व्यक्ति रात में लज्जा और भय से झुककर आया था, वही अब मान सम्मान और उपहार लेकर घर लौट रहा था।

कजली माता की कृपा और व्रत का फल

घर पहुँचकर ब्राह्मण ने देखा कि उसकी पत्नी अभी भी तीज माता के व्रत की प्रतीक्षा में बैठी है। उसने सवा किलो सातु, गहने, मेहंदी, लच्छा और धन उसे सौंप दिया।

ब्राह्मणी ने प्रेम और कृतज्ञता से तीज माता की पूजा की। सातु का भोग लगाया और पूरा परिवार मिलकर कजली माता की आराधना में जुट गया।

कथा के अनुसार उसी दिन से ब्राह्मण का दुर्भाग्य घटने लगा और उसके जीवन में समृद्धि के द्वार खुलने लगे। कथा का अंतिम कथन यही है कि जैसे ब्राह्मण के दिन फिरे, वैसे ही जो भी श्रद्धा से कजली तीज का व्रत रखे और कजली माता की कथा सुने, उसके भी दिन बदलते हैं, कजली माता की कृपा से घर परिवार में सुख, सौभाग्य और समृद्धि बढ़ती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कजली तीज का व्रत किस महीने में रखा जाता है?
यह व्रत भाद्रपद महीने में कजली तीज की तिथि पर रखा जाता है। इसी दिन तीज माता की पूजा और कजली तीज की व्रत कथा सुनने का विशेष महत्व माना जाता है।

कजली तीज में चने के सातु का इतना महत्व क्यों है?
कथा के अनुसार ब्राह्मणी ने अपने व्रत की पूर्ति के लिए चने के सातु की इच्छा की थी और उसी के लिए ब्राह्मण साहूकार की दुकान तक गया। इसलिए इस व्रत में चने का सातु तीज माता का मुख्य प्रसाद माना गया है।

साहूकार ने ब्राह्मण की पत्नी को धर्म बहन क्यों माना?
ब्राह्मण की नीयत और उसकी गरीबी जानकर साहूकार का हृदय बदल गया। उसने उसकी पत्नी को धर्म बहन मानकर न केवल सातु दिया बल्कि गहने, मेहंदी, लच्छा और धन भी भेंट किया, ताकि तीज माता का व्रत शुभ और पूर्ण हो सके।

कजली तीज का व्रत किस फल के लिए रखा जाता है?
यह व्रत सुहाग, सौभाग्य, परिवार की समृद्धि और कठिन परिस्थितियों के बदलने की कामना से रखा जाता है। कथा में स्पष्ट कहा गया है कि जैसे ब्राह्मण का भाग्य बदला, वैसे ही कजली माता की कृपा से भक्तों के दिन भी फिरते हैं।

यदि सातु न मिले तो क्या कजली तीज का व्रत अधूरा रह जाता है?
कथा के भाव के अनुसार सातु व्रत का मुख्य प्रसाद है, इसलिए प्रयत्न यही होना चाहिए कि चने का सातु किसी न किसी रूप में अवश्य प्राप्त हो। फिर भी सबसे महत्वपूर्ण बात तीज माता के प्रति श्रद्धा, सत्य भाव और पूजा में मन की एकाग्रता मानी गई है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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