By पं. सुव्रत शर्मा
विवाहिक जीवन में सुख और सही जीवनसाथी के लिए व्रत का महत्व

कोकिला व्रत को उन कन्याओं और स्त्रियों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, जो अपने जीवन में श्रेष्ठ जीवनसाथी, स्थिर दांपत्य और सच्ची भक्ति की कामना रखती हैं। इस व्रत की कथा सीधे भगवान शिव और माता सती से जुड़ी है और इसका वर्णन शिव पुराण में मिलता है। माना जाता है कि इस व्रत का प्रारंभ माता पार्वती के पूर्व जन्म, अर्थात देवी सती के रूप में हुई उनकी कथा से होता है।
कोकिला व्रत आषाढ़ मास की विशेष तिथियों में रखा जाता है और परंपरागत रूप से इसमें कोयल के प्रतीक को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि जो कन्या या स्त्री इस व्रत को श्रद्धा से करती है, उसके विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और उसे अपने स्वभाव के अनुरूप, भावनात्मक रूप से सच्चा और योग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है। इस व्रत की पृष्ठभूमि में सती से पार्वती तक की लंबी आध्यात्मिक यात्रा छिपी है, जो त्याग, तप और पुनर्जन्म के माध्यम से पूर्ण होती है।
कोकिला व्रत की कथा देवी सती के जन्म और उनके मायके के वातावरण से आरंभ होती है।
देवी सती का जन्म राजा दक्ष के घर पुत्री के रूप में हुआ। दक्ष प्रजापति थे, यज्ञ परंपरा और वैदिक कर्मकांड के बड़े ज्ञाता माने जाते थे। लेकिन उनके भीतर एक गंभीर कमी थी। उन्हें भगवान शिव से विशेष विरक्ति बल्कि अप्रसन्नता थी। जहां सती के हृदय में शिव के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति थी, वहीं पिता के मन में उनके प्रति विरोध और अहंकार भरा था। इसी विरोधाभास से आगे चलकर वह प्रसंग जन्म लेता है, जिसे दक्ष यज्ञ के नाम से जाना जाता है।
एक बार राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने देवताओं, ऋषियों और सभी प्रमुख लोकपालों को आमंत्रित किया। ब्रह्मा, विष्णु और अनेक देवताओं को सादर निमंत्रण भेजा गया। सभा, वेद मंत्र, आहुति, सब कुछ बड़े आयोजन के साथ तैयार था। लेकिन इस निमंत्रण सूची से एक नाम जानबूझ कर अलग रखा गया। वह नाम था भगवान शिव का।
जब देवी सती को यह बात ज्ञात हुई कि उनके पिता ने यज्ञ किया, सबको बुलाया, लेकिन न अपने दामाद शिव को बुलाया, न अपनी पुत्री को, तो उनके हृदय में पीड़ा और प्रश्न दोनों उठे। उन्हें लगा कि बेटी होने के नाते उनका भी अधिकार है कि वे अपने पिता के यज्ञ में जाएं।
देवी सती ने भगवान शिव से अनुमति चाही कि वे अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहती हैं।
सती के लिए यह बात तर्क से सही थी, पर हृदय के भाव अलग थे। उन्हें लगा कि पिता का घर, बचपन का स्नेह और अपना अधिकार, इन सबके बीच निमंत्रण की औपचारिकता कम हो जाती है। वे शिव की बात से सहमत न हो सकीं और हठपूर्वक निर्णय लेकर अकेले ही दक्ष यज्ञ में पहुंच गईं।
दक्ष के यज्ञ स्थल पर पहुंचकर सती ने देखा कि पूरे आयोजन में कहीं भी उनके और उनके पति के लिए सम्मान या आदर की भावना नहीं है। न उनके आने की खुशी, न उनके लिए आदरपूर्ण स्वागत। इतना ही नहीं, कथा के अनुसार दक्ष ने न केवल सती को बल्कि भगवान शिव को भी अपमानित करने वाले शब्दों से संबोधित किया। उनके व्यवहार में अहंकार और कटुता स्पष्ट थी।
पति देव के इस अपमान को सती सह न सकीं। उन्हें लगा कि जहां उनके आराध्य का अपमान हो, वहां स्वयं जीवित रहना भी मानो उस अपराध में सहभागी होना है। अतः उन्होंने यज्ञ कुंड की अग्नि में कूदकर अपनी देह त्याग दी। इस प्रकार सती ने अपने शरीर का विसर्जन कर लिया, पर अपने प्रेम और भक्ति का त्याग नहीं किया।
जब यह समाचार भगवान शिव तक पहुंचा, तो उनके भीतर गहरा शोक और क्रोध दोनों जाग उठे। कथा में वर्णन मिलता है कि शिव ने सती के देह त्याग के बाद दक्ष के यज्ञ को भंग कर दिया और उसके अहंकार को चूर किया। यह घटना केवल एक यज्ञ को नष्ट करने की नहीं बल्कि उस दृष्टिकोण को तोड़ने की प्रतीक है जो केवल बाहरी कर्मकांड में उलझकर भक्ति और विनम्रता को भूल जाता है।
इसी प्रसंग के दौरान शिव द्वारा सती के प्रति भी एक कठोर निर्णय का उल्लेख आता है। सती ने बिना अनुमति के, हठपूर्वक यज्ञ में जाने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप इतना बड़ा अनिष्ट घटित हुआ। इस बात से शिव अत्यंत व्यथित हुए। कथा में कहा गया कि सती की इस जिद्द और आज्ञा उल्लंघन के कारण उन्हें भी एक श्राप मिला, कि उन्हें हजारों वर्षों तक कोयल के रूप में लोक में भटकना होगा।
यहीं से कोकिला व्रत का आधार बनता है। कोयल, जिसकी मधुर आवाज सबको प्रिय होती है, यहां तप, प्रतीक्षा और विरह के लंबे काल की प्रतीक बन जाती है। सती का कोयल रूप में तप, उनकी अधूरी साधना और पुनः पार्वती के रूप में जन्म वही आध्यात्मिक यात्रा है, जो इस व्रत के मर्म को गहराई देती है।
श्राप के प्रभाव से सती ने कोयल के रूप में नंदन वन में लंबा समय बिताया।
इसी तपस्या से जुड़े स्मरण के कारण इस व्रत का नाम कोकिला व्रत पड़ा। कोकिला, अर्थात कोयल, यहां केवल पक्षी नहीं बल्कि वही सती हैं जो अपनी अधूरी भक्ति को पूर्णता तक पहुंचाने के लिए समय और देह दोनों की सीमाओं से परे साधना कर रही हैं।
कथा आगे बताती है कि लंबी तपस्या के पश्चात देवी सती का पुनर्जन्म पार्वती के रूप में होता है। वे इस बार पर्वतराज हिमवान की पुत्री बनकर जन्म लेती हैं। जन्म से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति भक्ति और आकर्षण प्रकट होता है, मानो पिछले जन्म की साधना पुनः जाग उठी हो।
ऋषियों के मार्गदर्शन से पार्वती को यह संकेत मिलता है कि यदि वे अपने इस जन्म में भी नियमपूर्वक व्रत और तपस्या करेंगी, तो शिव फिर से उन्हें स्वीकार करेंगे। इसी क्रम में बताया गया कि पार्वती ने आषाढ़ मास से दूसरे मास तक विशेष व्रत रखकर शिवजी का पूजन किया। इस दीर्घ साधना, संयम और श्रद्धा ने अंततः भगवान शिव का हृदय पुनः पिघला दिया और उन्होंने पार्वती के साथ विवाह स्वीकार कर लिया।
इस प्रकार कोकिला के रूप में तप से लेकर पार्वती के रूप में विवाह तक, यह पूरी कथा संकेत देती है कि सच्चा प्रेम, यदि तप, संयम और सुधरे हुए निर्णयों के साथ जुड़ जाए, तो समय चाहे जितना लगे, वह पूर्णता तक अवश्य पहुंचता है।
कोकिला व्रत को विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ पति प्राप्ति का व्रत माना जाता है, पर इसका भाव केवल विवाह तक सीमित नहीं है।
कोकिला व्रत करते समय माता सती और माता पार्वती दोनों के रूपों को स्मरण करना, उनके जीवन की सीखों को अपने व्यवहार में उतारने का प्रयास करना, इस व्रत के आध्यात्मिक पक्ष को और गहरा बना देता है।
क्या कोकिला व्रत केवल अविवाहित कन्याओं के लिए है?
मुख्य रूप से यह व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ पति प्राप्ति का माना गया है, लेकिन विवाहित स्त्रियां भी अपने दांपत्य जीवन की स्थिरता और सौभाग्य के लिए इसे श्रद्धा से कर सकती हैं।
क्या कोकिला व्रत के दिन कोयल या पक्षियों को भोजन कराना आवश्यक है?
कथा में ऐसा अनिवार्य नियम नहीं बताया गया, लेकिन कोयल के प्रतीक को ध्यान में रखते हुए पक्षियों को अन्न या जल अर्पित करना अनेक स्थानों पर शुभ माना जाता है। यह करुणा और संवेदना का छोटा, पर सुंदर रूप है।
क्या इस व्रत के लिए संपूर्ण मास व्रत रखना पड़ता है?
कथा में आषाढ़ से दूसरे मास तक पार्वती द्वारा व्रत करने का उल्लेख संकेत रूप में है। व्यवहार में कोकिला व्रत की अवधि क्षेत्र और परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है। जिसका जितने दिनों का संकल्प हो, उसे उसी के अनुसार विधि से निभाना उचित है।
क्या केवल कोकिला व्रत कथा सुनने से भी लाभ होता है?
जो व्यक्ति व्रत न कर सके, वह भी श्रद्धा से कोकिला व्रत कथा सुनकर या पढ़कर माता सती और पार्वती का स्मरण कर सकता है। कथा श्रवण से भी मन में भक्ति, धैर्य और सही निर्णय की प्रेरणा जागती है, जो स्वयं में एक बड़ा लाभ है।
क्या यह व्रत हर वर्ष करना चाहिए या केवल एक बार पर्याप्त है?
यदि परिस्थितियां अनुमति दें, तो इसे हर वर्ष करना शुभ माना जा सकता है। फिर भी, किसी विशेष मनोकामना, जैसे श्रेष्ठ पति प्राप्ति या दांपत्य स्थिरता के लिए, एकाग्र भाव से किया गया एक भी कोकिला व्रत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
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