By पं. नीलेश शर्मा
अंधकार पर विजय और आत्मशुद्धि के दिव्य प्रतीक

दीपावली की दीपमालाओं से पहले भारतवर्ष एक ऐसे दिवस का साक्षी बनता है जो न केवल धार्मिक बल्कि ब्रह्मांडीय महत्व रखता है। दीपावली से एक दिन पूर्व मनाया जाने वाला नरकासुर चतुर्दशी या छोटी दीपावली, भगवान श्रीकृष्ण और देवी सत्यभामा द्वारा असुरराज नरकासुर के संहार की दिव्य स्मृति को जीवित रखता है। यह कथा केवल बुराई पर अच्छाई की विजय की नहीं बल्कि प्रकाश से पूर्व अंधकार के अंत की है।
भागवत तथा विष्णु पुराण के अनुसार, नरकासुर पृथ्वी देवी भूदेवी और भगवान वराह (विष्णु का वराह अवतार) का पुत्र था। दैवी कुल में जन्मे इस असुर में अपार शक्ति थी, परंतु अहंकार और स्वार्थ ने उसे अधर्म के मार्ग पर डाल दिया। उसका राज्य प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) में था, जहाँ से उसने देव, ऋषि और मानव सभी को आतंकित किया।
उसके अतिचारों की सीमा न थी, उसने स्वर्ग लोकों पर अधिकार किया, देवी अदिति के दिव्य कुंडल चुरा लिए और सोलह हजार देवकन्याओं को बंदी बना लिया। यह केवल बाहरी सत्ता का दुरुपयोग नहीं बल्कि निर्दोषता और पवित्रता पर अत्याचार था। उसका अहंकार यह दर्शाता था कि जब शक्ति विवेक से विमुख हो जाती है तब वही विनाश का कारण बनती है।
नरकासुर के अत्याचार से पीड़ित देवतागण भगवान विष्णु की शरण में गए। तब एक भविष्यवाणी प्रकट हुई कि नरकासुर का वध केवल उसकी माता या माता के अवतार द्वारा ही संभव है। वहीं से श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा, जो भूदेवी का ही अवतार थीं, इस दिव्य लीला का अभिन्न अंग बनीं।
श्रीकृष्ण अपने वाहन गरुड़ पर आरूढ़ होकर सत्यभामा के साथ नरकासुर के दुर्ग की ओर बढ़े। किले की रक्षा में अनेक परतें थीं, पत्थर, अग्नि, जल और अस्त्रों की दीवारें, जिन्हें उन्होंने एक-एक कर भेद डाला। नरकासुर का सेनापति मूर उनके मार्ग में अवरोध बनकर आया, पर श्रीकृष्ण ने उसका संहार कर "मुरारी" उपाधि प्राप्त की।
जब नरकासुर स्वयं युद्ध भूमि में आया तब आकाश अस्त्रों की अग्नि से दहक उठा। उसने त्रिशूल, ब्रह्मास्त्र और अग्न्यास्त्र का प्रयोग किया, किन्तु श्रीकृष्ण ने दिव्य ब्रह्मास्त्र और वरुणास्त्र से उसका प्रतिकार किया। अन्ततः एक क्षण आया जब त्रिशूल द्वारा नरकासुर ने श्रीकृष्ण के वक्ष पर आघात किया। श्रीकृष्ण ने उस समय लीलापूर्वक मूर्छा धारण की। तभी सत्यभामा ने धर्माघात सहन न कर अपने बाण से असुर का हृदय भेद दिया, भविष्यवाणी पूर्ण हुई और अधर्म का अंत हुआ।
नरकासुर के पतन के पश्चात उसका हृदय परिवर्तित हुआ। उसने अपनी गलतियों के लिए पश्चाताप किया और श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि उसकी मृत्यु का दिन शोक का नहीं बल्कि आनंदोत्सव का दिन बने। श्रीकृष्ण ने उसे वरदान दिया कि यह तिथि संसार में हमेशा नरकासुर चतुर्दशी के रूप में मनाई जाएगी, अंधकार से मुक्ति और ज्ञान से आलोक का दिवस।
कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण विजय प्राप्त कर नगर लौटे तब उनके शरीर पर रक्त के छींटे थे। उस दृश्य का स्वागत करने हेतु नगरवासियों ने दीप जलाए। वही दीप आज दीपावली के प्रथम ज्योति-पर्व का प्रतीक बन गए, प्रकाश का स्वागत, अधर्म के पराजय का उत्सव।
नरकासुर मात्र एक राक्षस नहीं, वह प्रत्येक मनुष्य के भीतर बसे उन विकारों का प्रतीक है जो आत्मा को बाँधते हैं, अहंकार, क्रोध, मोह, लालच और हिंसा। श्रीकृष्ण का यह धर्मयुद्ध आत्मा के प्रकाश द्वारा इन आंतरिक अंधकारों के विनाश का प्रतीक है।
सत्यभामा उस चेतना की प्रतिमूर्ति हैं जो कर्म और साहस से धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है। अतः यह कथा बताती है कि दीपावली का प्रकाश तभी सार्थक है जब हम पहले अपने भीतर के “नरकासुर” को जीत लें।
सत्यभामा का रूप इस कथा का हृदय है। वह शक्ति का मूर्त प्रतिरूप हैं, साहस, नीति और करुणा का संगम। उनका अंतिम प्रहार यह सन्देश देता है कि बुराई का अंत केवल प्रार्थना से नहीं बल्कि सक्रिय चेतना से होता है। इस दिन देवी शक्ति की अनेक रूपों में पूजा की जाती है, सत्यभामा, भूदेवी या महाकाली के रूप में। यह स्मरण है कि धर्म की विजय में स्त्रीशक्ति का योगदान अनिवार्य है।
| प्रदेश | प्रमुख अनुष्ठान और अर्थ |
|---|---|
| दक्षिण भारत (तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) | इसे दीपावली का मुख्य दिन माना जाता है। सूर्योदय से पूर्व अभ्यंग स्नान, आतिशबाजी और दीप जलाकर बुराई के अंत का उत्सव मनाया जाता है। |
| महाराष्ट्र और गुजरात | ‘छोटी दीपावली’ के रूप में अभ्यंग स्नान, दीपदान और यम पूजा कर स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है। |
| असम और पूर्वोत्तर भारत | प्राग्ज्योतिषपुर की पौराणिक स्मृति के कारण यह पर्व विशेष महत्त्व रखता है। कामाख्या मंदिर में माता भूदेवी और सत्यभामा की पूजा होती है। |
प्रांत कोई भी हो, भाव एक ही है, पहले अंधकार दूर करें, तभी प्रकाश प्रवेश पाए।
नरकासुर चतुर्दशी में किये जाने वाले अनुष्ठान आत्मिक प्रतीक हैं,
यह सम्पूर्ण प्रक्रिया बताती है कि उत्सव का पहला चरण शुद्धि है और उसी से ज्योति का उद्भव होता है।
दीपावली पर्वों का अनुक्रम एक दार्शनिक परिपाटी का निर्माण करता है,
श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध उसी तरह प्रकाश की प्रस्तावना करता है, जैसे भगवान राम की अयोध्या वापसी। दोनों घटनाएँ यह सत्य प्रतिपादित करती हैं, बुराई का अंत हुए बिना प्रकाश की स्थिरता संभव नहीं।
प्रश्न 1: दीपावली से एक दिन पहले नरकासुर चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है?
उत्तर: यह आत्मशुद्धि और अंधकार मुक्ति का दिवस है, जो प्रकाश उत्सव की तैयारी का प्रतीक है।
प्रश्न 2: नरकासुर की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: यह अहंकार और शक्ति के दुरुपयोग से उत्पन्न पतन की चेतावनी है और आत्मसत्य की विजय का संदेश भी।
प्रश्न 3: सत्यभामा की भूमिका इस युद्ध में इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर: वह शक्ति का प्रतीक हैं, जिन्होंने सक्रिय धर्म से बुराई का अंत किया और स्त्रीशक्ति के संतुलन की स्थापना की।
प्रश्न 4: इस दिन के प्रमुख अनुष्ठान कौन से हैं?
उत्तर: अभ्यंग स्नान, दीपदान, यम पूजा और आत्ममंथन, ये सभी कर्म शुद्धि और जागृति के प्रतीक हैं।
प्रश्न 5: यह दिवस दीपावली से कैसे जुड़ा हुआ है?
उत्तर: यह दीपावली का आध्यात्मिक पूर्वारंभ है; पहले अंधकार का अंत, फिर प्रकाश का उत्सव।
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