अभिमन्यु वध और श्रीकृष्ण का मौन

By पं. अभिषेक शर्मा

जानिए महाभारत के सबसे क्रूर दिन योगेश्वर के मौन रहने का परम कारण

अभिमन्यु वध के समय श्रीकृष्ण मौन क्यों थे

कुरुक्षेत्र का युद्ध मैदान मानवीय भावनाओं, जटिल निर्णयों और दैवीय योजनाओं का एक ऐसा महासंगम है जिसे समझना साधारण बुद्धि के लिए अत्यंत कठिन है। महाभारत के संपूर्ण युद्ध में अभिमन्यु वध से अधिक हृदयविदारक और विचलित करने वाला कोई दूसरा प्रसंग नहीं दिखाई देता। एक सोलह वर्ष का पराक्रमी बालक जिसे चक्रव्यूह के भीतर प्रवेश करने का आधा ज्ञान था वह धर्म की रक्षा के लिए उस भयानक कालचक्र में कूद पड़ता है। द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि जैसे संसार के सर्वश्रेष्ठ और महारथी योद्धाओं से घिरा होने के बाद भी वह बालक अंतिम सांस तक एक सिंह की भांति निर्भीक होकर लड़ता है। परंतु इतिहास के पन्नों में एक अत्यंत गंभीर प्रश्न आज भी गूंज रहा है कि उस समय संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण कहां थे। जो ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं उन्होंने उस निरीह बालक की करुण पुकार पर मौन क्यों साध लिया। यह मौन किसी लाचारी या दुर्बलता का सूचक नहीं था बल्कि इसके पीछे नियति का एक ऐसा अटल विधान, कर्मों का लेखा-जोखा और धर्म की स्थापना का एक अत्यंत गहरा रहस्य छिपा था जो आज भी मानवीय चेतना को झकझोर देता है।

चंद्र देव के पुत्र का भूलोक पर संक्षिप्त प्रवास

इस अलौकिक रहस्य की जड़ें महाभारत काल से भी बहुत पीछे पौराणिक काल की एक दिव्य घटना से जुड़ी हुई हैं। वैदिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार अभिमन्यु वास्तव में कोई साधारण मानव नहीं थे बल्कि वे साक्षात् चंद्र देव के अत्यंत प्रिय पुत्र वर्चा के अवतार थे। जब द्वापर युग में पृथ्वी पर अधर्म का भार अत्यधिक बढ़ गया और भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया तब ब्रह्मा जी के आदेशानुसार सभी देवताओं को अपने अंश पृथ्वी पर भेजने पड़े।

जब चंद्र देव से उनके पुत्र को भूलोक पर भेजने के लिए कहा गया तो वे अपने पुत्र के वियोग की कल्पना से अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्होंने देवताओं के सामने एक अनिवार्य शर्त रखी कि उनका पुत्र पृथ्वी पर अधिक समय तक नहीं रहेगा। चंद्र देव ने कहा कि उनका पुत्र द्वापर युग में केवल सोलह वर्षों के लिए ही मनुष्य रूप में जन्म लेगा और महाभारत के महायुद्ध में अपना अद्भुत पराक्रम दिखाकर वापस उनके पास लौट आएगा। यही कारण था कि अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र के रूप में जन्मे अभिमन्यु की आयु नियति ने पहले से ही केवल सोलह वर्ष निर्धारित कर रखी थी। श्रीकृष्ण जो कि साक्षात् काल के भी महाकाल हैं वे इस दिव्य समझौते और काल के नियम को भली-भांति जानते थे इसलिए उन्होंने नियति के इस अटल विधान में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

पूर्व जन्म का अनसुलझा हुआ कर्मिक ऋण

सनातन दर्शन और वैदिक ज्योतिष का यह परम अकाट्य सिद्धांत है कि इस संसार में कोई भी जीव अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से बच नहीं सकता चाहे वह देवताओं का पुत्र ही क्यों न हो। पौराणिक कथाओं के अनुसार अपने पूर्व जन्म में वर्चा ने अज्ञानतावश एक अत्यंत पूजनीय ऋषि का अपमान किया था या उनके कार्य में बाधा उत्पन्न की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें एक भयानक श्राप मिला था। उस श्राप के प्रभाव और कर्मिक ऋण को चुकाने के लिए ही उन्हें पृथ्वी पर एक अत्यंत कठिन और दर्दनाक परिस्थिति का सामना करना पड़ा।

इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिकोण यह भी है कि जब कंस का वध हुआ था तो उसकी दुष्ट आत्मा का एक अंश अभिमन्यु के भीतर भी अनजाने में प्रवेश कर गया था जब वे अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में थे। श्रीकृष्ण इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यदि उस नकारात्मक अंश का पूरी तरह से विनाश नहीं किया गया तो वह भविष्य में धर्म स्थापना के मार्ग में एक नई बाधा बन सकता है। चक्रव्यूह के भीतर सात महारथियों द्वारा मिलकर किया गया वह क्रूर प्रसंग वास्तव में उस बचे हुए नकारात्मक अंश को नष्ट करने और अभिमन्यु की आत्मा को पूरी तरह पवित्र करके वापस देवलोक भेजने की एक अत्यंत गुप्त दैवीय योजना का हिस्सा था।

अर्जुन के मोह भंग और महाविनाश की पृष्ठभूमि

कुरुक्षेत्र का यह महायुद्ध कोई साधारण भूमि का विवाद नहीं था बल्कि यह त्रेता युग और द्वापर युग के संचित पापों का अंत करके एक नए युग के निर्माण की वेदी थी। युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन अत्यंत भावुक हो गए थे और उन्होंने अपने ही बंधु-बांधवों पर अस्त्र उठाने से मना कर दिया था। श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर उनके तात्कालिक मोह को तो नष्ट कर दिया था परंतु अर्जुन के भीतर अपने सगे-संबंधियों के प्रति जो आंतरिक और सूक्ष्म ममता छिपी हुई थी वह युद्ध को पूरी आक्रामकता से लड़ने से रोक रही थी।

युद्ध का चरण अर्जुन की मानसिक स्थिति श्रीकृष्ण की कूटनीतिक योजना
युद्ध का प्रारंभ अत्यधिक मोह, अपनों को खोने का गहरा भय और उदासीनता गीता का दिव्य उपदेश देकर कर्तव्य पथ पर अग्रसर करना
चक्रव्यूह की रचना संशप्तकों से युद्ध में व्यस्त, मुख्य भूमि से अत्यधिक दूरी अर्जुन को रणभूमि से दूर ले जाना ताकि नियति अपना कार्य कर सके
अभिमन्यु का वध तीव्र शोक, अपार क्रोध और प्रतिज्ञा की अग्नि मोह का पूर्ण विनाश और कौरव सेना के समूल नाश का संकल्प

अभिमन्यु के इस भयानक और क्रूर वध ने पांडवों विशेषकर अर्जुन के भीतर की बची हुई दुर्बलता और मोह को हमेशा के लिए भस्म कर दिया। जब अर्जुन ने देखा कि कौरवों के बड़े-बड़े महारथियों ने धर्म के सारे नियमों को ताक पर रखकर उनके निहत्थे और अकेले पुत्र की निर्मम हत्या कर दी है तो उनका क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। इस घटना के बाद पांडवों के मन में कौरवों के प्रति दया की जो थोड़ी बहुत भावना बची थी वह पूरी तरह समाप्त हो गई। श्रीकृष्ण जानते थे कि दुष्टों का पूरी तरह से संहार करने के लिए पांडवों के भीतर इस प्रतिशोध की अग्नि का धधकना अत्यंत आवश्यक था अन्यथा वे अंत तक पूरी शक्ति से युद्ध नहीं लड़ पाते।

धर्मराज युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा और सत्य की परीक्षा

महाभारत की इस घटना के पीछे केवल श्रीकृष्ण का मौन ही नहीं था बल्कि पांडवों के अपने कर्म और निर्णय भी उत्तरदायी थे। द्रोणाचार्य ने जब चक्रव्यूह की रचना की थी तो उनका मुख्य उद्देश्य युधिष्ठिर को बंदी बनाना था ताकि युद्ध को समाप्त किया जा सके। अर्जुन उस समय रणभूमि में उपस्थित नहीं थे क्योंकि कौरव सेना के कुछ विशिष्ट योद्धा उन्हें जानबूझकर बहुत दूर ले गए थे। ऐसे संकट के समय में युधिष्ठिर ने अपने कुल के मान-सम्मान और अपनी रक्षा के लिए अभिमन्यु को उस व्यूह में प्रवेश करने का आदेश दिया जबकि वे जानते थे कि इस बालक को बाहर निकलने का मार्ग ज्ञात नहीं है।

युधिष्ठिर की इस चूक और पांडवों के अन्य भाइयों जैसे भीम, नकुल और सहदेव की असमर्थता ने भी अभिमन्यु को अकेला कर दिया क्योंकि जयद्रथ ने शिव के वरदान के कारण उन चारों को व्यूह के द्वार पर ही रोक दिया था। श्रीकृष्ण मनुष्यों को यह सिखाना चाहते थे कि जब आप स्वयं अधर्म या विवेकहीनता का मार्ग चुनते हैं और अपने स्वार्थ के लिए किसी निर्दोष को संकट में डालते हैं तो भगवान आपके द्वारा किए गए फैसलों के परिणामों को बीच में आकर नहीं बदलते। ईश्वर कर्मों के फल को भोगने की स्वतंत्रता देते हैं और यही संसार का सबसे बड़ा नियम है।

इस हृदयविदारक प्रसंग से मिलने वाले शाश्वत जीवन मूल्य

अभिमन्यु का यह बलिदान और श्रीकृष्ण की यह रहस्यमयी चुप्पी आधुनिक मनुष्य को जीवन जीने के कई अत्यंत गूढ़ और व्यावहारिक संदेश देती है जिन्हें आत्मसात करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए कल्याणकारी है।

  • जीवन में कई बार परिस्थितियां हमारे अनुकूल नहीं होतीं परंतु विपरीत समय में भी साहस का परित्याग न करना ही वास्तविक वीरता है।
  • अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है इसलिए किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसके सभी पहलुओं का पूरी तरह अध्ययन कर लेना चाहिए।
  • ईश्वर की योजनाओं को हमारी सीमित बुद्धि तुरंत नहीं समझ सकती परंतु समय आने पर यह सिद्ध हो जाता है कि हर घटना के पीछे एक बड़ा कल्याण छिपा होता है।
  • कर्तव्य पथ पर चलते हुए यदि प्राण भी संकट में पड़ जाएं तो भी पीछे न हटना ही श्रेष्ठ मनुष्यों का वास्तविक आचरण है।
  • सांसारिक संबंधों का मोह कितना भी गहरा क्यों न हो आत्मा की उन्नति और धर्म की रक्षा के सामने वह हमेशा गौण हो जाता है।

जब मनुष्य इन शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारता है तो वह समझ जाता है कि जीवन में आने वाले संकट वास्तव में हमें नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि हमारी आत्मा को निखारने और संसार को एक बड़ा संदेश देने के लिए आते हैं। अभिमन्यु भले ही शारीरिक रूप से उस दिन युद्ध हार गए परंतु इतिहास में उनका नाम अमर हो गया और वे शौर्य के सबसे बड़े प्रतीक बन गए।

नियति के न्याय और परमात्मा की मौन उपस्थिति का सत्य

संसार में जब भी कोई बड़ी त्रासदी होती है तो मनुष्य तुरंत ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठाने लगता है कि ईश्वर ने ऐसा अन्याय क्यों होने दिया। परंतु महाभारत का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि परमात्मा का मौन कभी भी उनकी उदासीनता नहीं होता। श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में केवल अर्जुन के सारथी नहीं थे बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड के न्याय की तुला को संतुलित कर रहे थे। वे जानते थे कि एक उत्तम भविष्य के निर्माण के लिए वर्तमान में कुछ अत्यंत कठिन और अप्रिय आहुतियां देना अनिवार्य होता है।

अभिमन्यु की मृत्यु ने कौरवों के पाप के घड़े को पूरी तरह से भर दिया और उनके विनाश की पटकथा को अंतिम रूप दे दिया। यदि उस दिन श्रीकृष्ण अपनी योगमाया से अभिमन्यु को बचा लेते तो संसार कभी भी यह नहीं समझ पाता कि अधर्म कितना क्रूर होता है और उसके समूल नाश के लिए कितने बड़े बलिदान की आवश्यकता होती है। इसलिए परमात्मा के उस मौन को उनकी विवशता समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनका वह मौन ही वास्तव में आने वाले एक बहुत बड़े धर्मराज्यों की स्थापना का शंखनाद था।

FAQ

श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक शक्तियों से अभिमन्यु को जीवित क्यों नहीं किया

श्रीकृष्ण नियति और काल के नियमों का पूर्ण सम्मान करते हैं। अभिमन्यु वास्तव में चंद्र देव के पुत्र थे जिन्हें केवल सोलह वर्षों के लिए ही पृथ्वी पर रहने की अनुमति मिली थी। यदि श्रीकृष्ण उन्हें जीवित करते तो यह ब्रह्मांडीय नियमों और चंद्र देव को दिए गए वचन का उल्लंघन होता।

चक्रव्यूह की रचना किसने की थी और इसका क्या उद्देश्य था

चक्रव्यूह की रचना कौरव सेना के सेनापति आचार्य द्रोणाचार्य ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य पांडवों के राजा युधिष्ठिर को बंदी बनाना था ताकि पांडव युद्ध हार जाएं और दुर्योधन की जीत सुनिश्चित हो सके क्योंकि अर्जुन उस समय मुख्य रणभूमि से बहुत दूर थे।

जयद्रथ ने पांडवों को चक्रव्यूह में प्रवेश करने से कैसे रोक दिया

जयद्रथ ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया था कि वह युद्ध में केवल एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर बाकी चारों पांडवों को आगे बढ़ने से रोक सकता है। इसी वरदान की शक्ति के कारण जयद्रथ ने भीम और अन्य पांडवों को व्यूह के द्वार पर ही रोक दिया जिससे अभिमन्यु अकेले पड़ गए।

अभिमन्यु चक्रव्यूह से बाहर निकलने की कला क्यों नहीं सीख पाए थे

जब अभिमन्यु अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में थे तब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुना रहे थे। सुभद्रा सुनते-सुनते सो गईं जिसके कारण गर्भ में स्थित अभिमन्यु केवल प्रवेश करने की विधि सुन सके और बाहर निकलने की विधि के समय सुभद्रा के सोने से वे उसे नहीं सुन पाए।

क्या अभिमन्यु का वध धर्म के नियमों के अनुसार हुआ था

नहीं, अभिमन्यु का वध पूरी तरह से युद्ध के नियमों और धर्म के विरुद्ध था। उस समय के नियमों के अनुसार किसी भी निहत्थे और रथ विहीन योद्धा पर वार करना वर्जित था परंतु कौरवों के सात महारथियों ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु पर पीछे से वार करके उनकी क्रूरतापूर्वक हत्या की थी।

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पं. अभिषेक शर्मा

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