By पं. नीलेश शर्मा
सावन मंगलवार व्रत से सौभाग्य और संतान सुख प्राप्ति

मंगल गौरी व्रत का पावन अवसर आते ही विवाहिताओं के हृदय में आनंद की लहर दौड़ जाती है। माता पार्वती शक्ति की प्रतीक और सुखी गृहिणी का आदर्श हैं। सावन मास के प्रत्येक मंगलवार को यह व्रत रखा जाता है। सोमवार शिव को समर्पित होते हैं। मंगलवार मंगला गौरी की आराधना का दिन है। यह व्रत केवल महिलाएं ही रखती हैं। सोलह या बीस मंगलवार तक इसे जारी रखा जाता है। हाल ही में विवाहित महिलाएं प्रथम पांच वर्षों में इसे निभाती हैं। भारत के लगभग सभी स्थानों पर यह प्रथा प्रचलित है।
सावन मंगलवार की पूजा प्रातः ब्रह्म मुहूर्त से आरंभ करें। शुभ मुहूर्त सुबह 5 से 7 बजे तक रहता है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा सामग्री एकत्र करें।
मंगला गौरी व्रत से महिलाएं माता गौरी की कृपा प्राप्त करती हैं। यह व्रत वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाता है। जीवन की 모든 बाधाएं दूर होती हैं। अविवाहित कन्याएं अच्छे पति की कामना से पूजा करती हैं। माता पार्वती शिव की अर्धांगिनी हैं। वे भक्तों की इच्छाएं पूर्ण करती हैं। विवाहिताएं सौभाग्यवती रहने के लिए समर्पित होती हैं।
यह व्रत शक्ति उपासना का प्रतीक है। नियमित पालन से दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है। संतान प्राप्ति होती है। आर्थिक समृद्धि आती है। स्वास्थ्य लाभ मिलता है। परिवार में शांति स्थापित होती है। एक कथा प्रचलित है। एक धनी व्यापारी धर्मपाल और उनकी सुंदर पत्नी संतानहीन थे। देव कृपा से पुत्र प्राप्त हुआ किंतु अल्पायु था। उन्होंने पुत्र का विवाह एक कन्या से किया जो विधवा न होने का वरदान प्राप्त थी। इससे पुत्र को शतायु प्राप्त हुआ। ऐसी कथाएं व्रत की महिमा बताती हैं।
धर्मपाल नामक धनी वैश्य थे। उनकी पत्नी अत्यंत रूपवती थी। लेकिन संतान सुख न था। परमात्मा की कृपा से एक पुत्र हुआ। किंतु वह शीघ्र मृत्यु का शिकार हो गया। दंपति शोकाकुल हो गए। उन्होंने मंगला गौरी व्रत रखा। माता गौरी प्रसन्न हुईं। पुत्र को पुनर्जीवन मिला। विवाह के लिए एक विशेष कन्या मिली। वह कन्या कभी विधवा न होने का आशीर्वाद प्राप्त थी। विवाह के बाद पुत्र को सौ वर्ष आयु प्राप्त हुई। वे सुखी जीवन जिए। यह कथा भक्तों को प्रेरणा देती है। मंगल गौरी की भक्ति से असंभव संभव होता है।
मंगला गौरी पूजा की तैयारी लकड़ी के पटरे पर करें। लाल वस्त्र बिछाएं। मंगला गौरी मूर्ति स्थापित करें। गेहूं के आटे से बने सोलह मोटे बैल विकों का दीपक प्रज्ज्वलित करें। शोडशोपचार पूजा करें। पवित्र स्नान करें। चावल से नवग्रह बनाएं। गेहूं से षोडश मातृका स्थापित करें। भगवान गणेश की मूर्ति goddesses के निकट रखें। कलश स्थापना करें।
गणेश पूजा में हल्दी, कुमकुम, अक्षत, जल, चंदन, सिंदूर, सुपारी, चावल, फूल, इलायची, बेल पत्र, फल, नट्स, दान अर्पित करें। उसके बाद नवग्रह पूजा। फिर षोडश मातृका पूजा। मंगला गौरी को शोडशोपचार पूजा दें। सोलह प्रकार के फूल फल चढ़ाएं। आईना, कंगा, चूड़ियां भेंट करें। पूजा के अंत में मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ करें।
| पूजा चरण | मुख्य सामग्री और विधि |
|---|---|
| कलश स्थापना | मंगल कलश, जल भरें, सुपारी, सिक्का, आम पत्र डालें। |
| गणेश पूजा | हल्दी कुमकुम, फल, मिष्टान्न अर्पित करें। |
| नवग्रह पूजा | चावल से नवग्रह बनाएं, धूप दीप दिखाएं। |
| षोडश मातृका | गेहूं से 16 देवियां, प्रत्येक को पूजें। |
| मंगला गौरी पूजा | शोडशोपचार, 16 फूल फल, आभूषण चढ़ाएं। |
सावन के अंतिम मंगलवार के अगले दिन बुधवार को मंगला गौरी विश्रजन करें। मूर्ति को सरोवर में विसर्जित करें। प्रसाद, हल्दी, सिंदूर विवाहिताओं को बांटें। व्रत सोलह या बीस मंगलवार तक रखें। हाल विवाहिताएं पांच वर्ष तक निभाएं।
पूजा स्थल को सुंदर सजाएं। घंटी बजाएं। मंत्र जप करें। आरती करें। भजन गाएं। प्रसाद ग्रहण करें। दान दें। यह विधि पूर्ण निष्ठा से करें।
यह व्रत वैवाहिक सुख का खजाना है। माता शक्ति की कृपा से जीवन उज्ज्वल होता है। बाधाएं नष्ट होती हैं। अच्छा पति मिलता है। दांपत्य जीवन सफल होता है। संतान सुख प्राप्त होता है। सौभाग्य बना रहता है।
लाभ सूची:
सावन मंगलवार मंगला गौरी भक्ति का केंद्र होता है। पूजा सामग्री एकत्र रखें। लाल चुनरी, फूल, फल। हल्दी कुमकुम। मिठाई प्रसाद। यह परंपरा प्राचीन है। महिलाएं एकत्र होकर पूजा करती हैं।
सामग्री तालिका:
मंगल गौरी व्रत कब और कैसे रखें?
सावन के मंगलवार को। सोलह या बीस तक। विधि अनुसार पूजा करें।
क्या अविवाहित कन्याएं मंगल गौरी व्रत रख सकती हैं?
हां। अच्छे पति की कामना से।
मंगल गौरी पूजा में क्या अर्पित करें?
16 फूल फल, आईना, कंगा, चूड़ियां।
मंगल गौरी विश्रजन कब करें?
अंतिम मंगलवार के अगले बुधवार को।
मंगल गौरी व्रत कथा कौन सी है?
धार्मपाल की पुत्र प्राप्ति कथा।
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