By पं. अमिताभ शर्मा
सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश और धार्मिक महत्व

वैदिक ज्योतिष में मिथुन संक्रांति को सूर्य की एक महत्वपूर्ण स्थिति परिवर्तन तिथि माना जाता है। इस दिन सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है और इस संक्रांति को कई प्रदेशों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में इसे प्रायः आषाढ़ या आणी के नाम से जोड़ा जाता है, जबकि केरल में यह समय मिथुनम ओन्थ के रूप में जाना जाता है।
सूर्य के इस राशि परिवर्तन को ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है, इसलिए अनेक श्रद्धालु इस दिन विशेष पूजा, व्रत और दान के माध्यम से शुभ फल की कामना करते हैं। ओडिशा में मिथुन संक्रांति को विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहां यह पर्व राजा पर्व के नाम से लोक जीवन में रचा बसा है।
मिथुन संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य वृषभ से हटकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है। सूर्य की यह चाल सौर गणना के अनुसार आषाढ़ के आरंभिक चरण को सूचित करती है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस संक्रांति का संबंध अलग अलग नामों और महीनों से जोड़ा जाता है।
| क्षेत्र | स्थानीय नाम और संदर्भ |
|---|---|
| दक्षिण भारत | आषाढ़, आणी से जुड़ा समय |
| केरल | मिथुनम ओन्थ |
| ओडिशा | मिथुन संक्रांति, राजा पर्व |
इस परिवर्तन के साथ वर्षा ऋतु की आहट मानी जाती है। वातावरण में नमी, बादलों का जमाव और खेती के नए वर्ष की शुरुआत का संकेत धीरे धीरे स्पष्ट होने लगता है, इसलिए ओडिशा जैसे कृषिप्रधान क्षेत्रों में इसे कृषि वर्ष के आधिकारिक आरंभ का शुभ समय माना जाता है।
मिथुन संक्रांति को हिंदू परंपरा में अत्यंत शुभ संक्रांतियों में से एक माना गया है। सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश को संस्कृत में मिथुन संक्रामण कहा जाता है और इसे नए विचार, संवाद, व्यापार और गति शुरू होने के संकेत के रूप में भी प्रतीकात्मक रूप से समझा जाता है।
ओडिशा में यह तिथि कृषि वर्ष की शुरुआत मानी जाती है, जहां धरती के पहली वर्षा के स्वागत के साथ किसान नई आशा और उत्साह के साथ खेतों की तैयारी करते हैं। लोग इस दिन ईश्वर से उत्तम वर्षा, भरपूर फसल और परिवार की समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
संक्रांति काल के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात यह है कि मिथुन संक्रांति पर संक्रांति के क्षण के बाद लगभग सोलह घटी तक का समय दान पुण्य के कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। संक्रांति से लेकर संक्रांति के बाद सोलह घटी तक किए गए दान, जप और पुण्य कर्म विशेष फलदायी माने जाते हैं।
मिथुन संक्रांति के दिन वस्त्र दान को अत्यंत शुभ बताया गया है। श्रद्धालु नए या उपयोग योग्य साफ वस्त्र जरूरतमंदों, ब्राह्मणों या कर्मयोगी साधुओं को अर्पित करते हैं।
इस दिन लोग ईश्वर से उत्तम वर्षा और अच्छी फसल की प्रार्थना करते हैं। कई परिवारों में भगवान सूर्य या भगवान विष्णु के समक्ष संकल्प लेकर व्रत रखा जाता है। इसे कहीं कहीं राजा पर्व के व्रत के रूप में भी जाना जाता है, जिसका उद्देश्य प्रकृति, वर्षा और पृथ्वी माता को सम्मान देना है।
मान्यता यह भी है कि मिथुन संक्रांति या राजा पर्व पर व्रत रखकर, संयमित आहार लेकर और दान पुण्य करके भगवान सूर्य को प्रसन्न किया जाए तो घर में समृद्धि, शांति और सुख की वृद्धि होती है।
ओडिशा में मिथुन संक्रांति केवल ज्योतिषीय संक्रांति नहीं बल्कि एक बड़ा लोक उत्सव भी है जिसे राजा पर्व कहा जाता है। यह उत्सव प्रायः चार दिनों तक चलता है और वर्षा ऋतु के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।
इस पर्व का भाव है कि धरती माता वर्षा से पहले विश्राम और श्रृंगार के एक विशेष चरण से गुजर रही है। लोग धरती को एक जीवंत देवी के रूप में महसूस करते हुए उसके विश्राम और नई सर्जना को सम्मान देते हैं। इस अवधि में खेतों की जुताई, खुदाई या धरती को कष्ट देने वाले कार्यों से यथासंभव बचने की परंपरा मानी जाती है, ताकि पृथ्वी शांतिपूर्वक वर्षा को ग्रहण कर सके।
कन्याएं इस समय सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनती हैं। विवाहित स्त्रियां भी घर के भारी कामों से कुछ समय के लिए विराम लेकर उत्सव की उमंग में शामिल होती हैं। लोक जीवन में यह पर्व आनंद, विश्राम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सुंदर संगम बन जाता है।
राजा पर्व के दौरान स्त्री और पुरुष दोनों ही धरती पर नंगे पांव चलकर वर्षा का स्वागत करते हैं। लोक गीतों, हंसी और उल्लास के बीच वर्षा के पहले बूंदों को ईश्वरीय आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया जाता है।
इस पर्व में राजा गीता नाम से प्रसिद्ध लोक गीत बड़े प्रेम से गाए जाते हैं। लड़कियां और महिलाएं झूले पर झूलती हैं, पारंपरिक वस्त्र और गहने पहनकर आपस में मंगल गीत गाती हैं।
पुरुष और महिलाएं दोनों ही नंगे पांव पृथ्वी पर चलने की परंपरा निभाते हैं, जो यह संकेत देती है कि मनुष्य अपने अहं को थोड़ा पीछे रखकर प्रकृति की गोद में सीधे संपर्क से जुड़ रहा है। नृत्य और गीतों के बीच वर्षा का स्वागत करना इस पर्व की आत्मा माना गया है।
मिथुन संक्रांति और राजा पर्व के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कथा भूमि देवी और भगवान विष्णु से जुड़ी है। परंपरा के अनुसार पृथ्वी को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में भूदेवी स्वरूप में पूजित माना गया है।
मिथुन संक्रांति के चार दिवसीय उत्सव में चौथा दिन विशेष रूप से वसुमति स्नान के रूप में जाना जाता है। इस दिन पृथ्वी को स्नान कराने का प्रतीकिक अनुष्ठान किया जाता है। ओडिशा में श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी में भूदेवी की रजत प्रतिमा को विशेष रूप से अलंकृत किया जाता है, जो पृथ्वी की समृद्धि और ऐश्वर्य का द्योतक मानी जाती है।
इस दिन भगवान विष्णु और भगवान की अर्धांगिनी भूदेवी की पूजा करके उनसे समृद्धि, संतुलित वर्षा और धरा के उर्वर बने रहने की कामना की जाती है।
राजा पर्व के अंतिम दिन वसुमति गधुआ या वसुमति स्नान नामक अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। वसुमति को पृथ्वी की समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इस अनुष्ठान में स्त्रियां घर में उपयोग होने वाले पीसने वाले पत्थर या सिल बट्टे को पृथ्वी माता का प्रतीक मानकर स्नान कराती हैं।
वे इन पत्थरों को हल्दी, सिंदूर और स्वच्छ जल से अभिषिक्त करती हैं। उसके बाद मौसमी फलों, विशेषकर स्थानीय फलों को भूदेवी के अर्पण के रूप में समर्पित किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया इस भाव के साथ होती है कि पृथ्वी माता को वर्षा से पहले स्नान और श्रृंगार कराने की प्रतीकात्मक सेवा की जा रही है।
पुरुष और महिलाएं नंगे पांव धरती पर चलकर, गीत गाते हुए और वर्षा के बाद उत्पन्न होने वाली हरियाली की कल्पना करते हुए प्रकृति के साथ एकात्मता महसूस करते हैं।
मिथुन संक्रांति के दिन भगवान विष्णु और पृथ्वी देवी की पूजा प्रमुख रूप से की जाती है। श्रद्धालु पारंपरिक वस्त्र पहनकर घर या मंदिर में पृथ्वी को प्रतीक रूप में मानकर पूजा की व्यवस्था करते हैं।
घर के किसी साफ स्थान पर पीसने वाले पत्थर, मूसल या घर की भूमि के किसी भाग को पृथ्वी माता का प्रतीक मानकर उस पर हल्दी, कुंकुम, पुष्प और दीप अर्पित किए जाते हैं। कई घरों में छोटे मिट्टी के ढेर या कलश को भी धरती का प्रतीक माना जाता है।
पूजा के समय यह भावना रखी जाती है कि भूमि ही संपूर्ण जीवन, अन्न, जल और वनस्पति का आधार है। वर्षा के आगमन से पहले उसे सम्मान, विश्राम और कृतज्ञता देना आवश्यक है। इस दिन पूर्वजों को भी श्रद्धा से स्मरण किया जाता है, क्योंकि खेत, पेड़ और घर पूर्वजों की तपस्या और श्रम की देन माने जाते हैं।
राजा पर्व की एक सुंदर परंपरा झूला बांधने की है। बरगद या अन्य मजबूत वृक्षों की डाल पर झूला बांधकर लड़कियां और महिलाएं झूलकर आनंद लेती हैं। यह झूला केवल खेल नहीं बल्कि धरती और आकाश के बीच झूलती जीवन लीला का प्रतीक भी माना जाता है।
कई परंपराओं में इस दिन चावल और सामान्य अनाज खाने से बचने की बात कही जाती है। यह संकेत है कि जिस भूमि से अनाज प्राप्त होता है उसे वर्षा से पहले विश्राम दिया जाए और उस दिन साधक सरल, हल्का, भूमि पर कम भार डालने वाला भोजन अपनाए।
मिथुन संक्रांति के दिन ओडिशा में विशेष रूप से पोड़ा पीठा नामक पारंपरिक व्यंजन तैयार किया जाता है। इसे गुड़, नारियल, कपूर, गुड़ की चास और घी या मक्खन से तैयार किया जाता है। यह व्यंजन पृथ्वी माता और देवी देवताओं को अर्पित कर परिवार और अतिथियों के साथ प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
श्रद्धा और शास्त्रीय विधि से मनाई गई मिथुन संक्रांति साधक के जीवन में कई स्तरों पर सकारात्मक ऊर्जा लाने वाली मानी जाती है।
इस प्रकार मिथुन संक्रांति केवल ज्योतिषीय घटना न रहकर, जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन को सम्मान देने वाला पर्व बन जाती है।
मिथुन संक्रांति क्या है और यह किस राशि परिवर्तन से जुड़ी है
मिथुन संक्रांति वह समय है जब सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है। इसी राशि परिवर्तन को मिथुन संक्रामण कहा जाता है और ओडिशा सहित अनेक प्रदेशों में इसे वर्षा और कृषि वर्ष के आरंभ का संकेत माना जाता है।
मिथुन संक्रांति पर दान के लिए कौन सी वस्तुएं सबसे शुभ मानी जाती हैं
इस संक्रांति पर विशेष रूप से वस्त्र दान को शुभ माना गया है। इसके साथ अन्न, फल और आवश्यकता अनुसार दक्षिणा देना भी पुण्यकारी है। लोग इस दिन वर्षा, अच्छी खेती और परिवार की समृद्धि की कामना के साथ दान करते हैं।
राजा पर्व और मिथुन संक्रांति का संबंध क्या है
ओडिशा में मिथुन संक्रांति को ही राजा पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह चार दिन तक चलने वाला उत्सव है जिसमें धरती माता को विश्राम और श्रृंगार की अवधि मानकर वर्षा और कृषि वर्ष का स्वागत किया जाता है। नंगे पांव चलना, झूला झूलना और लोक गीत गाना इसी पर्व की मुख्य पहचान है।
वसुमति स्नान का क्या महत्व है
राजा पर्व के चौथे दिन वसुमति स्नान के रूप में पृथ्वी माता को प्रतीक रूप में स्नान कराया जाता है। महिलाएं पीसने वाले पत्थरों को भूदेवी मानकर हल्दी, सिंदूर और जल से स्नान कराती हैं और फल अर्पित करती हैं। यह अनुष्ठान पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता और वर्षा से पहले उसकी शुद्धि और श्रृंगार का प्रतीक है।
मिथुन संक्रांति पर भोजन से जुड़े कौन से नियम अपनाए जाते हैं
कई परंपराओं में इस दिन चावल और सामान्य अनाज के सेवन से बचने की सलाह दी जाती है। साधक हल्का और सात्त्विक भोजन लेते हैं और कुछ लोग व्रत रखकर केवल प्रसाद या फलाहार ग्रहण करते हैं। ओडिशा में पोड़ा पीठा तैयार कर देवी और पृथ्वी को अर्पित करने के बाद प्रसाद रूप में लिया जाता है।
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