By पं. नीलेश शर्मा
नाग देव की पूजा और परिवार की रक्षा का आध्यात्मिक महत्व

सावन के पावन माह में आने वाली नागपंचमी केवल सर्प पूजा का त्योहार नहीं मानी जाती। यह भाई बहन के पवित्र स्नेह, वचन की पवित्रता और नागदेव की कृपा से जुड़े भावनात्मक संबंध का उत्सव भी है। इस दिन स्त्रियां नागदेव को भाई रूप में मानकर उनकी पूजा करती हैं और अपने परिवार की रक्षा, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं।
पुरानी मान्यताओं के अनुसार नागपंचमी के पीछे एक अत्यंत प्राचीन कथा जुड़ी है, जिसमें एक सर्प एक स्त्री का धर्मभाई बनकर उसके जीवन की रक्षा करता है और उसे मान सम्मान तथा संपत्ति दिलाता है। यही कथा आज भी नागपंचमी के व्रत और पूजा के मूल में छिपे भाव को समझने में मदद करती है।
नागपंचमी के दिन घरों की दीवारों, दरवाजों या आंगन में सर्प के चित्र बनाकर या नागदेव की प्रतिमा के समक्ष दूध, हल्दी, कुंकुम और फूल अर्पित किए जाते हैं। परंपरा है कि इस दिन सर्प को भाई मानकर उसकी आराधना करने से जीवन में सर्प भय, अकाल मृत्यु और अनपेक्षित संकटों से रक्षा होती है।
नागदेव पृथ्वी की गहराइयों, जल स्रोतों और अदृश्य लोक से जुड़े माने जाते हैं। इसीलिए नागपंचमी की कथा केवल सर्प और धन की नहीं बल्कि वचन, विश्वास और धार्मिक आचरण के महत्व की भी शिक्षा देती है।
| नागपंचमी का पक्ष | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| नागदेव की पूजा | अदृश्य शक्तियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता |
| सर्प को भाई मानना | रक्षक के रूप में नागदेव पर विश्वास |
| व्रत और कथा श्रवण | परिवार की सुरक्षा और सुख समृद्धि की कामना |
प्राचीन समय की बात है। एक सेठ के सात पुत्र थे और सभी के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी अत्यंत सुशील, विदुषी और उत्तम चरित्र वाली थी, पर उसका एक अभाव था कि उसे जन्म से कोई भाई प्राप्त नहीं हुआ था।
एक दिन घर की बड़ी बहू ने कहा कि आज घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लानी होगी। उसने सभी बहुओं को साथ चलने के लिए कहा। सभी धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगीं। मिट्टी खोदते समय अचानक वहां से एक सर्प निकला। बड़ी बहू घबराई और खुरपी से उसे मारने लगी।
यह देखकर छोटी बहू के हृदय में दया जागी। उसने बड़ी बहू से कहा कि इसे मत मारो, यह निरपराध है, हम केवल इसका स्थान छीन रहे हैं, इसका कोई दोष नहीं। छोटी बहू की बात सुनकर बड़ी बहू ने सर्प को मारना रोक दिया। सर्प एक ओर जाकर शांत होकर बैठ गया।
तब छोटी बहू ने सर्प से कहा कि हम अभी मिट्टी लेकर घर लौटते हैं, तुम यहां से जाना मत। इतना कहकर सब बहुएं घर लौट आईं। घर के कामकाज में उलझकर छोटी बहू सर्प से किया हुआ अपना वादा भूल गई।
अगले दिन जब छोटी बहू को यह बात याद आई तो वह तुरंत बाकी सबको साथ लेकर उसी स्थान पर पहुंची। उसने देखा कि सर्प वहीं बैठा हुआ है। उसे देखकर छोटी बहू के मुंह से सहज ही निकला, सर्प भैया नमस्कार।
सर्प बोला कि तूने मुझे भैया कह दिया है, इसीलिए तुझे छोड़ रहा हूं। नहीं तो जो व्यक्ति वादा करके भूल जाए उसे तो झूठ बोलने के पाप के कारण तुरंत दंश मिलना चाहिए। छोटी बहू ने लज्जित होकर कहा कि भैया, मुझसे भूल हो गई, क्षमा चाहती हूं।
सर्प का हृदय पिघल गया। उसने कहा कि अच्छा आज से तू मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई। तुझे जो भी मांगना हो, निसंकोच मांग ले। छोटी बहू भावुक हो गई और बोली कि भैया, मेरा अपना कहने को कोई नहीं था। अच्छा हुआ कि तू मेरा भाई बन गया, यही मेरे लिए बड़ा वरदान है।
कुछ समय बीत गया। एक दिन वही सर्प मनुष्य रूप धारण करके सेठ के घर आया और बोला कि मेरी बहन को मेरे साथ विदा कर दीजिए। घरवालों ने आश्चर्य से कहा कि इसे तो कोई भाई नहीं था। वह व्यक्ति बोला कि मैं दूर के रिश्ते से इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था, अब लौटा हूं। विश्वास कराने पर घरवालों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया।
रास्ते में उसने सच्चाई बताई कि वही वही सर्प है जिसे उसने बचाया था। उसने कहा कि जहां चलने में कठिनाई हो, वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना, डरना नहीं। छोटी बहू ने वैसा ही किया और इस प्रकार वह उसके नाग लोक जैसे घर पहुंच गई।
जब छोटी बहू ने अपने सर्प भाई के घर का वैभव देखा तो वह चकित रह गई। वहां सोना, चांदी, रत्न और अपार धन संपत्ति थी। सर्प की माता भी अत्यंत स्नेह से मिलीं। कुछ समय बाद एक दिन सर्प की माता ने कहा कि उन्हें एक काम से बाहर जाना है, जब तक वे लौटें तब तक छोटी बहू अपने भाई को ठंडा दूध पिला दे।
छोटी बहू को यह बात ध्यान न रही और उसने भूल से गरम दूध ही दे दिया। गरम दूध पीकर सर्प के मुख में तेज जलन होने लगी। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुईं। उन्हें लगा कि बहन ने जानबूझकर हानि पहुंचाई है।
तभी सर्प ने माता को समझाया कि यह सब भूल से हुआ है। उसने अपनी बहन की सच्ची नीयत की रक्षा की और माता का क्रोध शांत कराया। इसके बाद सर्प ने कहा कि अब बहन को उसके घर वापस भेज देना चाहिए।
जब वह विदा होने लगी तो सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, रत्न और वस्त्र आभूषण देकर विदा किया। छोटी बहू इतने धन के साथ जब ससुराल लौटी तो सब हैरान रह गए।
छोटी बहू के पास इतना धन देखकर बड़ी बहू के मन में ईर्ष्या जाग उठी। वह सोचने लगी कि भाई तो बहुत धनवान है, इसलिए छोटी बहू को उससे और भी धन मंगाना चाहिए। सर्प भाई ने जब यह बात सुनी तो उसने और भी सोने चांदी की वस्तुएं भिजवा दीं।
बड़ी बहू फिर बोली कि इतने सोने की वस्तुओं के लिए झाड़ू भी तो सोने की होनी चाहिए। यह सुनकर सर्प ने सोने की झाड़ू भी भेज दी।
इसी समय छोटी बहू को सर्प भाई ने हीरा मणि का एक अद्भुत हार दिया था। उस हार की चर्चा पूरे नगर में, यहां तक कि उस देश की रानी के कानों तक भी पहुंच गई। रानी ने राजा से कहा कि सेठ की छोटी बहू का वह हार महल में आना चाहिए।
राजा ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि वह हार तुरंत मंगवाया जाए। मंत्री सेठ के घर पहुंचे और कहा कि महारानी को छोटी बहू का हार चाहिए, इसे तुरंत दे दीजिए। सेठ भय के कारण मजबूर हो गए और छोटी बहू से हार मंगवाकर राजा के पास भेज दिया।
छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपने सर्प भाई को स्मरण किया और उससे प्रार्थना की कि कुछ ऐसा हो कि जब तक हार रानी के गले में रहे तब तक वह सर्प बना रहे और जब वह हार वापस कर दे तब वह फिर से रत्न जड़ित हो जाए। सर्प भाई ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की।
जैसे ही रानी ने वह हार अपने गले में पहन लिया, हार सर्प का रूप लेकर लिपट गया। यह देखकर रानी भय से चिल्ला उठी और रोने लगी। दरबार में हाहाकार मच गया।
राजा ने तुरंत सेठ को बुलवाया और कहा कि छोटी बहू को तुरंत दरबार में प्रस्तुत करो। सेठ घबराए कि कहीं राजा दंड न दे दे। वे स्वयं छोटी बहू को लेकर दरबार में पहुंचे।
राजा ने छोटी बहू से पूछा कि यह कैसी जादुई बात है, सच्चाई न बताने पर दंड मिलेगा। छोटी बहू ने विनम्रता से कहा कि यह हार साधारण नहीं है। मेरे गले में यह हीरा मणि से जड़ा रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है।
राजा को विश्वास न हुआ। उन्होंने हार को छोटी बहू को वापस देकर कहा कि इसे पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही हार पहना, वह तुरंत पूर्ववत रत्नों से चमकने लगा। यह देखकर राजा को उसकी बात पर पूर्ण विश्वास हो गया।
राजा ने प्रसन्न होकर छोटी बहू को बहुत सी मुद्राएं और उपहार दिए और हार भी उसी को लौटा दिया। छोटी बहू अपने हार और धन के साथ घर लौट आई।
जब छोटी बहू घर लौटी और उसके पास इतना धन देख बड़ी बहू के मन में फिर ईर्ष्या बढ़ी। उसने छोटी बहू के पति के कान भर दिए कि उसके पास जो धन आया है, वह अवश्य किसी संदिग्ध स्रोत से आया होगा।
यह सुनकर छोटी बहू के पति ने भी संदेह से पत्नी से पूछा कि सच सच बता कि इतना धन तुझे कौन देता है। उस समय छोटी बहू के मन में पीड़ा भी हुई और विश्वास भी। उसने अपने सर्प भाई को याद किया।
तुरंत ही सर्प वहां प्रकट हो गया। उसने छोटी बहू के पति से कहा कि यदि तू मेरी धर्मबहन के चरित्र पर संदेह करेगा तो मैं तुझे दंश दे दूंगा। यह सुनकर उसका पति भयभीत भी हुआ और प्रसन्न भी, क्योंकि अब उसे सच्चाई मालूम हो चुकी थी।
उसने सर्प देवता का आदर सत्कार किया और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। तब से घर में प्रेम और विश्वास का वातावरण बन गया।
इसी प्रसंग के आधार पर माना जाता है कि उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाने लगा। स्त्रियां सर्प देव को अपना भाई मानकर व्रत रखती हैं, दूध और पूजा अर्पित करती हैं और उनसे परिवार, संतान और सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं।
यह प्राचीन कथा केवल चमत्कार या धन की नहीं बल्कि वचन, दया और विश्वास की शक्ति का प्रतीक है। छोटी बहू ने सर्प को केवल दया से बचाया, पर सर्प ने इसे धर्म संबंध मानकर उसे बहन का दर्जा दिया और हर संकट में उसका रक्षक बना।
कथा यह भी समझाती है कि ईर्ष्या और लोभ मनुष्य को अपमान और भय की ओर ले जाते हैं, जबकि सच्चाई, सरलता और भक्ति सम्मान और सुरक्षा का मार्ग बनाते हैं। नागपंचमी पर नागदेव की पूजा करते हुए यदि मनुष्य इन भावों को समझ ले तो जीवन में सच्चे संरक्षण की अनुभूति बढ़ती है।
नागपंचमी पर सर्प को भाई क्यों माना जाता है?
इस प्राचीन कथा में सर्प एक धर्मभाई के रूप में छोटी बहू की रक्षा करता है। इसी भाव से नागपंचमी के दिन स्त्रियां नागदेव को भाई मानकर उनकी पूजा करती हैं ताकि जीवन में रक्षक स्वरूप कृपा बनी रहे।
क्या नागपंचमी पर वास्तविक सर्प को दूध पिलाना आवश्यक है?
कथा का भाव प्रतीकात्मक है। घर में या मंदिर में नागदेव के चित्र या प्रतिमा के समक्ष श्रद्धा से पूजा करना, मन्त्र स्मरण करना और प्रार्थना करना ही मुख्य माना जाता है।
छोटी बहू को सर्प से इतना धन क्यों मिला?
छोटी बहू ने बिना स्वार्थ के दया दिखाई, अपना वचन निभाने का प्रयास किया और सच्चे हृदय से सर्प को भाई माना। इसी निस्वार्थ भाव के बदले में सर्प ने उसे धन, मान और सुरक्षा दी।
राजदरबार में हार के सर्प बनने की बात क्या संकेत देती है?
यह संकेत है कि जो वस्तु या संबंध केवल धर्म और विश्वास के आधार पर स्थिर रहता है, वह गलत हाथों में जाने पर डर और संकट का कारण बन सकता है। सही स्थान पर वही वस्तु सुख और वैभव बन जाती है।
कथा के अनुसार नागपंचमी का मुख्य संदेश क्या है?
इस कथा में वचन की पवित्रता, भाई बहन के स्नेह, ईर्ष्या के त्याग और अदृश्य देव शक्तियों के प्रति सम्मान का संदेश है। नागपंचमी पर इन भावों के साथ नागदेव की पूजा करने से परिवार में सुरक्षा, प्रेम और समृद्धि का विश्वास मजबूत होता है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 25
इनसे पूछें: करियर, पारिवारिक मामले, विवाह
इनके क्लाइंट: छ.ग., म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें