By पं. सुव्रत शर्मा
निर्जला एकादशी का महत्व, नियम और कथा

सनातन परंपरा में निर्जला एकादशी को वर्ष की सबसे कठिन और सबसे अधिक फलदायी एकादशी माना जाता है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आने वाली यह पावन निर्जला एकादशी केवल जल तक का त्याग करके रखी जाती है। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन नियमपूर्वक निर्जल व्रत करता है, उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के संयुक्त व्रत के समान फल की प्राप्ति होती है और वह वैकुण्ठ लोक तक का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस दिन व्रती को प्रातः स्नान, संकल्प, पूजा, जप, दान और कथा श्रवण के साथ निर्जल उपवास करना चाहिए। द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन और दान देकर ही व्रत का पारण करना शुभ माना जाता है। पूजा के समय निर्जला एकादशी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्रत की पूर्णता मानी जाती है।
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। यह समय सूर्य के वृषभ या मिथुन राशि में स्थित रहने के दौर में आता है, इसलिए इस एकादशी पर तेज गर्मी में जल का त्याग करना विशेष तप माना गया है।
इस दिन सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न के साथ साथ जल का भी पूर्ण त्याग करने का विधान है। केवल आचमन या कुल्ला के लिए अल्प जल ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है। जो व्रती इस प्रकार निर्जल रहकर एकादशी का पालन करता है, उसके लिए शास्त्रों में कहा गया है कि वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य उसे इसी एक निर्जला एकादशी से प्राप्त हो जाता है।
द्वादशी को प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की विधिवत पूजा, जल और सुवर्ण दान तथा ब्राह्मण भोजन के बाद स्वयं पारण करने से यह व्रत पूर्ण माना जाता है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| मास | ज्येष्ठ मास |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| व्रत की प्रकृति | निर्जल व्रत केवल आचमन के लिए जल मान्य |
| विशेष नाम | निर्जला एकादशी, भीमसेनी, पाण्डव द्वादशी |
| मुख्य देवता | भगवान केशव भगवान विष्णु |
| मुख्य फल | सभी एकादशियों के बराबर पुण्य, पाप क्षय |
कथाओं में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों की साररूप तिथि कहा गया है। जो भक्त अन्य एकादशियों का पालन नियमित रूप से न कर सके, वह यदि केवल इस एक निर्जला एकादशी को भी पूरे नियम से कर ले, तो भी उसे सभी एकादशियों के संयुक्त पुण्य का अधिकारी माना जाता है।
इस व्रत की विशेषता यह भी है कि इसमें केवल अन्न ही नहीं बल्कि जल का भी त्याग किया जाता है। शरीर की प्राकृतिक आवश्यकता से ऊपर उठकर ईश्वर स्मरण और आत्मसंयम को चुनना, इस व्रत को साधारण उपवास से कहीं अधिक ऊंचा स्थान देता है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि निर्जला एकादशी के पुण्य से पापों का क्षय होता है और वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति का मार्ग सहज हो जाता है।
कथा के आरंभ में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करते हैं। वे कहते हैं कि आपने अपरा एकादशी का महात्म्य सुनाया, अब कृपया ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी बताएं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस विशेष एकादशी का वर्णन स्वयं सत्यवती पुत्र वेदव्यास जी करेंगे, क्योंकि वे सभी शास्त्रों और वेदों के गहन ज्ञाता हैं।
तब वेदव्यास जी युधिष्ठिर से कहते हैं कि दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। द्वादशी के दिन स्नान करके, भगवान केशव की पूजा कर, नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पहले ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, फिर स्वयं अन्न ग्रहण करना चाहिए। वे यह भी बताते हैं कि जन्म या मृत्यु से जुड़े अशौच काल में भी एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह तिथि स्वयं ही पापों को हरने वाली मानी गई है।
वेदव्यास जी आगे युधिष्ठिर से कहते हैं कि पितामह, आप मेरी बात ध्यान से सुनें। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव सभी एकादशी को उपवास करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि भीमसेन भी एकादशी का व्रत करे।
भीमसेन अपने स्वभाव के अनुसार उत्तर देते हैं कि उनसे भूख सहन नहीं होती। वे कहते हैं कि एक बार भोजन करके भी उपवास करना उनके लिए अत्यंत कठिन है, फिर पूरे दिन निराहार कैसे रह सकते हैं। भीम बताते हैं कि उनके पेट में वृक नाम की अग्नि सदैव प्रज्वलित रहती है जो बहुत अधिक भोजन करने पर ही शांत होती है। इसी कारण वे वर्ष भर में दोनों पक्षों की एकादशी पर निराहार रहना अपने लिए असंभव मानते हैं।
भीमसेन विनीत भाव से निवेदन करते हैं कि वे वर्ष में केवल एक ही बार उपवास कर सकते हैं। वेदव्यास जी से वे प्रार्थना करते हैं कि ऐसा कोई एक व्रत बताएं जिससे उन्हें स्वर्ग प्राप्त हो और कल्याण भी हो सके और जिसका वे पूरे नियम से पालन कर सकें।
वेदव्यास जी भीमसेन से कहते हैं कि यदि तुम स्वर्ग प्राप्त करना चाहते हो और नरक से बचना चाहते हो, तो दोनों पक्षों की एकादशी को व्रत रखना सर्वोत्तम है, पर यदि यह संभव न हो तो एक विशेष उपाय है। वे बताते हैं कि ज्येष्ठ मास में जब सूर्य वृषभ या मिथुन राशि में रहता है, उस समय जो शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है, उस पर पूर्ण यम नियम के साथ निर्जल उपवास करना चाहिए।
वे स्पष्ट कहते हैं कि इस व्रत के दौरान केवल कुल्ला या आचमन के लिए ही जल ग्रहण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी रूप में जल को मुख में नहीं लेना चाहिए, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक यदि मनुष्य जल तक का त्याग कर सके, तभी यह व्रत पूर्ण माना जाता है।
द्वादशी की सुबह स्नान करके, ब्राह्मणों को जल और सुवर्ण दान देना चाहिए। इसके बाद जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ स्वयं भी भोजन करे। वेदव्यास जी कहते हैं कि वर्ष भर में जितनी भी एकादशियां आती हैं, उन सबका जो पुण्य फल होता है, वह केवल इस एक निर्जला एकादशी के विधि पूर्वक व्रत से प्राप्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
वेदव्यास जी बताते हैं कि स्वयं शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान केशव ने उनसे कहा है कि यदि कोई मनुष्य सब बातों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आ जाए और एकादशी तिथि को निराहार रहे, तो वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति के पास मृत्यु के समय कभी भी विकराल रूप वाले, काले वर्ण, दंड और पाश धारण करने वाले यमदूत नहीं आते। उस समय पीताम्बर धारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन चक्र धारण किए हुए वेगवान विष्णुदूत आते हैं और उस साधक को भगवान विष्णु के परम धाम तक पहुंचा देते हैं।
इसी कारण कहा गया है कि मनुष्य को निर्जला एकादशी को पूरी श्रद्धा और विधि से उपवास अवश्य करना चाहिए। श्रीकृष्ण का स्पष्ट वचन है कि यदि स्त्री या पुरुष ने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तब भी निर्जला एकादशी के प्रभाव से वे पाप भस्म हो सकते हैं, यदि व्रत नियमपूर्वक किया जाए।
कथा में कहा गया है कि जो व्यक्ति निर्जला एकादशी के दिन जल के नियम का पालन करता है, वह अत्यंत बड़ा पुण्य अर्जित करता है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन एक एक पहर में करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं के दान के समान फल प्राप्त होता है।
इस एकादशी के दिन जो स्नान, दान, जप, होम और अन्य शुभ कर्म किए जाते हैं, वे सब अक्षय फल देने वाले माने जाते हैं। यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का वचन कहा गया है। निर्जला एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने से मनुष्य वैष्णव पद को प्राप्त करता है, अर्थात उसे भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति की योग्यता मिलती है।
कहा गया है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन अन्न खाकर व्रत की अवहेलना करता है, वह वस्तुतः पाप का ही सेवन करता है। ऐसे व्यक्ति को इस लोक में चाण्डाल के समान माना गया है और मृत्यु के पश्चात उसे दुर्गति का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत जो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को उपवास रखते हैं और दान करते हैं, वे परम पद के अधिकारी बनते हैं और ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी तथा गुरु अपमान जैसे महापापों से भी मुक्त हो सकते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि हे कुन्तीपुत्र, निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्तव्य बताए गए हैं, उन्हें ध्यान से सुनना चाहिए। उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और जलमयी धेनुका का दान करना शुभ माना गया है।
यदि संभव हो तो वास्तविक गाय का दान सर्वोत्तम होता है, अन्यथा घृत से बनी धेनु का प्रतीक स्वरूप दान भी किया जा सकता है। इसके साथ पर्याप्त दक्षिणा और विभिन्न प्रकार के मिष्ठानों से ब्राह्मणों को तृप्त करना चाहिए। ब्राह्मण प्रसन्न होने पर भगवान श्रीहरि भी प्रसन्न होते हैं और मोक्ष प्रदान करते हैं।
इस दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शय्या, सुंदर आसन, कमण्डलु और छाता आदि का दान शुभ माना गया है। जो व्यक्ति किसी उत्तम और सुपात्र ब्राह्मण को जूते का दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है, ऐसा वर्णन मिलता है।
कथा में यह भी कहा गया है कि जो लोग शम, दम और दान में प्रवृत्त होकर श्रीहरि की पूजा करते हैं और रात्रि में जागरण के साथ यह व्रत करते हैं, वे अपनी सौ पूर्व पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के धाम तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।
जो व्यक्ति श्रद्धा से इस एकादशी की महिमा सुनता है और जो श्रद्धा से इसका वर्णन करता है, दोनों ही स्वर्ग लोक के अधिकारी हो जाते हैं। चतुर्दशी युक्त अमावस्या के सूर्यग्रहण में जो फल श्राद्ध से प्राप्त होता है, वही फल इस एकादशी की कथा के श्रवण और कीर्तन से प्राप्त हो सकता है।
सुबह दंतधावन करके यह संकल्प लेना बताया गया है कि भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहेंगे और आचमन के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में जल ग्रहण नहीं करेंगे। द्वादशी के दिन भगवान विष्णु की गंध, धूप, पुष्प और वस्त्रों से पूजन करके जल के कलश का दान करते हुए निम्न मंत्र के साथ संकल्प करना चाहिए।
कथा में दिया गया मंत्र है
देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्।।
इसका अर्थ है कि हे देवों के देव, हे हृषीकेश, हे संसार सागर से तारने वाले प्रभु, इस जल के घड़े का दान करने से कृपा करके मुझे परम गति प्रदान कीजिए। यह मंत्र निर्जला एकादशी व्रत के ऊंचे आध्यात्मिक लक्ष्य को स्पष्ट करता है कि उद्देश्य केवल सांसारिक सुख नहीं बल्कि परम गति और मोक्ष की प्राप्ति है।
वेदव्यास जी अंत में भीमसेन से कहते हैं कि ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए और उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल से भरे घड़े दान करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के निकट पहुंचकर सुख और आनंद का अनुभव करता है।
इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए। जो व्यक्ति इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी निर्जला एकादशी का व्रत करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर अनामय पद को प्राप्त करता है, अर्थात रोग रहित और दुख रहित अवस्था को प्राप्त करता है।
यह सब सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ निर्जला एकादशी का व्रत ग्रहण कर लिया। तब से ही लोक में यह तिथि पाण्डव द्वादशी और भीमसेनी एकादशी के नाम से विख्यात हो गई, क्योंकि एक मात्र इस व्रत के द्वारा भीमसेन ने सभी एकादशियों के पुण्य का मार्ग प्राप्त कर लिया।
निर्जला एकादशी का व्रत किस तिथि को रखा जाता है
निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक अन्न और जल का त्याग कर, केवल आचमन मात्र की अनुमति के साथ व्रत करने का विधान है।
निर्जला एकादशी को भीमसेनी या पाण्डव द्वादशी क्यों कहा जाता है
कथा के अनुसार भीमसेन के लिए हर एकादशी का उपवास करना कठिन था। वेदव्यास जी ने उन्हें सलाह दी कि वर्ष भर में एक ही निर्जला एकादशी का कठोर व्रत रखें। भीमसेन ने इस व्रत को स्वीकार किया, इसलिए यह एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव द्वादशी के नाम से जानी जाने लगी।
निर्जला एकादशी का व्रत कैसे करने पर सभी एकादशियों के बराबर फल मिलता है
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन निर्जल रहकर, भगवान विष्णु की पूजा, जप, दान और कथा श्रवण के साथ पूरे दिन और रात्रि व्रत रखा जाता है। द्वादशी पर स्नान, जल और सुवर्ण दान तथा ब्राह्मण भोजन कराकर पारण किया जाता है। इस कठिन तप और पूर्ण निष्ठा के कारण शास्त्र कहते हैं कि वर्ष भर की सभी एकादशियों का संयुक्त पुण्य इस एक व्रत से प्राप्त हो जाता है।
निर्जला एकादशी पर कौन से दान विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं
इस दिन जलमयी धेनुका, गाय, शक्कर के साथ जल भरे घड़े, अन्न, वस्त्र, गौ, कमण्डलु, छाता, शय्या और उत्तम जूते का दान विशेष रूप से शुभ माना गया है। इन दानों से ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं और उनके प्रसन्न होने से भगवान श्रीहरि भी प्रसन्न होकर मोक्ष और वैकुण्ठ की प्राप्ति का मार्ग खोलते हैं।
यदि कोई निर्जला एकादशी की कथा सुनता या सुनाता है तो उसे क्या फल मिलता है
कथा में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से निर्जला एकादशी की महिमा सुनता है और जो भक्त श्रद्धा से इसका वर्णन करता है, दोनों ही स्वर्ग लोक के अधिकारी बनते हैं। चतुर्दशी युक्त अमावस्या के सूर्यग्रहण में जो फल श्राद्ध से मिलता है, वही पुण्य इस एकादशी की कथा के श्रवण से प्राप्त हो सकता है।
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