By पं. संजीव शर्मा
ओणम की कथा और राजा महाबली का दिव्य व्रत

ओणम का उत्सव केवल फसल कटाई या आनन्दोत्सव नहीं है। यह दिन असुरराज महाबली के अपनी प्रजा के बीच लौटकर आने की स्मृति से जुड़ा हुआ पावन पर्व माना जाता है। मलयाली समाज में यह विश्वास गहराई से स्थापित है कि ओणम के समय राजा महाबली पाताल से अपने प्रिय लोगों का हाल जानने और उनका सुख देखने के लिए धरती पर आते हैं।
इस दस दिवसीय उत्सव में घर आँगन में पुष्प सज्जा, पारंपरिक व्यंजन, नृत्य और वस्त्राभूषण के माध्यम से उस समृद्धि और सौभाग्य को महसूस किया जाता है जिसका प्रतीक ओणम है। फसल की नई उपज, नए वस्त्र और पारिवारिक मिलन मिलकर इस पर्व को आनंद और कृतज्ञता की सुंदर अनुभूति में बदल देते हैं।
ओणम को नवधान्य पर्व अर्थात फसल के नए अन्न का त्योहार भी कहा जाता है। खेतों की लहलहाती फसल और भरे भंडार इस बात के प्रतीक हैं कि मेहनत और ईश्वर की कृपा से जीवन में आवश्यक संसाधन प्राप्त होते हैं।
केरल की परंपरा में ओणम के दिनों में घर के बाहर आँगन में रंग बिरंगे फूलों से सुंदर पुक्कलं या पुष्परंगोली बनाई जाती है। यह पुष्प सज्जा घर और हृदय दोनों में प्रचुरता, सौभाग्य और मंगल की भावना जगाती है।
त्योहार के समय स्त्रियां पारंपरिक परिधानों और स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित होकर उत्सव में भाग लेती हैं। घर में सुस्वादु पकवानों से सजी विविध व्यंजनों वाली पत्ती परोसकर सामूहिक भोज किया जाता है, जिसे ओणम साद्या कहा जाता है।
ओणम के अवसर पर केरल की लोक संस्कृति के अनेक नृत्य रूप भी प्रस्तुत किए जाते हैं। इनमें कैकोट्टिकलि, तुम्बी तुल्लल, कुम्माट्टिकलि और पुलिकली विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन नृत्यों के माध्यम से प्राचीन परंपरा, लोककला और समुदाय की एकजुटता जीवंत हो उठती है।
ओणम की सबसे मुख्य कथा असुरराज महाबली से जुड़ी है। महाबली, भगवान विष्णु के परम भक्त और हिरण्यकशिपु के पौत्र प्रह्लाद के पुत्र माने गए हैं। वंश से असुर होते हुए भी महाबली के बारे में मान्यता है कि वे न्यायप्रिय, दानी और ज्ञान का सम्मान करने वाले महान राजा थे।
उनके राज्य में प्रजा सुखी और निडर रहती थी। धर्म, दान और समृद्धि से भरा हुआ यह शासन काल एक आदर्श समय की तरह स्मरण किया जाता है। इसी कारण उनकी प्रजा आज भी महाबली को प्रेम से याद करती है और उनके आगमन का स्वागत ओणम के रूप में करती है।
कथा के अनुसार एक समय महाबली ने एक महायज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में वे संकल्प लेकर बैठे थे कि जो भी याचक उनकी सभा में आएगा, उसे मनोकामना अनुसार दान दिया जाएगा। उसी समय एक नाटा किंतु तेजस्वी ब्राह्मण बालक यज्ञशाला में प्रवेश करता है।
यज्ञ की परंपरा के अनुसार महाबली ने उस विभा से भरे बालक का सम्मानपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने उससे आने का उद्देश्य पूछा और कहा कि वह जो चाहे, धन, भूमि या अन्य कोई भी वस्तु मांग सकता है।
उस बालक ने शांत स्वर में कहा कि मनुष्य को जितनी आवश्यकता हो, उतना ही माँगना चाहिए। उसने निवेदन किया कि उसे केवल उतनी भूमि चाहिए जो उसके तीन पग में समा सके। सुनने में यह छोटा सा वरदान प्रतीत होता था, इसलिए महाबली तुरंत प्रसन्न हो उठे।
उसी समय उनके गुरु शुक्राचार्य ने इशारे से उन्हें सावधान किया। उन्होंने बताया कि यह साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु वामन रूप में पधारे हैं और कोई रहस्यपूर्ण लीला चल रही है। फिर भी राजधर्म और अतिथि सत्कार के विचार से महाबली ने तीन पग भूमि का वरदान देने का अपना वचन वापस नहीं लिया।
जैसे ही महाबली ने तीन पग भूमि दान करने की स्वीकृति दी, वह छोटा सा वामन बालक त्रिविक्रम के विराट रूप में प्रकट हो गया। उसका शरीर आकाश को छूने लगा।
अपने पहले पग से उसने समस्त पृथ्वी को नाप लिया। दूसरे पग से पूरा आकाश भर गया। दो ही कदमों में महाबली का सम्पूर्ण राज्य, भूमि और दिक्पालों का क्षेत्र त्रिविक्रम के चरणों में आ चुका था।
तब भगवान ने महाबली से प्रश्न किया कि अब तीसरा पग कहाँ रखा जाए, क्योंकि दान तो तीन पग भूमि का था। अपना वचन निभाने के लिए महाबली को तीसरे पग के लिए स्थान देना आवश्यक था।
भगवान के इस प्रश्न पर महाबली ने थोड़ी भी झिझक नहीं दिखाई। उन्होंने अगाध श्रद्धा और पूर्ण समर्पण के साथ अपना शीश आगे बढ़ा दिया और कहा कि तीसरा पग इसी सिर पर रखा जाए। यह क्षण महाबली के अहंकार के पूर्ण निवर्तन और भक्ति की चरम अवस्था का प्रतीक माना जाता है।
महाबली की इस निष्ठा और समर्पण को देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें पाताल लोक में स्थान देकर यह आशीर्वाद दिया कि अगले मन्वंतर में उन्हें इंद्र पद की प्राप्ति होगी।
साथ ही उन्होंने यह वर भी दिया कि वे स्वयं पाताल के द्वार पर विराजमान रहेंगे और महाबली की रक्षा करेंगे। महाबली की प्रजा जब अपने प्रिय राजा से बिछड़ने लगी तो उसने भगवान से प्रार्थना की कि उन्हें अपने राजा के दर्शन का अवसर मिलता रहे।
भगवान विष्णु ने उनकी भावनाओं का आदर करते हुए महाबली को वर्ष में एक बार पाताल से पृथ्वी पर जाकर अपनी प्रजा से मिलने की अनुमति दे दी। यही दिन आगे चलकर ओणम के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन लोग अपने घरों को सुसज्जित कर, पुष्परंगोली और दीप सजाकर राजा महाबली का प्रतीक रूप से स्वागत करते हैं।
वामन अवतार की कथा केवल पौराणिक प्रसंग नहीं बल्कि अहंकार, ज्ञान और विनम्रता से जुड़ा गहन संदेश भी देती है। महाबली अपने यश, वैभव और अपराजेय शक्ति के कारण यह भाव रखने लगे थे कि जितनी भूमि उनकी दृष्टि में है, वह सब उनकी है।
असली परीक्षा तब आती है जब व्यक्ति को अपना सब कुछ ईश्वर या सत्य के सामने समर्पित करना पड़ता है। वामन अवतार दिखाता है कि अहंकार कितना भी विशाल हो, उसे तीन छोटे से प्रतीकात्मक कदमों से जीता जा सकता है।
वामन का पहला पग पृथ्वी पर पड़ा। इसका संकेत यह है कि सबसे पहले मानव को अपनी पृथ्वी को, अपने आस पास के संसार को सच में देखना चाहिए। इस धरती पर अनेकों जाति, जीव, वृक्ष और प्राणी हैं।
जब कोई व्यक्ति अपने इर्दगिर्द इतने प्राणियों के अस्तित्व को महसूस करता है तो मन में स्वाभाविक विनम्रता उत्पन्न होती है। तब यह समझ आता है कि अकेला मनुष्य ही इस सृष्टि का केंद्र नहीं बल्कि एक छोटी सी कड़ी है।
दूसरा पग वामन ने आकाश में रखा। इसका अर्थ यह समझाया जाता है कि कभी कभी मन को ऊपर, असीम गगन की ओर भी देखना चाहिए। ब्रह्मांड में अनगिनत लोक, तारों और ग्रहों की उपस्थिति को सोचकर मनुष्य अपने अस्तित्व को बहुत छोटा अनुभव करता है।
यह चिंतन अहंकार को ढीला करता है और व्यक्ति को यह स्वीकार करने में सहायता देता है कि जीवन, शक्ति और सामर्थ्य सब किसी उच्चतर सत्ता की देन हैं। जब यह भावना आती है तो व्यवहार में स्वाभाविक नम्रता और संतुलन बढ़ता है।
तीसरे पग के रूप में वामन महाबली के शीश पर चरण रखते हैं। प्रतीक रूप से यह संकेत देता है कि अंत में मनुष्य को अपना अहंकार, अपने विचार और पहचान स्वयं के ऊपर ही रखकर परखनी पड़ती है।
जब व्यक्ति सच में ध्यान से अपने सिर पर हाथ रखकर यह सोचता है कि जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र में उसका एक जीवन कितना छोटा है तब वह भीतर से हल्का महसूस करता है। संपूर्ण ब्रह्मांड की विस्तृत योजना में अपनी भूमिका को बहुत छोटी मानकर काम करना ही सच्ची विनम्रता है।
| वामन के तीन प्रतीकात्मक कदम | आंतरिक साधना का कदम |
|---|---|
| पृथ्वी पर पहला पग | संसार और सभी जीवों को देख कर विनम्र होना |
| आकाश में दूसरा पग | ब्रह्मांड की विशालता से अपने अहंकार को पिघलाना |
| शीश पर तीसरा पग | अपने जीवन की क्षणभंगुरता स्वीकार कर समर्पण |
ओणम शब्द को तिरुवोणम और श्रवणम का संक्षिप्त रूप माना जाता है। यह उत्सव भारतीय पंचांग के अनुसार श्रावण मास में श्रवण नक्षत्र के समय मनाया जाता है। उत्तर भारत में श्रावण का समय प्रायः वर्षा ऋतु के मध्य आता है, जबकि दक्षिण भारत में यह अवधि कुछ आगे बढ़कर वर्षा के उत्तरार्ध तक फैल जाती है।
श्रावण मास को देव उपासना, व्रत और साधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस समय वर्षा जल से धरती हरी भरी होती है और वातावरण में शुद्धता और सौम्यता का भाव प्रबल होता है। इसी महीने में श्रवण नक्षत्र की उपस्थिति ओणम के पर्व को विशेष रूप से पवित्र बना देती है।
श्रवण नक्षत्र को आकाश में एक विशेष तारा समूह के रूप में जाना जाता है। पश्चिमी खगोल परंपरा में इसे अल्टेयर नामक चमकीले तारे और उसके दोनों ओर स्थित बीटा और गामा तारा समूह के रूप में पहचाना जाता है।
भारतीय परंपरा में इन तीन तारों को वामन के त्रिविक्रम स्वरूप के तीन पदचिह्न के रूप में देखा गया है। मानो भगवान के तीन पग आकाश में स्थायी चिन्ह बनकर मनुष्य को सदा उसकी मर्यादा और सीमा का स्मरण कराते हों।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि महाबली और वामन की कथा में श्रवण नक्षत्र को इतना महत्व क्यों दिया गया। श्रवण शब्द का एक गहरा अर्थ है, सुनना और ध्यान से ग्रहण करना।
आकाश में स्थित ये तीन तारे प्रतीक हैं इस बात के कि महाबली ने अपने गुरु की चेतावनी को ध्यान से नहीं सुना। अतिथि को देखकर केवल दान वीरता के भाव में आकर उन्होंने गुरु की बात पर मनन नहीं किया और उसके बाद जो परिणाम आया, वह उनकी नियति बना।
इसीलिए श्रवण नक्षत्र मनुष्य को यह संदेश देता है कि जो भी शुभ सलाह, सत्संग या मार्गदर्शन जीवन में मिले, उसे ध्यान से सुनना और उस पर विचार करना आवश्यक है। केवल सुन लेना पर्याप्त नहीं बल्कि उस पर अमल करना ही ज्ञान को सार्थक बनाता है।
ओणम और राजा महाबली की यह कथा सिखाती है कि वैभव, सत्ता और यश तभी तक सुशोभित करते हैं जब तक उनके साथ विनम्रता और समर्पण जुड़ा रहे। महाबली का तेज और दानशीलता अद्वितीय थी, फिर भी अंतिम परीक्षा में उन्हें अपना शीश ईश्वर के चरणों में समर्पित करना ही सर्वोच्च उपलब्धि के रूप में मिला।
वामन अवतार जीवन को यह संकेत देता है कि जब भी अहंकार बढ़ने लगे तब पृथ्वी, आकाश और स्वयं के सिर पर हाथ रखकर अपनी सीमाओं को याद करना चाहिए। इसी से मन में संतुलन और शांति बनी रहती है और जीवन के उत्सव, जैसे ओणम, केवल बाहरी आनंद नहीं बल्कि आंतरिक जागृति का अवसर बन जाते हैं।
ओणम का मुख्य संबंध किससे माना जाता है?
ओणम का प्रमुख संबंध असुरराज महाबली से है। इस दिन को उनके अपनी प्रजा के बीच लौटकर आने का पावन अवसर माना जाता है, जब लोग प्रतीक रूप से अपने प्रिय राजा का स्वागत करते हैं।
राजा महाबली को महान क्यों कहा जाता है?
महाबली को न्यायप्रिय, दानी और प्रजा वत्सल राजा माना गया है। उनके राज्य में किसी प्रकार का भय या अभाव नहीं था, इसलिए उनकी प्रजा उन्हें आज भी प्रेम और सम्मान से याद करती है।
वामन अवतार में तीन पग भूमि का क्या अर्थ है?
तीन पग भूमि प्रतीक है अहंकार पर विजय के तीन चरणों का। पहला पग पृथ्वी को देखकर विनम्र होने का संदेश देता है, दूसरा आकाश की विशालता को समझने का और तीसरा अपने सिर पर समर्पण का।
श्रवण नक्षत्र को ओणम से क्यों जोड़ा जाता है?
ओणम श्रवण नक्षत्र के समय मनाया जाता है और श्रवण का अर्थ है सुनना। यह नक्षत्र स्मरण दिलाता है कि गुरु और सज्जनों की नेक सलाह को ध्यान से सुनना और उस पर अमल करना जीवन में संतुलन और कल्याण लाता है।
ओणम मनाते समय इस कथा को याद रखना क्यों लाभकारी माना जाता है?
इस कथा को स्मरण रखने से उत्सव केवल बाहरी आनंद तक सीमित नहीं रहता। व्यक्ति को दान, विनम्रता, समर्पण और सजगता के गुण याद रहते हैं, जिससे परिवार और समाज दोनों में सौहार्द और समृद्धि की भावना प्रबल होती है।
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