By पं. नीलेश शर्मा
जानें पद्मिनी एकादशी व्रत कथा, महत्व और इससे मिलने वाले यश, संतान तथा विष्णु कृपा

वैदिक परंपरा में पद्मिनी एकादशी अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली मानी जाती है। यह एकादशी केवल अधिकमास में ही आती है, जो सामान्य वर्षों में दिखाई नहीं देती। पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को कीर्ति, संतति सुख और अंततः विष्णुलोक की प्राप्ति होने का वर्णन मिलता है। व्रत की कथा और विधि दोनों मिलकर इस एकादशी को अत्यंत विशिष्ट बनाते हैं।
साधारण वर्ष में कुल 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, वर्ष में जुड़ता है तो दो अतिरिक्त एकादशियां उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार पूरे वर्ष में 26 एकादशियां मानी जाती हैं। अधिकमास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी या कमला एकादशी कहा जाता है और कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी के नाम से जाना जाता है।
अधिकमास कोई सामान्य मास नहीं माना जाता। यह मास लगभग 32 महीनों के अंतराल के बाद आता है और इसकी एकादशियां विशेष पुण्यदायिनी कही गई हैं। पद्मिनी एकादशी इन्हीं विशिष्ट तिथियों में से एक है जो विशेष रूप से संतान प्राप्ति, कीर्ति, यश और विष्णु कृपा के लिए मानी जाती है।
| घटक | विवरण |
|---|---|
| मास | अधिकमास पुरुषोत्तम मास |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| नाम | पद्मिनी एकादशी या कमला एकादशी |
| अतिरिक्त एकादशियां | पद्मिनी शुक्ल, परमा कृष्ण |
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक निवेदन किया। उन्होंने कहा कि अन्य सभी एकादशियों की महिमा सुनी जा चुकी है, अब कृपा करके अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी विस्तृत रूप से बताएं। नाम क्या है, विधि क्या है और फल क्या है।
भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि अधिकमास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम पद्मिनी एकादशी है। कमला एकादशी के नाम से भी इसे जाना जाता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि यह एकादशी अनंत पुण्य देने वाली है और इसके व्रत से मनुष्य दुर्लभ बैकुंठ धाम तक जा सकता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत कल्याणकारी है जो दीर्घकालिक संकल्प, संतति सुख और यश की इच्छा रखते हैं।
पद्मिनी एकादशी का व्रत साधारण एकादशी से कुछ अधिक अनुशासन और नियमों वाला माना गया है। इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से प्रारंभ होती है।
दशमी के दिन से ही व्रती को सात्त्विक आहार अपनाना चाहिए। जौ और चावल आदि का भोजन कांसे के पात्र में ग्रहण किया जाता है। नमक का त्याग किया जाता है ताकि शरीर और मन दोनों में संयम बढ़ सके। भूमि पर शयन किया जाता है और ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। यह सब उपाय मन को व्रत के लिए तैयार करने के साधन हैं।
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर दंतधावन किया जाता है। परंपरा में जल के बारह कुल्ले करके शुद्ध होने का उल्लेख आता है। इसके बाद व्रती किसी पवित्र जलाशय या तीर्थ में स्नान के लिए जाता है। स्नान के समय गोबर, मिट्टी, तिल, कुशा और आंवले के चूर्ण का उपयोग कर विधिपूर्वक स्नान करने का विधान बताया गया है ताकि बाह्य शुद्धि के साथ साथ आंतरिक पवित्रता की भावना जागृत हो।
इसके पश्चात श्वेत वस्त्र धारण किए जाते हैं। मंदिर में जाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष दीप, धूप, पुष्प और नैवेद्य से पूजा की जाती है। पूरे दिन नामस्मरण, जप और भजन करने से व्रत की शक्ति और अधिक प्रबल मानी जाती है। रात्रि में जागरण का भी विशेष महत्व बताया गया है, विशेषकर अधिकमास की एकादशी के लिए।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुरुषोत्तम मास में जो एकादशी आती है उसका नाम पद्मिनी एकादशी है और यह अनेक पुण्यों को प्रदान करने वाली है। इस व्रत को करने से मनुष्य न केवल कीर्ति प्राप्त करता है बल्कि बैकुंठ धाम अर्थात भगवान विष्णु के धाम को भी प्राप्त करता है।
पुरुषोत्तम मास स्वयं ही भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ माना गया है। इस मास में किए गए जप, तप, दान और व्रत साधारण मास की अपेक्षा कहीं अधिक फलदायी होते हैं। इस कारण पद्मिनी एकादशी को विशेष महिमा प्राप्त है। यह व्रत उन लोगों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है जो लंबे समय से किसी बड़े आध्यात्मिक या पारिवारिक संकल्प को पूरा करना चाहते हैं।
श्रीकृष्ण ने पद्मिनी एकादशी के महत्व को स्पष्ट करने के लिए त्रेता या त्रेता समान युग के प्राचीन प्रसंग का वर्णन किया। उस समय हैहय वंश में कृतवीर्य नामक राजा महिष्मतीपुरी में राज्य करता था। यह वही वंश है जिसकी परंपरा में आगे चलकर प्रसिद्ध कार्तवीर्य अर्जुन हुए।
कृतवीर्य राजा के पास एक हजार रानियां थीं। वे सभी प्रिय थीं, परंतु किसी के भी गर्भ से पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। विशाल राज्य का उत्तरदायित्व और वंश की परंपरा के लिए योग्य उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी। देवता, पितृ, सिद्ध और अनेक वैद्य तथा आचार्य सबकी शरण राजा ने ली, परंतु पुत्र प्राप्ति का कोई मार्ग नहीं खुला। असफलता के बाद अंततः राजा ने तपस्या को ही अंतिम समाधान माना।
राजा कृतवीर्य की परम प्रिय रानी पद्मिनी थीं। वे राजा हरिश्चंद्र के इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न कन्या थीं। उच्च कुल, तेजस्वी स्वरूप और पतिव्रता धर्म से युक्त थीं। जब राजा ने वन में तपस्या करने का निश्चय किया तो रानी पद्मिनी ने भी उनके साथ वन जाने का संकल्प लिया।
दोनों ने अपने विश्वस्त मंत्री को राज्य का भार सौंपा। राजसी वस्त्र, आभूषण और सुख सुविधाओं का त्याग कर गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान किया। पर्वत पर पहुंचकर राजा ने हजारों वर्ष तक कठोर तप किया। यह तपस्या केवल अलंकारिक वर्णन नहीं थी बल्कि निरंतर संयम, जप और ध्यान से जुड़ी हुई साधना थी। इतनी लंबी तपस्या के बावजूद भी उन्हें पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। मन स्वाभाविक रूप से निराशा की ओर झुकने लगा।
इसी समय पतिव्रता रानी पद्मिनी से अनुसूया जी ने संवाद किया। अनुसूया स्वयं तप और सतीत्व के लिए प्रसिद्ध मानी जाती हैं। उन्होंने रानी से कहा कि बारह मासों से भी अधिक महत्वपूर्ण एक मलमास होता है, जिसे अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यह मास लगभग 32 माह के बाद आता है।
अनुसूया ने बताया कि जब यह अधिकमास आता है तो उसमें जो शुक्ल पक्ष की एकादशी आती है उसे पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। यदि तुम इस पद्मिनी एकादशी का जागरण सहित व्रत करोगी तो तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएंगी। विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति और वंश वृद्धि का फल इस व्रत से मिलता है।
रानी पद्मिनी ने पूर्ण विश्वास के साथ यह व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने एकादशी के दिन निराहार रहकर पूरे नियम से व्रत किया। रात्रि में जागरण करके भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन और ध्यान किया। इस व्रत की समाप्ति पर उन्होंने हृदय से प्रार्थना की कि भगवान उन्हें योग्य पुत्र प्रदान करें।
रानी पद्मिनी की इस निष्ठा और तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया। उन्होंने पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। भगवान ने कहा कि तुम्हारी गोद में जो पुत्र आएगा वह बल, प्रभाव और वैभव में अद्वितीय होगा।
समय आने पर पद्मिनी के गर्भ से कार्तवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। शास्त्रों में उसे कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है। वह अत्यंत बलवान, तेजस्वी और विजयी राजा हुआ। तीनों लोकों में उसके समान पराक्रम वाला कोई न था। केवल भगवान विष्णु को छोड़कर कोई उसे जीतने की सामर्थ्य नहीं रखता था। इस प्रकार पद्मिनी एकादशी के व्रत ने न केवल संतान दी बल्कि अद्वितीय योग्यता वाला पुत्र प्रदान किया।
पद्मिनी एकादशी की कथा केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह कथा धैर्य, तप, पतिव्रता धर्म और ईश्वर में अटूट विश्वास की भी शिक्षा देती है। राजा कृतवीर्य का लंबा तप, रानी पद्मिनी का विश्वास और अनुसूया का मार्गदर्शन इन सबके बीच एक साझा सूत्र दिखाई देता है।
पहला संदेश यह कि कभी कभी लंबे प्रयासों के बाद भी तुरंत परिणाम नहीं मिलते, परंतु सही समय और सही साधन मिलने पर साधना सफल होती है। दूसरा यह कि विशेष तिथियां जैसे अधिकमास की पद्मिनी एकादशी साधारण दिन से अधिक शक्तिशाली माध्यम बन सकती हैं। तीसरा यह कि पति पत्नी के संयुक्त संकल्प और भक्ति से परिवार के लिए अद्भुत फल प्राप्त हो सकता है।
पद्मिनी एकादशी विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए शुभ मानी जाती है जो संतति सुख की कामना रखते हैं और लंबे समय से प्रयासरत हैं। साथ ही यह व्रत उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो अपने जीवन में दीर्घकालिक यश, कीर्ति और धर्म आधारित सफलता चाहते हैं।
अधिकमास में समय निकालकर नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने से मन को भी स्पष्ट दिशा मिलती है। साधक की इच्छाएं धीरे धीरे संकुचित होकर एक स्पष्ट आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर मुड़ती हैं। इस दृष्टि से पद्मिनी एकादशी केवल फल देने वाला व्रत नहीं बल्कि साधना को केंद्रित करने का सुंदर अवसर है।
पद्मिनी एकादशी किस मास में आती है
पद्मिनी एकादशी केवल अधिकमास में आती है जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह अधिकमास लगभग 32 माह के अंतराल पर पड़ता है और उसमें शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी के रूप में माना जाता है।
अधिकमास में कुल कितनी एकादशियां होती हैं
सामान्य वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं। अधिकमास जुड़ने पर दो अतिरिक्त एकादशियां आती हैं। शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी और कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी। इस प्रकार पूरे वर्ष में कुल 26 एकादशियों की गणना की जाती है।
पद्मिनी एकादशी व्रत की मुख्य विशेष विधि क्या है
दशमी से ही व्रत की शुरुआत मानी जाती है। नमक रहित सात्त्विक भोजन, भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य और संयम का पालन। एकादशी के दिन प्रातः स्नान, श्वेत वस्त्र, तीर्थ स्नान, गोबर, मिट्टी, तिल, कुशा और आंवले के चूर्ण से स्नान का उल्लेख आता है। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा और यथाशक्ति रात्रि जागरण करने से व्रत पूर्ण माना जाता है।
पद्मिनी एकादशी व्रत से रानी पद्मिनी को क्या फल मिला
रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से पद्मिनी एकादशी का जागरण सहित व्रत किया। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया। उसी व्रत के प्रभाव से उनके घर कार्तवीर्य जैसे बलवान, तेजस्वी और अद्वितीय पुत्र का जन्म हुआ जो तीनों लोकों में अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध हुआ।
आज के समय में पद्मिनी एकादशी व्रत से क्या लाभ हो सकता है
आज भी जो दंपति संतति सुख, कीर्ति, यश और स्थायी शुभफल की कामना रखते हैं वे अधिकमास की पद्मिनी एकादशी का व्रत कर सकते हैं। श्रद्धा, नियम और संयम के साथ किया गया यह व्रत मन को स्थिर करता है और जीवन में धर्मसंगत सफलता तथा ईश्वर कृपा की दिशा खोलता है।
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