By पं. संजीव शर्मा
जानें परम एकादशी व्रत कथा, महत्व और इससे मिलने वाले धन, खुशहाली और शुभ भाग्य

वैदिक परंपरा में परमा एकादशी को अधिकमास की अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि माना जाता है। यह एकादशी केवल उसी वर्ष आती है जब अधिकमास या मलमास जुड़ता है, इसलिए इसका व्रत सामान्य एकादशी की तुलना में अधिक दुर्लभ और प्रभावी समझा जाता है। इस व्रत से पापों का क्षय, दरिद्रता का नाश, इस लोक में सुख और परलोक में उत्तम गति प्राप्त होती है। कथा और व्रत विधान दोनों मिलकर परमा एकादशी को विशेष आध्यात्मिक महत्त्व प्रदान करते हैं।
शास्त्रीय गणना के अनुसार सामान्य वर्ष में कुल 24 एकादशियां मानी जाती हैं। जब वर्ष में अधिकमास या मलमास आता है तो दो अतिरिक्त एकादशियां जुड़ जाती हैं। इस प्रकार उस वर्ष कुल 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी और कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहा जाता है।
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और इसे भगवान विष्णु के प्रिय मास के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस मास में किए गए व्रत, जप, दान और तप अन्य महीनों की तुलना में अधिक फलदायी माने जाते हैं। परमा एकादशी इस माह की कृष्ण पक्ष की प्रमुख तिथि है जो विशेष रूप से दरिद्रता नाश, धन समृद्धि और पाप क्षय के लिए प्रसिद्ध है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| मास | अधिकमास मलमास पुरुषोत्तम मास |
| पक्ष | कृष्ण पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| एकादशी का नाम | परमा एकादशी |
| अन्य अधिकमास एकादशी | पद्मिनी शुक्ल, परमा कृष्ण |
| पूज्य देवता | भगवान विष्णु |
| मुख्य फल | पाप क्षय, दरिद्रता नाश, सद्गति |
श्रीमहाभारत काल में एक प्रसंग आता है जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से शुक्ल पक्ष की एकादशी का विस्तारपूर्वक वर्णन सुनने के बाद निवेदन किया। वे बोले कि अधिकमास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम क्या है, उसमें किस देवता की पूजा की जाती है, किस प्रकार का व्रत विधान है और उससे किस प्रकार का फल प्राप्त होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि अधिकमास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह परमा एकादशी कहलाती है। वर्ष में जब अधिकमास जुड़ता है तब पद्मिनी और परमा मिलकर दो विशेष एकादशियां उस वर्ष की कुल संख्या को 26 तक बढ़ा देती हैं। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि परमा एकादशी का व्रत विधिवत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य इस संसार में सुख और परलोक में सद्गति प्राप्त करता है। इस व्रत में भगवान विष्णु का धूप, दीप, नैवेद्य और पुष्प के साथ पूजन करना सर्वोत्तम माना गया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि इस एकादशी की जो पावन कथा महर्षियों के बीच काम्पिल्य नगरी में प्रसंग रूप से प्रकट हुई, वही कथा परमा एकादशी की महिमा को स्पष्ट करती है।
काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक अत्यंत धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी पतिव्रता, शीलवान और अत्यंत पवित्र स्वभाव वाली थी। किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण यह दंपती गहन दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे। ब्राह्मण जब भिक्षा के लिए निकलता तो उसे पर्याप्त भिक्षा भी प्राप्त नहीं होती।
पत्नी के पास वस्त्रों की भी कमी थी, फिर भी वह अपने पति की सेवा में तन मन से लगी रहती। अतिथि आने पर वह स्वयं भूखी रहकर भी अन्न दे देती, पर पति से कभी कोई वस्तु नहीं मांगती। दोनों पति पत्नी घोर निर्धनता के बीच भी धर्म, सेवा और सहनशीलता का आश्रय लेकर जी रहे थे।
एक दिन अत्यधिक निराशा की अवस्था में ब्राह्मण सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि जब वह धनवानों के पास जाकर कुछ सहायता चाहता है तो वे उसे मना कर देते हैं। गृहस्थ जीवन धन के बिना टिक नहीं पाता। इसलिए यदि पत्नी की सहमति हो तो वह परदेस जाकर कोई कार्य करके धन अर्जित करना चाहेगा। सुमेधा ने यह भी कहा कि विद्वान लोगों ने कर्म की प्रशंसा की है, इसलिए प्रयत्न करना ही उचित है।
पत्नी ने अत्यंत विनम्रता और धैर्य के साथ उत्तर दिया। उसने कहा कि वह स्वयं को अपने पति की दासी मानती है, इसलिए पति जो उचित समझें वही उसे स्वीकार होगा। परंतु उसने यह भी समझाया कि मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। सुमेरु पर्वत पर भी यदि कोई व्यक्ति बैठे तो भी बिना भाग्य के उसे स्वर्ण नहीं मिल सकता। जो पूर्व जन्म में विद्या और भूमि का दान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में विद्या और भूमि की प्राप्ति होती है।
पत्नी ने कहा कि यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उस जीवन में केवल अन्न की व्यवस्था करते हैं। उसने पति से विनती की कि वे इस स्थान को न छोड़ें, क्योंकि वह उनके वियोग को सह नहीं सकती। पति के बिना स्त्री का सम्मान समाज में भी कम हो जाता है। माता, पिता, भाई, ससुर और अन्य संबंधी भी उससे विमुख हो जाते हैं। इसलिए उसने प्रार्थना की कि जो भाग्य में लिखा है वही यहीं प्राप्त होगा, अतः वे कहीं न जाएं।
ब्राह्मण ने पत्नी की सलाह को महत्व दिया और परदेस जाने का विचार त्याग दिया। समय कठिन था पर दंपती धैर्य के साथ जीवन जीते रहे।
एक समय कौण्डिन्य ऋषि उस क्षेत्र में आए। सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें देखकर बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया। वे बोले कि आज हमारा जीवन सार्थक हो गया। उन्होंने ऋषि को आसन देकर यथाशक्ति भोजन कराया।
भोजन के बाद पतिव्रता ब्राह्मणी ने अत्यंत विनम्र स्वर में निवेदन किया कि वे उन्हें दरिद्रता दूर करने की कोई विधि बताएं। उसने स्वीकार किया कि उसने ही अपने पति को परदेस जाकर धन कमाने से रोका है, क्योंकि वह पति वियोग को सहन नहीं कर सकती। अब जब ऋषि स्वयं कृपा से उनके घर आए हैं, तो वह आशावान है कि यह दरिद्रता शीघ्र ही समाप्त होगी।
कौण्डिन्य ऋषि ने उसकी बात सुनकर करुणा से प्रेरित होकर उपाय बताया। उन्होंने कहा कि मलमास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत सभी पाप, दुख और दरिद्रता को नष्ट करने वाला है। जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है, वह धनवान हो जाता है। इस व्रत में रात्रि जागरण, नृत्य, गायन और भगवान के नाम का संकीर्तन भी अत्यंत शुभ माना गया है।
ऋषि ने यह भी बताया कि यही परमा एकादशी वह व्रत है जिसे कुबेर ने भी किया था। इस व्रत के प्रभाव से भगवान शिव प्रसन्न हुए और कुबेर को देवताओं के धनपाल का पद प्रदान किया। राजा हरिश्चंद्र ने भी इसी व्रत के प्रभाव से पुत्र, स्त्री और राज्य की पुनः प्राप्ति की थी।
कौण्डिन्य ऋषि ने केवल एक दिन का व्रत ही नहीं बताया बल्कि परमा एकादशी से जुड़े पंचरात्रि व्रत की भी महिमा समझाई। उन्होंने कहा कि परमा एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर विधि पूर्वक पांच दिनों तक चलने वाला यह व्रत आरंभ करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि जो लोग पांच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं वे अपने माता, पिता और पत्नी सहित स्वर्ग लोक को प्राप्त होते हैं। जो पांच दिन तक प्रतिदिन केवल संध्या के समय भोजन करते हैं, वे भी स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। जो साधक स्नान करके पांच दिनों तक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे समस्त संसार को भोजन कराने के समान फल प्राप्त करते हैं।
जो व्यक्ति इस व्रत में अश्व दान करते हैं, उन्हें तीनों लोकों को दान करने का फल मिलता है। जो उत्तम ब्राह्मण को तिल दान करते हैं, वे तिल की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में वास करते हैं। जो घी का पात्र दान करते हैं, वे सूर्य लोक को प्राप्त होते हैं। जो पांच दिन तक ब्रह्मचर्य पूर्वक रहते हैं, वे देवांगनाओं के साथ स्वर्ग की सुखद यात्रा करते हैं। ऋषि ने ब्राह्मणी से कहा कि वह अपने पति के साथ इस व्रत को धारण करे, इससे उन्हें सिद्धि और अंत में स्वर्ग प्राप्त होगा।
कौण्डिन्य ऋषि के बताई विधि के अनुसार सुमेधा ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने परमा एकादशी का पंचरात्रि व्रत किया। उन्होंने यथाशक्ति नियम, संयम और श्रद्धा का पालन किया। व्रत के पूर्ण होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने देखा कि एक राजकुमार उनके घर की ओर आ रहा है।
राजकुमार ब्रह्मा जी की प्रेरणा से आया था। उसने इस दंपती को एक सुंदर, सुसज्जित और सभी आवश्यक वस्तुओं से परिपूर्ण गृह दान में दिया। इसके साथ ही आजीविका के लिए एक संपूर्ण गांव भी प्रदान किया, ताकि उन्हें आगे किसी प्रकार की आर्थिक चिंता न रहे। इस प्रकार वह दंपती दरिद्रता से पूर्णतः मुक्त हो गया।
कथा में कहा गया है कि पृथ्वी पर अनेक वर्षों तक सुख भोगने के पश्चात वे दोनों पति पत्नी अंत में श्रीविष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गए। इस प्रकार परमा एकादशी व्रत ने उन्हें केवल धन ही नहीं दिया बल्कि जीवन भर का सम्मान, संतोष और अंततः आध्यात्मिक सिद्धि भी प्रदान की।
परमा एकादशी की कथा केवल धन प्राप्ति या दरिद्रता नाश की कहानी नहीं है। यह कथा धैर्य, पतिव्रता धर्म, संतोष, पुनर्जन्म के सिद्धांत और ईश्वर पर विश्वास की गहरी शिक्षा देती है। सुमेधा और उसकी पत्नी ने कठिन परिस्थितियों में भी घर, धर्म और संबंधों को नहीं छोड़ा।
कथा यह भी बताती है कि सही समय पर सही साधन मिलने पर भाग्य बदल सकता है, परंतु इसके लिए जीवन में श्रद्धा और संयम बनाए रखना आवश्यक है। परमा एकादशी व्रत यह सिखाता है कि केवल बाह्य प्रयत्न ही नहीं बल्कि आंतरिक शुद्धि, व्रत और दान का भी जीवन सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक इस व्रत को अपनाता है, वह धीरे धीरे न केवल आर्थिक रूप से बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी समृद्ध होता जाता है।
परमा एकादशी किस माह और पक्ष में आती है
परमा एकादशी केवल अधिकमास में आती है जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह इस विशेष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है और वर्ष की 26 एकादशियों में से एक मानी जाती है।
अधिकमास में पद्मिनी और परमा एकादशी में क्या अंतर है
अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी और कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहा जाता है। पद्मिनी का संबंध मुख्य रूप से संतान सुख, यश और दीर्घकालिक संकल्प से जोड़ा जाता है, जबकि परमा एकादशी विशेष रूप से पाप क्षय, दरिद्रता नाश और धन समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है।
परमा एकादशी व्रत से दरिद्रता कैसे दूर होती है
कथा के अनुसार काम्पिल्य नगरी के सुमेधा ब्राह्मण और उनकी पत्नी ने कौण्डिन्य ऋषि के बताई विधि से परमा एकादशी और पंचरात्रि व्रत किया। व्रत के पूर्ण होने पर उन्हें राजकुमार के माध्यम से घर और गांव प्राप्त हुआ। इससे संकेत मिलता है कि यह व्रत साधक के जीवन में आजीविका के साधन, सम्मान और स्थिरता प्रदान करने की क्षमता रखता है, जब इसे श्रद्धा से किया जाए।
पंचरात्रि व्रत में किन मुख्य नियमों का पालन किया जाता है
पंचरात्रि व्रत परमा एकादशी से प्रारंभ होकर पांच दिनों तक चलता है। इसमें निर्जल व्रत, केवल संध्या को भोजन, ब्राह्मणों को भोजन कराना, तिल और घी आदि का दान, ब्रह्मचर्य पालन और नियमित स्नान तथा जप शामिल हैं। प्रत्येक साधक अपनी क्षमता के अनुसार इन नियमों का पालन कर सकता है, पर मूल भाव श्रद्धा और संयम का होना आवश्यक है।
आज के समय में परमा एकादशी व्रत किन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है
आज के जीवन में यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो आर्थिक अस्थिरता, कर्ज, आजीविका की चिंता या मानसिक दरिद्रता से जूझ रहे हैं। साथ ही जो व्यक्ति अपने कर्मों के पाप प्रभाव से मुक्त होकर नई सकारात्मक शुरुआत करना चाहते हैं, उनके लिए भी परमा एकादशी का व्रत एक सशक्त आध्यात्मिक साधन बन सकता है।
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