By पं. अमिताभ शर्मा
वामन अवतार, राजा bali की भक्ति और परिवर्तिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

परिवर्तिनी एकादशी की कथा केवल एक व्रत कहानी नहीं बल्कि भगवान विष्णु के वामन अवतार, दैत्यराज बलि की भक्ति और अभिमान के सूक्ष्म अंतर को समझाने वाली गहन आध्यात्मिक शिक्षा भी मानी जाती है। इस एकादशी को जयन्ती एकादशी के नाम से भी जाना जाता है और इसका संबंध भगवान वामन की पूजा, श्रीहरि के शयन भाव तथा चातुर्मास के विशेष समय से जोड़ा जाता है।
परंपरा में कहा गया है कि परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु शयनावस्था में करवट बदलते हैं। इसी कारण इसे परिवर्तिनी नाम प्राप्त हुआ। जो साधक इस तिथि पर व्रत रखकर भगवान वामन और श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे पापों के शमन, स्वर्गप्राप्ति और विष्णुलोक की कृपा के अधिकारी माने जाते हैं। इस व्रत से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति का भी वर्णन आता है।
कथा का आरंभ महाभारत के प्रसंग जैसा भाव लिए हुए होता है। पाण्डु पुत्र अर्जुन विनम्र भाव से श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसका व्रत विधान क्या है और उसके उपवास से क्या फल प्राप्त होता है। वे यह भी प्रार्थना करते हैं कि भगवान इस सबको स्पष्ट कर समझाएँ।
श्रीकृष्ण, जिन्हें यहाँ पार्थ के हितचिंतक मार्गदर्शक के रूप में वर्णित किया गया है, कहते हैं कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को जयन्ती एकादशी कहा जाता है। वे बताते हैं कि इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से भी पापों का शमन हो सकता है और मनुष्य स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है। इतना ही नहीं, यह कथा अत्यंत अधोगति वाले पापियों का भी उद्धार करने वाली मानी गई है।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो धर्मपरायण मनुष्य इस दिन भगवान की पूजा करता है, उसे संसार की समस्त पूजा का फल प्राप्त होता है। जो उनके रूप की उपासना करता है, वह उनके लोक की प्राप्ति का अधिकारी बनता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं बताया गया है।
विशेष रूप से कहा गया है कि जो साधक इस एकादशी के दिन भगवान वामन का पूजन करते हैं, वे वास्तव में त्रिदेव की पूजा करते हैं, क्योंकि वामन के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की उपासना का फल माना जाता है। इस एकादशी के उपवास से ऐसा माना जाता है कि साधक के लिए संसार में कोई विशेष कर्तव्य शेष नहीं रह जाता, अर्थात जीवन की दिशा धर्म और भक्ति से पूर्ण हो जाती है।
इसी प्रसंग में श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि इस एकादशी को परिवर्तिनी इसलिए कहते हैं क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु शयन अवस्था में करवट बदलते हैं। यह संकेत है कि सृष्टि में ऊर्जा के प्रवाह में सूक्ष्म परिवर्तन और चातुर्मास के मध्य का विशेष मोड़ आता है।
श्रीकृष्ण के वचनों को सुनकर अर्जुन आश्चर्य में पड़ जाते हैं। वे निवेदन करते हैं कि भगवान शयन कैसे करते हैं, करवट बदलने का क्या अर्थ है और दैत्यराज बलि को क्यों बाँधा गया। वे यह भी पूछते हैं कि वामन रूप की लीलाएँ क्या थीं, चातुर्मास्य व्रत का क्या विधान है और भगवान के शयन काल में मनुष्य के कर्तव्य क्या माने गए हैं।
श्रीकृष्ण, अर्जुन को प्रिय संबोधन देते हुए कहते हैं कि अब वह कथा सुनें जो समस्त पापों को नष्ट करने वाली है। इसके साथ ही वे त्रेतायुग के एक बड़े प्रसंग का वर्णन आरंभ करते हैं, जहाँ दैत्यराज बलि का चरित्र और उनकी भक्ति की शक्ति दिखाई देती है।
त्रेतायुग में बलि नामक एक असुर राजा का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार बलि अत्यंत भक्त, दानी, सत्यवादी और ब्राह्मण सेवापरायण था। वह यज्ञ, तप, दान और ब्राह्मण सेवा में निष्ठा से लगा रहता था। उसकी तपस्या और पराक्रम के प्रभाव से वह इतना समर्थ हो गया कि स्वर्ग पर भी उसका अधिकार स्थापित हो गया।
समय बीतते बीतते स्थिति यह बनी कि देवराज इन्द्र के स्थान पर भी बलि का राज्य स्थापित हो गया। देवता इस स्थिति को सहन न कर सके। इन्द्र और अन्य देवता मिलकर भगवान श्रीहरि के पास पहुँचे और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की। देवताओं की यह व्यथा सुनकर भगवान ने निर्णय लिया कि वे स्वयं वामन रूप में अवतार लेकर बलि की परीक्षा भी लेंगे और देवताओं के अधिकार को भी पुनः स्थापित करेंगे।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने वामन रूप धारण किया। यह रूप एक तेजस्वी ब्राह्मण बालक जैसा था। वे यज्ञ स्थल पर पहुँचे जहाँ राजा बलि अपने दान और यज्ञ से प्रसन्नचित्त बैठे थे। ब्राह्मण रूप देखकर बलि ने आदरपूर्वक स्वागत किया और उनकी इच्छा पूछी।
भगवान वामन ने विनम्रता से याचना की कि हे राजन, आप तीन पग भूमि दान दें। इतना सा दान देकर भी आपको तीनों लोकों के दान के समान फल की प्राप्ति होगी। बलि, जो स्वयं बड़े दानी और उदार थे, इतने छोटे से वरदान पर प्रसन्न हुए और बिना विचलन के वचन दे दिया कि वे तीन पग भूमि दान करेंगे।
जैसे ही बलि ने वचन देकर दान स्वीकार कर लिया, भगवान वामन ने अपना आकार बढ़ाना आरंभ किया। छोटी सी काया से वे विराट रूप में प्रकट हुए। एक पग से उन्होंने पृथ्वी को नाप लिया, दूसरे पग से समस्त स्वर्ग लोक को व्याप्त कर लिया।
कथा में उल्लेख आता है कि भूलोक में उनका पग, भुवनलोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महलोक में उदर, जनलोक में हृदय, तपलोक में कंठ और सत्यलोक में मुख स्थापित हो गया। उनका शीर्ष इतना ऊँचा उठा कि सूर्य, नक्षत्र, इन्द्र और अन्य देवता भी उनकी स्तुति में लग गए।
तब भगवान ने राजा बलि की ओर देखकर पूछा कि अब तीसरा पग कहाँ रखा जाए, क्योंकि दो पग से तो समस्त लोक नाप लिए हैं।
भगवान के इस प्रश्न को सुनकर राजा बलि का हृदय भीतर तक हिल गया, पर उनका धर्म और वचन पालन उससे भी अधिक जागृत रहा। उन्होंने अपने वचन को निभाने के लिए अपना सिर झुका दिया और कहा कि प्रभु तीसरा पग उनके सिर पर रख दें।
भगवान ने तीसरा पग बलि के सिर पर रखा। इस प्रकार देवताओं के हित के लिए, धर्म की स्थापना के लिए और बलि के छिपे हुए अभिमान को शांत करने के लिए भगवान ने अपने भक्त असुर राजा को पाताल लोक की ओर भेज दिया। यह दंड नहीं बल्कि एक प्रकार की दिव्य व्यवस्था थी जिसमें बलि को भी विशेष स्थान और भगवान की सतत उपस्थिति का वरदान मिला।
कथा में आता है कि जब बलि ने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की तब भगवान ने कहा कि वे सदैव उसके साथ रहेंगे।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन भगवान की एक प्रतिमा दैत्यराज बलि के पास पाताल में स्थित रहती है और एक रूप क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करता है। यह दोहरा भाव इस बात का संकेत है कि भगवान अपने भक्त के साथ भी हैं और समस्त सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में भी शयन अवस्था में विश्व की देखरेख कर रहे हैं।
इसी दिन भगवान को शयनावस्था में करवट बदलते हुए माना जाता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह भी समझा जाता है कि विश्व के सूक्ष्म कर्म चक्र में एक नया मोड़ आता है और साधकों को अपने भीतर भी परिवर्तन और सजगता लाने का अवसर मिलता है।
कथा में परिवर्तिनी एकादशी के व्रत विधान का भी सरल वर्णन मिलता है। इस दिन त्रिलोकीनाथ श्री विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। चावल और दही सहित चाँदी का दान शुभ माना गया है। ऐसे दान को स्थिर लक्ष्मी और पुण्यदायक समझा जाता है।
रात्रि में जागरण का भी उल्लेख आता है। भक्तजन रात भर भजन, कीर्तन या नामस्मरण करते हुए व्यतीत करते हैं। व्रत, उपवास और जागरण के माध्यम से शरीर, मन और इन्द्रियों को संयम की ओर ले जाकर भगवान की कृपा पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी का उपवास और कथा श्रवण मनुष्य को पापों से मुक्त कर स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। कथा में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो इस व्रत की कथा श्रद्धा से सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।
कथा के अंत में संकेत रूप में यह स्पष्ट किया गया है कि दान के बाद मनुष्य को अभिमान नहीं करना चाहिए। राजा बलि निस्संदेह महान दानी और भक्त थे, पर उनमें सूक्ष्म स्तर पर दान और बल के प्रति गर्व भी उत्पन्न हुआ। यही कारण बना कि उन्हें पाताल लोक की ओर जाना पड़ा, यद्यपि भगवान की कृपा उनके साथ रही।
इससे यह शिक्षा भी मिलती है कि हर प्रकार की अति, चाहे वह बल की हो, दान की हो या अहं की, अंततः अनुचित सिद्ध होती है। सच्चा दान वह है जो विनम्रता, समर्पण और निष्काम भाव से किया जाए। परिवर्तिनी एकादशी की कथा साधक को यह संदेश देती है कि भक्ति, दान और व्रत के साथ साथ नम्रता और संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं।
परिवर्तिनी एकादशी को जयन्ती एकादशी क्यों कहा जाता है?
इस एकादशी को जयन्ती इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी कथा और व्रत को पापों के नाश और स्वर्गप्राप्ति का कारण माना गया है। कथा कहती है कि इसका श्रवण भी पापों का शमन कर मनुष्य को उच्च लोकों का अधिकारी बना सकता है।
इस एकादशी पर भगवान वामन की पूजा का विशेष महत्व क्या है?
भगवान वामन के पूजन से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त पूजा का फल माना गया है। वामन अवतार में ही भगवान ने दैत्यराज बलि की परीक्षा लेकर देवताओं का अधिकार स्थापित किया और दान, भक्ति तथा नम्रता का आदर्श प्रस्तुत किया।
भगवान के करवट बदलने का क्या आध्यात्मिक संकेत है?
परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के करवट बदलने का अर्थ यह है कि सृष्टि के सूक्ष्म क्रम में परिवर्तन का एक चरण आता है। साधकों के लिए यह समय अपने जीवन में भी परिवर्तन, आत्मसमीक्षा और नए संकल्प के लिए शुभ माना जाता है।
राजा बलि को पाताल में भेजना दंड था या कृपा?
कथा से स्पष्ट होता है कि यह केवल दंड नहीं था। भगवान ने बलि को पाताल में प्रतिष्ठित किया और स्वयं उसके साथ रहने का वचन दिया। यह उनके अभिमान का शमन भी था और उनकी भक्ति का सम्मान भी।
परिवर्तिनी एकादशी की कथा से दान के संबंध में क्या सीख मिलती है?
कथा सिखाती है कि दान के बाद अहंकार नहीं होना चाहिए। दान, तप और बल यदि अभिमान से जुड़ जाएँ तो पतन का कारण बनते हैं। विनम्रता, संतुलन और भगवान पर समर्पण के साथ किया गया दान ही वास्तव में कल्याणकारी होता है।
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