By पं. अभिषेक शर्मा
राधाष्टमी के दिन श्री राधा के प्रेम और भक्ति का महत्व

राधाष्टमी का पर्व श्रीराधा रानी के अवतरण उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भक्तों के लिए यह दिन केवल जन्मोत्सव नहीं बल्कि शुद्ध प्रेम, निष्काम भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ साधन माना जाता है। श्रीराधा को प्रेम की अधिष्ठात्री देवी माना गया है और उनकी कृपा से ही श्रीकृष्ण की साक्षात् कृपा तक पहुँचना संभव बताया गया है।
श्रीमद्भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराण और अनेक वैष्णव ग्रंथों में श्रीराधा के स्वरूप और महिमा का निरंतर वर्णन मिलता है। कथा के भाव के अनुसार जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया तब उनकी अनंत शक्ति, देवी लक्ष्मी ने श्रीराधा के रूप में अवतार ग्रहण किया। धरती पर यह अवतरण केवल जन्म नहीं बल्कि गोलोकधाम के शाश्वत प्रेम का प्रत्यक्ष प्राकट्य माना जाता है।
परंपरा में श्रीराधा को प्रेम की देवी कहा जाता है। उनका प्रत्येक भाव, प्रत्येक दृष्टि और प्रत्येक संकोच भी भक्ति का आदर्श रूप माना जाता है। राधाष्टमी की कथा को समझने के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राधा और कृष्ण दोनों गोलोकधाम में नित्य एक साथ विद्यमान हैं।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लिया तब उनके दिव्य प्रेम को व्यक्त करने और भक्तों को प्रेम भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए श्रीराधा ने भी अवतरण किया। कथा में यह भी बताया जाता है कि श्रीराधा जी का अवतरण केवल पृथ्वी लोक पर जन्म भर नहीं बल्कि उनकी नित्य लीला का एक अंश है जो समय और स्थान के पार भी चलता रहता है।
कथा के अनुसार वृषभानु जी और उनकी पत्नी कीर्ति देवी अत्यंत सरल, धर्मपरायण और भक्तिमती दंपति थे। वे वृंदावन के समीप बरसाना क्षेत्र में निवास करते थे। दोनों के मन में संतान पाने की तीव्र इच्छा थी, पर लंबे समय तक उन्हें संतोषजनक फल प्राप्त नहीं हुआ।
समय बीतने के साथ उनकी प्रार्थना और भी गहरी होती गई। वे भीतर से यही कामना करते थे कि उन्हें कोई ऐसी संतान प्राप्त हो जो केवल घर की नहीं, समस्त ब्रज की खुशी का कारण बने। इसी अंतरताप, इसी प्रार्थना और इसी भक्ति को देखकर ईश्वर की कृपा जागृत हुई और श्रीराधा के अवतरण की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
एक दिन वृषभानु जी यमुना के तट पर गए। वहाँ शांत जल, मंद लहरें और दिव्य वातावरण के बीच उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने देखा कि जल के मध्य एक कमल का पुष्प खिल रहा है और उस कमल पर एक अनुपम सुंदर कन्या विराजमान है।
उस कन्या का तेज असाधारण था। उसकी देह से कोमल प्रभा निकल रही थी और उसका स्वरूप सामान्य बालिका जैसा होते हुए भी अलौकिक शांति और माधुर्य से भरा हुआ था। वृषभानु जी उस दिव्य बालिका को देखकर भावविभोर हो उठे। उन्हें अंतर्मन से अनुभव हुआ कि यह कोई साधारण बालिका नहीं, ईश्वरीय वरदान है।
वृषभानु जी ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक उस कन्या को कमल सहित अपने पास उठाया और हृदय से लगाकर घर लेकर आए। घर पहुँचकर जब कीर्ति देवी ने उस बालिका के दर्शन किए तो उनकी आँखों में भी आनंद अश्रु आ गए। दोनों ने मिलकर उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यही दिव्य कन्या आगे चलकर श्रीराधा के नाम से संपूर्ण ब्रज में पूजित हुई।
कथा में यह उल्लेख आता है कि श्रीराधा बाल्यावस्था में भी अत्यंत शांत, धैर्यवान और कोमल स्वभाव वाली थीं। उनके चेहरे पर अदृश्य मुस्कान और गहरी शांति का प्रकाश रहता था। कहा जाता है कि जन्म के समय और कुछ समय तक उनकी आँखें बंद ही रहीं, मानो वे बाहरी संसार को देखे बिना ही भीतर के एक दिव्य लोक में लीन हों।
वृषभानु जी और कीर्ति देवी उनकी हर गतिविधि को प्रेम से देखते थे। उनके मन में बार बार यही भाव आता था कि यह बालिका सामान्य नहीं, किसी उच्च लोक की देवी प्रतीत होती है। फिर भी माता पिता के रूप में वे उन्हें पूरे स्नेह से पालते और उनके लिए अपने जीवन को धन्य मानते थे।
कथा का अत्यंत मधुर प्रसंग वह है जब श्रीकृष्ण और श्रीराधा की पहली भेंट होती है। ब्रज की पवन, यमुना की लहरें और वृंदावन के वन उस क्षण के साक्षी माने जाते हैं। छोटा कान्हा, जिसकी बाल लीलाएँ पहले ही ब्रज में प्रसिद्ध हो चुकी थीं, किसी अवसर पर उस स्थान पर पहुँचे जहाँ राधा विराजमान थीं।
उस समय भी श्रीराधा की आँखें बंद बताई जाती हैं। जब श्रीकृष्ण उनके समीप आए और उनके चरणों के पास आकर ठहरे तब लीला के स्वरूप में ऐसा वर्णन मिलता है कि श्रीकृष्ण के स्पर्श से राधा की आँखें खुलीं। पहली दृष्टि में ही उन्होंने श्रीकृष्ण का दर्शन किया और उनका मन उसी क्षण से प्रेम में निमग्न हो गया।
यह दृश्य केवल दो बालकों की भेंट नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है। श्रीराधा की दृष्टि में श्रीकृष्ण ही सर्वस्व बन गए और श्रीकृष्ण के लिए भी राधा उनकी प्रेम लीला की पूर्णता का आधार बन गईं।
श्रीकृष्ण और श्रीराधा का प्रेम संसार के लिए केवल कथात्मक प्रसंग नहीं बल्कि भक्ति का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है। इस प्रेम में स्वार्थ, अपेक्षा या अधिकार की भावना नहीं बल्कि केवल समर्पण, तन्मयता और सेवा की भावना बताई जाती है।
वैष्णव आचार्य बताते हैं कि जो भक्त राधा के भाव को समझने का प्रयत्न करता है, उसके लिए भक्ति केवल कर्मकांड नहीं रहती बल्कि जीवन की साँस साँस बन जाती है। राधाष्टमी की कथा यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम वह है जिसमें स्वयं को भुलाकर केवल प्रियतम की प्रसन्नता की चिंता की जाए। यही भाव बाद में भक्ति योग के उच्चतम रूप के रूप में स्वीकार किया गया।
राधाष्टमी के दिन भक्तजन श्रीराधा का विशेष पूजन करते हैं। कई स्थानों पर राधा और कृष्ण का संयुक्त पूजन होता है, जहाँ राधा को पहले और कृष्ण को बाद में पूजित करने की परंपरा भी देखी जाती है। यह इस भाव का प्रतीक है कि श्रीकृष्ण तक पहुँचने का सहज मार्ग श्रीराधा की शरण से होकर जाता है।
भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, कीर्तन, भजन, रास लीला के पाठ और राधा नाम की जप साधना करते हैं। माखन, मिश्री, फल, दूध और अन्य मधुर पदार्थों का भोग लगाया जाता है। राधाष्टमी के अवसर पर राधा कृष्ण की झांकी सजाई जाती है, जहाँ राधा को अलंकार, वस्त्र और श्रृंगार से सुशोभित कर प्रेमपूर्वक आरती की जाती है।
राधाष्टमी की कथा का मूल संदेश यह है कि भक्ति का सर्वोच्च रूप निष्काम प्रेम है। श्रीराधा का जीवन यह दिखाता है कि जब मनुष्य अपने मन, वचन और कर्म को केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित कर देता है तब उसका प्रत्येक क्षण साधना बन जाता है।
जो साधक राधाष्टमी के दिन राधा नाम का स्मरण करता है और राधा कृष्ण की कथा सुनता है, उसके लिए यह अवसर हृदय की कोमलता, विनम्रता और प्रेम को जगाने का बन जाता है। इस प्रेम में भय नहीं, अपेक्षा नहीं, केवल समर्पण और विश्वास होता है। यही राधाष्टमी को विशेष बनाता है और यही श्रीराधा को भक्ति मार्ग की सर्वोच्च शिखर पर स्थापित करता है।
श्रीराधा को प्रेम की देवी क्यों कहा जाता है?
श्रीराधा का पूरा जीवन और उनकी प्रत्येक लीला केवल प्रेम और समर्पण पर आधारित मानी गई है। उनके भाव में स्वार्थ रहित भक्ति, संपूर्ण समर्पण और श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण निष्ठा दिखाई देती है, इसलिए उन्हें प्रेम की देवी कहा जाता है।
वृषभानु और कीर्ति देवी को राधा जी कैसे प्राप्त हुईं?
कथा के अनुसार वृषभानु जी ने यमुना तट पर एक कमल पर विराजमान दिव्य कन्या को देखा। वे उसे अपने घर ले आए और कीर्ति देवी के साथ मिलकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। वही दिव्य कन्या आगे चलकर श्रीराधा के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
राधा की आँखें श्रीकृष्ण को देखकर ही खुलने का क्या अर्थ है?
कथा में वर्णित है कि श्रीराधा की आँखें तब खुलीं जब श्रीकृष्ण ने उनके निकट आकर अपने चरणों का स्पर्श कराया। इसका संकेत यह माना जाता है कि सच्चा दर्शन और सच्ची जागृति तब होती है जब आत्मा का ध्यान पूर्ण रूप से भगवान की ओर लग जाता है।
राधाष्टमी के दिन किस प्रकार की पूजा अधिक फलदायी मानी जाती है?
इस दिन राधा कृष्ण की संयुक्त पूजा, राधा नाम जप, भजन कीर्तन और प्रेमभाव से की गई आरती को विशेष फलदायी माना जाता है। भोग में माखन, मिश्री, दूध, फल और मधुर पदार्थ चढ़ाकर सरलता और प्रेम के भाव के साथ पूजा करना ही इस दिवस की आत्मा है।
राधाष्टमी की कथा से साधक को क्या सीख मिलती है?
राधाष्टमी की कथा सिखाती है कि भक्ति का सार केवल नियम पालन नहीं बल्कि हृदय का शुद्ध, सरल और प्रेमपूर्ण होना है। जब साधक राधा की तरह अपना केंद्र केवल भगवान की प्रसन्नता पर रखता है तब उसका जीवन भी धीरे धीरे दिव्य आनंद से भरने लगता है।
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