By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए क्यों ब्रह्मा की पूजा दुर्लभ है लेकिन अत्यंत पावन मानी जाती है

भारतीय परंपरा में ब्रह्मा को सृष्टि का शिल्पी माना गया है। वे जीवन, समय, पंचतत्व और सभी जीवों के आरंभदाता हैं। फिर भी उनकी पूजा अत्यंत दुर्लभ है। विष्णु और शिव की उपासना जहाँ व्यापक है, वहीं ब्रह्मा का स्मरण केवल विशेष अवसरों पर ही किया जाता है। यह विरोधाभास बताता है कि सृजनकर्ता का सम्मान मौन और गहन भाव से किया जाता है।
ब्रह्मा सृष्टि को रचते हैं, परंतु उनका कार्य एक बार पूर्ण होने पर समाप्त हो जाता है।
संरक्षण का उत्तरदायित्व विष्णु को और संहार का कार्य शिव को सौंप दिया जाता है।
इसलिए ब्रह्मा का स्मरण उस निर्माणकर्ता की तरह है जो किसी विलक्षण रचना के बाद शांत बैठ जाता है।
उनकी पूजा सीमित होने का यही दार्शनिक अर्थ है – सृजन अपने बाद स्वयं पीछे हट जाता है।
लोककथा के अनुसार, ब्रह्मा ने भृगु ऋषि का आदर नहीं किया। क्रोधित भृगु ने उन्हें श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी सक्रिय उपासना नहीं होगी।
यह कथा देवत्व से अधिक मानवीय सीख देती है – सृजन तभी पूर्ण होता है जब उसमें करुणा और विनम्रता भी जुड़ी हो।
कई कथाएँ ब्रह्मा और सरस्वती के संबंधों का उल्लेख करती हैं।
कहते हैं कि ब्रह्मा उनकी सुंदरता से आकर्षित हुए, जिसे अन्य देवताओं ने अनुचित माना।
यह कथा सृजन की सीमाओं और जिम्मेदारी की भावना का प्रतीक है।
सृजन शक्ति तभी पवित्र मानी जाती है जब उसमें संतुलन और संयम भी हो।
भारत में ब्रह्मा के मंदिर अत्यंत कम हैं, और पुष्कर इसका प्रमुख उदाहरण है।
यहाँ प्रतिवर्ष बड़ा मेला लगता है और भक्त नए आरंभ का आशीर्वाद मांगते हैं।
यह मंदिर सृजन की परंपरा और नवाचार की भावना का प्रतीक है।
ब्रह्मा की उपासना रोजमर्रा की इच्छाओं हेतु नहीं होती।
यह सृजन की शक्ति, नए विचारों, सपनों और दिशा की स्वीकृति का प्रतीक है।
लेखक की पहली पंक्ति, कलाकार की पहली रेखा, नवजात का पहला स्पर्श – हर आरंभ में ब्रह्मा का अंश छिपा है।
जीवन को सृजन, पालन और संहार के चक्र में देखा जाता है।
ब्रह्मा का सृजन एक आधारशिला की तरह है – जो जीवन के लक्ष्य, मूल्यों और पहचान का निर्माण करता है।
उनकी पूजा स्वयं के भीतर स्थित सृजनकर्ता को प्रणाम करना है।
| पहलू | आधार |
|---|---|
| पूजा की दुर्लभता | भृगु ऋषि का श्राप |
| सरस्वती प्रसंग | मर्यादा और संतुलन का प्रतीक |
| प्रमुख मंदिर | पुष्कर, राजस्थान |
| पूजा का अर्थ | सृजन की शक्ति का सम्मान |
| दार्शनिक स्थान | नवाचार, विनम्रता, स्वाभाविकता |
जब भी जीवन में कोई नया अध्याय खुलता है, ब्रह्मा का स्मरण हमें आंतरिक रचनात्मकता से जोड़ता है।
यह प्रेरित करता है कि सृजन हमेशा पवित्र है, और उसके पश्चात विनम्रता ही सृजनकर्ता की वास्तविक शोभा है।
1. ब्रह्मा की पूजा बहुत कम क्यों होती है?
भृगु ऋषि के श्राप और सृष्टि के एक बार पूर्ण होने की परंपरा के कारण।
2. क्या ब्रह्मा और सरस्वती की कथा ऐतिहासिक है या प्रतीक?
यह कथा जिम्मेदारी, मर्यादा और सृजनशीलता की सीमाओं का गहरा प्रतीक है।
3. पुष्कर मंदिर इतना विशेष क्यों है?
क्योंकि यह भारत में गिने-चुने ब्रह्मा मंदिरों में से एक है और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
4. ब्रह्मा की पूजा का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
यह अपनी रचनात्मक ऊर्जा और नए विचारों को सम्मान देने का तरीका है।
5. क्या ब्रह्मा की पूजा जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकती है?
हाँ, यह व्यक्ति में नवीनता, स्पष्टता और लक्ष्य की दिशा में प्रेरणा उत्पन्न करती है।
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