By पं. नरेंद्र शर्मा
भगवान जगन्नाथ के दर्शन और भक्ति का अनुभव

रथ यात्रा को केवल एक उत्सव नहीं बल्कि भगवान के अपने भक्तों के बीच आने का सजीव अनुभव माना जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने विशाल श्री मंदिर से निकलकर भक्तों के बीच उसी तरह विराजते हैं जैसे कोई करुणामय राजा अपने प्रजा के बीच उतर आए। रथों की गरिमा, भक्तों का उत्साह और कीर्तन की धुन मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें भक्ति और भाव, दोनों गहराई से अनुभव होते हैं।
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा उनके श्री मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक मानी जाती है। गुंडिचा मंदिर समुद्र तट स्थित जगन्नाथ मंदिर से लगभग दो मील उत्तर पूर्व दिशा में सुंदराचल नामक स्थान पर माना जाता है। ओडिशा के लोग इसी कारण इस पर्व को प्रेम से गुंडिचा यात्रा भी कहते हैं। रथ यात्रा की तिथि हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ती है, जब भगवान अपने भक्तों को विशेष रूप से दर्शन देते हैं और रथों पर आरूढ़ होकर नगर भ्रमण करते हैं।
रथ यात्रा के पीछे केवल बाहरी शोभायात्रा नहीं बल्कि बहुत गहरा आध्यात्मिक भाव छिपा हुआ माना जाता है।
एक कथा के अनुसार जब भगवान कृष्ण मथुरा गए और फिर द्वारका में जाकर बसे, तो वृंदावन की गोपियां और विशेष रूप से राधारानी गहरे विरह में डूब गईं। वे कृष्ण के साथ द्वारका नहीं गईं, क्योंकि उन्हें वहां का ऐश्वर्य और राजसी जीवन नहीं भाता था। उनका हृदय तो वृंदावन के सरल उपवनों में श्यामसुंदर के साथ बिताए गए प्रेममय क्षणों में ही बसता था।
कहा जाता है कि एक बार सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में यज्ञ हो रहा था। वहां द्वारका से कृष्ण, बलराम और सुभद्रा भी पहुंचे। इसी बीच वृंदावन की गोपियां, राधारानी के नेतृत्व में, कुरुक्षेत्र में कृष्ण से मिलीं। उन्होंने कृष्ण को वापस वृंदावन ले जाने की तीव्र इच्छा व्यक्त की। भाव यह था कि वे कृष्ण को राजसी रथ, शंख, चक्र और गदा के साथ नहीं बल्कि वन विहार के प्रेमपूर्ण रूप में पाना चाहती थीं।
प्रतीक रूप में कहा जाता है कि गोपियों ने कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथ को पकड़कर वृंदावन की ओर खींचना चाहा। इसी भावना को रथ यात्रा में देखा जाता है, जहां भक्त भगवान के रथ को खींचते हैं, मानो उन्हें अपने हृदय वृंदावन में वापस बुला रहे हों। इस दृष्टि से गुंडिचा मंदिर को वृंदावन का प्रतीक माना जाता है और श्री मंदिर को द्वारका या नीलाद्रि की तरह समझा जाता है।
रथ यात्रा में रथ को खींचने वाले हजारों भक्त, ऊंची उठती हरिनाम संकीर्तन की ध्वनि और शंख, तुरही, ढोल, झांझ की ताल, सब मिलकर एक ही संदेश देते हैं कि भगवान को प्रेमपूर्वक अपने जीवन के केंद्र की ओर खींचना ही वास्तविक भक्ति है।
रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलदेव और बहन सुभद्रा के साथ श्री मंदिर से निकलते हैं। यात्रा का प्रत्येक चरण अत्यंत सुव्यवस्थित और मंगलमय माना जाता है।
पूरी यात्रा के दौरान अनेक प्रकार के व्यंजन बनाकर भगवान को भोग अर्पित किया जाता है। बाद में यही भोग प्रसाद के रूप में भक्तों को बांटा जाता है। जब रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं तब भगवान कुछ समय के लिए वहीं विराजते हैं और उस स्थान को भी अपने दिव्य उपस्थित से पावन बनाते हैं।
रथ यात्रा से लगभग पंद्रह दिन पहले स्नान यात्रा का विशेष उत्सव होता है, जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।
इसके बाद लगभग पंद्रह दिन तक भगवान के बाह्य दर्शन सामान्य भक्तों के लिए बंद रहते हैं। इस अवधि को अनवसार कहा जाता है। इस समय के दौरान भगवान के विग्रह पर विशेष प्रकार का शृंगार और जीर्णोद्धार किया जाता है, जिसे नव यौवन की अनुभूति का संकेत माना जाता है। जब यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है तब भगवान रथ यात्रा के दिन पुनः अपने नवीन और युवा रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
जब अनवसार की अवधि समाप्त होती है तब रथ यात्रा के दिन भगवान अपने भक्तों के बीच आने के लिए रथ पर विराजने की प्रक्रिया आरंभ होती है। इसे पहांडी विजय कहा जाता है।
यह परंपरा श्री चैतन्य महाप्रभु के समय से जुड़ी मानी जाती है, जब महाराजा प्रतापुरुद्र ने इसी तरह विनम्र सेवा करके भगवान जगन्नाथ और चैतन्य महाप्रभु को प्रसन्न किया था। आज भी गजपति राजा के वंशज यह सेवा निभाते हैं और रथ यात्रा के आरंभ से पहले सोने की मूठ वाली झाड़ू से मार्ग की सफाई कर इस विनम्र परंपरा को जीवित रखते हैं।
रथों के आगे आगे भक्तगण ऊंचे स्वर में संकीर्तन करते हैं। हरिनाम की ध्वनि, झूमते हुए कीर्तन मंडल और रथ की गरिमा, सब मिलकर एक ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं, जहां भक्त अपने दुख, अहंकार और सीमाओं को भूलकर केवल भगवान के नाम में डूब जाते हैं।
रथ यात्रा के दिन रथ गुंडिचा मंदिर तक पहुंचते हैं और भगवान जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा कुछ दिनों तक वहीं निवास करते हैं।
इसी बीच श्री मंदिर में स्थित देवी लक्ष्मी का भाव अत्यंत रोचक रूप में वर्णित है। कथा के अनुसार जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ श्री मंदिर से निकल जाते हैं और कई दिन तक वापस नहीं आते, तो पांचवें दिन देवी लक्ष्मी को चिंता होने लगती है। उन्हें लगता है कि उनके स्वामी काफी समय से लौटे नहीं हैं, इसलिए वे स्वयं गुंडिचा मंदिर तक जाती हैं।
लक्ष्मी जी भगवान से निवेदन करती हैं कि वे श्री मंदिर वापस लौटें। भगवान अपनी सहधर्मिणी को आश्वासन देते हैं और उन्हें आज्ञा माला प्रदान करते हैं, जो सहमति का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि मन की वेदना और रोष प्रकट करने के लिए देवी लक्ष्मी अपने सेवकों को आदेश देती हैं कि नंदिघोष रथ को आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दें। इस विशेष घटना को रथ भंग कहा जाता है।
कथा में बताया गया है कि अपने इस कठोर भाव के परिणामों से डरकर देवी लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर के बाहर एक इमली के वृक्ष के पीछे कुछ समय छिपी रहती हैं और फिर दूसरी राह से चुपचाप श्री मंदिर की ओर लौट जाती हैं। यह पूरी लीला यह बताती है कि दिव्य संबंध में भी प्रेम, मान, रोष और मान मनौवल की कोमल अनुभूतियां किस प्रकार स्थान पाती हैं।
रथ यात्रा की पूरी परंपरा केवल एक भव्य उत्सव नहीं बल्कि साधक के लिए गहरी प्रेरणा मानी जाती है।
रथ यात्रा भक्त को यह भी सिखाती है कि चाहे पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, भगवान के चरणों में विनम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण है। गजपति राजा की झाड़ू सेवा, गोपियों का कृष्ण को वृंदावन ले जाने की चाह और लक्ष्मी जी का मान, सब मिलकर भक्ति को अत्यंत मानवीय, सुलभ और हृदयस्पर्शी बना देते हैं।
क्या रथ यात्रा में रथ खींचना हर भक्त के लिए आवश्यक है?
रथ खींचना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है, पर सभी के लिए यह व्यवहारिक रूप से संभव नहीं होता। जो भक्त रथ नहीं खींच पाते, वे केवल नाम संकीर्तन, दर्शनों, दान या सेवा के माध्यम से भी इस पर्व से जुड़ सकते हैं।
रथ यात्रा के दिन कौन से विशेष नाम या मंत्र का जप करना उत्तम माना जाता है?
इस दिन विशेष रूप से हरिनाम संकीर्तन, जैसे हरे कृष्ण महामंत्र का जप, तथा जय जगन्नाथ के उच्चारण को अत्यंत शुभ माना जाता है। सरल भाव से भगवान जगन्नाथ का नाम लेना ही इस दिन की मुख्य साधना है।
क्या रथ यात्रा केवल पुरी में ही महत्व रखती है?
पुरी की रथ यात्रा मूल और अत्यंत प्राचीन परंपरा है, पर आज अनेक शहरों में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। जहां भी भगवान का रथ निकले और वहां भक्तिभाव से आराधना हो, वहां इस उत्सव का आध्यात्मिक महत्व सम्मान के योग्य माना जाता है।
क्या रथ यात्रा से पहले स्नान यात्रा और अनवसार की परंपरा हर जगह समान रहती है?
स्नान यात्रा, अनवसार और नवयौवन की मूल भावना पुरी की परंपरा से आती है। अन्य स्थानों पर भी इन्हें विभिन्न रूपों में निभाया जाता है, हालांकि हर क्षेत्र में व्यवहारिक रूप कुछ भिन्न हो सकता है।
रथ यात्रा के अवसर पर साधक को जीवन में क्या संकल्प लेना उपयोगी होता है?
रथ यात्रा के दिन यह संकल्प लेना शुभ माना जाता है कि जीवन के रथ को व्यर्थ आकर्षणों की दिशा से मोड़कर भगवान केंद्रित दिशा में ले जाया जाएगा, क्रोध, अहंकार और आलस्य को थोड़ा थोड़ा कम किया जाएगा और भक्ति, सेवा और विनम्रता को बढ़ाने का प्रयास जारी रहेगा।
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