By पं. नीलेश शर्मा
मनु और शत रूपा से शुरू होती मानवता की कथा और दिव्य नारी‑ऊर्जा का रहस्य

कल्पना करो एक ऐसा क्षण जब न दिन था न रात न पर्वत थे न नदी केवल एक अनंत सा मौन और संभावनाओं से भरी शून्यता थी। इसी विराट शून्य में ब्रह्मा का संकल्प जागा और सृष्टि की कहानी शुरू हुई। कहा जाता है कि इस संकल्प से पहले मन में एक विचार उठा और उस विचार से दो रूप प्रकट हुए मनु और शतरूपा। मनु को पहला पुरुष कहा गया और शतरूपा को पहली स्त्री लेकिन उनका अर्थ केवल इतना भर नहीं है कि वे सबसे पहले जन्मे मनुष्य थे। यह जोड़ी सृष्टि की चेतना और प्रकृति विचार और ऊर्जा देव और देवी के शाश्वत मिलन का प्रतीक बन जाती है।
शतरूपा नाम ही अपने भीतर पूरा दर्शन समेटे हुए है। शत का अर्थ है सौ और रूपा का अर्थ है रूपों वाली। यानी वह जो सौ नहीं अनगिनत रूपों में प्रकट हो सके जो कभी धरती बन जाए कभी जल कभी वायु कभी हृदय की भावना तो कभी किसी जीव का शरीर। उसी अनंत क्षमता को पहली स्त्री के रूप में सामने रखकर हिंदू परंपरा यह कहना चाहती है कि नारी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं प्रकृति का मानवीकरण है।
जब यह कहा जाता है कि ब्रह्मा ने अपने मन से मनु और शतरूपा को उत्पन्न किया तो यह सिर्फ इतना नहीं बताता कि वे बिना साधारण जन्म प्रक्रिया के प्रकट हुए। यह एक संकेत है कि सृष्टि की जड़ में मन संकल्प और चेतना काम करती है। मनु उस चेतन पुरुष का प्रतीक हैं जो सोचता है दिशा देता है योजना बनाता है। शतरूपा उस प्रकृति का रूप हैं जो सारी योजनाओं को रूप देती है खेत को हरियाली देती है गर्भ को शिशु में बदलती है और विचार को वास्तविकता में।
अगर केवल मनु होते और शतरूपा न होतीं तो सारी सृष्टि केवल विचारों का जगत बनकर रह जाती सपनों की दुनिया जिसमें कोई आकार नहीं कोई स्पर्श नहीं। और यदि केवल शतरूपा होतीं और मनु न होते तो ऊर्जा की अपार लहरें होतीं लेकिन उन्हें दिशा देने वाली बुद्धि नहीं होती। इसलिए दोनों को साथ उत्पन्न दिखाया गया ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि सृष्टि का हर सुंदर रूप हर परिवार हर रिश्ता हर वन हर नदी मनु और शतरूपा के भीतर छिपे चेतना और प्रकृति के मिलन से जन्म लेता है।
शतरूपा यहाँ किसी असहाय पहली स्त्री की तरह नहीं खड़ी हैं बल्कि उस मूल शक्ति की तरह जो ब्रह्मा की सृजन इच्छा को हाँ कहती है उसे अपने भीतर स्थान देती है और फिर उसे असंख्य रूपों में बाहर प्रकट कर देती है। जैसे कलाकार का मनु रूपी विचार और शतरूपा रूपी हाथ रंग और कैनवस मिलकर चित्र बनाते हैं वैसे ही सृष्टि का हर दृश्य इस जोड़ी की साझी रचना है।
शतरूपा की कहानी का एक हिस्सा बहुत लोगों को असहज करता है इसलिए कई लोग उसे नजरअंदाज भी कर देते हैं। लेकिन यदि उसे प्रतीक के रूप में समझें तो वह मन और इच्छा की गहराई खोल देता है।
कथा कहती है कि जब शतरूपा प्रकट हुईं तो उनकी सुंदरता और तेजस्विता ने स्वयं ब्रह्मा को भी आकर्षित कर लिया। शतरूपा संकोच से भरकर दिशा बदलती रहीं कभी पूर्व की ओर कभी पश्चिम की ओर कभी उत्तर कभी दक्षिण। वे जिस तरफ जातीं ब्रह्मा का सिर उसी दिशा में घूम जाता ताकि उनकी दृष्टि उनसे हट न पाए। इस तरह चार दिशाओं के लिए चार सिर प्रकट हो गए।
यहाँ तक तो बात समझ में आती है कि सृष्टिकर्ता अपनी ही रचना की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गया जैसे कोई कलाकार अपनी बनाई हुई मूर्ति को निहारता रहता है। लेकिन जब कथा कहती है कि शतरूपा ऊपर की ओर गईं और ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर ऊपर प्रकट हो गया तब यह कहानी एक चेतावनी बन जाती है। अब यह केवल प्रशंसा नहीं रहती बल्कि आसक्ति का रूप ले लेती है वह अवस्था जहाँ सृजनकर्ता अपनी ही रचना को पाने की चाह में उलझने लगता है।
फिर मंच पर शिव का प्रवेश होता है। शिव यहाँ विनाश के देवता भर नहीं हैं वे संतुलन के देवता हैं। कथा में वे आते हैं पाँचवाँ सिर देखते हैं और उसे काट देते हैं। यह दृश्य बड़ा नाटकीय लगता है लेकिन उसका संदेश एकदम साफ है कि सृजन की शक्ति को चाहे वह कितनी भी ऊँची हो यदि वासना और स्वार्थ की तरफ झुकने लगे तो उसे वापस धर्म की दिशा में मोड़ना ही होगा। पाँचवाँ सिर कटना किसी तरह की शारीरिक हिंसा का glorification नहीं बल्कि यह कहने का तरीका है कि जब इच्छा सीमा पार करे तो उसे वहीं रोक देना चाहिए।
इस प्रसंग में शतरूपा को दोष देना आसान है लेकिन वास्तव में वे दोष की नहीं परीक्षण की प्रतीक हैं। उनकी उपस्थिति यह दिखाती है कि सुंदरता और शक्ति किसी को भी आकर्षित कर सकती है पर असली परीक्षा इस बात की है कि सामने वाला अपनी दृष्टि को कितना पवित्र रख पाता है।
विवादित प्रसंग यहीं समाप्त होता है और कथा का केंद्र मनु और शतरूपा की ओर लौटता है। अब वे किसी आध्यात्मिक प्रयोग का हिस्सा नहीं बल्कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के लिए चुनी गई जोड़ी बन जाते हैं। अनेक पुराण बताते हैं कि मनु और शतरूपा के संयोग से ही आगे मनुष्य जाति के विविध वंश विकसित हुए राजाओं की वंशावलियाँ बनीं ऋषियों की परंपराएँ चलीं और समाज का ढाँचा आकार लेने लगा।
मनु और शतरूपा की कहानी में प्रलय का प्रसंग भी आता है जहाँ एक महाविनाशकारी जल प्रलय सब कुछ बहा ले जाने की तैयारी में होता है। मनु को पहले से चेतावनी मिलती है वे एक नाव तैयार करते हैं और जीव जंतुओं के जोड़े उसमें सहेज लेते हैं। कई परंपराओं में माना गया कि इस नए चक्र के बाद फिर से मानव वंश की शुरुआत मनु और शतरूपा से ही हुई। यहाँ वे सिर्फ पहले माता पिता नहीं बल्कि पुनर्जन्मी मानवता के संरक्षक भी बन जाते हैं जो प्रलय की अंधेरी रात के बाद एक नए सवेरा का स्वागत करते हैं।
ध्यान देने वाली बात यह है कि हर बार जब भी मानव सभ्यता का नया अध्याय शुरू होता है तो कथा किसी न किसी नारी ऊर्जा को उसके केंद्र में रखती है। यहाँ वह ऊर्जा शतरूपा के रूप में प्रकट होती है जो प्रलय के बाद भी जीवन को अपने गर्भ में सम्भालकर आगे बढ़ाती है। यह संदेश बहुत सीधा है कि चाहे समय कितना भी हिंसक क्यों न हो जाए जीवन का धागा अक्सर स्त्री के हाथ में ही सुरक्षित रहता है।
शतरूपा का नाम केवल काव्यात्मक नहीं एक कल्पना की चाबी है। जब हम कहते हैं कि वह सौ रूपों वाली है तो हमें अपने आसपास के सभी रूपों पर एक नयी नजर डालनी पड़ती है। जिस मिट्टी पर चलते हैं वह भी उसका रूप है जिस हवा को सांस में भरते हैं वह भी। खेत में उगती फसल आसमान में उड़ते पक्षी जंगल की नमी महासागर की गहराई शहरों की हलचल और साधु की शांति इन सब के पीछे एक ही प्रकृति काम कर रही है जो हर क्षण अपने अलग रूप दिखाती रहती है।
इसी तरह हमारे मन के भीतर उठने वाली भावनाएँ भी शतरूपा के ही रूप हैं। प्रेम करुणा क्रोध उत्साह थकान जिज्ञासा हर भावना प्रकृति की किसी एक लहर की तरह है जो चेतना के सागर में उठती है। इसीलिए शतरूपा की कहानी केवल बाहर की दुनिया की नहीं हमारे भीतर की दुनिया की भी कहानी है। बाहरी प्रकृति और भीतरी भाव दोनों मिलकर ही पूरा मनुष्य बनाते हैं।
जब हिंदू दर्शन कहता है कि शतरूपा शक्ति का मानवीकृत रूप हैं तो इसका भाव यह होता है कि जो शक्ति पूरे ब्रह्मांड में काम कर रही है वही एक स्त्री के रूप में हमारे सामने आकर हमें इसकी याद दिलाती है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं। वृक्षों और नदियों का अपमान करना धरती का शोषण करना या स्त्री ऊर्जा को हीन समझना इन सबका मूल में एक ही भूल है कि हमने शतरूपा को भूल दिया है।
मनु और शतरूपा की कहानी का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि पुरुष और स्त्री चेतना और प्रकृति दोनों में कोई भी ऊँचा या नीचा नहीं है। दोनों की भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं लेकिन महत्त्व में कोई कमी नहीं। एक बीज अपने आप में पूर्ण लग सकता है पर यदि उसे सही मिट्टी न मिले तो वह सूख जाएगा। मिट्टी बहुत उपजाऊ हो सकती है लेकिन यदि उसमें बीज न पड़े तो वह क्षमता बनकर ही रह जाएगी। बीज और मिट्टी के बीच जैसे बराबरी का रिश्ता है वैसे ही चेतना और शक्ति के बीच भी है।
आज के समय में हम अक्सर यह भूल जाते हैं। कभी पुरुष के अहंकार के कारण स्त्री को केवल सहायक बना दिया जाता है तो कभी प्रतिरोध में स्त्री पूरे पुरुष तत्त्व को ही अविश्वसनीय मानने लगती है। शतरूपा और मनु की कथा दोनों अतियों को शांत होकर देखने की सलाह देती है। वे दिखाते हैं कि सृष्टि का नृत्य तभी सुंदर लगता है जब दोनों अपने अपने घर में खड़े होकर एक दूसरे की भूमिका को सम्मान दें।
आज मंदिरों में जब आरती होती है तो हम अक्सर लक्ष्मी दुर्गा काली पार्वती सरस्वती जैसे नाम सुनते हैं। वे सब शक्ति के तेजस्वी और अलग अलग रूप हैं। लेकिन कहीं भीतर पूरे मानव परिवार के पीछे एक मौन सा नाम भी खड़ा है शतरूपा। वह शायद पूजा की थाली में रोज याद न की जाए लेकिन शास्त्रों और कहानियों की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि वही वह पहली स्त्री है जिसकी गोद में मानवता ने पहली सांस ली।
उन्हें भुला देने का अर्थ है अपने स्रोत को भुला देना। जब हम शतरूपा को याद करते हैं तो केवल एक देवी को नहीं बल्कि उस पूरे स्त्री तत्त्व को प्रणाम करते हैं जो माँ के रूप में धरती के रूप में प्रकृति के रूप में और हमारे भीतर छिपी संवेदनशीलता के रूप में हर जगह मौजूद है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि नारी किसी के पीछे खड़ी छाया नहीं बल्कि वह केंद्र है जिसके चारों ओर सृष्टि घूमती है।
और शायद सबसे सुंदर बात यह है कि शतरूपा की कथा हमें यह महसूस कराती है कि हम सब चाहे किसी भी देश धर्म या सभ्यता के हों अंत में एक ही आदिम माता पिता की संतान हैं। हम सब के भीतर थोड़ी सी मनु की चेतना है और बहुत सारी शतरूपा की प्रकृति जो हमें दिन रात बदलती रहती है गिराती और उठाती रहती है और हर अनुभव के साथ हमें नए रूप देती रहती है।
1 क्या शतरूपा सचमुच हिंदू धर्म में पहली स्त्री मानी जाती हैं
कई परंपरागत ग्रंथों और कथाओं में मनु को पहला पुरुष और शतरूपा को पहली स्त्री बताया गया है और इन्हें संपूर्ण मानव जाति के आदि माता पिता के रूप में स्मरण किया जाता है।
2 क्या शतरूपा ब्रह्मा की पुत्री हैं या केवल उनकी रचना
शतरूपा को अक्सर ब्रह्मा की मानस पुत्री कहा जाता है यानी वे उनके मन से जन्मी हैं। कुछ व्याख्याएँ यह भी कहती हैं कि ब्रह्मा के शरीर के स्त्री और पुरुष भाग के विभाजन से मनु और शतरूपा प्रकट हुए इसलिए वे उनकी रचना भी हैं और प्रतीक रूप में उनकी पुत्री भी।
3 ब्रह्मा के पांचवें सिर और शिव द्वारा उसे काटे जाने की कहानी को कैसे समझें
इसे शाब्दिक इतिहास की तरह नहीं बल्कि मन की यात्रा के प्रतीक के रूप में समझना अधिक सार्थक है। यह प्रसंग दिखाता है कि यदि सृजन की शक्ति भी इच्छा और आसक्ति में फँस जाए तो शिव तत्त्व यानी संतुलन और त्याग की शक्ति उसे रोकती और शुद्ध करती है ताकि धर्म बना रहे।
4 शतरूपा और शक्ति के संबंध को आधुनिक ढंग से कैसे समझें
हम कह सकते हैं कि शतरूपा वही creative energy हैं जो हर जगह काम कर रही है चाहे वह किसी कलाकार की कल्पना हो किसी माँ की गोद हो किसी वैज्ञानिक की खोज हो या प्रकृति के भीतर चल रहा विकास। वे शक्ति का वह मानवीय चेहरा हैं जो हमें याद दिलाता है कि हर सृजन के पीछे एक nurturing feminine presence होती है।
5 आज के समय में शतरूपा की कथा हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है
क्योंकि यह कहानी हमें तीन बातें याद दिलाती है पहला स्त्री ऊर्जा जीवन की मुख्य धुरी है दूसरा इच्छा और आकर्षण को भी मर्यादा और विवेक के भीतर रखना जरूरी है तीसरा सृष्टि के हर स्तर पर पुरुष और प्रकृति दोनों की बराबर साझेदारी है। यह दृष्टि रिश्तों पर्यावरण समाज और अपनी खुद की inner balance सबको देखने का तरीका बदल सकती है।
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