By पं. सुव्रत शर्मा
भगवान शिव की भक्ति और व्रत के शुभ फल

सावन मास में आने वाली सावन शिवरात्रि भगवान शिव की विशेष आराधना का अद्वितीय अवसर मानी जाती है। इस पावन रात्रि में भक्त पूरे मन से व्रत रखकर शिवलिंग पर जल, दूध और बिल्वपत्र अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन शिवरात्रि का व्रत रखने से मन के गहरे दुःख हल्के होते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख तथा सौभाग्य का द्वार खुलता है। इस दिन श्रावण मास की शिवरात्रि व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और व्रत का फल और अधिक बढ़ जाता है।
शिवपुराण में वर्णित है कि सावन मास में आने वाली शिवरात्रि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। श्रद्धा से व्रत रखने वाले जातक के दुःख और पीड़ाएं धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं। इस विशेष शिवरात्रि पर व्रत, जागरण और कथा श्रवण से शिव और माता पार्वती दोनों की कृपा एक साथ प्राप्त होती है। गृहस्थ जीवन में स्थिरता आती है। परिवार में सौभाग्य, संतोष और मानसिक संतुलन बढ़ता है।
सावन शिवरात्रि की रात में एक समय का फलाहार या केवल जल पर व्रत करने की परंपरा भी प्रचलित है। रात्रि में चार प्रहरों के अनुसार शिवलिंग पर जलाभिषेक, बिल्वपत्र और धूप दीप से पूजा की जाती है। जो भक्त इस दिन नियमपूर्वक व्रत रखकर शिवरात्रि व्रत कथा का पाठ सुनते हैं, उनके लिए यह व्रत शुभ व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है।
ऋषियों ने सूतजी से निवेदन किया कि सावन शिवरात्रि व्रत के फल, विधि और पूर्व उदाहरण को विस्तार से सुनने की इच्छा है। उन्होंने पूछा कि क्या इस व्रत को पहले किसी ने किया है और यदि किसी ने ज्ञान या अज्ञान में भी इसे कर लिया हो तो उसे क्या श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है। सूतजी बोले कि इस व्रत का स्वरूप समझाने के लिए एक निषाद के जीवन की अद्भुत कथा बताई जाएगी, जो सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाली है।
यह कथा केवल चमत्कार नहीं दिखाती बल्कि यह बताती है कि अनजाने में भी जब शिव की पूजा हो जाती है और हृदय में पश्चाताप तथा करुणा जागती है तब भी शिव कृपा से जन्म जन्मांतर के पाप कटने लगते हैं। सावन शिवरात्रि पर इस कथा का श्रवण व्रत को संपूर्ण बनाता है।
प्राचीन वन में गुरुद्रह नाम का एक पापी निषाद रहता था। वह प्रतिदिन वन में जाकर मृगों और पशुओं का वध करता था। चोरी, हिंसा और अन्य दुष्कर्म उसके लिए सामान्य बात थी। बाल्यकाल से लेकर उसने कभी भी कोई शुभ कार्य नहीं किया। धीरे धीरे उसका पूरा जीवन पापों से भर गया।
समय बीता। एक दिन शिवरात्रि की पावन रात्रि आ पहुंची। उसी दिन गुरुद्रह अपनी गर्भवती स्त्री और परिवार के लिए भोजन की तलाश में वन में निकला। पूरे दिन दौड़ता रहा परन्तु उसे कोई शिकार न मिल पाया। वह चिंतित हो उठा कि गर्भवती पत्नी को तो अवश्य भोजन देना चाहिए, अन्यथा बड़ा संकट होगा।
उसने सोचा कि किसी जलाशय के निकट बैठा जाए, वहां प्यासे पशु अवश्य आएंगे। यह विचार कर वह एक सुंदर सरोवर के पास पहुंचा और शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।
सरोवर के किनारे एक घना बेल वृक्ष खड़ा था। गुरुद्रह ने वहीं के जल से अपनी प्यास बुझाई और फिर उसी बेल के वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया, ताकि नीचे आने वाले किसी जीव पर दृष्टि रख सके। उसे यह ज्ञात नहीं था कि उस वृक्ष के नीचे भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित है।
रात्रि के प्रथम प्रहर में एक हिरनी प्यास से व्याकुल होकर सरोवर का जल पीने आई। निषाद ने उसे देखा और हर्षित होकर धनुष पर बाण चढ़ाया। जैसे ही उसने निशाना साधने के लिए हलचल की, वृक्ष से कुछ जल की बूंदें और कुछ बेलपत्र नीचे स्थित शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार बिना जाने ही प्रथम प्रहर की शिव पूजा संपन्न हो गई।
इसी क्षण शिव की कृपा से उसके भारी पापों का क्षय आरंभ हो गया। हिरनी ने धनुष की टंकार सुनकर ऊपर देखा। भयभीत होकर उसने निषाद से कहा कि आज उसके छोटे छोटे शावक घर पर हैं, अतः उन्हें अपनी बहन या पति के संरक्षण में सौंपकर लौटना चाहती है। उसने प्रतिज्ञा की कि लौटकर स्वयं को उसकी इच्छा के अनुसार समर्पित कर देगी।
गुरुद्रह पहले तो कठोर मन से मना करता रहा परन्तु हिरनी के सत्य और विनम्र वचनों से उसके मन में थोड़ी करुणा जगी। अंततः उसने हिरनी को जाने दिया। इस प्रकार पहला प्रहर व्रत, जागरण और पूजन के साथ बिना भोजन किए बीत गया।
दूसरे प्रहर में पहली हिरनी की बहन, दूसरी हिरनी भी उसे खोजती हुई जल पीने वहीं आ पहुंची। उसे देखते ही गुरुद्रह ने फिर धनुष उठाया और निशाना साधने के लिए हलचल की तो पहले की तरह बेलपत्र और जल की बूंदें शिवलिंग पर गिर पड़े। परिणामस्वरूप द्वितीय प्रहर की पूजा भी अनजाने में पूर्ण हो गई।
हिरनी ने व्याकुल होकर कहा कि वह अपने शावकों और स्वामी को सौंपने के बाद अवश्य लौटेगी। निषाद ने पहले इसे भी रोकना चाहा परन्तु वह शास्त्रों में वर्णित सत्य और धर्म की बातों से उसे आश्वस्त करती रही कि यदि वह वापस न आए तो उसे नरक में भी स्थान न मिले। इस दृढ़ वचन से गुरुद्रह ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार दूसरे प्रहर में भी वह बिना सोए जागरण करता रहा और अनजाने में ही शिव की आराधना में लगा रहा।
तीसरे प्रहर में एक हृष्ट पुष्ट मृग, जो उन दोनों हिरनियों का पति था, अपनी स्त्रियों की खोज में वहां पहुंचा। गुरुद्रह ने उसे देखा और तुरंत धनुष पर बाण चढ़ाया। जैसे ही उसने तीर ताना, बेलपत्र और जल फिर से नीचे शिवलिंग पर गिर गए और तृतीय प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई।
मृग ने शांत स्वर में पूछा कि वह क्या करना चाहता है। निषाद ने कहा कि वह अपने भूखे कुटुंब के लिए उसे मारना चाहता है। तब मृग ने उत्तर दिया कि वह धन्य है, यदि उसका शरीर किसी और के उपकार में काम आ जाए परन्तु वह अपने बच्चों और दोनों हिरनियों को विदा करके लौटना चाहता है।
गुरुद्रह ने संदेह से भरकर उसे जाने से रोका क्योंकि पहले ही दो हिरनियां लौटने का वचन देकर जा चुकी थीं। तब मृग ने अनेक शास्त्रीय प्रमाण देकर यह प्रतिज्ञा की कि यदि वह वापस न आए तो शिवरात्रि के दिन भोजन करने, असत्य प्रमाण देने और विश्वासघात जैसे पाप उससे जुड़ जाएं। इस कठोर सत्य प्रतिज्ञा के बाद निषाद ने मृग को भी जाने दिया।
समय बीता। धीरे धीरे प्रातःकाल से पूर्व चौथे प्रहर का समय आया। वही मृग, दोनों हिरनियां और उनके छोटे छोटे बच्चे सब मिलकर उस स्थान पर लौट आए। उन्होंने निश्चय किया कि जो भी नियति होगी उसे स्वीकार किया जाएगा।
उन्हें एक साथ अपने सामने देखकर व्याध के भीतर अचरज और दया दोनों साथ जाग उठे। उसने फिर धनुष पर बाण चढ़ाया और इस बार भी वृक्ष से जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। इससे चौथे प्रहर की शिव पूजा भी पूर्ण हो गई। चारों पहर का अनजाने में हुआ जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण, जागरण और व्रत मिलकर पूर्ण शिवरात्रि व्रत बन गया।
शिव कृपा से गुरुद्रह के सारे पाप भस्म होने लगे। मृग और हिरनियां उससे आग्रह कर रही थीं कि वह वचन अनुसार बाण चलाए परन्तु अब उसका अंतःकरण परिवर्तित हो चुका था। उसे लगा कि ये सभी मृग मृगियां कितने उच्च त्याग और सत्य का पालन कर रहे हैं। उसने विचार किया कि मनुष्य जन्म पाकर स्वयं ने तो केवल हिंसा और पाप ही किए हैं। उसने अपने जीवन को धिक्कारते हुए धनुष नीचे रख दिया और मृग परिवार को मुक्त कर दिया।
उसी क्षण भगवान शिव ने प्रसन्न होकर गुरुद्रह के समक्ष अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उन्होंने प्रेम से उसे स्पर्श किया और कहा कि वह इस व्रत और अनजानी पूजा से अत्यंत प्रसन्न हैं। शिवजी ने उसे वर मांगने को कहा।
निषाद भावविभोर होकर उनके चरणों में गिर पड़ा। शिव ने उसे आशीर्वाद दिया कि आगे चलकर उसके घर स्वयं श्रीराम पधारेंगे और उससे सखा भाव करेंगे। उनके संग रहकर वह दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करेगा। एक अन्य प्रसंग में यही निषाद आगे चलकर राम भक्त निषादराज गुह के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जो रामजी की सेवा कर सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करता है।
इसी प्रकार मृग और हिरनियां भी दिव्य शरीर धारण कर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए। शिवजी ने उस तीर्थ को व्याधेश्वर नाम दिया और वे अर्बुदाचल पर्वत पर सुशोभित हुए।
इस कथा के माध्यम से ऋषियों ने स्पष्ट किया कि संसार में अनेक व्रत, अनेक तीर्थ और अनेक प्रकार के दान तथा यज्ञ हैं परन्तु नियमपूर्वक की गई शिवरात्रि की साधना उनमें सर्वोत्तम मानी गई है। जो भी अपना वास्तविक हित चाहता है उसे सावन शिवरात्रि का यह व्रत अवश्य रखना चाहिए।
सावन शिवरात्रि व्रत केवल बाहरी नियम से पूर्ण नहीं होता। जागरण, जलाभिषेक और बिल्वपत्र अर्पण के साथ साथ हृदय में करुणा, सत्य और पश्चाताप जागना भी आवश्यक है। कथा में गुरुद्रह के भीतर हिंसा से संवेदना की ओर जो परिवर्तन दिखता है वही शिव साधना का वास्तविक फल है।
यह कथा सिखाती है कि मनुष्य यदि अनजाने में भी उपवास, जागरण और पूजा के माध्यम से शिव के निकट चला जाए और फिर अपने जीवन को बदलने का संकल्प ले, तो शिव उसे कभी निराश नहीं करते। सावन शिवरात्रि की रात मन को पवित्र बनाने और जीवन के मार्ग को नया मोड़ देने का श्रेष्ठ समय मानी जाती है।
सावन शिवरात्रि का व्रत क्यों रखा जाता है?
सावन शिवरात्रि व्रत भगवान शिव की कृपा पाने, पाप क्षय, मनोकामना पूर्ण होने और जीवन में सुख सौभाग्य बढ़ाने के लिए रखा जाता है।
क्या अनजाने में की गई पूजा से भी व्रत का फल मिलता है?
हाँ। गुरुद्रह निषाद की कथा से स्पष्ट है कि अनजाने में हुए जलाभिषेक और बिल्वपत्र अर्पण से भी शिव प्रसन्न होते हैं, यदि अंत में हृदय में सच्चा परिवर्तन आ जाए।
सावन शिवरात्रि पर रात्रि जागरण का क्या महत्व है?
चारों प्रहर जागरण कर शिवलिंग पर जल और बिल्वपत्र चढ़ाने से संपूर्ण शिवरात्रि व्रत का फल मिलता है और मन की चंचलता धीरे धीरे शांत होती है।
क्या इस कथा का पाठ शिवरात्रि व्रत के लिए आवश्यक माना गया है?
इस निषाद कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ व्रत को संपूर्ण बनाता है, इसलिए सावन शिवरात्रि के दिन पूजा के साथ इसे सुनना या पढ़ना श्रेष्ठ माना गया है।
शिवरात्रि को श्रेष्ठ व्रत क्यों कहा गया है?
शास्त्रों में कहा गया है कि अनेक व्रत और तीर्थ हैं परन्तु शिवरात्रि का व्रत शुभ व्रतों का राजा है, जो सच्चे साधक को मोक्ष के मार्ग तक पहुंचाने में समर्थ होता है।
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