शरद पूर्णिमा व्रत कथा और चंद्रदेव की कृपा

By पं. संजीव शर्मा

शरद पूर्णिमा व्रत का महत्व, चंद्रदेव की आशीर्वाद और सुख-समृद्धि

शरद पूर्णिमा व्रत कथा और चंद्रदेव की कृपा

शरद पूर्णिमा का व्रत चन्द्रदेव की कृपा, संतति सुख, समृद्धि और मानसिक शांति के लिए अत्यन्त मान्य माना जाता है। इस तिथि की चन्द्रप्रकाशित रात्रि को वर्ष की सबसे उजली और कोमल चाँदनी वाली रात कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा का शीतल अमृत तुल्य प्रकाश धरा पर बरसता है और श्रद्धा से व्रत, पूजन तथा चन्द्र दर्शन करने वालों पर विशेष अनुग्रह बरसता है।

इस व्रत में प्रातःकाल शुद्ध आचरण का संकल्प लेकर दिन भर संयम रखा जाता है। सन्ध्या के समय चन्द्रमा के उदय पर अर्घ्य अर्पित किया जाता है और निहारते हुए जीवन के दुःख दोषों के क्षय तथा सौभाग्य की वृद्धि की प्रार्थना की जाती है। व्रत के पालन में स्थिरता, श्रद्धा और पूर्णता को विशेष महत्व दिया गया है, जिसका सुंदर संकेत दो बहनों की शरद पूर्णिमा व्रत कथा में मिलता है।

शरद पूर्णिमा व्रत के मुख्य संकेत

विषय अर्थ और संकेत
प्रमुख देवता चन्द्रदेव और उनकी शीतल कृपा
मुख्य उद्देश्य संतति सुख, सौभाग्य, शांति और समृद्धि
व्रत का मूल भाव पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन और व्रत की पूर्णता
विशेष कर्म चन्द्रमा को अर्घ्य, रात्रि जागरण, कृतज्ञता

दो बहनों की शरद पूर्णिमा व्रत कथा

एक गाँव में एक साहूकार रहता था जिसकी दो बेटियाँ थीं। दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत तो करती थीं, लेकिन उनके मन की भावना और व्रत के प्रति दृष्टि भिन्न थी। बड़ी बहन अत्यन्त पवित्र, धर्मनिष्ठ और व्रत के नियमों के प्रति सजग थी।

वह शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे श्रद्धा भाव और विधि से करती थी। सन्ध्याकाल में चन्द्रदेव के उदय पर जल से अर्घ्य अर्पित करती, फिर प्रार्थना और पूजा उपरान्त ही अपना व्रत खोलती थी। वह कभी भी व्रत को अधूरा नहीं छोड़ती, न बीच में तोड़ती और न ही लापरवाही से निभाती।

दूसरी ओर छोटी बहन व्रत के प्रति उदासीन थी। वह केवल नाम मात्र के लिए पूर्णिमा का व्रत करती थी। न तो उसके भीतर विशेष श्रद्धा थी, न नियमों के प्रति सतर्कता। वह अपना व्रत पूरा किये बिना ही तोड़ देती, कभी समय से पहले कुछ खा लेती, कभी व्रत के नियम को हल्के में ले लेती।

शरद पूर्णिमा व्रत का फल और दोनों का वैवाहिक जीवन

समय बीतने के साथ दोनों बहनें युवावस्था में पहुँचीं। साहूकार ने उचित समय पर दोनों का विवाह कर दिया। विवाह के बाद जीवन की वास्तविक परख आरम्भ हुई। बड़ी बहन के घर स्वस्थ और दीर्घायु शिशुओं का जन्म हुआ। घर में हँसी, आनंद और संतोष का वातावरण दिखाई देने लगा।

इसके विपरीत छोटी बहन के जीवन में एक गहरी पीड़ा जन्मी। उसे संतान तो प्राप्त होती, पर प्रत्येक शिशु जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता। प्रत्येक प्रसव के बाद थोड़ी ही देर में शिशु का प्राण चले जाना उसके लिए असहनीय दुःख बन गया। बार बार इस अनुभव ने उसके मन को तोड़ दिया और वह अपने दुर्भाग्य का कारण खोजने लगी।

छोटी बहन की पीड़ा और संत के पास जाना

बारंबार शिशुओं की मृत्यु से व्यथित होकर छोटी बहन ने किसी संत का आश्रय लिया। वह आँसुओं से भरी आँखों के साथ संत के पास पहुँची और अपने जीवन के दुःख, सूने आँगन और बार बार संतान हानि के बारे में बताने लगी।

संत ने धैर्य से उसकी बात सुनी और उसके जीवन की आदतों, व्रतों और आचरण का संकेत पूछकर स्थिति समझी। उन्हें सूक्ष्म रूप से यह स्पष्ट हो गया कि छोटी बहन शरद पूर्णिमा सहित पूर्णिमा व्रतों को केवल औपचारिकता की तरह निभाती रही थी। न मन में भक्ति, न नियमों की सावधानी और न ही व्रत की पूर्णता का आदर।

संत ने समझाया कि व्रत केवल नाम का न होकर श्रद्धा और समर्पण के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधूरा, उपेक्षित और बिना भक्ति वाला व्रत शुभ फल देने के स्थान पर जीवन में अव्यवस्था और बाधाएँ बढ़ा सकता है। यदि छोटी बहन सच्चे मन से, पूरे विधि विधान के साथ व्रत करेगी, तो चन्द्रदेव की कृपा से उसका अशुभ समय बदल सकता है।

त्रुटि का स्वीकार और नये भाव से शरद पूर्णिमा व्रत

संत के वचनों से छोटी बहन की आँखें खुल गईं। उसे अनुभव हुआ कि वह अब तक केवल दिखावे में, बिना मन से जुड़कर व्रत करती रही थी। उसने मन ही मन संकल्प लिया कि अब आने वाली शरद पूर्णिमा पर व्रत को पूरी श्रद्धा, शुचिता और विधि से करेगी।

जब अगली शरद पूर्णिमा आई तो छोटी बहन ने दिन भर संयम रखकर नियमपूर्वक व्रत किया। सन्ध्या समय चन्द्रमा के उदय पर अर्घ्य अर्पित किया, प्रार्थना की, कथा स्मरण की और व्रत को यथाविधि पूर्ण किया। इस बार उसके मन में लापरवाही नहीं बल्कि समर्पण और श्रद्धा का भाव था।

कुछ समय बाद ईश्वरीय कृपा से उसे पुनः गर्भ प्राप्त हुआ। शरद पूर्णिमा के व्रत और तप के बल से उसका हृदय आशा से भर गया। जब प्रसव का समय आया तो उसने एक चिर प्रतीक्षित शिशु को जन्म दिया।

नवजात शिशु की मृत्यु और छोटी बहन की योजना

किन्तु दुर्भाग्य से वही पुरानी पीड़ा दोबारा सामने आ गयी। जन्म के तुरंत बाद यह शिशु भी प्राण त्याग बैठा। छोटी बहन का मन क्षण भर के लिए टूट गया, पर उसके भीतर एक आशा की किरण अभी भी थी।

उसे यह भली भाँति ज्ञात था कि उसकी बड़ी बहन शरद पूर्णिमा का व्रत बचपन से ही अटूट श्रद्धा से करती आ रही है और उस पर चन्द्रदेव की विशेष कृपा है। उसे विश्वास था कि बड़ी बहन के स्पर्श से, चन्द्रमा की कृपा के माध्यम से, उसके शिशु को जीवन वापस मिल सकता है।

छोटी बहन ने एक विचार किया। उसने शिशु के मृत शरीर को स्नान कराकर स्वच्छ कपड़े से ढक दिया और उसे एक छोटी सी शैया पर लिटा दिया। फिर उसने किसी सामान्य से कारण के बहाने अपनी बड़ी बहन को अपने घर बुलाया और आतिथ्य के लिए आग्रह किया।

बड़ी बहन का स्पर्श और शिशु का पुनर्जीवन

जब बड़ी बहन घर आई तो छोटी बहन ने उस शैया पर बैठने का निवेदन किया, जिस पर शिशु का शरीर कपड़े से ढका हुआ रखा था। बड़ी बहन को यह ज्ञात नहीं था कि वहाँ क्या रखा है। वह जैसे ही बैठने के लिए उस पलंग की ओर बढ़ी, उसके वस्त्र उस ढके हुए शिशु के शरीर को हल्के से स्पर्श कर गए।

चमत्कारिक रूप से उसी क्षण शिशु ने रोना शुरू कर दिया। मृत समझा जाने वाला शिशु जीवित हो उठा। बड़ी बहन यह दृश्य देखकर चकित रह गई। उसने तुरंत छोटी बहन को इतनी लापरवाही से शिशु को बिस्तर पर अकेला छोड़ देने के लिए डाँटा।

उस समय छोटी बहन ने सच बताकर कहा कि शिशु जन्म के समय ही मर चुका था और वह यह आशा लेकर बैठी थी कि बड़ी बहन के स्पर्श और उसके द्वारा किए गए शरद पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से शिशु को पुनः जीवन मिल सके। यही हुआ और यह केवल चन्द्रदेव की कृपा और पूर्ण श्रद्धा से किए गए व्रत की शक्ति का परिणाम था।

शरद पूर्णिमा व्रत की परंपरा का प्रसार

इस घटना के बाद दोनों बहनों के घर और परिवार में शरद पूर्णिमा व्रत की महिमा और भी प्रखर हो गयी। बड़ी बहन के दृढ़ व्रत, चन्द्र कृपा और छोटी बहन के पश्चाताप सहित नये संकल्प से किए गए व्रत की शक्ति का प्रसंग धीरे धीरे गाँव, नगर और समाज में फैल गया।

लोगों ने समझा कि शरद पूर्णिमा का व्रत केवल एक परंपरा नहीं बल्कि जीवन में शुभ फल और संतति सुख के लिए एक सशक्त साधन है। तब से शरद पूर्णिमा पर श्रद्धा, संयम और विधि से व्रत रखने, चन्द्रमा को अर्घ्य देने और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करने की परंपरा आरम्भ हुई और समय के साथ अधिक लोकप्रिय होती गयी।

आज भी शरद पूर्णिमा की चन्द्रमयी रात में अनेक घरों में व्रत, कथा और चन्द्रदर्शन की परंपरा निभाई जाती है। दो बहनों की यह कथा इस बात का स्मरण कराती है कि व्रत का सार केवल नियमों की संख्या नहीं बल्कि हृदय की सत्यनिष्ठा और पूर्णता में छिपा रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरद पूर्णिमा व्रत में चन्द्रमा को अर्घ्य देना क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
चन्द्रमा को अर्घ्य देना उनकी शीतल कृपा को स्वीकार करने और जीवन के क्लेश, तनाव तथा दुःख को दूर करने की प्रार्थना का प्रतीक है। इस अर्घ्य में कृतज्ञता, नम्रता और सौभाग्य की कामना एक साथ जुड़ी रहती है।

कथा में छोटी बहन के जीवन में बार बार संतान हानि का कारण क्या बताया गया है?
कथा के अनुसार छोटी बहन पूर्णिमा का व्रत केवल नाम मात्र के लिए करती थी। वह व्रत को अधूरा छोड़ देती थी और उसके प्रति श्रद्धा या अनुशासन नहीं रखती थी। इसी कारण उसके जीवन में दुर्भाग्य और संतति हानि का अनुभव बारंबार हुआ।

संत ने छोटी बहन को कौन सी मुख्य सलाह दी थी?
संत ने कहा कि व्रत को औपचारिकता न बनाकर पूरे मन, श्रद्धा और नियमों के साथ पालन करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वह शरद पूर्णिमा का व्रत पूर्ण समर्पण से करेगी तो चन्द्रदेव की कृपा से उसका अशुभ समय समाप्त हो सकता है।

शिशु के पुनर्जीवन का कारण किस रूप में समझाया गया है?
कथा कहती है कि बड़ी बहन के वस्त्रों के स्पर्श से, जो शरद पूर्णिमा व्रत की शक्ति और चन्द्र कृपा से ओतप्रोत थे, मृत शिशु पुनः जीवित हो गया। यह व्रत की सत्यनिष्ठा और चन्द्रदेव के आशीर्वाद की संयुक्त प्रभावशीलता का संकेत है।

शरद पूर्णिमा व्रत से साधक को क्या शिक्षा मिलती है?
यह व्रत सिखाता है कि किसी भी साधना या व्रत में वास्तविक फल श्रद्धा, समर्पण और पूर्णता से आता है। आधे अधूरे व्रत के स्थान पर थोड़े व्रत सही भाव से करना अधिक कल्याणकारी है। शरद पूर्णिमा की कथा हृदय की सच्चाई और नियम की दृढ़ता को ही सच्चा साधन मानती है।

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पं. संजीव शर्मा

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