By पं. नीलेश शर्मा
गीता के आठवें अध्याय में शुक्ल और कृष्ण पक्ष से जुड़ी जीवन-मरण मार्ग की व्याख्या

उपनिषदों को चारों वेदों का सार और भगवद्गीता को उपनिषदों का सार कहा गया है। गीता केवल दर्शन नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच चलने वाले सूक्ष्म मार्गों का भी संकेत देती है। गीता के आठवें अध्याय में एक गहन बात कही गई है कि शुक्ल पक्ष, उत्तरायण और ज्योतिर्मय मार्ग में देह त्याग करने वाला योगी वापस जन्म नहीं लेता, जबकि कृष्ण पक्ष, दक्षिणायन और धूममार्ग से जाने वाला पुनः लौट आता है।
गीता का यह विषय समझने से पहले इन शब्दों की सरल व्याख्या आवश्यक है, ताकि बात केवल शास्त्रीय उद्धरण तक सीमित न रह जाए।
हिंदू मास और चंद्र पक्ष।
परंपरा में शुक्ल पक्ष को देवताओं का दिन और कृष्ण पक्ष को पितरों का दिन कहा जाता है।
सूर्य के संदर्भ में।
यही चार स्थितियाँ गीता के श्लोकों में एक साथ जुड़कर दो मार्गों की व्याख्या करती हैं।
गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मृत्यु के समय जाने वाले योगियों के लिए दो प्रकार के मार्ग बताए गए हैं। इन्हें समझाने के लिए पहले वे काल शब्द का प्रयोग करते हैं, फिर स्पष्ट रूप से दो मार्गों की चर्चा करते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह काल या मार्ग बताऊँगा जिसमें देह त्याग करने वाले योगी अनावृत्ति को प्राप्त होते हैं, अर्थात वापस नहीं लौटते।
फिर श्लोक में इस मार्ग के प्रतीक बताए गए हैं।
जो श्रेष्ठ ब्रह्मविद योगी इन स्थितियों के अनुकूल समय और मार्ग से देह छोड़ते हैं, वे देवताओं द्वारा क्रमशः आगे बढ़ाए जाते हुए ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इस मार्ग को ही देवयान या शुक्ल गती कहा गया, जहाँ से वापस जन्म लेना नहीं होता।
इसके बाद गीता में दूसरे मार्ग का वर्णन है, जिसमें।
इस मार्ग से जाने वाला योगी चंद्र लोक की ज्योति को प्राप्त होता है। यहाँ वह अपने सकाम कर्मों के शुभ फल भोगता है और जब वह फल समाप्त हो जाता है तब वापस लोकों में लौट आता है। इस मार्ग को पितृयान या कृष्ण गती कहा गया, जहाँ से पुनर्जन्म निश्चित है।
गीता स्पष्ट कहती है कि ये दो मार्ग, शुक्ल और कृष्ण, जगत की शाश्वत गतियाँ मानी गई हैं।
यहाँ स्पष्ट है कि बात साधारण व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि योगी, ध्यानी और ब्रह्मविद के लिए है।
यह स्वाभाविक प्रश्न है। हर दिन, हर पक्ष और हर काल में असंख्य लोग देह छोड़ते हैं।
फिर क्या सभी शुक्ल पक्ष में मरने वालों को मोक्ष मिल जाता है और क्या कृष्ण पक्ष में मरने वाले सबको पुनर्जन्म लेना ही पड़ता है।
शास्त्रों की दृष्टि से इसका उत्तर स्पष्ट है। गीता का यह सिद्धांत सभी के लिए समान रूप से लागू नियम नहीं बल्कि विशेष प्रकार के साधकों के लिए संकेत है।
गीता का यह कथन मुख्य रूप से तीन प्रकार के साधकों के लिए समझा जाता है।
इनके लिए मृत्यु केवल शरीर छोड़ना नहीं बल्कि उस मार्ग के चयन की भी स्थिति है जहाँ उनकी साधना उन्हें ले जाती है। उनके लिए मृत्यु का समय, आंतरिक अवस्था, प्राण की दिशा और देवताओं की सहायता सब मिलकर यह तय करते हैं कि वे किस मार्ग से जाएँगे।
साधारण व्यक्ति, जो न तो विशेष योग साधना में रत रहा और न ही ब्रह्म ज्ञान में स्थित रहा, उसके लिए केवल शुक्ल पक्ष में मरना ही मुक्तिदायक नहीं हो जाता। वह अपने कर्मों के अनुसार शीघ्र ही पुनर्जन्म की ओर बढ़ जाता है।
जो व्यक्ति पाप कर्म में गहरे फँसे हुए हैं, जिनका मन अत्यधिक आसक्त या दूषित है, उनके लिए भी तुरंत पुनर्जन्म का मार्ग सरल नहीं होता।
इसके बाद उनका जन्म कभी कभी निचली योनियों में भी हो सकता है, जो एक प्रकार से आध्यात्मिक दृष्टि से डिमोशन है, क्योंकि मनुष्य योनि से नीचे जाना माना गया। इस तरह गीता के कथन से यह स्पष्ट है कि मुक्ति और पुनर्जन्म का प्रश्न केवल पक्ष से नहीं बल्कि कुल मिलाकर कर्म और साधना से तय होता है।
गीता जिन शुक्ल और कृष्ण मार्गों की बात करती है, उन्हें समझने के लिए चंद्र पक्ष की साधारण परिभाषा भी उपयोगी है।
शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या होती है।
परंपरा में।
गीता इन सब प्रतीकों को जोड़कर साधक को यह संकेत देती है कि यदि साधना की दिशा प्रकाशमय, उर्ध्वगामी और शुद्ध हो जाए, तो उसका अंत समय भी उसे ऐसे मार्ग की ओर ले जाएगा जहाँ से वापस लौटना नहीं पड़ेगा।
साधारण जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए इस पूरे विषय का सार यह है कि।
इसलिए गीता का संदेश यह है कि व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन में ही ऐसा मार्ग चुने कि मृत्यु चाहे जब भी आए, भीतर की चेतना ऐसी हो जो उसे प्रकाशमय दिशा की यात्रा पर ले जा सके।
क्या हर वह व्यक्ति जो शुक्ल पक्ष में मरता है, मोक्ष प्राप्त कर लेता है
नहीं, गीता का कथन सामान्य व्यक्तियों के लिए यांत्रिक नियम नहीं है। यह विशेष रूप से उन योगियों, ध्यानी और ब्रह्मविदों के लिए है जिनकी साधना पूर्ण हो चुकी हो। आम व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म लेता है।
कृष्ण पक्ष में मरने वाला हर व्यक्ति अवश्य ही लौटता है क्या
कृष्ण पक्ष का मार्ग मूलतः पितृयान और कर्मफल भोग की प्रक्रिया से जुड़ा है। सामान्यतः यहाँ पुनर्जन्म की संभावना बताई गई है, लेकिन यह भी व्यक्ति के कर्म, भाव और अंत समय की चेतना पर निर्भर रहता है।
भीष्म ने शुक्ल पक्ष और उत्तरायण का इंतजार क्यों किया
भीष्म जैसे महायोगी को वरदान था कि वे इच्छानुसार देह त्याग कर सकते हैं। उन्होंने उत्तरायण और शुक्ल पक्ष की प्रतीक्षा इसलिए की क्योंकि यह काल देवयान मार्ग और उर्ध्वगामी गति का प्रतीक माना जाता है।
भूत प्रेत या निचली योनि में जाने का कारण क्या माना गया है
जब किसी का मन अत्यधिक पाप, आसक्ति या क्रोध में फँसा हो और मृत्यु के समय भी वह शांति में न हो, तो उसका सूक्ष्म शरीर भटक सकता है। ऐसी स्थिति में भूत, प्रेत जैसी अवस्थाएँ आती हैं। यह सब उसके अपने कर्म और मनःस्थिति का परिणाम है।
एक साधारण साधक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु क्या है
सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जीवन में ईमानदारी, भक्ति, सजगता और साधना का अभ्यास किया जाए। यदि भीतर की दिशा शुद्ध हो, तो मृत्यु का समय और पक्ष अपने आप उसके लिए अनुकूल मार्ग बना देता है, चाहे वह शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष।
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