By पं. सुव्रत शर्मा
अमर आत्माओं से मिलने वाली जीवन और धर्म की गहन शिक्षा

सनातन धर्म की खूबसूरती यह है कि उसके लिए समय केवल आगे बढ़ने वाली रेखा नहीं, एक जीवित स्मृति है। हर युग अपने भीतर कुछ पात्रों की छाप लेकर चलता है। कुछ नाम इतिहास की किताबों तक सीमित हो जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिनकी उपस्थिति युगों के पार महसूस की जाती है। इन्हें ही चिरंजीवी कहा गया है।
चिरंजीवी का अर्थ केवल यह नहीं कि वे मरते नहीं। इसका अर्थ यह भी है कि उनकी कथा, उनके गुण और उनका प्रभाव समय के पार जाकर भी मनुष्य को दिशा देते रहते हैं। ऐसा मान लिया जाता है कि आठ प्रमुख चिरंजीवी हैं, जिनके नाम सुनते ही अलग-अलग गुणों की याद आती है - भक्ति, अनुशासन, ज्ञान, संयम, त्याग, साहस और नैतिकता।
इन आठ चिरंजीवियों को यदि केवल पौराणिक चरित्र मानकर छोड़ दिया जाए तो कथा अधूरी रह जाती है। इन्हें जीवित आदर्श की तरह देखने पर उनके भीतर छुपी सीखें आज के जीवन से सीधी जुड़ती हैं।
कल्पना कीजिए, एक ऐसा योद्धा जिसे पर्वत उठाने की शक्ति हो, जिसे आकाश में उड़ने की क्षमता हो, जिसके एक हुंकार से शत्रु सेनाएं कांप उठें। वही योद्धा स्वयं को केवल “रामदूत” कहकर परिचय दे। यही हनुमान हैं।
हनुमान जन्म से ही विलक्षण थे। बचपन में उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने की कोशिश की। देवताओं ने उन्हें अनेकों वरदान दिए। पर उनकी असली महानता उस शक्ति में नहीं, उस विनम्रता में है जिसके कारण वे कभी स्वयं को केंद्र में नहीं लाए। सीता की खोज हो, लंका दहन हो, लक्ष्मण की प्राण रक्षा हो - हर जगह उन्होंने अपना सर्वस्व लगा दिया, लेकिन श्रेय राम के चरणों में रख दिया।
उनकी कथा यह सिखाती है कि भक्ति केवल मंत्र जपने का नाम नहीं है। भक्ति वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी शक्ति को ईश्वर की सेवा में लगाता है। हनुमान के भीतर इतनी सामर्थ्य थी कि वे अकेले ही रावण से युद्ध कर सकते थे, फिर भी उन्होंने स्वयं को सेना का एक सेवक माना। आज के समय में, जब थोड़ी सी सफलता भी मन में अहंकार भर देती है, हनुमान यह याद दिलाते हैं कि जितनी ऊंचाई बढ़े, उतनी ही नम्रता जरूरी हो जाती है।
परशुराम के हाथ में परशु है, आंखों में तप की ज्वाला और भीतर एक ऐसा संकल्प जो अन्याय को स्वीकार नहीं कर सकता। उन्हें केवल “क्रोधी” कह देना सरल है, लेकिन उनकी कथा के पीछे गहरी तपस्या छुपी है।
क्षत्रियों के अत्याचारों से जब पृथ्वी कांपने लगी तब परशुराम ने हथियार उठाए। उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं था। वह अधर्म के विरुद्ध था। फिर भी, उनकी कथा यह भी दिखाती है कि धर्म के नाम पर चला कोई भी अति अंततः नई संतुलन की मांग करती है। परशुराम स्वयं भी समय के साथ शस्त्र त्याग कर तप में लौटते हैं।
उनका जीवन सिखाता है कि क्रोध अपने आप में न अच्छा है, न बुरा। वह सही दिशा में लगे तो अन्याय के विरुद्ध खड़ा करने वाला बल बन जाता है और यदि अहंकार से मिला हुआ हो तो विनाश का कारण भी बन सकता है। आधुनिक जीवन में, जब अन्याय देखकर भी लोग “हमसे क्या” कहकर चुप हो जाते हैं, परशुराम याद दिलाते हैं कि कुछ युद्ध ऐसे होते हैं जिन्हें टालना नहीं, सही दिशा देनी होती है।
वेदव्यास का नाम आते ही आंखों के सामने एक शांत, गंभीर ऋषि की छवि उभरती है, जो नदी किनारे बैठे हैं, सामने शिष्य है और वे शब्दों के माध्यम से युगों को जोड़ने वाला पुल बना रहे हैं। वे वही हैं जिन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत जैसी विशाल कथा को संकलित किया और पुराणों के माध्यम से जटिल सत्य को सरल कहानियों में पिरो दिया।
उनके बिना ज्ञान केवल कुछ ऋषि मुनियों की स्मृति तक सीमित रह सकता था। उन्होंने उसे लिखित और श्रुति दोनों परंपराओं में व्यवस्थित किया। वेदव्यास का “अमरत्व” इस बात में दिखता है कि आज भी जब कोई गीता का श्लोक पढ़ता है, कोई महाभारत का प्रसंग सुनता है, तो अनजाने ही वेदव्यास की दी हुई धरोहर से जुड़ता है।
वे यह सिखाते हैं कि ज्ञान केवल अपने पास रखने की वस्तु नहीं, जिम्मेदारी है। आज के युग में, जब जानकारी बहुत है लेकिन समझ कम, वेदव्यास याद दिलाते हैं कि सच्चा ज्ञान वही है जो आने वाली पीढ़ियों के जीवन को आसान और सार्थक बना सके।
अश्वत्थामा की कथा सुनते समय मन में करुणा और भय दोनों उत्पन्न होते हैं। वे महान योद्धा थे, द्रोणाचार्य के पुत्र थे और धर्म की बारीक समझ रखने वाले घर में पले थे। लेकिन युद्ध के अंतिम दिनों में क्रोध ने उनके विवेक पर ऐसा पर्दा डाला कि वे सोते हुए पांडवों का संहार करने निकल पड़े। प्रतिशोध की आग ने उन्हें इतना अंधा कर दिया कि उन्होंने बच्चों तक को नहीं छोड़ा।
उस क्षण में किया गया कर्म इतना गंभीर था कि उन्हें जो “अमरत्व” मिला, वह वरदान नहीं, श्राप बन गया। उनके घाव कभी भरते नहीं, उनकी व्यथा कभी पूरी नहीं बुझती। वे अस्तित्व में बने रहते हैं, पर शांति से दूर।
उनकी कथा यह चेतावनी देते हुए चलती है कि शक्तिशाली होना अपने आप में सौभाग्य नहीं है तब तक जब तक वह शक्ति विवेक और करुणा की छत्रछाया में न हो। भावनाओं के प्रवाह में एक क्षण की अति कभी-कभी पूरे जीवन को नहीं, कई युगों को दंड में बदल सकती है।
कृपाचार्य महाभारत की कथा में कई बार सामने होकर भी ध्यान से छूट जाते हैं। वे दोनों पक्षों के शस्त्र गुरु हैं। उन्होंने कौरवों को भी शिक्षा दी, पांडवों को भी। युद्ध के समय वे कौरव पक्ष में रहे, लेकिन भीतर बैठा धर्मबोध बुझा नहीं।
उनकी चिरंजीविता यह दिखाती है कि कुछ लोग किसी एक पक्ष का झंडा उठाने के लिए नहीं जन्मते बल्कि समय के साक्षी बनने के लिए आते हैं। वे यह याद दिलाने के लिए उपस्थित रहते हैं कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, अपने कार्य में ईमानदारी और निष्ठा संभव है।
आज के दौर में, जब कार्यस्थल पर पक्षपात, निजी लाभ और डर अक्सर नैतिकता से बड़ा स्थान पा लेते हैं, कृपाचार्य की उपस्थिति यह सिखाती है कि अपने काम में स्वच्छ रहना भी एक प्रकार की आध्यात्मिक साधना है।
राजा बलि की कथा में वैभव, पराक्रम और विनम्रता तीनों एक साथ मिलते हैं। वे पराक्रमी दैत्य राजा थे, जिनका शासन न्यायपूर्ण और उदार माना जाता था। उनके यश से देवगण तक प्रभावित थे। जब विष्णु वामन रूप में उनके यज्ञ में आए और तीन पग भूमि मांगी, बलि ने बिना झिझक स्वीकृति दी।
जब पृथ्वी और आकाश भर गए और तीसरे पग के लिए स्थान न बचा तब बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। उन्होंने सत्ता छोड़ दी, पर वचन नहीं तोड़ा। यही समर्पण उन्हें चिरंजीवी बनाता है।
राजा बलि बताते हैं कि नेतृत्व का मूलाधार “मैं कितना ले सकता हूं” नहीं, “मैं कितना दे सकता हूं” होना चाहिए। आधुनिक राजनीति और प्रबंधन में यह दृष्टि शायद सबसे अधिक आवश्यक है।
मार्कंडेय की कथा में एक छोटे से बालक की छवि है, जिसके जीवन की आयु सीमित कर दी गई है, लेकिन जिसके हृदय में भक्ति की लौ बुझने का नाम नहीं लेती। जब मृत्यु का समय आया, तो वह शिवलिंग से चिपक गया और पूरी निष्ठा से प्रार्थना करने लगा। काल का दूत आया, फंदा डाला, किंतु उस क्षण शिव स्वयं प्रकट हुए। मृत्यु का विधान वहीं बदल गया।
मार्कंडेय चिरंजीवी हुए, पर उनकी अमरता केवल शरीर तक सीमित मानना उचित नहीं। उनकी वास्तविक अमरता उस भाव में है कि जब सब दिशाएं बंद लगें तब भी कोई भीतर से कह सके - “अभी एक दरवाजा बाकी है और वह विश्वास है।”
आज जब निराशा, तनाव और भय लोगों को भीतर से खा रहे हैं, मार्कंडेय की कथा इस भरोसे को जीवित करती है कि अंतिम क्षण तक भी उम्मीद और प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती।
लंका के स्वर्ण महल में, रावण की सभा में बैठा एक व्यक्ति लगातार विरोध की आवाज़ उठा रहा था। वह विभीषण थे। रावण के छोटे भाई, लेकिन सत्य के बड़े पक्षधर। उन्होंने बार-बार रावण को समझाया कि सीता का अपहरण धर्म के विरुद्ध है। रावण नहीं माना। अंततः विभीषण ने अपना घर, अपना कुल, अपनी सुविधा सब छोड़कर राम का साथ चुना।
कई लोग उन्हें “देशद्रोही” भी कह सकते हैं, लेकिन रामायण उन्हें धर्म के पक्ष में खड़े होने वाला साहसी मनुष्य दिखाती है। विभीषण यह सिखाते हैं कि कभी-कभी सही निर्णय का मतलब सब कुछ छोड़ देना होता है - अपना समूह, अपना परिवार, अपनी सुरक्षा। परंतु यदि अंतरात्मा स्पष्ट हो, तो यह त्याग भीतर गहरी शांति लाता है।
आज जब लोग अक्सर यह सोचकर समझौता कर लेते हैं कि “सब ऐसे ही करते हैं,” विभीषण याद दिलाते हैं कि बहुमत हमेशा सत्य के पक्ष में नहीं होता।
आठ चिरंजीवी किसी गुफा में छुपकर बैठे हुए अमर प्राणियों की सूची भर नहीं हैं। वे उन गुणों के प्रतीक हैं जो मृत नहीं होते - भक्ति, साहस, त्याग, ज्ञान, अनुशासन, ईमानदारी, करुणा और सत्यनिष्ठा। जब भी कोई मनुष्य इन गुणों को अपने आचरण में उतारता है, चिरंजीवी वहीं उपस्थित हो जाते हैं।
हनुमान हर उस क्षण में प्रकट होते हैं जब कोई व्यक्ति अपनी ताकत को सेवा में लगाता है।
परशुराम हर उस आवाज़ में हैं जो अन्याय के सामने खामोश नहीं रहती।
वेदव्यास हर उस प्रयास में हैं जिसमें कोई अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित करता है।
अश्वत्थामा की याद हर उस क्षण में आती है जब कोई गुस्से में हद पार करने लगता है।
कृपाचार्य उस व्यक्ति में हैं जो सिस्टम के भीतर रहकर भी अपनी नैतिकता बचाए रखता है।
बलि हर उस निर्णय में हैं जिसमें किसी पद से अधिक मूल्य समर्पण का हो।
मार्कंडेय उस सांस में हैं जहां निराशा के बीच भी विश्वास जिंदा रहे।
विभीषण उस अकेली आवाज़ में हैं जो भीड़ के विरुद्ध जाकर भी सही का साथ देती है।
1. चिरंजीवी किसे कहा जाता है?
ऐसी आत्मा या ऐसा आदर्श, जिसका प्रभाव केवल जीवनकाल तक सीमित न रहे बल्कि युगों तक मनुष्य के विचार और आचरण को दिशा देता रहे।
2. क्या चिरंजीवी वास्तव में आज भी पृथ्वी पर हैं?
शास्त्र उन्हें काल से परे उपस्थित बताते हैं। व्यावहारिक रूप से उनका जीवित होना उनके गुणों के जीवित रहने के रूप में समझा जा सकता है।
3. चिरंजीवियों से सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा क्या मिलती है?
यह कि धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं बल्कि हर छोटे बड़े निर्णय में ईमानदारी, साहस और करुणा को चुनना ही असली धर्म है।
4. अश्वत्थामा को अमरत्व दंड क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनके अमरत्व में शांति नहीं, निरंतर पीड़ा है, जो यह स्मरण कराती है कि क्रोध में किया गया अधर्म कितनी दूर तक परिणाम देता है।
5. क्या हम भी चिरंजीवियों जैसे गुण अपना सकते हैं?
हां। यही इन कथाओं का उद्देश्य है - कि हम अपनी सीमित जिंदगी में ऐसे निर्णय लें कि उनके गुण हमारे माध्यम से आगे आने वाले जीवनों तक पहुंच सकें।
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