By अपर्णा पाटनी
विशाल विघ्नहर्ता के चरणों में बैठा छोटा चूहा यह दिखाता है कि जिसे हम तुच्छ समझते हैं वही मन और कर्म को साधने की सबसे बड़ी कुंजी बन सकता है

मंदिरों में जब हम गणेश जी की मूर्ति देखते हैं तो अक्सर हमारा ध्यान उनके बड़े पेट हाथों में लिए हुए शस्त्रों और मोदक की ओर जाता है। परंतु ज़रा नीचे देखें तो एक छोटा-सा चूहा उनके चरणों के पास बैठा दिखाई देता है कभी उनके वाहन के रूप में कभी प्रार्थना करते हुए। पहली नज़र में यह दृश्य विचित्र लगता है इतना शक्तिशाली देवता और इतना छोटा वाहन। पर पुराणों और प्रतीकों की भाषा में यह संयोजन हमारे लिए गहरी आध्यात्मिक सीख छुपाए बैठा है।
चूहा हमारे चंचल मन अनियंत्रित इच्छाओं और छोटे-छोटे स्वार्थों का प्रतीक माना गया है। वही चूहा जब गणेश जी का वाहन बनता है तो यह बताता है कि सच्चा “विघ्नहर्ता” वह है जो बाहरी दुनिया से पहले अपने भीतर के विकारों पर बैठना सीख जाए। बड़ा देवता छोटे वाहन पर बड़े ज्ञान का छोटा रूपक बन जाता है।
कथा आती है कि एक बार मुषिक नामक एक बलवान असुर ऋषियों और साधकों को सताने लगा। वह कभी छोटा कभी बड़ा हो जाता कहीं भी घुस जाता और जिसके जीवन में जाता वहाँ अशांति फैला देता। देवताओं ने गणेश जी से सहायता माँगी। गणेश जी ने उसे सहजता से वश में कर लिया और जब वह पश्चात्ताप कर झुक गया तो उसे मारने के बजाय अपना वाहन बना लिया।
यह कथा दिखाती है कि मुषिक असुर में जो प्रवृत्ति थी वही हमारे भीतर भी है आकार बदलता अहंकार कभी छोटा दिखता कभी बड़ा हो जाता और अवसर मिलते ही हर जगह घुस जाता। जब यह प्रवृत्ति भगवान के चरणों में आत्मसमर्पण कर देती है तो वह नष्ट नहीं होती बल्कि सेवा का माध्यम बन जाती है। गणेश जी का चूहे पर बैठना इस परिवर्तन का चित्र है जहाँ अनियंत्रित शक्ति नियंत्रित साधन बन जाती है।
यह हमें सिखाता है कि हमारे भीतर की ऊर्जा चाहें कितनी ही अस्त-व्यस्त क्यों न हो यदि वह सही दिशा में लग जाए तो वही हमें आगे ले जा सकती है। प्रश्न ऊर्जा का नहीं उसके स्वामी का है।
चूहा तेज चंचल हमेशा कुछ न कुछ ढूँढते रहने वाला जीव है। वह अंधेरे कोनों में भी घुस जाता है रास्ता खोज लेता है और जहाँ मौका मिले कुछ न कुछ कुतर देता है। हमारे विचार भी कुछ ऐसे ही हैं एक से दूसरे विषय पर दौड़ते हुए कभी बिना वजह चिंता में कभी बिना सोचे आकर्षण में कभी छोटी-छोटी बातों में गुस्से में।
चूहा बिना भेदभाव के जो भी मिलता है खाने की कोशिश करता है जैसे हमारी इच्छाएँ बिना भेदभाव के हर सुख को पकड़ लेना चाहती हैं। कब कितना किसलिए इसका विवेक नहीं बस “और चाहिए” का भाव होता है। गणेश जी का उस चूहे पर बैठना यह दिखाता है कि मन और इच्छाएँ स्वयं में शत्रु नहीं पर यदि उन्हें दिशा न दी जाए तो वे जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं।
जब हम गणेश जी के वाहन के रूप में चूहे की ओर देखते हैं तो यह स्मरण हो सकता है कि “मेरे अंदर भी यही दौड़ता हुआ मन है जिसे गणेश की बुद्धि और संतुलन के नीचे आने की ज़रूरत है।”
दृश्य रूप से देखें तो इतना बड़ा देवता और इतना छोटा वाहन तर्क के हिसाब से उल्टा लगता है। पर प्रतीक की भाषा में यही उलटफेर गहरी बात कहता है। छोटे आकार की वस्तु जब विशाल भार उठाती है तो वह यह याद दिलाती है कि सेवा में आकार नहीं भावना महत्वपूर्ण है। एक छोटा बीज भी विशाल वृक्ष बनाता है एक सौम्य शब्द किसी का जीवन बदल सकता है एक छोटी-सी मदद किसी के लिए भगवान का रूप बन सकती है।
किसान यह सत्य बीजों में देखते हैं माँ यह सच रोजमर्रा की देखभाल में देखती हैं और साधक गणेश-चूहे के रूप में इसे मंदिर में देखते हैं। चूहा यह भी सीख देता है कि भगवान के काम के लिए हमारे पास “बड़ी” योग्यता होना ज़रूरी नहीं बल्कि छोटे-छोटे कामों में भी सच्ची निष्ठा होना ज़रूरी है।
जब हम छोटे कार्यों को “ऊबाऊ” या “महत्त्वहीन” समझकर टालते हैं तो यह चित्र याद दिलाता है कि गणेश जैसा महादेव भी छोटे चूहे के बिना अपना वाहन नहीं बनाते वे हमारे भीतर के हर छोटे कार्य को भी गरिमा देते हैं।
ग्रामीण भारत में चूहा खेतों में नुकसान भी पहुँचाता है पर साथ ही यह भी देखा जाता है कि वही खेत छोटे बीजों से भरपूर अन्न देते हैं। जीवन में जो ताकत हमें परेशान करती है यदि उसे साध लिया जाए तो वही समृद्धि का कारण भी बन सकती है। इसी तरह घरों में गणेश जी के पास रखा चूहा यह याद दिलाता है कि छोटे स्तर पर चलने वाली गतिविधियाँ ही बड़ी तस्वीर को संभव बनाती हैं।
चूल्हा जलाना बच्चों का ध्यान रखना दफ्तर का दैनिक काम बूढ़े माँ-बाप की सेवा सब बाहरी दुनिया की नज़र में “छोटे काम” लग सकते हैं पर इन्हीं से एक बड़ा जीवन टिकता है। गणेश जी का चूहा हमें सिखाता है कि छोटे कामों को तुच्छ न मानें उनमें भी ईश्वर की सेवा और अपनी साधना का अवसर देखें।
जब हम किसी भी काम को चाहे वह घर की सफाई हो या किसी का ध्यान रखना “गणेश की सेवा” की भावना से करते हैं तो हम स्वयं उस वाहन की तरह बन जाते हैं जिस पर गणेश बैठते हैं।
गणेश और चूहे की जोड़ी हमें रोजमर्रा के जीवन के लिए कई सरल लेकिन गहरी सीख देती है
जो भी व्यक्ति रोज थोड़ा समय स्वयं को देखने अपने विचारों और आदतों की जाँच करने में लगाता है वह धीरे-धीरे अपने भीतर के “चूहे” को मित्र बना लेता है शत्रु नहीं।
जब भी आप गणेश मंदिर जाएँ केवल बड़ा विग्रह ही नहीं छोटे चूहे पर भी दृष्टि अवश्य डालें। मन ही मन स्वीकार करें “यह चूहा मेरे मन का प्रतीक है हे गणेश मेरी चंचलता को अपनी बुद्धि के नियंत्रण में लेकर सही दिशा दिखाइए।”
घर में गणेश जी की पूजा करते समय मोदक अर्पित करते हुए यह भावना रखी जा सकती है कि जैसे मोदक भीतर की मिठास को दिखाते हैं वैसे ही मेरे भीतर की कड़वाहट धीरे-धीरे पिघलकर prasād बन जाए। चूहे को देख कर अपने भीतर के छोटे-छोटे स्वार्थ और डर याद आएँ और उन्हें भी गणेश को समर्पित कर दिया जाए।
छोटे बच्चों को भी यह प्रतीक समझाया जा सकता है ताकि वे सीखें कि ऊँचा होना केवल आकार या ताकत से नहीं बल्कि अपने मन पर नियंत्रण और विनम्रता से आता है।
इन छोटे अभ्यासों से प्रतीक केवल मूर्ति में नहीं जीवन के व्यवहार में उतरने लगता है।
1. क्या चूहा हमेशा केवल नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक है
प्रारंभिक रूप से वह चंचलता लालच और अंधेरे में घुस जाने वाली आदत का प्रतीक है पर जब वही प्रवृत्ति ईश्वर के अधीन आ जाती है तो वही तेज़ी सेवा और साधना का माध्यम बन जाती है। इसलिए चूहा “ऊर्जा” का प्रतीक है दिशा के हिसाब से वह विनाशकारी या कल्याणकारी बन सकता है।
2. गणेश जी ने मुषिक असुर को मारने की बजाय वाहन क्यों बनाया
यह संदेश देने के लिए कि हमारी भीतर की खराब लगने वाली प्रवृत्तियाँ भी यदि सही मार्गदर्शन पा जाएँ तो पूरी तरह नष्ट करने लायक नहीं उन्हें रूपांतरित करके काम में लिया जा सकता है। केवल दमन से भीतर विद्रोह बढ़ता है पर जागरूकता और समर्पण से वही शक्ति सहायक बन जाती है।
3. छोटे कामों को “चूहे का काम” कहकर हल्का समझना गलत है क्या
हाँ क्योंकि प्रतीक यही बता रहा है कि बिना चूहे के गणेश का वाहन पूरा नहीं होता। घर समाज और दफ्तर में अनगिनत छोटे काम हैं जिन पर कोई विशेष ताली नहीं बजता पर वही पूरी व्यवस्था को चलाते हैं। उन्हें तुच्छ समझना अपने ही आधार को कमजोर करना है।
4. अगर मेरा मन बहुत ज़्यादा दौड़ता है तो “गणेश और चूहे” के प्रतीक से practically क्या कर सकता/सकती हूँ
दिन में कुछ बार जब ध्यान आए बस दो पल के लिए आँखें बंद करके गहरी साँस लें और मन ही मन कहें “हे गणेश मेरे दौड़ते मन को अपने चरणों के पास बैठा दीजिए।” साथ ही धीरे-धीरे सोशल मीडिया बेवजह सोचने और शिकायत में लगने वाला समय घटाकर पढ़ने सीखने प्रार्थना या शरीर की देखभाल में लगाने की कोशिश करें।
5. क्या केवल इस प्रतीक को समझ लेने से ही जीवन बदल जाएगा
समझना पहला कदम है बदलना उसके बाद की प्रक्रिया। प्रतीक आपको रोज याद दिला सकता है कि आपको किस दिशा में काम करना है पर वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब आप प्रतिदिन छोटे-छोटे निर्णय इस समझ के आधार पर लेने लगते हैं जैसे कम प्रतिक्रिया अधिक जागरूकता और छोटी सेवाओं को भी सम्मान देना।
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