By पं. अभिषेक शर्मा
गुरु चरणों में पूर्ण समर्पण और आंतरिक अनुभव

श्री व्यास पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि गुरु के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण की जीवंत साधना है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को महर्षि वेदव्यास की प्रकट तिथि मानी जाती है और इसी दिन पूरे भारतवर्ष में श्रद्धालु अपने आध्यात्मिक गुरु की विशेष पूजा करते हैं। इसे ही श्री व्यास पूजा या श्री गुरु पूजा के रूप में जाना जाता है।
परंपरा में इस दिन श्रृंगार, मालाएँ, पुष्प, फल, मिठाई और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। बाहरी रूप से यह सब पूजन के चिह्न हैं परन्तु वास्तविक श्री व्यास पूजा केवल तब मानी जाती है जब शिष्य अपने स्वतंत्र अहं को गुरु के चरणों में समर्पित कर दे। यही भाव इस पूरे प्रसंग का सबसे गहरा सत्य है।
शास्त्रों के अनुसार केवल हार पहनाना, कुछ फल, पुष्प, वस्त्र या धन अर्पित कर देना ही सच्चा गुरु पूजन नहीं माना जाता। यह सब तो प्रतीकात्मक पूजा है, जो सामान्य लोगों को बाहरी माध्यम से गुरु सम्मान का अभ्यास कराती है।
श्री व्यास पूजा का वास्तविक अर्थ है कि साधक अपने भीतर यह भाव जागृत करे कि अब जीवन की दिशा, निर्णय और प्रयास सब कुछ गुरु के आदेश और इच्छा के अनुसार होंगे। जब किसी के हृदय में यह भाव प्रकट हो जाए कि जो कुछ भी अपना समझा जाता था वह सब गुरु के चरणों का अर्पण है, तभी वास्तविक गुरु पूजन प्रारम्भ होता है। बाहरी पुष्प और आरती केवल उस आंतरिक समर्पण का दृश्य रूप हैं।
आत्मसमर्पण केवल शब्दों में नहीं बल्कि जीवन की दिशा में दिखाई देता है। शिष्य का मन जब यह कहने लगे कि अब अपनी स्वतंत्रता भी गुरु चरणों की सुरक्षा में सौंप दी गई, तभी उसने वास्तविक व्यास पूजन की ओर कदम बढ़ाया है।
ऐसी ही भावना का सुंदर उदाहरण श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन में मिलता है। श्री ईश्वरपुरी से दीक्षा ग्रहण करते समय महाप्रभु ने प्रार्थना की कि शरीर सहित जो कुछ भी है वह सब गुरु को समर्पित है और अब जीवन का लक्ष्य केवल गुरु के बताए मार्ग पर चलकर श्रीकृष्ण के चरणों का अमृत रस पाना है। यह प्रार्थना केवल उनके लिए नहीं, हर साधक के लिए आदर्श बनती है।
सच्चा समर्पण वहाँ दिखाई देता है जहाँ शिष्य अपने स्वार्थ, संकोच और व्यक्तिगत योजनाओं से ऊपर उठकर गुरु की इच्छा को सर्वोपरि मानता है। ऐसा शिष्य चाहे अधिक बाह्य पूजन न भी कर पाए, उसकी साधना फिर भी वास्तविक व्यास पूजन मानी जाती है।
सम्पूर्ण समर्पण का जीवंत उदाहरण श्रील सनातन गोस्वामी के जीवन में मिलता है। उन्होंने अपने घर, परिवार, मंत्री पद, वैभव, प्रतिष्ठा, सेवक और सुविधा सब कुछ छोड़ दिया ताकि श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा पूरी हो सके। वे खाली हाथ महाप्रभु के पास पहुँचे और भीतर से यह भाव लेकर आए कि अब जीवन केवल प्रभु की सेवा के लिए है।
इसी समर्पण को वास्तविक व्यास पूजन कहा गया। बिना किसी वस्तु के, केवल जीवन को अर्पण कर देना ही उनका सबसे बड़ा पुष्प अर्पण था। उनका यह त्याग याद दिलाता है कि गुरु के लिए किया गया छोटा सा त्याग भी, यदि निःस्वार्थ और शुद्ध भाव से हो, तो वह असीम आध्यात्मिक फल दे सकता है।
वेद, पुराण और महापुरुषों की वाणी बार बार यह संकेत देती है कि अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य श्री श्री राधा कृष्ण के चरणों की प्रेममयी सेवा है। संसार में जो भी साधना, व्रत, जप और भजन किया जाता है, उसका वास्तविक सार इसी दिव्य सेवा में मिल जाता है।
यह लक्ष्य अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। परंतु यदि कोई साधक किसी सच्चे गुरु के चरणों में आश्रय ले ले और उनके बताए नियमों के अनुसार राधा कृष्ण की सेवा भाव का अभ्यास करे, तो यह कठिन लक्ष्य भी क्रमशः सुलभ होने लगता है। इसलिए श्री व्यास पूजन का गहरा तात्पर्य यह भी है कि शिष्य गुरु के माध्यम से श्री श्री राधा कृष्ण की सेवा की दिशा पकड़ ले।
शास्त्र बताते हैं कि भक्ति की मूल धारा श्रीकृष्ण से प्रवाहित होती है, लेकिन वही दिव्य सत्ता गुरु रूप में प्रकट होकर शिष्य का मार्गदर्शन करती है। इसीलिए कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति सहृदय भाव से गुरु की सेवा नहीं करता, तो केवल बाहरी प्रयासों से उसे भक्ति उपलब्ध नहीं होती।
आध्यात्मिक दृष्टि से गुरु और भगवान के बीच विरोध नहीं बल्कि एकात्मकता का अनुभव कराया जाता है। सच्चा साधक गुरु और ईश्वर दोनों के प्रति समान, शुद्ध और अटल भक्ति रखता है। तब ही शास्त्रों का गूढ़ अर्थ उसके हृदय में प्रकट होने लगता है। ज्ञान की पंक्तियाँ केवल कागज़ पर नहीं बल्कि जीवन में उतरने लगती हैं।
भारत भूमि के सभी साधक महर्षि वेदव्यास के प्रति विशेष रूप से ऋणी हैं। उन्होंने सबसे पहले वेदों को व्यवस्थित कर वेदांत सूत्र में उनका सार प्रस्तुत किया। उसके बाद पुराण और महाभारत के माध्यम से धर्म, भक्ति, नीति और जीवन के अनेक सूत्रों को सरल भाषा में लोक तक पहुँचाया।
फिर भी वेदव्यास का हृदय पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं था। बाद में श्रीमद्भागवत के माध्यम से उन्होंने श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और भक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने यह कथा अपने पुत्र शुकदेव गोस्वामी को सुनाई। शुकदेव जी द्वारा अपने पिता और गुरु वेदव्यास की जो आदरपूर्ण सेवा और श्रवण भाव प्रकट हुआ, उसे ही प्रथम व्यास पूजा माना गया।
इसके बाद श्रील सूत गोस्वामी ने शुकदेव गोस्वामी की महिमा का साधकों के मध्य वर्णन किया और उसी क्रम में दूसरी व्यास पूजा की परंपरा स्थापित हुई। इस प्रकार गुरु पूजन और व्यास पूजन की धारा शास्त्रों से लेकर साधकों के जीवन तक निरंतर बहती आ रही है।
वैदिक परंपरा में एक अत्यंत सूक्ष्म सिद्धांत बताया गया है कि गुरु पूजा को श्रीकृष्ण पूजा से भी पहले स्थान दिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु को भगवान से बढ़कर माना गया बल्कि यह कि भगवान तक पहुंचने का मार्ग गुरु के माध्यम से ही खुलता है।
जब शिष्य पहले गुरु के चरणों में अपना मन, बुद्धि और अहंकार समर्पित करता है तब उसका हृदय श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए तैयार होता है। इसलिए व्यास पूजा का दिन यह स्मरण कराने का माध्यम है कि बिना गुरु के अनुग्रह के, भगवान की कृपा का सही अर्थ भी समझ पाना कठिन हो जाता है।
हमारी गुरुपरंपरा में यह विशिष्टता है कि यहाँ श्री श्री राधा कृष्ण की सेवा, विशेष रूप से श्रीमती राधिका की भावनाओं के अनुसार सेवा को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। इस परंपरा में श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वरूप दामोदर, रमनंद राय, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, कृष्णदास कविराज, नारोत्तम ठाकुर, विश्वनाथ चक्रवर्ती, जगन्नाथ दास बाबाजी, भक्तिविनोद ठाकुर, श्रील प्रभुपाद और उनके पश्चात के आचार्य जुड़े हुए हैं।
श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण हैं, जो श्रीराधा की भाव और कांति लेकर प्रकट हुए। उन्होंने इस संसार को श्री श्री राधा कृष्ण की मधुर सेवा का अद्भुत उपहार दिया। महाप्रभु ने स्वयं इस विषय को विस्तार से प्रचार नहीं किया बल्कि यह भाव श्रील रूप गोस्वामी के हृदय में प्रकट कर उनकी लेखनी से संसार में प्रकट कराया। यही वह विशेष धारा है, जिसे समझे बिना व्यास पूजा का वास्तविक फल नहीं मिल पाता।
भक्ति मार्ग पर चलने वाले अनेक साधक प्रारंभ में बड़ा उत्साह लेकर साधना भजन आरम्भ करते हैं, पर समय के साथ माया की आकर्षक शक्तियों में फँस जाते हैं। विशेष रूप से स्त्री आकर्षण या सांसारिक भोग की प्रवृत्ति उन्हें भीतर से विचलित कर देती है। परिणामस्वरूप उनका जीवन साधना से हटकर पुनः दुःख और मोह के जाल में उलझ जाता है।
इसलिए यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि गौड़ीय मठ और वैष्णव संस्थाएँ केवल बाहरी व्यवस्था या विवाह जैसे सांसारिक कार्यों के केंद्र नहीं हैं। उनका मुख्य उद्देश्य श्रील रूप गोस्वामी की शिक्षाओं का पालन और प्रचार करना है। जो साधक मठ में रहकर केवल शुद्ध भजन, गुरु सेवा और वैष्णव सेवा का संकल्प लेते हैं, वही वास्तव में व्यास पूजा की आत्मा को स्पर्श कर पाते हैं।
जो व्यक्ति भक्ति जीवन को गंभीरता से अपनाना चाहता है, उसके लिए सबसे बड़ा सहारा श्री गुरु और वैष्णवों की संगति है। मठ या आश्रम में रहना आसान नहीं होता। वहाँ गुरु और वरिष्ठ वैष्णव कभी कभी डाँट या कठोर वचन भी कहते हैं परन्तु वह डाँट भी अंततः कल्याणकारी होती है।
जिस प्रकार नारद जी के श्राप से नलकूवर और मणिग्रीव का जीवन सुधर गया, उसी प्रकार गुरु या वैष्णवों की कठोरता भी शिष्य के भीतर छिपे अहंकार और दूषित संस्कारों को तोड़ने का कार्य करती है। जो शिष्य ऐसी परिस्थितियों को सहन कर लेता है और मठ में रहकर सेवा और भजन में स्थिर रहता है, वही गुरु की दया का वास्तविक अर्थ समझ पाता है।
आषाढ़ पूर्णिमा का दिन केवल व्यास पूजा का ही नहीं बल्कि श्रील सनातन गोस्वामी की तिरोभाव तिथि का भी स्मरण कराता है। हमारी वैष्णव परंपरा में उन्हें वेदव्यास के समान माना जाता है, क्योंकि उन्होंने श्रीमद्भागवत पर महत्त्वपूर्ण टीका लिखी और श्री बृहत् भागवतामृत जैसा अद्भुत ग्रंथ प्रकट किया।
बृहत् भागवतामृत को उस मूल आधार रूप में देखा जाता है, जिस पर बाद के काल में रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी और अन्य आचार्यों के ग्रंथ जैसे अलंकार बनकर जड़े हैं। इस दृष्टि से सनातन गोस्वामी एक ओर रूप गोस्वामी के गुरु के समान हैं, तो दूसरी ओर स्वयं उन्हें अपना गुरु मानते हैं। यही गुरु तत्त्व की सूक्ष्मता है, जहाँ अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता।
जो व्यक्ति भीतर से यह सोचने लगे कि अब वह गुरु बन गया, वह वास्तव में गुरु तत्त्व से दूर हो जाता है। सच्चा गुरु स्वयं को महान दिखाने का प्रयास नहीं करता। उसका लक्ष्य शिष्यों को इस योग्य बनाना होता है कि आगे चलकर वे भी दूसरों के मार्गदर्शक बन सकें।
गुरु की वास्तविक पहचान यह है कि उसके संपर्क में आकर साधक के भीतर भक्ति की गहराई, विनम्रता और सेवा भाव बढ़ने लगे। ऐसा गुरु शिष्यों की संख्या बढ़ाने से अधिक, एक एक शिष्य के हृदय में भक्ति के बीज को सींचने में रुचि रखता है। इसी रूप में वह स्वयं भी परम्परा का शिष्य बना रहता है।
शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारतवर्ष में जन्म लेने वाला प्रत्येक मानव अपने जीवन को सार्थक बनाने और दूसरों के कल्याण के लिए प्रयास करने का उत्तरदायित्व लेकर आता है। इसका अर्थ केवल सामाजिक कार्य नहीं बल्कि शुद्ध भक्ति की साधना कर के, दूसरों को भी उसी पथ के लिए प्रेरित करना है।
जो साधक श्री गुरु के चरणों में शरण लेकर स्वयं भक्ति का मार्ग अपनाता है और फिर भीतर से मिले अनुभव और शिक्षाओं को श्रद्धापूर्वक दूसरों तक पहुँचाता है, वही वास्तव में व्यास पूजा की परंपरा को आगे बढ़ा रहा होता है। यहाँ अभ्यास और प्रचार, दोनों को समान महत्व दिया गया है। बिना अभ्यास के प्रचार खोखला बन जाता है और बिना प्रचार के अभ्यास में व्यापकता नहीं आती।
श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन का मूल उद्देश्य यह बताना था कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य क्या है। वह लक्ष्य है श्रील रूप गोस्वामी के चरणों की धूल के समान तरुकण बनकर, श्रीमती राधिका की मानसी सेवा में अपना अस्तित्व अर्पित करना। यही भाव पूरे गुरुवर्ग की अंतरतम आकांक्षा के रूप में सदियों से प्रवाहित होता आया है।
जो साधक अपना घर छोड़कर भक्ति के लिए आए हैं या जो गृहस्थ रहकर भी भक्ति की साधना कर रहे हैं, दोनों के लिए व्यास पूजा का वास्तविक रूप यही है कि पहले इन सिद्धांतों से अच्छी तरह परिचित हों। उसके बाद जब वे गुरु, व्यास और राधा कृष्ण की पूजा करें, तो वह केवल बाहरी विधि नहीं बल्कि अंदर तक स्पर्श करने वाली साधना बन जाए। इसी आंतरिक परिवर्तन को जागृत करने वाला दिन है श्री व्यास पूजा।
क्या व्यास पूजा केवल आध्यात्मिक गुरु के लिए ही होती है
व्यास पूजा का मूल भाव आध्यात्मिक गुरु के चरणों की पूजा है। उसी के माध्यम से परम्परा के सभी आचार्य और महर्षि वेदव्यास का सम्मान किया जाता है। इस दिन गुरु के रूप में अन्य किसी भी आध्यात्मिक मार्गदर्शक को भी श्रद्धा से याद किया जा सकता है।
क्या केवल मालाएँ और वस्त्र अर्पित करना ही पर्याप्त है
माला, वस्त्र, पुष्प और नैवेद्य अर्पण करना शुभ है परन्तु जब तक मन और स्वभाव गुरु की आज्ञा और मार्गदर्शन के अनुसार ढलने न लगें तब तक पूजा अधूरी मानी जाती है। वास्तविक व्यास पूजा भीतर के समर्पण से पूर्ण होती है।
क्या गृहस्थ भी व्यास पूजा कर सकते हैं
हाँ, व्यास पूजा केवल मठ में रहने वालों के लिए नहीं है। जो गृहस्थ अपने घर में रहते हुए भी गुरु की दी हुई साधना को ईमानदारी से निभाते हैं, नियमित रूप से नाम जप, पाठ और सेवा करते हैं, वे भी अपने स्तर पर पूर्ण व्यास पूजा कर रहे होते हैं।
क्या व्यास पूजा के लिए किसी विशेष मंत्र की आवश्यकता होती है
विभिन्न परंपराओं में अलग अलग मंत्र और स्तुति प्रयोग में लाए जाते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मंत्र गुरु के प्रति हृदय से निकली हुई प्रार्थना और समर्पण है। साधक जिस मंत्र में श्रद्धा और स्थिरता अनुभव करे, वही उसके लिए सर्वश्रेष्ठ होता है।
क्या हर वर्ष व्यास पूजा करना आवश्यक है
प्रत्येक वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन व्यास पूजा करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे साधक को अपने पिछले वर्ष की साधना की समीक्षा और नये वर्ष के संकल्प तय करने का अवसर मिलता है। फिर भी, यदि कोई व्यावहारिक कारण से किसी वर्ष विशेष पूजा न कर सके, लेकिन समर्पण भाव बनाए रखे, तो उसकी श्रद्धा व्यर्थ नहीं जाती।
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