By पं. संजीव शर्मा
महाकाली की आराधना द्वारा आत्मिक रूपांतरण का उत्सव

दीपावली को साधारणतः दीयों, परिवारिक उल्लास और लक्ष्मी पूजन से जोड़ा जाता है, परंतु इस शुभ तिथि का एक गूढ़ पक्ष भी है, जो उजाले में नहीं, अपितु अंधकार में विकसित होता है। कार्तिक अमावस्या की इस रात्रि को, जहाँ सम्पूर्ण भारतवर्ष प्रकाशोत्सव मनाता है, वहीं तंत्र की रहस्यमयी परंपरा में यह रात्रि महाकाली उपासना के लिए सबसे शक्तिशाली और पवित्र मानी जाती है।
विशेष रूप से अकोरी साधक (अघोरी) इस रात्रि को मृत्यु और पुनर्जन्म के संगम स्थल, श्मशान भूमि, में मनाते हैं। यह उनके लिए केवल पर्व नहीं बल्कि एक दैवी प्रयोगशाला होती है, जहाँ भय, मृत्यु, वर्जना और अंधकार को आत्मिक शक्ति में रूपांतरित किया जाता है। यहाँ दीपक नहीं, परंतु आंतरिक ज्योति जलती है।
सामान्य समाज के लिए दीपावली धनों और सौभाग्य की देवी महालक्ष्मी की पूजा का पर्व है। किंतु तांत्रिक दृष्टि से यह रात्रि शून्यता का जागरण है, अमावस्या जब चंद्रमा अनुपस्थित रहता है तब यह "महाशून्य" की अवस्था मानी जाती है।
तंत्र के अनुसार जब बाहरी प्रकाश लुप्त होता है, उसी क्षण भीतर का सत्य प्रकाशित होता है।
अघोरी परंपरा मानती है कि अमावस्या की यह रात्रि भ्रमों के विनाश तथा आत्मा के साक्षात्कार का समय है। इसी कारण, इस रात देवी महाकाली, जो समय, मृत्यु और अज्ञान विनाश की अधिष्ठात्री हैं, की विशेष साधना की जाती है। वह न केवल विनाश की प्रतीक हैं बल्कि करुणा और मुक्ति की भी अधिष्ठात्री हैं।
अघोरी वे साधक हैं जो जीवन, मृत्यु और समाज की सीमाओं को लांघकर परम सत्य की खोज करते हैं। उनका दर्शन यह है कि जो भयभीत करता है, वही ब्रह्म का द्वार है।
दीपावली की अमावस्या को वे वाराणसी के मणिकर्णिका घाट, ऊँकारेश्वर, उज्जैन और अन्य सिद्ध श्मशानों में समाधि व साधना करते हैं, जिन अनुष्ठानों के माध्यम से वे अपने भीतर के अंधकार से मुक्त होते हैं।
इन तांत्रिक अनुष्ठानों का उद्देश्य भयावहता नहीं बल्कि आत्म-परिवर्तन है। अघोरी इस सत्य को स्वीकारते हैं कि शुद्धता और अपवित्रता दोनों ही एक ही ब्रह्म तत्व के रूप हैं।
उनके लिए शवस्थल कोई वर्जित स्थान नहीं बल्कि मोक्ष का द्वार है। यहाँ मृत्यु का कंपन जीवन की सीमाओं को तोड़कर साधक को "अद्वैत" का अनुभव कराता है। इस प्रक्रिया में शरीर, अहं और संस्कारों की परतेंजलकर समाप्त हो जाती हैं और जो शेष रहता है, वही आत्मा है।
यह साधनाएँ साधारण जन के लिए नहीं। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि बिना योग्य गुरु दीक्षा के तंत्र से जुड़ना हानिकर है।
अघोरी साधना वर्षों की तपस्या, ब्रह्मचर्य और आचार की शुद्धता के पश्चात प्राप्त होती है। सामान्य गृहस्थ व्यक्तियों को इन अनुष्ठानों की नकल करने की मनाही है क्योंकि यह केवल अनुभवी योगियों के लिए आरक्षित मार्ग है।
वेद और मानस जैसे ग्रंथ स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि अत्यधिक तांत्रिक प्रयोग योग्य दीक्षा के बिना अनर्थ का कारण बन सकते हैं।
श्मशान केवल भय और मृत्यु का प्रतीक नहीं, वह निर्माण और पुनर्जन्म का केंद्र है। यहाँ की अग्नि अहंकार को भस्म करने वाली ज्ञान ज्योति बन जाती है।
महाकाली को पूजना उनके भयानक रूप की नहीं बल्कि यह स्वीकारना है कि वही शक्ति हमारी सीमाओं को तोड़ती है। वह असत्य का नाश कर आत्मसत्य को प्रकट करती हैं।
अघोरी साधक जब दीपावली की रात इन साधनाओं में लीन होता है, तो वह बाहर के प्रकाश का नहीं बल्कि भीतर की दीप्ति का आलोकन करता है।
| पक्ष | मुख्यधारा दीपावली | अघोरी तांत्रिक साधना |
|---|---|---|
| केन्द्रबिंदु | समृद्धि, सौभाग्य, परिवार | आत्मपरिवर्तन, भयमुक्ति, ज्ञान |
| स्थान | घर, मंदिर, समाज | श्मशान, तांत्रिक स्थल |
| अनुष्ठान | लक्ष्मी पूजा, दीपदान | शव साधना, अग्नि तत्त्व, मन्त्र जप |
| प्रतीकवाद | प्रकाश बनाम अंधकार | अहंकार का अंत, मृत्यु में पुनर्जन्म |
| दृष्टिकोण | सामाजिक और पारिवारिक | गूढ़, व्यक्तिगत और रहस्यमय |
| समाज में स्वीकार्यता | सार्वजनिक रूप से पूजनीय | गोपनीय और सीमित दीक्षा तक सीमित |
अघोरी तांत्रिक साधना का सार यही है कि असली प्रकाश तभी प्राप्त होता है जब हम अपने भीतर के भय और वर्जनाओं का सामना करते हैं।
जैसे दीपावली का दीया बाहर के अंधकार को दूर करता है, वैसे ही ये साधनाएँ भीतर के अज्ञान और द्वेष को जलाती हैं।
यह मार्ग सरल नहीं, परंतु जो इसीलिए आगे बढ़ता है, वह आत्मा के उच्चतम शिखर, महामोक्ष, तक पहुँचता है।
श्मशान की राख, त्रिशूल की ज्वाला और महाकाली का रौद्र स्वरूप केवल बाहरी प्रतीक नहीं बल्कि आत्म-विलयन की प्रक्रिया हैं।
जब बाहर का दीप बुझता है तब आंतरिक प्रकाश का उदय होता है। यही दीपावली का गूढ़ रहस्य है:
"अंधकार से लड़ने के लिए, पहले उसे अपनाना पड़ता है।"
अघोर साधना इसी दर्शन की जीवंत व्याख्या है, मृत्यु में मुक्ति, भय में बोध और अंधकार में अद्वितीय प्रकाश।
प्रश्न 1: क्या अघोरी साधना दीपावली की आम पूजा से जुड़ी होती है?
उत्तर: परोक्ष रूप से हाँ। यह दीपावली की अमावस्या के समान काल में होती है, परंतु इसकी दिशा आत्मिक और गूढ़ होती है।
प्रश्न 2: यह साधनाएँ क्यों श्मशान भूमि में की जाती हैं?
उत्तर: क्योंकि वहाँ जन्म और मृत्यु के मध्य की सीमा विलीन होती है, जिससे साधक अद्वैत का साक्षात्कार करता है।
प्रश्न 3: क्या ये अनुष्ठान सामान्य व्यक्तियों के लिए उपयुक्त हैं?
उत्तर: नहीं, ये केवल सिद्ध और दीक्षित योगियों के लिए हैं। अयोग्य व्यक्ति के लिए यह साधना हानिकारक हो सकती है।
प्रश्न 4: महाकाली की पूजा का तांत्रिक अर्थ क्या है?
उत्तर: यह अंधकार में छिपे दिव्य तत्व को पहचानने और अहंकार के नाश द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग है।
प्रश्न 5: इस साधना से क्या अंतिम फल कहा गया है?
उत्तर: भय, मृत्यु और द्वैत के पार जाकर मुक्ति (मोक्ष) का अनुभव, जो आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता है।
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