By पं. संजीव शर्मा
जानिए ऋषभदेव का इतिहास, जन्म, निर्वाण और सांस्कृतिक महत्व

भारत की सभ्यता में ऐसे दिव्य पुरुष बहुत कम हुए हैं जिन्हें दो महान परंपराएँ समान आदर से स्वीकार करती हों। ऋषभदेव उन्हीं विरलों में से एक हैं। वे जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भी हैं और वैदिक धर्म में विष्णु के अवतार भी। उनका चरित्र, उनका तप और उनका संदेश दोनों ही परंपराओं को एक सूत्र में बाँधता है।
जैन कालगणना के अनुसार एक नए कालचक्र की शुरुआत में चैत्र कृष्ण नवमी को अयोध्या में राजा नाभि और रानी मरुदेवी के यहाँ ऋषभदेव का जन्म हुआ।
उनका जीवन आदिपुराण में विस्तृत रूप से वर्णित है। वे मानवजाति को तप, संयम और आत्मोन्नति का मार्ग बताते हुए माघ कृष्ण चतुर्दशी को कैलाश पर्वत पर निर्वाण को प्राप्त हुए।
भागवत पुराण में उन्हें विष्णु के चौंबीस अवतारों में से एक माना गया है।
उनका राज्य इक्ष्वाकु वंश में था—वही वंश जिसमें भगवान राम भी अवतरित हुए।
उन्होंने समाज को कृषि, शासन, कला, योग और धर्म के मूल सिद्धांत सिखाए, इसलिए उन्हें सांस्कृतिक सभ्यता के आदिशिक्षक भी कहा जाता है।
ऋषभदेव का प्रभाव इतना प्राचीन और व्यापक है कि:
इस प्रकार उनका चरित्र किसी एक धर्म की सीमा नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय अध्यात्म का सेतु है।
यह शिक्षा आज भी मनुष्य के जीवन को स्थिरता और दिशा प्रदान करती है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | चैत्र कृष्ण नवमी, अयोध्या |
| माता-पिता | राजा नाभि, रानी मरुदेवी |
| वंश | इक्ष्वाकु |
| स्थान | प्रथम तीर्थंकर (जैन); विष्णु अवतार (वैदिक) |
| निर्वाण | कैलाश पर्वत, माघ कृष्ण चतुर्दशी |
| प्रमुख ग्रंथ | आदिपुराण, भागवत पुराण |
1. ऋषभदेव को जैन और हिंदू दोनों क्यों मानते हैं?
क्योंकि दोनों परंपराओं में उनके जन्म, वंश, तप और उपदेश का उल्लेख समान रूप से मिलता है।
2. ऋषभदेव का वर्णन किन ग्रंथों में है?
आदिपुराण, भागवत पुराण, ऋग्वेद और अनेक वैदिक ग्रंथों में।
3. उनका निर्वाण कब और कहाँ हुआ?
कैलाश पर्वत पर, माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन।
4. ऋषभदेव की शिक्षाएँ आज क्यों प्रासंगिक हैं?
वे आत्मविकास, अहिंसा, ध्यान और सामाजिक नैतिकता का मार्ग बताती हैं जो हर युग में आवश्यक है।
5. क्या ऋषभदेव ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे या दैवीय?
दोनों परंपराएँ उन्हें दैवीय भी मानती हैं और सांस्कृतिक इतिहास का आधार-स्तंभ भी।
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