By अपर्णा पाटनी
अग्नि और जल के संगम से उत्पन्न जालंधर की अद्भुत कहानी

हर प्राचीन कथा में मानवीय भावनाओं की एक गहरी संवेदना छिपी होती है। जालंधर की कथा उन विरल आख्यानों में से एक है जो विस्मरण को अस्वीकार करती है, वह इसलिए नहीं स्मरणीय है कि उसमें युद्ध अथवा असुरों की पराजय का प्रदर्शन है बल्कि इसलिए कि उसमें सत्य की चिरंतन अनुगूँज है। यह किसी साधारण दैत्य के विनाश की कहानी नहीं, यह उस अस्तित्व की कथा है जिसका जन्म अन्य जीवों की भाँति नहीं बल्कि शिव के क्रोध की ज्वाला से हुआ, एक ऐसी ज्वाला जो ईश्वरीय आक्रोश का रूप लेकर जीवन में परिणत हुई और जिसने स्वर्ग के साम्राज्य की नींव तक हिला दी।
जालंधर के स्वरूप के पीछे अभिमान और भक्ति, प्रेम और विरक्ति, तथा नियति के प्रज्वलित खेल की मार्मिक झंकार सुनाई देती है।
एक समय था जब देवता अपनी सीमाओं से व्यथित थे। सृष्टि में अशांति व्याप्त थी, समुद्र गरज रहे थे, पर्वत कांप रहे थे और दैत्यराज अपने बल के मद में अंधे हो चुके थे। इसी उथल-पुथल के बीच वह दिव्य क्षण आया जब ब्रह्मांड की संतुलन-रेखा डोल उठी। उसी समय भगवान शिव के तृतीय नेत्र से प्रलयंकारी अग्नि की चिनगारी निकली।
यह कोई सामान्य क्रोध नहीं था, यह सृजन-संहार का सामर्थ्य लिए हुए दिव्य ज्वाला थी। वह अग्निचिनगारी आकाश में धधकती हुई समुद्र की गहराइयों में समा गई।
जब अग्नि और जल का संगम हुआ, विनाश और सृजन ने एक-दूसरे को आलिंगन किया। उसी क्षण जल की गोद से एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। उसका शरीर अग्नि-ताप से सुनहला और उसका प्राण जल की निर्मलता से शीतल था। यही बालक आगे चलकर जालंधर कहलाया , जिसका अर्थ है जो जल में उत्पन्न हुआ या जो जल को धारण करता है।
जलदेव वरुण देवता ने उस बालक को अपना पुत्र मान लिया। मोतियों और प्रवाल के भवनों में, समुद्र की गंभीर गहराई में, जालंधर ने अपनी चेतना का विस्तार किया।
किन्तु जिस अग्नि से उसने जन्म लिया वही एक दिन उसका अंत भी लिख चुकी थी।
जालंधर अन्य असुरों की भाँति अंधकार का प्रतीक नहीं था। उसका जन्म स्वयं शिव की दिव्य शक्ति से हुआ था। इसलिए उसमें केवल विनाश की प्रवृत्ति नहीं बल्कि सत्य की खोज और अन्याय के प्रश्न भी थे। उसने देवताओं की सत्ता को उनके दोषपूर्ण व्यवहार से तौलना आरंभ किया।
उसका तर्क था , यदि देवता भी अभिमान, क्रोध और मोह से ग्रस्त हैं, तो उन्हें ब्रह्मांड का सर्वोच्च अधिकार क्यों प्राप्त हो?
इस प्रश्न ने स्वर्गधाम में हलचल मचा दी। उसकी शक्ति अभूतपूर्व थी और उसका तेज इंद्र समेत सभी देवताओं के लिए चिंता का विषय बन गया।
जालंधर ने असुरों की सेना संगठित की किन्तु उसकी वास्तविक शक्ति उसकी अदम्य नेतृत्व क्षमता और आकर्षक व्यक्तित्व में थी। उसने देवताओं के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
परंतु उस प्रचंड योद्धा के हृदय में एक कोमल और भक्तिपूर्ण कक्षा भी थी , उसका प्रेम उसकी पत्नी वृंदा के लिए।
वृंदा नारी जाति की महानतम प्रतीक कथा है। वह केवल जालंधर की पत्नी नहीं बल्कि पतिव्रता धर्म की जीवंत प्रतिमूर्ति थी। उसकी भक्ति और निष्ठा ने जालंधर के चारों ओर एक अदृश्य कवच बना दिया था।
| स्रोत | प्रकृति | प्रभाव |
|---|---|---|
| जालंधर का जन्म | शिव की अग्नि | अतुल शक्ति और तेज |
| वृंदा की भक्ति | अटूट पतिव्रता | अभेद्य रक्षा कवच |
| सम्मिलित प्रभाव | प्रेम और शक्ति का संगम | अपराजेय पराक्रम |
जब तक वृंदा का पतिव्रत अडिग रहा तब तक कोई भी शक्ति, यहाँ तक कि स्वयं शिव भी, जालंधर को पराजित नहीं कर सकते थे। यही उसका भाग्य भी बना और पतन का कारण भी।
देवता बार-बार पराजित होते रहे। अंततः उन्होंने विष्णु से सहायता माँगी, जो सृष्टि के संतुलन के रक्षक हैं। विष्णु ने यह समझ लिया कि जालंधर की शक्ति उसकी पत्नी की निष्ठा में निहित है।
उन्होंने उसे तोड़ने के लिए एक कठिन, किंतु नियति-निर्दिष्ट उपाय सोचा। विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के सम्मुख उपस्थित हुए। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर स्वागत किया। उस क्षण उनकी पवित्रता भंग हुई और जालंधर का दिव्य कवच नष्ट हो गया।
जब वृंदा को सत्य का बोध हुआ, उसके हृदय में आक्रोश और वेदना की संयुक्त ज्वाला भड़क उठी। उसने विष्णु को इस छल के लिए शाप दिया,
“जैसे तुमने मुझे धोखे से पति-वियोग का दुख दिया, वैसे ही तुम भी अपने अवतार में प्रिय-वियोग सहोगे।”
यह शाप आगे चलकर रामावतार में सत्य बना , जब राम अपनी पत्नी सीता से वियोग का दुःख झेलते हैं।
वृंदा की शरीर मृत्यु हुई किंतु उसकी आत्मा पवित्रता के प्रतीक तुलसी रूप में परिणत हो गई। इस घटना से जालंधर का अपराजेय कवच टूट गया और उसका विनाश समीप आ गया।
जब जालंधर ने वृंदा की मृत्यु और उसके साथ हुए छल का समाचार सुना, तो उसकी चेतना का द्वार क्रोध और शोक दोनों से भर गया। समुद्र पुत्र होने के बावजूद उसकी अग्नि उग्र हो उठी। उसने शिव को युद्ध के लिए ललकारा।
कैलास की भूमि साक्षी बनी जब जालंधर और शिव आमने-सामने हुए।
शिव ने बिना वैरभाव के युद्ध किया, परंतु नियति के नियम अपरिहार्य थे। त्रिशूल उठा और जालंधर का जीवन अग्नि में विलीन हो गया। वह चिनगारी जिसने कभी जल को आलिंगन किया था अब पुनः अपने स्रोत में समा गई।
जालंधर की कथा केवल देव-असुर युद्ध नहीं बल्कि चेतना के गहन मर्म की व्याख्या है।
1. शक्ति बिना विनम्रता विध्वंस बन जाती है
जालंधर की शक्ति दिव्य थी, परंतु विवेक के अभाव ने उसे विनाश की ओर ले जाया।
2. प्रेम शक्ति भी है और दुर्बलता भी
वृंदा की निष्ठा ने उसे अजेय बनाया, किंतु उसी प्रेम की आस्था के टूटने से उसका अंत हुआ।
3. देवता भी परिणामों से अछूते नहीं
विष्णु के छल ने उन्हें शाप दिया, जो उनके अवतारों में फलित हुआ।
4. विरोधी हमेशा दुष्ट नहीं होते
जालंधर का जन्म अंधकार से नहीं बल्कि शिव की ज्योति से हुआ था। वह प्रश्नकर्ता था, विनाशक नहीं।
जालंधर की कथा का सार मानव जीवन की जटिलताओं में झलकता है। उसमें सामर्थ्य, प्रेम, अधिकार और विद्रोह का सूक्ष्म संगम है। वह हर उस चेतना का प्रतीक है जो अपनी पहचान के लिए संघर्ष करती है, जो शक्ति के साथ विवेक का संतुलन खो देती है और जो अंततः स्वयं में लौट आती है।
जालंधर की कथा जल और अग्नि की संयुक्त उपमा है , जीवन की अनिवार्य द्वंद्वता। शिव के क्रोध से प्रकट हुआ वह अग्निपुत्र अंततः उसी अग्नि में लीन हुआ। यह कथा स्मरण कराती है कि
जालंधर की जीवनाग्नि बुझी नहीं, वह आज भी आत्मसाक्षात्कार की चेतना में प्रज्वलित है।
1. जालंधर का जन्म कैसे हुआ था?
वह भगवान शिव के तृतीय नेत्र से निकली अग्निज्वाला और समुद्र के संगम से उत्पन्न हुए।
2. उसकी शक्ति का स्रोत क्या था?
उसकी शक्ति शिव के तेज और उसकी पत्नी वृंदा की भक्ति का सम्मिलित परिणाम थी।
3. वृंदा ने विष्णु को क्यों शाप दिया?
क्योंकि विष्णु के छल से उसकी पवित्रता भंग हुई और जालंधर का कवच नष्ट हुआ।
4. जालंधर को किसने मारा?
भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से जालंधर का अंत किया।
5. वृंदा का रूपांतरण किसमें हुआ?
वह तुलसी के रूप में पूजनीय बनीं, जो आज भी पवित्रता और भक्ति का प्रतीक है।
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