By पं. नीलेश शर्मा
प्रकृति की आत्मा और पर्यावरण चेतना का वैदिक स्वरूप

ऋग्वेद के प्राचीन मंत्रों और भारत की ग्रामीण लोककथाओं में एक ऐसी अदृश्य देवी का उल्लेख मिलता है, जो वन की आत्मा के समान विद्यमान है। यह देवी न तो स्वर्णमंडित मंदिरों में प्रतिष्ठित होती है, न ही भव्य उत्सवों में वर्णित होती है। उसका निवास वनों की निस्तब्धता में है और उसका नाम है अरण्यानी , वृक्षों की छाया, पुष्पों की सुगंध और वायु के स्पर्श में निनादित देवी। अरण्यानी की कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं बल्कि सृष्टि, पर्यावरण और सहअस्तित्व की आत्मा का अनुभव है। जो इसे समझता है, वह प्रत्येक पत्ते और हर जीव की धड़कन में देवी का स्पर्श पाता है।
अरण्यानी नाम संस्कृत शब्द अरण्य से उद्भूत है, जिसका अर्थ है वन या निर्जन प्रदेश। किंतु देवी केवल वृक्षों की रक्षक ही नहीं, स्वयं वनरूपा हैं।
उनके स्वरूप के वर्णन में कहा गया है,
वनों की विकासशीलता, छाया की शांति और अधोलोक के जीवन का सम्मिलित रूप ही देवी अरण्यानी हैं।
अरण्यानी के बारे में कहा जाता है कि किसी मानव ने आज तक उनका स्वरूप नहीं देखा। वे नयनगम्य नहीं बल्कि हृदयगम्य हैं। उनका दर्शन होता है,
उनकी यह अदृश्यता प्रकृति की गूढ़ आत्मा का संकेत है, जिसे सुना जा सकता है, महसूस किया जा सकता है, परंतु परिभाषित नहीं किया जा सकता।
अरण्यानी का वात्सल्य प्रत्येक जीव के लिए समान है। वे संपूर्ण वनस्पति और जीव समुदाय की संरक्षिका हैं,
ग्राम्य परंपराओं में आज भी वृक्षों की जड़ में अनाज, पुष्प और मधु चढ़ाकर अरण्यानी का पूजन किया जाता है ताकि फसल, वृक्ष और पशुधन स्वस्थ बने रहें।
ऋग्वेद के अति सुंदर सूक्तों में से एक में अरण्यानी स्तुता हैं। वहां उन्हें निम्न गुणों के लिए पूजित किया गया है,
| स्वरूप | वर्णन | अर्थ |
|---|---|---|
| रूपवती | सूर्यकिरणों से नहाए उपवनों के समान सुंदर | प्रकृति की सौंदर्यता का मूर्त रूप |
| समृद्धा | फल, मूल और चारे की दात्री | पालन-पोषण का स्रोत |
| रहस्यमयी | छाया और प्रकाश के बीच नृत्य करती | सृष्टि की छिपी चेतना का प्रतीक |
इस स्तुति में मानव और वन के परम सह-अस्तित्व को रेखांकित किया गया है। अरण्यानी उदारता, संयम और जीवनदाता शक्ति का स्वरूप हैं।
यद्यपि आज उनके नाम पर भव्य देवालय नहीं हैं, फिर भी अरण्यानी का संदेश आधुनिक पर्यावरण विचारों में गूंजता है। वे सिखाती हैं,
उनकी कथा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति से विलग होकर कोई सभ्यता स्थायी नहीं रह सकती। उनकी आराधना का अर्थ है, पर्यावरण की रक्षा और जीवन के प्रति कृतज्ञता।
वन के प्रत्येक अंश में अरण्यानी की झलक मिलती है,
| तत्व | देवी की उपस्थिति | अर्थ |
|---|---|---|
| पत्तों की सरसराहट | उनके श्वास की फुसफुसाहट | वायु में चेतना का प्रवाह |
| पक्षियों का गायन | उनका प्रातःकालीन स्वागत गीत | जीवन का उल्लास |
| पुष्पों का खिलना | उनका सृजनमय नृत्य | सृष्टि का नवोदय |
| जलधारा का प्रवाह | उनकी करुणा के अंजन | जीवन का पोषण |
यह निरंतर नर्तन दर्शाता है कि ब्रह्मांड की लय अरण्यानी की ही भित्ति पर अंकित है। हर सुवास, हर स्वर, हर तरंग हमें याद दिलाती है कि वन जीवित हैं और उनमें देवी की स्पंदनशीलता सतत विद्यमान है।
अरण्यानी की उपासना का अभिप्राय बाह्य पूजा नहीं, अपितु प्रकृति के प्रति सम्मोहन और करुणा है। वह हमें प्रेरणा देती हैं,
अरण्यानी की कथा हमें सिखाती है कि सभ्यता और वन के बीच संघर्ष नहीं बल्कि समानता का बंधन है। जब हम वनों की लय सुनना सीख जाते हैं तब हम स्वयं में देवी की उपस्थिति अनुभव करते हैं , मौन, अनदेखी, परंतु सर्वव्यापी।
1. अरण्यानी कौन हैं?
वे ऋग्वेद में वर्णित वनदेवी हैं, जो सजीव प्रकृति की आत्मा और सभी जीवों की रक्षक मानी जाती हैं।
2. क्या अरण्यानी का कोई मंदिर है?
उनका कोई स्थायी मंदिर नहीं है, क्योंकि उनका मंदिर स्वयं वन है जहाँ प्रत्येक वृक्ष उनकी उपस्थिति का प्रतीक है।
3. अरण्यानी के पूजन की परंपरा कहाँ से जुड़ी है?
ग्रामीण भारत में आज भी वृक्षों की जड़ों में मधु, फल और अन्न रखकर देवी को प्रसन्न करने की परंपरा जीवित है।
4. देवी का आधुनिक अर्थ क्या है?
वे पर्यावरण चेतना, जैव विविधता के सम्मान और वनों के संरक्षण की दैवी प्रेरणा हैं।
5. अरण्यानी का प्रत्यक्ष दर्शन संभव है क्या?
वे नयनगम्य नहीं, अंतःकरणगम्य हैं। जो प्रकृति की निस्तब्धता में सुनता है, वही उनका अनुभूति कर सकता है।
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