By अपर्णा पाटनी
आयुर्वेद, ज्योतिष और शिवभक्ति के संदर्भ में रावण का व्यक्तित्व

रामायण का नाम आते ही सामान्य मन में जिस रावण की छवि उभरती है वह लंका का अहंकारी राक्षस राजा होता है जिसने सीता का हरण किया और श्रीराम से युद्ध किया। दशहरा के दिन जलने वाला उसका पुतला मानो इस बात का प्रतीक बन गया है कि रावण केवल अधर्म और अहंकार का नाम है।
फिर भी प्राचीन ग्रंथों, आयुर्वेद और ज्योतिष की परंपराओं में झांक कर देखा जाए तो एक बिल्कुल अलग रावण सामने आता है। वही रावण जो दस शीशों वाला महाबली राजा था, आयुर्वेद का गहरा ज्ञाता भी था, ज्योतिषाचार्य भी था, शिव भक्त भी था और वेदों का सूक्ष्म व्याख्याता भी था। यही कारण है कि कई विद्वान मानते हैं कि रावण को केवल खलनायक के रूप में देखना अधूरा और सतही दृष्टिकोण है।
यह कथा पाठक को उस धरातल पर ले जाती है जहां किसी व्यक्ति को केवल एक कर्म से नहीं बल्कि उसके ज्ञान, साधना और अंतर यात्रा से भी परखा जाता है। सनातन धर्म की यही विशेषता है कि वह जन्म से नहीं, कर्म और ज्ञान से मनुष्य की परिभाषा तय करता है।
रावण का शाब्दिक अर्थ है जो गर्जना करता है या जिसका स्वर भय उत्पन्न कर दे। सामान्य परिचय में उसे राक्षस राजा कहा जाता है, परंतु उसका वंश ऋषि पुलस्त्य तक पहुंचता है। पुलस्त्य सप्तर्षियों में गिने जाते हैं। इस वंश परंपरा के कारण रावण को एक दृष्टि से ब्राह्मण भी माना जाता है, जो उसके वेद ज्ञान और आध्यात्मिक अध्ययन को समझने में सहायता करता है।
रावण एक सामान्य राक्षस नहीं था। वह शास्त्रों का ज्ञाता था, राज्य कौशल में निपुण था, आयुर्वेद में पारंगत था और संगीत, नृत्य, साहित्य तथा युद्ध विद्या में दक्ष था। लंका का स्वर्णिम साम्राज्य केवल बल से नहीं, गहरे ज्ञान और संगठन कौशल से भी खड़ा था। यही कारण है कि कुछ परंपराओं में उसे महा विद्वान और आदर्श शासक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
रावण को आयुर्वेदिक परंपरा में एक विशेष स्थान प्राप्त है। प्राचीन मान्यता के अनुसार उसने रावण संहिता नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें आयुर्वेद के अनेक गूढ़ रहस्य संजोए माने जाते हैं। यह ग्रंथ चिकित्सा पद्धतियों, वनौषधियों और उपचार विधियों पर केंद्रित बताया जाता है।
आयुर्वेद केवल औषधि सूची नहीं है। यह शरीर, मन और प्राण की समग्र दशा को समझने वाली ज्ञान प्रणाली है। इसमें
सब शामिल हैं। ऐसी जटिल प्रणाली में योगदान देना सामान्य बुद्धि का कार्य नहीं। रावण का नाम आयुर्वेदाचार्यों की पंक्ति में इसलिए लिया जाता है क्योंकि उसके विषय में मान्यता है कि वह जड़ी बूटियों के गुणों, नाड़ियों की स्थिति और रोग के सूक्ष्म कारणों को समझता था।
रावण को केवल विनाशक के रूप में देखने की छवि के पीछे उसका यह चिकित्सक रूप छिप जाता है, जबकि परंपरा में वह जीवन रक्षक और रोग निवारक समझ का वाहक भी है।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख ग्रंथ | रावण संहिता |
| मुख्य क्षेत्र | जड़ी बूटियां, रोग निदान, उपचार विधियां |
| दृष्टिकोण | शरीर, मन और समय के बीच संबंध पर जोर |
| आयुर्वेद में स्थान | परंपरा में विद्वान और शोधकर्ता की तरह स्मरण |
पुरानी कथाओं में रावण को चतुष्षष्टि कलाओं का सिद्ध माना गया है। इन 64 कलाओं में संगीत, नृत्य, नाटक, काव्य, चित्रकला, वास्तु, युद्ध, धनुर्विद्या, ज्योतिष, मंत्र शास्त्र, वेद पाठ और अनेक अन्य विधाएं सम्मिलित हैं।
ऐसी परंपरा में जहां राजाओं से केवल युद्ध कौशल नहीं, समग्र शिक्षा की अपेक्षा की जाती थी, रावण आदर्श विद्वान शासक के रूप में सामने आता है। उसकी प्रतिभा केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रही बल्कि सभा, पाठशाला, यज्ञ और संगीत सभा तक फैली। देवों और ऋषियों तक ने उसके ज्ञान को स्वीकार किया।
आज के समय में जब शिक्षा को अक्सर केवल किसी एक पेशे से जोड़कर देखा जाता है, रावण की यह बहुआयामी शिक्षा स्मरण दिलाती है कि प्राचीन भारत में विद्वत्ता का अर्थ कला, विज्ञान और आध्यात्मिकता के संतुलित विकास से था।
रावण को अपने युग का श्रेष्ठ ज्योतिषाचार्य बताया गया है। सनातन परंपरा में ज्योतिष केवल भविष्य बताने का साधन नहीं। यह काल, ग्रहों की गति और जीवन की लय को समझने की विद्या मानी जाती है।
रावण के संदर्भ में परंपरा कहती है कि
रावण संहिता में चिकित्सा के साथ ज्योतिष संबंधी संकेत भी वर्णित माने जाते हैं। इससे यह समझ बनती है कि उसके लिए स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं था बल्कि समय, ग्रह और कर्म के संतुलन से भी जुड़ा था। रावण को ब्रह्म ज्ञानी कहा जाता है, अर्थात वह ब्रह्म तत्व की अवधारणा को समझने वाला था।
इस दृष्टि से रावण केवल राजा नहीं, वैदिक परंपरा का गहरा अध्येता भी था, जिसने ज्ञान को प्रयोग के साथ जोड़ा।
रावण की सबसे प्रख्यात छवि उसकी शिव भक्ति से जुड़ी है। अनेक कथाओं में वर्णन मिलता है कि उसने कठोर तप किया, शिव की स्तुति की और उनसे अनेक वर प्राप्त किए। शिव पुराण की प्रसंग कथा में आता है कि रावण ने कैलास पर्वत को उठाने का प्रयास किया। तब शिव ने अंगुष्ठ मात्र से पर्वत दबाया और रावण पीड़ा से चीत्कार कर उठा।
उसी समय उसने जो स्तुति गाई, वह बाद में प्रसिद्ध शिव तांडव स्तोत्र के रूप में जानी गई। यहां रावण का रूप केवल विरोधी राजा का नहीं, अनन्य भक्त का भी दिखाई देता है।
शिव भक्ति के प्रमुख संकेत
यह पक्ष दिखाता है कि जो व्यक्ति काम, क्रोध और अहंकार जैसी कमजोरियों से घिरा हो, वह भी ईश्वर भक्ति के माध्यम से ऊंचे आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचने का प्रयास कर सकता है।
सामान्य समझ में रामायण को अक्सर अच्छे और बुरे के सीधे संघर्ष के रूप में देखा जाता है। श्रीराम को धर्म और मर्यादा का प्रतीक माना जाता है और रावण को अधर्म का। यह दृष्टि सरल है, पर पूर्ण नहीं।
सनातन दृष्टि बताती है कि एक ही व्यक्ति में ज्ञान और भूल, भक्ति और अहंकार, करुणा और कठोरता साथ साथ हो सकते हैं। रावण इसका सशक्त उदाहरण है।
दोनों रूप एक ही व्यक्ति में उपस्थित रहे। इससे यह संकेत मिलता है कि ज्ञान के साथ यदि संयम और विनम्रता न हो तो पतन संभव है, चाहे विद्वत्ता कितनी ही ऊंची क्यों न हो।
रावण का अंत केवल एक युद्ध का परिणाम नहीं। यह उस अहंकार का परिणाम है जिसे नियंत्रण में नहीं रखा गया।
रावण के जीवन से निकलने वाले प्रमुख संकेत
अहंकार की सीमा
कितना भी ज्ञान हो, यदि वह विनम्रता से न जुड़ा हो तो अहंकार जन्म लेता है। रावण का पतन यह दिखाता है कि स्वयं को अजेय मान लेना सबसे बड़ा भ्रम है।
कर्म की अनिवार्यता
सीता हरण जैसे कर्म ने रावण के सारे तप, विद्या और बल पर भारी प्रभाव डाला। परंपरा स्पष्ट कहती है कि अधर्म से किया गया कर्म अंततः फल अवश्य देता है।
भक्ति और भूल साथ साथ
रावण शिव का अनन्य उपासक था, फिर भी उसके जीवन में गंभीर नैतिक भूलें हुईं। इससे सीख मिलती है कि पूजा और साधना के साथ व्यवहार में भी धर्म की आवश्यकता है।
धर्म की जटिलता
धर्म केवल एक पंक्ति में नापने योग्य नहीं। परिस्थितियां, दृष्टिकोण और परिणाम सब मिलकर किसी कर्म को परिभाषित करते हैं। रावण की कथा इस जटिलता को समझने का अवसर देती है।
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख गुण | विद्वत्ता, आयुर्वेद ज्ञान, ज्योतिष, शिव भक्ति |
| प्रमुख दोष | अहंकार, क्रोध, वासना, परनारी हरण |
| प्रेरणा | ज्ञान की ऊंचाई तक पहुंचने की क्षमता |
| चेतावनी | अधर्म से जुड़ा कर्म अंततः पतन की ओर ले जाता है |
लोक कथाओं, क्षेत्रीय रामायणों और तमिल, सिंहली तथा अन्य परंपराओं में रावण की छवि हमेशा एक जैसी नहीं। कुछ क्षेत्रों में उसे
के रूप में भी याद किया जाता है। कहीं उसके बल और त्याग की कथाएं गाई जाती हैं, कहीं उसकी tragik भूलों को याद कर मनन किया जाता है।
आयुर्वेद और ज्योतिष से जुड़े कई साधक आज भी रावण संहिता को अध्ययन की दृष्टि से महत्व देते हैं। वहां वह एक ऐसे ऋषि पुरुष की तरह उभरता है जिसकी बातें रोग निवारण, ग्रह दशा और कर्म फल के बीच संबंध को समझने में सहायता करती हैं।
समकालीन जीवन में रावण की कथा केवल धर्म ग्रंथों की कहानी नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष का प्रतीक बन सकती है।
कुछ महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु
इस दृष्टि से रावण की कहानी चेतावनी भी है और प्रेरणा भी। चेतावनी इस बात की कि अधर्म से किया गया कोई भी कार्य अंततः फलित होता है। प्रेरणा इस रूप में कि कोई भी व्यक्ति अपनी सीमाओं और कमजोरियों के बावजूद ज्ञान और भक्ति की ओर आगे बढ़ सकता है।
क्या रावण वास्तव में आयुर्वेदाचार्य माना जा सकता है
परंपरा में रावण का नाम आयुर्वेदिक विद्वानों में लिया जाता है और रावण संहिता जैसी कृतियों का उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत स्पष्ट है कि उसकी पहचान केवल योद्धा या राजा तक सीमित नहीं, वह चिकित्सा और वनौषधि के ज्ञान से भी जुड़ा था।
यदि रावण इतना विद्वान था तो उसका पतन क्यों हुआ
विद्वत्ता और पतन का सीधा संबंध नहीं। पतन का कारण अहंकार, वासना और अधर्म से जुड़े कर्म बने। रावण के जीवन से यह सीख मिलती है कि ज्ञान के साथ यदि विनम्रता और संयम न हो तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
क्या रावण को किसी परंपरा में पूजनीय माना जाता है
कुछ क्षेत्रों में रावण को वीर, महान राजा या शिव भक्त के रूप में सम्मान दिया जाता है। वहां उसके ज्ञान, पराक्रम और शासन कौशल पर अधिक ध्यान दिया जाता है, हालांकि उसके अधर्मपूर्ण कर्मों को भी स्वीकार किया जाता है।
रावण संहिता का महत्व किस दृष्टि से माना जाता है
रावण संहिता को आयुर्वेद और ज्योतिष के तालमेल का प्रतीक माना जाता है। इसमें रोग, ग्रह दशा, उपाय और कर्म फल के बीच संबंध को समझाने वाले सूत्र बताए जाते हैं, जो कई साधकों के लिए आज भी अध्ययन का विषय हैं।
रावण की कथा से सामान्य पाठक के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या हो सकता है
सबसे गहरा संदेश यह है कि मनुष्य के भीतर प्रकाश और अंधकार दोनों साथ रहते हैं। ज्ञान, भक्ति और शक्ति यदि धर्म से न जुड़ें तो अहंकार जन्म लेता है। साथ ही यह भी कि किसी व्यक्ति को एक ही छवि में बांधने से पहले उसके जीवन के संपूर्ण आयामों पर विचार करना जरूरी है।
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