By पं. नरेंद्र शर्मा
रावण की 10 आदतें जिनसे उसकी विद्वत्ता, भक्ति और नेतृत्व का असली रूप दिखता है

रामायण की लोकप्रचलित कथाओं में रावण का नाम आते ही दस सिरों वाला राक्षस राजा याद आता है जिसने सीता का हरण किया और प्रभु श्रीराम से युद्ध किया। पीढ़ियों से उसे अधर्म का प्रतीक मानकर दहन किया जाता रहा है, इसलिए सामान्य पाठक के मन में रावण का अर्थ ही खलनायक बन चुका है।
फिर भी यदि थोड़ी देर के लिए भावनात्मक प्रतिक्रिया को एक तरफ रखकर केवल तथ्यों और परंपराओं पर दृष्टि डाली जाए तो रावण का व्यक्तित्व कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी दिखाई देता है। वह योद्धा था, पर केवल योद्धा नहीं। वह राक्षस कुल में जन्मा, पर केवल विनाशकारी नहीं। उसके भीतर एक अत्यंत विद्वान, कलाकार, भक्त और प्रखर प्रशासक भी छिपा था। यही कारण है कि रावण के कुछ आचरण गंभीर भूल माने जाते हुए भी उसकी कुछ आदतें आज के समय के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन सकती हैं।
| क्रम | आदत | मूल भावना |
|---|---|---|
| 1 | एकाग्र और प्रखर शिव भक्ति | समर्पण और आध्यात्मिक गहराई |
| 2 | ज्ञान की अनवरत साधना | जिज्ञासा और विद्वत्ता |
| 3 | कला और संगीत में निपुणता | संवेदनशीलता और रचनात्मकता |
| 4 | लंका का कुशल प्रशासन | दूरदृष्टि और जनकल्याण की भावना |
| 5 | विद्वानों और प्रतिभा का सम्मान | ईमानदार सलाह से प्रेम |
| 6 | परिवार के प्रति गहरा लगाव | निष्ठा और संबंधों के प्रति संवेदन |
| 7 | अपने मत पर डटे रहने का साहस | आत्मविश्वास और जोखिम उठाने की शक्ति |
| 8 | वचन और शरण की मर्यादा निभाना | प्रतिबद्धता और नीतिपूर्ण युद्ध दृष्टि |
| 9 | अत्यंत ऊंची महत्वाकांक्षा | बड़े लक्ष्य देखने की क्षमता |
| 10 | अंत समय में अपने दोष स्वीकार करना | आत्मचिंतन और गरिमापूर्ण स्वीकृति |
इन आदतों को समझते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि रावण के अधर्मपूर्ण कर्म छिपाए नहीं जा सकते, परंतु उसके भीतर की जिज्ञासा, तपस्या और भक्ति से भी आंख मूंद लेना उतना ही अधूरा दृष्टिकोण होगा।
रामायण और शिव परंपरा दोनों में रावण की शिव भक्ति के प्रसंग बार बार सामने आते हैं। लंका का स्वर्ण सिंहासन संभालने से पहले ही उसका हृदय कैलास की ओर झुका हुआ दिखाया गया है।
रावण की भक्ति की कुछ प्रमुख विशेषताएं
एक प्रसिद्ध कथा में उल्लेख मिलता है कि रावण ने शिव प्रसन्न करने के लिए अपने सिरों की आहुति देना प्रारंभ कर दी। नौ सिर अर्पित कर दिए और जब दसवां अर्पित करने को तैयार हुआ तब शिव प्रकट होकर उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे रोका। यह बात चाहे अलंकारिक हो, पर संदेश स्पष्ट है कि उसकी भक्ति औपचारिकता भर नहीं थी।
यह प्रसंग एक गहरा संकेत देता है कि पूजा का मूल्य बाहरी प्रदर्शन से नहीं, आंतरिक सत्यनिष्ठा से तय होता है। जब साधक का अहंकार पिघलता है, तभी भक्ति को वास्तविक गहराई मिलती है। रावण की यह आदत दिखाती है कि अत्यधिक शक्ति वाला व्यक्ति भी ईश्वर के आगे अपने को शिशु की तरह रख सकता है।
रावण को केवल पराक्रमी राजा मान लेना उसके बौद्धिक पक्ष के साथ अन्याय होगा। परंपरा में उसे वेद, उपनिषद, ज्योतिष, आयुर्वेद, संगीत और शस्त्र विद्या में पारंगत बताया गया है।
रावण की ज्ञान यात्रा के कुछ मुख्य आयाम
वेद और शास्त्र अध्ययन
कथाओं में उल्लेख है कि उसने चारों वेद और अनेक उपनिषदों का गहन अध्ययन किया। केवल पाठ नहीं बल्कि उनके तत्त्व पर चिंतन किया।
अन्य विद्याओं में प्रवीणता
गुरुओं से सीखने की ललक
रावण जैसे सामर्थ्यवान शासक के लिए भी ऋषियों और विद्वानों के पास जाकर ज्ञान ग्रहण करना एक विनम्र कदम था। यह आदत दिखाती है कि वह केवल प्रशंसा सुनने वाला राजा नहीं बल्कि सुधार और सीखने के लिए तैयार साधक भी था।
इस आदत से निकलने वाली सीख यह है कि उपाधि, पद या सामर्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण है सीखते रहने की क्षमता। जिस दिन जिज्ञासा मर जाती है, उस दिन व्यक्ति भीतर से स्थिर हो जाता है, चाहे बाहर कितना भी सफल दिखे।
दस सिरों वाला योद्धा और लंका का सम्राट एक बहुत ही सूक्ष्म संगीतकार भी था, यह सोचकर कई लोग चौंक जाते हैं। फिर भी परंपरा में रावण का एक रूप ऐसा भी है जो वीणा वादन और स्तुति रचना में डूबा हुआ दिखता है।
वीणा में दक्षता
यह माना जाता है कि वह वीणा को अत्यंत निपुणता से बजाता था। उसके संगीत से केवल मनुष्य ही नहीं, वातावरण भी प्रभावित होता था।
शिव तांडव स्तोत्र की परंपरा
शिव की स्तुति में जिस ऊर्जावान काव्य का वर्णन मिलता है, उसे कई विद्वान रावण से जोड़ते हैं। लय, छंद और भाव की दृष्टि से यह अद्वितीय काव्य माना गया है।
युद्ध और कला का संतुलन
रावण की यह आदत बताती है कि वीरता और संवेदनशीलता विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं। जो व्यक्ति केवल कठोरता से भरा हो, वह पूरा नहीं। जो केवल कोमलता में डूबा हो, वह भी अधूरा। संतुलन ही पूर्णता की पहचान है।
आज के पाठक के लिए यह आदत यह संदेश देती है कि व्यावसायिक जीवन और रचनात्मक अभिरुचि दोनों को साथ रखना संभव है। कला मन को परिष्कृत करती है और शक्ति को दिशा देती है।
रामायण में लंका के वर्णन में स्वर्ण महलों, सुंदर मार्गों और व्यवस्थित नगर योजना का वर्णन मिलता है। यह केवल अतिशयोक्ति नहीं बल्कि इस बात का संकेत है कि रावण केवल योद्धा नहीं, एक कुशल प्रशासक भी था।
रावण के शासन की कुछ मुख्य विशेषताएं
कई लोक कथाओं में बताया जाता है कि रावण के शासन में सामान्य जन अपेक्षाकृत सुरक्षित और संतुष्ट थे। समस्या उसके व्यक्तिगत निर्णयों में आई, जो सीता हरण और अहंकार से प्रेरित युद्ध तक पहुंची।
यह आदत स्पष्ट संकेत देती है कि कोई भी नेता केवल युद्ध कौशल से नहीं बल्कि बेहतर प्रशासन से भी परखा जाना चाहिए। सच्चा नेतृत्व वही है जो स्वयं के सम्मान के साथ साथ प्रजा के जीवन स्तर को भी ऊपर उठाए।
अहंकारी शासक प्रायः ऐसे लोगों को अपने आसपास रखते हैं जो केवल हां में हां मिलाएं। रावण की छवि इससे अलग दिखती है। उसकी सभा में ऐसे मंत्री और भाई भी थे जो उससे असहमति रखने का साहस करते थे।
सच बोलने वालों को स्थान
विभीषण जैसे पात्र, जिन्होंने युद्ध से पहले अनेक बार रावण को सीता को लौटाने और युद्ध टालने की सलाह दी, उसकी सभा में स्वतंत्र रूप से बोलते दिखते हैं।
विद्वानों की कद्र
रावण के पास विद्वान, पुरोहित और संगीतज्ञों का समूह था जिनसे वह विमर्श करता था। उसे यह स्वीकार था कि कुछ विषयों में उससे अधिक जानने वाले भी हो सकते हैं।
विचार और निर्णय का अंतर
यह बात अलग है कि कई बार उसने सबकी राय सुनकर भी अपने मन का ही निर्णय लिया। फिर भी यह आदत महत्वपूर्ण है कि विचार विमर्श के दरवाजे बंद नहीं किए गए थे।
यह आदत आधुनिक नेतृत्व के लिए भी प्रेरक है। जो व्यक्ति केवल प्रशंसा सुनना चाहता है, वह स्वयं को धोखा देता है। जो असहमति के लिए भी स्थान रखता है, वह वास्तविक विकास की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
लोक कथाओं में रावण को क्रूर राजा के रूप में दिखाया जाता है, परंतु उसके व्यक्तिगत संबंधों की बात करें तो उसमें गहरा पारिवारिक भाव भी था।
पत्नी मंदोदरी के प्रति सम्मान
मंदोदरी को बुद्धिमती, संतुलित और धर्मनिष्ठ रानी माना गया है। रावण उसके विचारों को महत्व देता था। कई प्रसंगों में वह उसे सही सलाह देती दिखती है।
भाई बहनों के प्रति निष्ठा
अपनी बहन शूर्पणखा के अपमान पर उसकी प्रतिक्रिया भले ही अतिशय और अधर्मी रही, पर मूल भाव उसके प्रति निष्ठा और पीड़ा से प्रेरित था। अपने भाइयों के लिए भी वह संघर्ष करने को तैयार रहा।
माता के प्रति लगाव
रावण की माता कैकसी के प्रति उसके प्रेम के प्रसंग भी मिलते हैं। उसके अनेक निर्णयों में परिवार का प्रभाव दिखता है।
यह आदत यह बताती है कि कोई व्यक्ति अपने पारिवारिक जीवन में संवेदनशील हो सकता है और साथ ही साथ सार्वजनिक जीवन में बड़ी भूल भी कर सकता है। भावनाओं का आधार सही हो, यह पर्याप्त नहीं। उसे सही दिशा देना भी उतना ही आवश्यक है।
रावण की सबसे प्रखर आदतों में से एक थी बड़े स्तर पर जोखिम उठाने की क्षमता। जब अधिकांश राजा देवताओं को प्रसन्न रखकर सीमित सीमा में शासन चलाना चाहते थे तब रावण देवताओं को चुनौती देने से भी पीछे नहीं हटा।
उसका विश्वास यह था कि
यहीं से उसकी महत्वाकांक्षा जन्म लेती है, जो तीनों लोकों पर प्रभाव स्थापित करना चाहती थी। यह महत्वाकांक्षा एक सीमा तक प्रेरणा बनती है, पर नियंत्रण से बाहर होते ही पतन का कारण भी बनती है।
यह आदत आधुनिक पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि बड़े लक्ष्य रखना गलत नहीं, परंतु उन लक्ष्यों की दिशा और सीमा भी ध्यान में रखनी चाहिए। केवल “सबकुछ पाने” की जिद अंततः जीवन को संतुलन से दूर ले जाती है।
रावण के संदर्भ में कम चर्चित, पर महत्वपूर्ण आदत यह है कि वह अपने दिए हुए वचन को निभाने का प्रयास करता था।
कथाओं में यह बात बार बार सामने आती है कि जो उससे शरण मांगता, उसे वह एक स्तर तक संरक्षण देने की कोशिश करता था। उसके निर्णयों में कई बार यह निष्ठा साफ झलकती है, भले ही अन्य पक्षों में उससे गंभीर भूलें हुईं हों।
यह आदत यह संदेश देती है कि किसी व्यक्ति के भीतर आंशिक सत्यनिष्ठा और आंशिक अधर्म दोनों एक साथ हो सकते हैं। मनुष्य के चरित्र को एक ही रेखा से नहीं नापा जा सकता।
रावण केवल लंका तक सीमित नहीं रहना चाहता था। कथाएं बताती हैं कि उसका लक्ष्य तीनों लोकों पर प्रभाव स्थापित करना था।
इस महत्वाकांक्षा के दो स्पष्ट पक्ष हैं
आज के समय में भी यह आदत दिखाई देती है, जब व्यक्ति अपने करियर, व्यवसाय या सामाजिक स्थान के लिए अत्यधिक ऊंची उड़ान भरना चाहता है। प्रश्न यह नहीं कि लक्ष्य कितना बड़ा है बल्कि यह कि उसे पाने की प्रक्रिया कितनी धर्मसम्मत है।
रावण के जीवन का सबसे मार्मिक दृश्य वह है जब वह युद्धभूमि में घायल होकर धरती पर पड़ा है। उसी क्षण उसके सामने श्रीराम खड़े होते हैं।
कथाओं में वर्णन मिलता है कि उस समय
बल्कि यह स्वीकार किया कि राम धर्म के मार्ग पर हैं और उसने स्वयं अपने अहंकार और वासना के कारण गंभीर भूलें कीं। इस क्षण में रावण की छवि एक हठी शत्रु से बदलकर एक ऐसे व्यक्ति की हो जाती है जो अंततः सत्य का सामना कर रहा है।
यह आदत यह दिखाती है कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि व्यक्ति ईमानदारी से स्वयं को देख सके, तो वह भीतर से हल्का होकर जा सकता है। गलतियां रहते हुए भी स्वीकृति में एक प्रकार की गरिमा रहती है।
रावण की ये दस आदतें मिलकर एक जटिल, पर अत्यंत शिक्षाप्रद चित्र बनाती हैं।
यह मिश्रण यह दिखाता है कि हर मनुष्य के भीतर किसी न किसी रूप में रावण उपस्थित है।
सनातन दृष्टि की सुंदरता यही है कि वह किसी पात्र को केवल एक पक्ष से नहीं देखती। रावण की आदतों से यह सीख मिलती है कि
तभी मनुष्य भीतर की जटिलता के बावजूद अपने जीवन को संतुलन और सार्थकता की ओर ले जा सकता है।
1. क्या रावण को केवल खलनायक कहना उचित है
उसके अधर्मपूर्ण कर्म, विशेषकर सीता हरण और अहंकार से प्रेरित युद्ध, निश्चित रूप से निंदनीय हैं। फिर भी उसकी भक्ति, विद्वत्ता, संगीत प्रतिभा और प्रशासनिक क्षमता को देखे बिना उसे केवल खलनायक कहना अधूरा दृष्टिकोण है। यह कथा हमें मिश्रित व्यक्तित्व को समझने की आदत सिखाती है।
2. रावण की शिव भक्ति से आज के साधक को क्या सीख मिलती है
रावण की भक्ति दिखाती है कि पूजा का मूल्य औपचारिकता से नहीं, सच्चे समर्पण से तय होता है। जब साधक अपनी अहं प्रवृत्तियों को पिघलाकर ईश्वर के आगे रखता है तब भक्ति गहरी होती है, भले ही जीवन के अन्य क्षेत्रों में उससे भूलें क्यों न हुई हों।
3. क्या रावण का ज्ञान उसकी गलतियों को मिटा देता है
ज्ञान कभी भी अधर्म को उचित नहीं ठहरा सकता। रावण की विद्वत्ता उसके कर्मों की जिम्मेदारी कम नहीं करती, पर यह अवश्य दिखाती है कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं। ज्ञान के साथ चरित्र और संयम भी आवश्यक हैं, अन्यथा विद्वान भी बड़े पतन का कारण बन सकता है।
4. लंका का सुव्यवस्थित राज्य क्या रावण को आदर्श शासक साबित करता है
वह कुशल प्रशासक अवश्य था, पर आदर्श शासक नहीं। आदर्श शासन केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, नैतिक संहिता से भी तय होता है। निजी स्तर पर की गई गंभीर भूलों ने उसके अन्य गुणों को पीछे धकेल दिया, यही उसकी सबसे बड़ी विडंबना रही।
5. रावण की सबसे बड़ी प्रेरणादायक आदत कौन सी मानी जा सकती है
अलग अलग लोगों के लिए उत्तर भिन्न हो सकता है, पर अक्सर दो बातें प्रमुख लगती हैं। एक, उसकी ज्ञान के प्रति प्रबल जिज्ञासा और सतत सीखने की आदत। दूसरी, अंत समय में अपने दोषों को स्वीकार करने की हिम्मत। दोनों मिलकर यह सिखाती हैं कि जीवन भर सीखते रहना और अंत में सत्य का सामना करना, मनुष्य के लिए सबसे बड़ी साधना हो सकती है।
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