By पं. नरेंद्र शर्मा
महाभारत के युद्ध में हर बार मौत से लौटते अर्जुन और हर बार आगे बढ़कर खड़े हो जाने वाले कृष्ण का रहस्य

महाभारत को हम अक्सर वीरता, युद्ध और दर्शन की कथा के रूप में पढ़ते हैं। लेकिन अगर थोड़ी देर रुककर केवल एक पात्र पर ध्यान दें - अर्जुन - तो एक और सच सामने आता है। अर्जुन इतने घातक युद्ध से बार‑बार कैसे बचा। कितनी बार मौत उसके एकदम सामने खड़ी हुई और फिर भी वह जीवित रहा। इसका जवाब केवल एक नाम है - कृष्ण।
कृष्ण और अर्जुन का रिश्ता साधारण दोस्ती नहीं था। यह एक दिव्य साझेदारी थी, जिसमें एक धनुष लेकर लड़ रहा था और दूसरा अदृश्य ढाल बनकर उसके साथ खड़ा था। अठारह दिन के युद्ध में कई ऐसे क्षण आए जब अगर कृष्ण न होते, तो अर्जुन की कथा वहीं खत्म हो जाती।
चौदहवें दिन अर्जुन ने एक भयंकर प्रतिज्ञा ली - सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारूँगा, नहीं तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग दूँगा। जयद्रथ वही था, जिसकी वजह से चक्रव्यूह में अभिमन्यु अकेला फँस कर मारा गया। कौरवों को पता था कि यदि वे अर्जुन को जयद्रथ तक पहुँचने से रोक लें, तो बिना धनुष उठाए ही अर्जुन से छुटकारा मिल जाएगा।
पूरा दिन अर्जुन युद्ध की परत दर परत काटता रहा, पर जयद्रथ तक की दूरी खत्म नहीं हो रही थी। जैसे‑जैसे सूर्य झुकता गया, अर्जुन के मन में घबराहट और बढ़ती गई। आख़िरी समय में, जब लगभग सबको लगा कि प्रतिज्ञा असफल हो गई, तभी अचानक आकाश में अंधेरा छा गया। ऐसा लगा जैसे सूर्यास्त हो चुका है।
कौरवों ने खुशी से हथियार ढीले कर दिए। जयद्रथ छिपने की जगह से बाहर निकला, अर्जुन की असफलता पर हँसने लगा। उसी क्षण कृष्ण ने धीरे से कहा - “सूर्य डूबा नहीं है, अभी भी समय है। अब तीर चलाओ।” अर्जुन ने गांडीव उठाया और एक ही बाण से जयद्रथ का सिर उड़ा दिया। कृष्ण ने उसे निर्देश दिया कि उस सिर को उसके पिता के तप में बैठे शरीर की गोद में गिरने दो, ताकि पिता के श्राप की शर्त पूरी हो जाए, लेकिन अर्जुन पर कोई प्रभाव न पड़े।
यहाँ कृष्ण ने केवल अर्जुन की जान नहीं बचाई, उसके वचन की लाज भी रखी। करियर और निजी जीवन में जब हम किसी समय-सीमा या वचन के दबाव में टूटने लगते हैं, यह प्रसंग याद दिलाता है - कभी‑कभी समाधान हमारी कोशिश से नहीं, किसी ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन से आता है।
बारहवें दिन, कौरवों की ओर से लड़ रहे भगदत्त ने एक भयानक अस्त्र छोड़ा - वैष्णव अस्त्र। यह वह दिव्य हथियार था जिसे कोई भी सामान्य योद्धा रोक नहीं सकता था। उसे सीधे अर्जुन के हृदय की ओर छोड़ा गया।
अर्जुन कुछ समझ पाते उससे पहले कृष्ण रथ पर सारथी की सीट से उठकर सामने आ गए। अस्त्र सीधे कृष्ण के वक्ष पर लगा और फिर अचानक एक दिव्य माला में बदल गया - वैजयंती माला। क्योंकि यह अस्त्र विष्णु का था और कृष्ण स्वयं वही विष्णु थे जिनके पास से यह शक्ति कभी निकली थी।
यह दृश्य केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, प्रेम का उद्घोष है। कृष्ण यहाँ यह दिखाते हैं कि जब तक वे साथ हैं, कोई भी शक्ति सीधे भक्त के हृदय तक नहीं पहुँच सकती।
सत्रहवें दिन कर्ण और अर्जुन आमने‑सामने थे। यह युद्ध केवल दो योद्धाओं का नहीं, दो जीवन यात्राओं का टकराव था। इसी द्वंद्व के बीच कर्ण ने नागास्त्र का प्रयोग किया - एक सर्प रूपी बाण, जो लक्ष्य के सिर को बिना चूके भेद देता है।
नागास्त्र सीधे अर्जुन के मस्तक की ओर छोड़ा गया। उसी क्षण कृष्ण ने अपने पैर से रथ पर ज़ोर से दबाव डाला। दिव्य घोड़े नीचे झुक गए, रथ कुछ इंच धरती में धँस गया और बाण अर्जुन का सिर नहीं, केवल मुकुट उड़ा कर निकल गया।
ज़रा सोचो, यह कितनी सूक्ष्म टाइमिंग थी - एक पल का फर्क होता और कहानी यहीं समाप्त हो जाती। यह प्रसंग उन सभी पलों जैसा है, जब हमें लगता है कि “बस, अब तो खत्म,” लेकिन किसी अदृश्य कृपा से चीज़ें बस थोड़ी सी बदल जाती हैं और हम बच जाते हैं।
कर्ण के पास एक और अद्भुत अस्त्र था - वासवी शक्ति, जो इंद्र से मिली थी और जिसे केवल एक बार प्रयोग किया जा सकता था। उसका लक्ष्य अगर अर्जुन होता, तो मृत्यु निश्चित थी। कृष्ण जानते थे कि इस अस्त्र के सामने वे भी सीमा में हैं।
रात के युद्ध में जब घटोत्कच (भीम का पुत्र) ने अपनी राक्षसी शक्तियों से कौरव सेना को तहस‑नहस करना शुरू किया, कृष्ण ने शांत मन से यह देखा। उन्हें पता था कि दुर्योधन की रक्षा के लिए कर्ण को मजबूरन अपना अंतिम अस्त्र अब ही प्रयोग करना पड़ेगा। और ऐसा ही हुआ - कर्ण ने वासवी शक्ति घटोत्कच पर चला दी। वह मारा गया, लेकिन मरते समय भी इतना विशालकाय हो गया कि गिरते‑गिरते उसने कौरव सेना को भारी नुकसान पहुंचाया।
युद्ध के बाद कृष्ण ने अर्जुन से कहा - “आज मैं सबसे अधिक प्रसन्न हूँ, क्योंकि जो अस्त्र तुम्हारे लिए बचा रखा गया था, वह घटोत्कच पर खर्च हो गया। अगर वह शस्त्र तुम्हें छू लेता, तो तुम्हें मैं भी नहीं बचा पाता।” यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि कई बार जीवन में जो हानि या बलिदान हमें “अन्याय” लगते हैं, वे किसी बड़ी सुरक्षा का हिस्सा हो सकते हैं, जिसे हम तुरंत नहीं देख पाते।
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद, जब शंख के स्वर शांत हो गए और धूल बैठने लगी तब भी एक रहस्य बाकी था। कृष्ण ने अर्जुन से कहा - “पहले तुम रथ से उतर जाओ, मैं बाद में उतरूँगा।” अर्जुन ने बिना पूछे आज्ञा मानी और नीचे आ गया।
जैसे ही कृष्ण रथ से उतरे, रथ अचानक भयंकर अग्नि में घिर गया और जल कर भस्म हो गया। अर्जुन स्तब्ध रह गया। तब कृष्ण समझाया - युद्ध के दौरान जितने भी दिव्य अस्त्र तुम्हारे रथ पर लगे थे, वे सब उसे उसी समय जला सकते थे। लेकिन मेरी उपस्थिति तक वे अपना प्रभाव पूरी तरह दिखा नहीं पाए। जैसे ही मैं उतरा, उनकी संचित शक्ति प्रकट हो गई और रथ नष्ट हो गया।
यह केवल एक चमत्कार नहीं, एक संकेत था - कि युद्ध में अर्जुन अकेला नहीं लड़ रहा था। हर पल, हर वार के साथ कृष्ण ढाल बनकर खड़े थे, चाहे अर्जुन को इसका बोध हो या न हो।
बहुत लोग पूछते हैं - क्या कृष्ण अर्जुन का पक्ष ले रहे थे। इस प्रश्न का उत्तर खुद गीता में छुपा है। कृष्ण व्यक्ति का नहीं, धर्म का पक्ष लेते हैं। अर्जुन उस समय धर्म का वाहक था, इसलिए कृष्ण उसके सारथी बने। उन्होंने अर्जुन को बचाया, पर उससे युद्ध भी करवाया, उससे कठिन फैसले भी करवाए, उसकी कमज़ोरियों पर भी प्रश्न उठाए।
इस रिश्ते के कुछ गहरे संकेत हैं:
आज के जीवन में भी, चाहे तुम करियर के मोड़ पर खड़े हो, शादी और रिश्तों की उलझन में हो या भीतर से थके हुए हो - यह कथा याद दिलाती है कि:
कभी‑कभी वह किसी सही सलाह के रूप में आता है, कभी किसी “क्लोज़ कॉल” से बच जाने के रूप में, कभी किसी अवसर के रूप में जो बिल्कुल समय पर मिलता है।
1. क्या ये सभी प्रसंग महाभारत की परंपरागत कथा का हिस्सा हैं
हाँ, जयद्रथ के समय सूर्य जैसा अंधकार, भगदत्त का वैष्णव अस्त्र, नागास्त्र से मुकुट कटना, वासवी शक्ति का घटोत्कच पर प्रयोग और युद्ध के बाद रथ का जलना - ये सब महाभारत की विभिन्न परंपराओं और व्याख्याओं में मिलते हैं।
2. क्या कृष्ण हर अस्त्र से अर्जुन को बचा सकते थे
वासवी शक्ति के बारे में स्वयं कृष्ण कहते हैं कि यदि वह अर्जुन पर प्रयोग होती, तो वे भी नहीं रोक पाते। यही कारण था कि उन्होंने रणनीति से उसे घटोत्कच पर खर्च करवा दिया।
3. इन प्रसंगों से आज के जीवन के लिए क्या सीख है
कि केवल “भगवान सम्भाल लेंगे” कहकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना और केवल “सब मेरे ही भरोसे है” कहकर टूट भी न जाना। दोनों के बीच संतुलन - प्रयास और भरोसा - ही असली मार्ग है।
4. क्या कृष्ण केवल अर्जुन जैसे “खास” लोगों के लिए ऐसे खड़े रहते हैं
कथा का भाव यह है कि जो भी ईमानदारी से धर्म, सत्य और कर्तव्य निभाने की कोशिश करता है, उसके जीवन में भी किसी न किसी रूप में ऐसी कृपा सक्रिय रहती है, भले वह उसे बाद में ही समझ आए।
5. आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में कृष्ण और अर्जुन हमें क्या बताते हैं
अर्जुन हमारे भीतर का कर्मयोगी है - जो संघर्ष करता है, काम करता है, रिश्ते निभाता है। कृष्ण हमारे भीतर की उच्च बुद्धि और दिव्य मार्गदर्शन हैं। जब दोनों जुड़ते हैं - यानी जब हमारा कर्म और हमारी चेतना एक दिशा में चलती है - तभी जीवन का असली “महाभारत” जीता जाता है।
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