By पं. संजीव शर्मा
माया, चेतना और विस्मरण पर एक प्राचीन कथा का गहन अर्थ

बहुत पुरानी बात है, जब अभी समय ने अपनी गति शुरू नहीं की थी। न दिन थे, न रातें। न दिशाएं थीं, न आकाश की सीमाएं। केवल एक शांत, असीम चेतना थी। कोई लहर नहीं, कोई हलचल नहीं, केवल एक ऐसा मौन जो स्वयं को भी सुन सकता था।
कहते हैं, उसी मौन में एक सूक्ष्म सी इच्छा जगी। जैसे कोई सागर स्वयं को लहरों के रूप में देखना चाहे। जैसे कोई चित्रकार अपने भीतर के रंगों को बाहर फैलाना चाहे। उसी इच्छा से सृष्टि की भूमिका लिखी गई। चेतना ने स्वयं को तीन रूपों में अभिव्यक्त किया - ब्रह्मा के रूप में सृजन, विष्णु के रूप में पालन, शिव के रूप में लय।
अब दुनिया थी, लोक थे, जीव थे, संसार का खेल चल पड़ा था। रूपों की भीड़ थी, अनुभवों की धाराएं थीं, जन्म और मृत्यु की लय थी। फिर भी एक बात अधूरी थी। चेतना ने स्वयं को देखा तो सही, पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं, केवल एक विराट एकत्व के रूप में। उसे अपने ही भीतर से एक ऐसे परदे की ज़रूरत थी जो उसे “दूसरा” बना कर दिखा सके, ताकि अनुभव का स्वाद गहरा हो सके।
यहीं से माया की कहानी शुरू होती है।
ब्रह्मा के हृदय से एक विचार उठा - यदि अनंत को सीमित रूप में न देखा जाए, तो अनुभव अधूरा रह जाएगा। अनंत को "मैं" और "दूसरा" के खेल के बिना कैसे जाना जा सकता है। उसी समय, एक ऐसी शक्ति को जन्म मिला जो न पूर्ण रूप से सत्य थी, न पूर्ण रूप से असत्य। वही माया थी।
माया झूठ नहीं थी। वह कोई दुष्ट शक्ति भी नहीं थी। वह तो एक कलाकार की तरह थी, जो खाली कैनवास पर कहानी उकेरती है। सत्य को छुपाती नहीं, लेकिन उसे ऐसे रंगों में ढक देती है कि उसे पहचानने के लिए दृष्टि को परिपक्व होना पड़े। जैसे साफ पानी में नीला आकाश प्रतिबिंबित हो कर स्वयं नीला लगने लगे, वैसे ही माया भी चेतना के ऊपर रंग चढ़ाती है।
देवता यह सब देख रहे थे। वे सृष्टि में अपनी भूमिकाएं निभा रहे थे। यज्ञ हो रहे थे, स्तोत्र गाए जा रहे थे, वरदान दिए जा रहे थे, वरदान वापस भी लिए जा रहे थे। धीरे-धीरे उनके भीतर एक सूक्ष्म गर्व पैदा हुआ। उन्हें लगा कि मनुष्य भ्रम में पड़ सकते हैं, राक्षस मार्ग भटक सकते हैं, लेकिन वे तो देवता हैं, उन्हें कोई माया कैसे ढक सकती है।
एक दिन वे ब्रह्मा के समक्ष पहुंचे। उनकी सभा में प्रकाश ही प्रकाश था, फिर भी प्रश्न की छाया उनमें उठ रही थी। देवताओं ने आदरपूर्वक कहा, “भगवन, माया की बात अक्सर सुनी है। मनुष्य उससे मोहित होते हैं, वे स्वयं को शरीर मान बैठते हैं, वे दुख और सुख में फंस जाते हैं। पर एक बात समझ में नहीं आती - क्या माया वास्तव में इतनी प्रबल है कि देवताओं को भी भ्रम में डाल सके।”
ब्रह्मा मुस्कुराए। उत्तर देने के बजाय उन्होंने केवल कहा, “यदि केवल सुनकर समझना ही पर्याप्त होता, तो सृष्टि की आवश्यकता ही क्या थी। तुम चाहो, तो स्वयं अनुभव कर सकते हो।”
देवताओं ने इसे चुनौती समझा। अंदर कहीं यह भी भाव था कि अनुभव हुआ भी तो वे जागृत ही रहेंगे, उन्हें कोई भूल नहीं घेर पाएगी। यह विश्वास ही उनकी पहली भूल थी।
कथा कहती है कि ब्रह्मा ने उन्हें एक ऐसे लोक में प्रवेश कराया जहाँ माया पूरी शक्ति से काम कर रही थी। जैसे कोई नाटक शुरू होने से पहले कलाकारों को नया परिधान दे दिया जाए, वैसे ही देवताओं ने भी नए रूप धारण किए।
शुरुआत में उन्हें सब याद था। उन्हें ज्ञात था कि वे मूलतः देव हैं, यह सब केवल एक लीला है। वे अपने नए रूपों को खेल की तरह देख रहे थे। उन्हें हंसी भी आ रही थी कि मनुष्य इस खेल में सचमुच खो जाते हैं।
लेकिन माया को जल्दी नहीं थी। वह धीरज से काम लेती है। पहले उसने उन्हें समय का अनुभव कराया। उन्हें लगा कि सुबह हुई है, फिर दिन चढ़ा, फिर शाम ढली, फिर रात आई। जिन्हें अनंत का ज्ञान था, वे स्वयं को घंटों और दिनों में बांटने लगे।
फिर माया ने उन्हें भूख और तृप्ति का स्वाद दिया। उन्हें भोजन की लालसा हुई, स्वाद आया, आसक्ति आई। संबंध बने, परिवार बने, अपनापन जगा। माया ने उनसे धीरे-धीरे कहा - “देखो, यह सब तुम्हारा है। यह घर तुम्हारा, यह लोग तुम्हारे, यह मान और प्रतिष्ठा तुम्हारे।”
धीरे-धीरे उनकी स्मृति धुंधली होने लगी। पहले वे याद रखते थे कि यह सब एक लीला है। फिर उन्होंने यह बात बाद में याद रखनी शुरू की। अंततः ऐसा हुआ कि वे केवल भूमिका में रह गए और सत्य की स्मृति पीछे कहीं दब गई।
वे अब देवता नहीं, किसी राज्य के राजा थे, किसी घर के पिता थे, किसी प्रिय के पति थे। उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं राज्य न छिन जाए, कहीं अपने से बिछड़ न जाएं, कहीं मान न गिर जाए। जो चेतना कभी निर्भय थी, अब असुरक्षा के जाल में फंसने लगी।
समय बीतता गया। देवता अपने ही रचे हुए संसार में इतने तल्लीन हो गए कि उन्हें अब यह प्रश्न भी नहीं उठता था कि वे कौन हैं। उनके लिए वही जीवन वास्तविक था। उस जीवन की जीत-हार ही सबकुछ बन गई थी।
फिर एक दिन, किसी अचानक घटना ने भीतर कुछ हिला दिया। किसी को प्रिय से बिछड़ना पड़ा, किसी को हार का सामना करना पड़ा, किसी का शरीर घायल हुआ, किसी के समक्ष मृत्यु का दृश्य आया। उस क्षण में, जो दुख उन्होंने महसूस किया, वह उस दुख से बहुत गहरा था जिसकी आदत सामान्य मनुष्यों को होती है। क्योंकि कहीं बहुत भीतर से एक हल्की सी आवाज़ उठ रही थी - “क्या यह सचमुच अंत है। क्या मैं केवल इतना ही हूं।”
यही वह क्षण था जब माया की परत में एक पतली सी दरार पड़ी।
कथा कहती है कि उसी समय, मानो दूर से, ब्रह्मा का स्वर उनके भीतर गूंजा। कोई शब्द नहीं, केवल एक स्मरण - “याद है, तुम कौन हो।”
पहले तो उन्होंने इस आहट को झटक दिया। मगर जब जीवन की उलझनों के बीच-बीच में यह आवाज़ लौटती रही, तो उनके भीतर सवाल उठने लगे। यह “मैं” कौन हूं जो दुखी भी है और इस दुख को देख भी रहा है। यह भय किसे हो रहा है और कौन है जो इस भय को देख पा रहा है।
धीरे-धीरे स्मरण लौटने लगा, जैसे रात के अंत में क्षितिज पर हल्की रेखा दिखाई दे।
जब उन्हें धीरे-धीरे एहसास हुआ कि वे केवल अपने शरीर, नाम, संबंध या उपलब्धियां नहीं हैं तब पहली प्रतिक्रिया गर्व नहीं थी। वे यह नहीं बोले कि “हम तो देव हैं, हमने पहचान लिया।” इसके विपरीत, उन पर विनम्रता छा गई।
उन्हें ज्ञात हुआ कि ज्ञान होना और हमेशा जागृत रहना दो अलग बातें हैं। उन्हें यह भी समझ आया कि अनुभव चेतना को बांध भी सकता है। कोई बात केवल इसलिए ऊंची नहीं हो जाती कि उसे देवता कह रहे हैं, उसे ऊंचा बनाती है उस तक पहुंचने की यात्रा।
कथा में कहा गया है कि जब वे ब्रह्मा के समक्ष लौटे, तो उनसे शिकायत नहीं की कि “आपने हमें इस भ्रम में क्यों डाला।” उन्होंने माया को शत्रु नहीं, गुरु के रूप में पहचाना।
उन्होंने कहा - “अब समझ में आया कि माया क्या है। वह केवल धोखा नहीं, वह परीक्षा है। यदि यह आवरण न हो, तो हम सत्य की कीमत कैसे समझते।”
माया ने उन्हें स्वयं से भुलाया, पर उसी विस्मरण की गहराई से जो स्मरण लौटा, वह पहले से अधिक सशक्त था।
यह कथा केवल देवताओं की नहीं है। यह हर उस मनुष्य की कथा है जो सुबह उठकर आईने में देखता है और सोचता है - “मैं यही हूं।” हम अपने नाम को स्वयं मान लेते हैं, अपने काम को अपनी पहचान मान लेते हैं, अपने संबंधों को अपने अस्तित्व की सीमा समझ लेते हैं। हमें लगता है कि जो दिख रहा है, बस वही है।
जब हमें प्रशंसा मिलती है, हम फूल जाते हैं। जब कोई आलोचना करता है, हम टूट जाते हैं। जब धन आता है, हम आश्वस्त हो जाते हैं। जब परिस्थिति बिगड़ती है, हम स्वयं को ही कमतर मानने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि ये सभी चीजें बितते समय की तरह हैं - आती हैं, जाती हैं, बदलती हैं।
माया हमें दंड देने नहीं आती। वह हमें अनुभव करने देती है। वह चाहती है कि हम इस नाटक में पूरी तरह उतरें, हंसें, रोएं, प्रेम करें, संघर्ष करें और फिर किसी क्षण स्वयं से प्रश्न पूछें - “क्या मैं केवल इतना ही हूं।”
कभी-कभी कोई घटना हमारे भीतर वही झटका देती है जो देवताओं को उनके झूठे संसार में मिला था। एक अचानक बीमारी, किसी प्रिय का जाना, किसी संबंध का टूटना, या फिर किसी न मिलने वाले लक्ष्य के पीछे भागते-भागते अचानक थक जाना।
उस थकान में जब मन शांत होता है, तो हम स्वयं से पूछते हैं - “मैं इतने वर्षों से किस के पीछे भाग रहा था। क्या वह मेरी असली जरूरत थी या केवल माया की कोई लहर।”
इन क्षणों में, यदि हम भागने के बजाय रुक जाएं, मौन हो जाएं, अपने भीतर झांक लें, तो वही कहानी दोहराई जाती है। माया का पर्दा थोड़ा हटता है, भीतर की चेतना थोड़ा स्पष्ट दिखने लगती है।
तभी समझ आता है कि माया को न तो मिटाने की जरूरत है और न उससे डरने की। उसे समझने की जरूरत है।
कथा के अंत में कहा जाता है कि देवताओं ने माया को नष्ट नहीं किया। उन्होंने उसे प्रणाम किया। उन्होंने कहा - “यदि तुम न होतीं, तो जागरण का आनन्द भी न होता। यदि यह विस्मरण इतना गहरा न होता, तो यह स्मरण इतना मधुर न होता।”
शायद जीवन भी हमसे यही चाहता है। कि हम अपनी भूमिकाएं पूरा निभाएं, पूरे मन से, पूरी ईमानदारी से। लेकिन किसी एक शांत क्षण में यह भी याद रख लें कि हम भूमिका से बड़े हैं। कि हम उस मंच से भी व्यापक हैं, जिस पर खड़े हैं।
माया कोई कारागार नहीं, वह एक निमंत्रण है। निमंत्रण यह देखने का कि अनुभव के बीच भी एक ऐसा “मैं” है जो बदलता नहीं, जो देखता है, जो जाग सकता है।
1. क्या माया को झूठ कहा जा सकता है?
नहीं। माया असत्य नहीं बल्कि सत्य के ऊपर डाला गया ऐसा आवरण है जो अनुभव और खेल को संभव बनाता है।
2. क्या देवता भी सचमुच भ्रम में पड़ सकते हैं?
कथा का अर्थ यह है कि चेतना किसी भी स्तर पर अनुभव में इतना उलझ सकती है कि मूल पहचान कुछ समय के लिए धुंधली हो जाए।
3. क्या माया हमारे खिलाफ काम करती है?
नहीं। माया विरोधी नहीं, शिक्षक की तरह है। वह हमें दिखाती है कि हम जब केवल बाहरी चीजों से चिपकते हैं तो किस तरह उलझ जाते हैं।
4. क्या माया से पूरी तरह मुक्त होना संभव है?
मुक्ति भाग कर नहीं, समझ कर आती है। जब हम जानते हैं कि खेल खेला जा रहा है और फिर भी सजग रहते हैं तब माया की पकड़ ढीली पड़ने लगती है।
5. इस कथा को अपने जीवन में कैसे अपनाया जा सकता है?
हर भूमिका निभाते हुए भीतर यह स्मरण जिंदा रखा जा सकता है कि "मैं" केवल पद, संबंध या परिस्थिति नहीं हूं। यह स्मरण ही माया के बीच जागरण का पहला कदम है।
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