By पं. नरेंद्र शर्मा
शिव के चर्म, भस्म और विनम्रता के आध्यात्मिक संदेश

नमः शिवाय शान्ताय कारणाय कृतात्मने।
निर्गुणाय निष्कलाय चिद्घनाय नमो नमः॥
हिमालय की गोद में विराजित शिव का स्वरूप सदैव रहस्य और गूढ़ता से भरा हुआ है। देवताओं की परंपरागत छवि में जहाँ स्वर्ण मुकुट, रेशमी वस्त्र और अलौकिक आभा का वर्चस्व दिखाई देता है, वहीं शिव का रूप इन सब सीमाओं से परे है। वह पशुचर्म धारण करते हैं, सर्पों को आभूषण बनाते हैं और राख से अपने शरीर को अलंकृत करते हैं। उनका निवास न तो सोने के महलों में है और न ही राजभवनों में बल्कि हिमाच्छादित कैलास पर्वत के निर्जन विस्तार में है। यहीं वह ध्यान में लीन, साक्षात् विरक्तता और सृजन के समन्वय के प्रतीक बनते हैं।
उनका वह रूप जिसमें वे बाघ की खाल ओढ़े और हाथी की खाल पहने दिखाई देते हैं, मानव चेतना के लिए एक गहन आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है। यह रूप केवल बाहरी कठोरता या शक्ति का प्रदर्शन नहीं बल्कि भीतर के पशु स्वभाव, अहंकार, कामना और मद, पर विजय की अभिव्यक्ति है।
वैदिक और पुराणिक परंपरा में बाघ को अनियंत्रित कामना, तीव्र ऊर्जा और आक्रामक प्रवृत्तियों का प्रतीक माना गया है। दारुकवन के प्रसंग में वर्णित है कि वहां के ऋषियों ने, अपनी साधना और अहंकार से मदोन्मत्त होकर, भगवान शिव को वश में करने के लिए एक मायावी बाघ उत्पन्न किया। शिव ने सहजता से उस दैत्य रूपी बाघ का वध किया और उसकी खाल को अपने आसन के रूप में धारण कर लिया।
यह कथा बताती है कि जब तक मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास बना रहता है तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता। शिव द्वारा बाघ की खाल पर आसन जमाना, इस बात का संदेश देता है कि इच्छा पर विजय ही सच्ची शक्ति है।
गजासुर नामक दैत्य की कथा शिव पुराण में वर्णित है। वह अपनी शक्ति के मद में तीनों लोकों को आतंकित करने लगा। तब शिव ने उसका संहार किया और उसकी खाल को ओढ़ लिया। हाथी यहाँ मद या अहंकार का प्रतीक है। अतः इस विजय का अर्थ हिंसा नहीं, वरन् आत्म-नियंत्रण और अहंकार पर आत्मबल की विजय है।
शिव का यह रूप गजचर्माम्बरधारी कहलाता है। यह केवल एक अनोखा दृश्य नहीं बल्कि इस सत्य की अभिव्यक्ति है कि जब अहंकार अपने चरम पर पहुँचता है तब सत्य की शक्ति उसे विनम्र बना देती है।
यदि शिव सभी देवताओं के अधिपति हैं, तो वे रेशम, स्वर्ण या विलास के प्रतीक वस्त्रों को क्यों अस्वीकार करते हैं? शिव की भस्म संसार के नाशवान स्वरूप की याद दिलाती है और पशुचर्म यह स्मरण कराता है कि जो कभी शक्तिशाली था, वह भी परिवर्तन के अधीन है।
प्राचीन हठयोग प्रदीपिका जैसे ग्रंथों में योगाभ्यास के लिए बाघ की खाल पर आसन लगाने की परंपरा उल्लिखित है। इसका औचित्य दोनों ही स्तरों पर समझा जा सकता है।
| उद्देश्य | लौकिक अर्थ | आध्यात्मिक अर्थ |
|---|---|---|
| ध्यान में कीटों और नमी से रक्षा | एकाग्रता और स्थिरता | मन रूपी बाघ को शांत करने की साधना |
शिव, जो आदियोगी हैं, का बाघ की खाल पर आसन जमाना इस बात का प्रतीक है कि साधक को अपने भीतर के विक्षोभ को नियंत्रित कर शांति में परिवर्तित करना चाहिए।
गजासुर केवल एक दैत्य नहीं था बल्कि वह उस अज्ञान का प्रतीक है जो सत्य को ढक देता है। शिव द्वारा उसकी खाल पहनने में एक गहरा आध्यात्मिक संकेत है।
विष्णु का स्वर्णाभूषित स्वरूप और शिव का भस्म-विभूषित रूप, सृष्टि के दो छोरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
| देवता | वेशभूषा | संदेश | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| विष्णु | रेशमी वस्त्र, रत्नजटित मुकुट | सृष्टि की रक्षा और व्यवस्था | क्षीरसागर, राजमहल |
| शिव | राख, सर्प, पशुचर्म | मोह और भ्रम का नाश | श्मशान और वन |
जहाँ विष्णु व्यवस्था के रक्षक हैं, वहीं शिव माया का विसर्जन कर चेतना को शुद्ध करते हैं। दोनों मिलकर सृष्टि का संतुलन बनाए रखते हैं।
सर्प की भाँति जो अपनी मृत त्वचा त्याग देता है, उसी प्रकार शिव की पशुचर्म धारण की परंपरा मनुष्य को बताती है कि उसे अपनी पुरानी आसक्तियाँ, अहंकार और लिप्साएँ त्याग देनी चाहिए।
शिव नकारात्मकता का संहार नहीं करते, वे उसे ज्ञान में बदल देते हैं। यही मुक्ति का सच्चा मार्ग है।
आज के भौतिकतावादी जीवन में भी शिव का यह रूप अप्रासंगिक नहीं हुआ है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक ‘बाघ’ रूपी कामना और एक ‘हाथी’ रूपी अहंकार विद्यमान रहता है। शिव का उपदेश हमें यही सिखाता है कि शक्ति धारित वस्त्रों या पदों में नहीं बल्कि संयम और आत्मनियंत्रण में है। साधक का सबसे बड़ा आभूषण उसकी साधना और संतोष है।
शिव का पशुचर्म धारण जीवन से विमुखता नहीं बल्कि उसकी सच्चाई का आलिंगन है। वह हमें बताते हैं कि वैभव और सौंदर्य अंततः विलीन हो जाते हैं, परंतु सरलता, विनम्रता और आत्मनियंत्रण अमर रहते हैं। जब साधक स्वयं पर विजय प्राप्त करता है, तभी वह दिव्यता की ओर अग्रसर होता है। यही शिव का सनातन उपदेश है , दूसरों पर नहीं, स्वयं पर विजय प्राप्त करना ही सच्चा योग है।
1. क्या शिव का पशुचर्म धारण हिंसा का प्रतीक है?
नहीं, यह आत्मविजय और नियंत्रण का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि शिव ने अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त की।
2. बाघ की खाल विशेष क्यों मानी जाती है?
क्योंकि यह इच्छाओं और लालसाओं पर विजय का प्रतीक है। शिव इस पर बैठकर कामना पर संयम का संदेश देते हैं।
3. हाथी की खाल से क्या तात्पर्य है?
यह अहंकार और गर्व के दमन का प्रतीक है। शिव दर्शाते हैं कि शक्ति का सर्वोच्च रूप विनम्रता है।
4. क्या भस्म लगाने का अर्थ मृत्यु का संकेत है?
यह जीवन की नश्वरता की स्मृति है ताकि साधक मोह से मुक्त हो सके।
5. आज के जीवन में शिव के चर्म और भस्म के प्रतीक का क्या अर्थ है?
यह आतंरिक साधना का आह्वान है, भोग से ऊपर उठकर आत्मसंयम में ही आनंद खोजना।
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