By पं. नरेंद्र शर्मा
शकुनि युधिष्ठिर और धर्म के सबसे खतरनाक खेल की अनकही सच्चाई

महाभारत की कथा में असंख्य युद्ध हुए। रथों के पहिए धूल उड़ाते रहे। गदा, चक्र और बाणों की टक्कर से रणभूमि गूंजती रही। फिर भी इतिहास की दिशा जिस एक घटना ने सबसे अधिक बदली वह न रणभूमि थी, न अस्त्रों की भिड़ंत। वह एक सभा थी। हस्तिनापुर की भव्य सभा। और उस सभा के मध्य बिछा हुआ चौसर।
वहीं पर पासे फेंके गए। वहीं पर धर्मराज के हाथ से धर्म फिसलता हुआ दिखा। वहीं पर द्रौपदी का सम्मान दांव पर लगा। वहीं पर भीष्म, द्रोण और कृप जैसे महायोद्धा मौन बैठे रहे। चौसर का वह खेल केवल जुआ नहीं था। वह समय, कर्म, धर्म और मानव कमजोरी का संयुक्त परीक्षण था।
यही से प्रश्न उठता है। इस चौसर के नियम किसने बनाए। क्या खेल वास्तव में निष्पक्ष था। या नियमों के नाम पर सब कुछ पहले से तय था।
राजसूय यज्ञ के बाद पांडवों की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल चुकी थी। इंद्रप्रस्थ का मायसभा जैसा महल दुर्योधन के अहंकार को घायल कर चुका था। वहीं से वैर की अग्नि प्रज्वलित हुई। दुर्योधन लोट कर हस्तिनापुर आया। शकुनि से मंत्रणा की। योजना बनी कि युद्ध में पांडवों को हराना कठिन है। इसलिए युद्ध से पहले उन्हें भीतर से तोड़ा जाए।
धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को खेल के लिए आमंत्रित किया। विदुर ने चेतावनी दी कि यह निमंत्रण शुभ नहीं है, फिर भी युधिष्ठिर ने पिता तुल्य राजा के आदेश को धर्म मानकर स्वीकार किया। वे स्वयं कहते हैं कि जुए से विनाश निश्चित है, पर पिता की आज्ञा न मानना भी अधर्म है। इसी द्वंद्व में वे सभा की ओर बढ़ते हैं।
शकुनि को आम तौर पर महाभारत का खलनायक कहकर छोड़ दिया जाता है। लेकिन उनके व्यक्तित्व में केवल छल नहीं, तीक्ष्ण रणनीति भी थी। वे गंधार के राजकुमार थे। राजदरबार और राजनीति की चालें जानते थे। वर्षों उन्होंने कुरु वंश के भीतर उठते-बैठते भावों को पढ़ा। खासकर पांडवों के स्वभाव को।
उन्हें पता था कि युधिष्ठिर की सबसे बड़ी पहचान उनका "धर्म" है। उसी को उन्होंने जाल बनाया। युधिष्ठिर चुनौती ठुकरा नहीं सकते, यह वे भलीभांति जानते थे। उन्होंने दुर्योधन को समझाया कि यदि पांडवों को हराना है तो उनकी तलवार से नहीं, उनकी वृत्ति से हराना होगा। चौसर उनके लिए वैकल्पिक युद्ध था। यहां रथ नहीं चलने थे, केवल मन और पासे चलने थे।
लोककथाओं में कहा जाता है कि शकुनि के पासे उनके पिता की अस्थियों से बने थे। वे उनके पक्ष में ही गिरते थे। यह कथन चाहे ऐतिहासिक रूप से जैसे भी हो, प्रतीक रूप से एक गहरी सच्चाई को व्यक्त करता है। पासे उन परिस्थितियों का रूपक हैं जहां नियम कागज पर बराबर दिखते हैं, पर नियंत्रण एक पक्ष के हाथ में होता है।
सभा पर्व के वर्णन और परंपरागत व्याख्याओं में बार-बार यह बात आती है कि शकुनि "कुशल जुआरी" थे और उनकी हर चाल सोची समझी थी। युधिष्ठिर चाहे जो भी दांव लगाते, परिणाम लगभग तय था। यह केवल भाग्य नहीं था, व्यवस्थित हेरफेर था। यही कारण है कि प्रश्न उठता है कि खेल के नियम वास्तव में किसके थे - चौसर के या शकुनि के।
युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता है। वे झूठ से बचते हैं, अन्याय से दूर रहते हैं। लेकिन धर्म का एक पक्ष नियम पालन है और दूसरा पक्ष विवेक। चौसर के खेल में उन्होंने नियमों का पालन तो किया, लेकिन विवेक खो दिया।
उनकी पहली गलती थी खेल के निमंत्रण को स्वतः धर्म समझ लेना। दूसरी गलती थी यह मान लेना कि सामने वाला भी उसी धर्मबद्धता से बंधा होगा। धर्म तब संकट में पड़ता है जब वह अधर्म से समान व्यवहार की अपेक्षा करता है। युधिष्ठिर ने धीरे-धीरे दांव बढ़ाए। पहले धन। फिर राज्य। फिर भाइयों को। फिर स्वयं को। अंततः द्रौपदी को। यहां उनका निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक था। यही से धर्म के प्रश्न और गहरे हो जाते हैं।
चौसर के खेल की हार केवल पांडवों की नहीं थी। यह कुरु वंश की नैतिक परीक्षा थी जिसमें अधिकांश पात्र असफल हुए। द्रौपदी के सभा में खींचे जाने पर भीष्म, द्रोण, कृप और अन्य बुजुर्ग मौन रहे। कोई स्पष्ट शब्द में विरोध नहीं कर पाया। विदुर अकेले आवाज उठाते रहे, पर उनकी बात को अनसुना किया गया।
द्रौपदी का प्रश्न "क्या दास बना हुआ पति अपनी पत्नी को दांव पर लगा सकता है" सभ्य समाज के लिए दर्पण था। सभा उस दर्पण में अपना चेहरा देखकर भी आंखें झुका बैठी। यह मौन ही आगे चलकर महाभारत के रक्तरंजित युद्ध का कारण बना।
तकनीकी तौर पर देखें तो चौसर के नियम कोई एक व्यक्ति नहीं बनाता। वे परंपरागत खेल के नियम थे। लेकिन व्यावहारिक तौर पर खेल का "फ्रेमवर्क" शकुनि ने बुना। उन्होंने तय किया कि कौन खेलेगा, क्या दांव होंगे, कौन पासा फेंकेगा, किस परिस्थिति में खेल रुकेगा या चलेगा। इस दृष्टि से नियमों की आत्मा उन्हीं ने गढ़ी।
दर्शन की दृष्टि से देखें तो यह भी कहा जा सकता है कि नियति ने यह चौसर रचा। युधिष्ठिर, शकुनि, दुर्योधन, धृतराष्ट्र, भीष्म - सभी अपने-अपने कर्म और स्वभाव के अनुसार भूमिका निभा रहे थे। पर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया जाए। महाभारत बार-बार सिखाता है कि "प्रारब्ध" और "पुरुषार्थ" साथ-साथ चलते हैं।
शकुनि के चरित्र में द्वंद्व है। वे छल का सहारा लेते हैं। पर उसी छल के माध्यम से छिपा हुआ अधर्म सामने आता है। गंधार की राजनीति, हस्तिनापुर के अन्याय, गांधारी के विवाह, उनके परिवार के विनाश - इन सबका बोझ उनके भीतर है। वे दुर्योधन के माध्यम से कुरु वंश को चुनौती देते हैं।
कुछ व्याख्याकारों के अनुसार यदि चौसर न होता तो कौरवों का अत्याचार धीरे-धीरे बढ़ता रहता, पर उतनी स्पष्टता से सामने न आता। चौसर ने वह क्षण पैदा किया जहां सबके सामने तय हो गया कि कौन किस पक्ष में है। इस दृष्टि से शकुनि अधर्म के प्रतिनिधि होने के साथ-साथ धर्म के पुनर्स्थापन का अप्रत्यक्ष साधन भी बन गए।
महाभारत का चौसर केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, गहरा मनोवैज्ञानिक पाठ भी है। युधिष्ठिर एक बार हारने के बाद "शायद अगली बार जीत जाऊंगा" की मानसिकता में फंसते हैं। जो कुछ खो चुका है उसे वापस पाने के चक्कर में और अधिक दांव लगाते जाते हैं। यह वही मनोवृत्ति है जो आज भी जुए और लत में देखने को मिलती है।
सभा में बैठे लोगों का मौन भी सामूहिक मनोविज्ञान को दिखाता है। अधिकार के सामने सत्य बोलने का साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। महाभारत बताता है कि अधर्म केवल वही नहीं जो गलत काम करे, अधर्म वह भी है जो गलत देखकर चुप रहे।
इस पूरे प्रसंग ने यह स्पष्ट किया कि धर्म केवल यज्ञ, व्रत, नियम और संस्कार तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप है - न्याय। जहां न्याय का हनन हो, वहां शास्त्रीय नियमों का पालन भी अधर्म बन सकता है। युधिष्ठिर ने धर्म की एक परत पकड़ी, दूसरी खो दी। द्रौपदी ने उस खोई हुई परत की याद दिलाई। इसलिए महाभारत में द्रौपदी की आवाज को भी धर्म की आवाज कहा गया है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थान | कुरु सभा, हस्तिनापुर |
| मुख्य खिलाड़ी | युधिष्ठिर (पांडव) और शकुनि (दुर्योधन की ओर से) |
| मुख्य दांव | धन, राज्य, भाई, स्वयं, द्रौपदी |
| प्रत्यक्ष परिणाम | 12 वर्ष वनवास + 1 वर्ष अज्ञातवास |
| नैतिक संदेश | नियम से ऊपर विवेक, अन्याय पर मौन भी अधर्म |
1. क्या चौसर के नियम शकुनि ने ही बनाए थे?
परंपरागत नियम पहले से थे, लेकिन खेल की संपूर्ण संरचना और नियंत्रण शकुनि के हाथ में था।
2. क्या युधिष्ठिर को खेल से इंकार करना चाहिए था?
आदर्श रूप से हां। पर उन्होंने राजा और पुत्र धर्म के दबाव में निर्णय लिया, जो आगे चलकर विनाशकारी साबित हुआ।
3. क्या पासे वास्तव में जादुई या शापित थे?
कथाएं उन्हें शापित बताती हैं, पर आध्यात्मिक दृष्टि से वे शक्ति असमानता और खेल की अन्यायपूर्ण प्रकृति का प्रतीक हैं।
4. क्या यह चौसर का खेल महाभारत युद्ध के लिए अनिवार्य था?
इसने अधर्म को खुलकर सामने लाया, कुरु समाज की नैतिक विफलता उजागर की, इसलिए धर्मयुद्ध लगभग अनिवार्य हो गया।
5. क्या शकुनि को केवल खलनायक मानना सही है?
वे छल के प्रतीक हैं, पर साथ ही नियति के ऐसे उपकरण भी जिनके माध्यम से छिपा हुआ अधर्म स्पष्ट हुआ और धर्म का पुनर्स्थापन संभव हुआ।
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