By पं. संजीव शर्मा
जब पुरानी पहचान टूटती है और हृदय नंगा हो जाता है तब हनुमान की शक्ति भीतर जागती है

भक्ति परंपरा में एक गहरी धारणा बार बार उभरती है हनुमान सबके हैं लेकिन उनका सजीव अनुभव प्रायः उन्हीं के भीतर तेज हो उठता है जो सचमुच भीतर से टूट चुके हों। सामान्य समय में मन अपनी योजनाओं इच्छाओं और चिंताओं में उलझा रहता है इसलिए ईश्वरीय उपस्थिति अक्सर केवल विचार या कथा जैसी लगती है। पर जब चोट इतनी गहरी हो जाती है कि पहचान भरोसा और सहारा सब हिलने लगता है तब वही मन अपने सारे मुखौटे खोकर नंगा और ईमानदार हो जाता है और यही वह क्षण है जब भक्त को लगता है कि हनुमान सचमुच उसके साथ खड़े हैं।
नासै रोग हरै सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा जैसी पंक्तियाँ केवल देह के रोग से मुक्ति की बात नहीं करतीं वे उस पीड़ा की ओर इशारा करती हैं जो आत्मा तक पहुँचती है जहाँ इंसान पूछने लगता है अब आगे कैसे जियूँ किस पर टिकूँ। इस दृष्टि से हनुमान कोई दूर खड़े देव नहीं बल्कि वही करुणा और शक्ति हैं जो तब सामने आती है जब मनुष्य की अपनी दीवारें गिर चुकी हों।
दैनिक जीवन में अनेक प्रकार की तकलीफें आती हैं। काम का दबाव रिश्तों की खटास आर्थिक चिंता ये सब दुख देते हैं लेकिन सामान्यतः हम उन्हें संभाल लेते हैं ध्यान बँटा लेते हैं या यह सोचकर आगे बढ़ते हैं कि समय बदल जाएगा। इस स्तर पर भीतर की संरचना जस की तस रहती है केवल सतह पर हलचल होती है।
गहरा दर्द वह है जो हमारी पूरी कहानी को चुनौती दे देता है। जब किसी प्रिय के साथ घोर विश्वासघात हो जाए जब किसी अपने को खो दें जब लंबे समय की बीमारी या असफलताओं से यह लगे कि अब कोई रास्ता नहीं बचा तब सवाल केवल घटना का नहीं रहता स्वयं की जड़ तक पहुँच जाता है। यहाँ पर पुरानी पहचान उपलब्धियाँ और दूसरों की राय सब फीकी पड़ जाती हैं और भीतर से एक सच्चा नंगा पुकार उठता है।
इसी बिंदु को भक्ति में उस दहलीज़ की तरह देखा जाता है जहां हनुमान की उपस्थिति अचानक सघन लगने लगती है। क्योंकि यहाँ मन के पास कुछ बचाने लायक ही नहीं रह जाता दिखावा टूट चुका होता है। जब भीतर से स्वर उठता है अब तुम ही हो तब भक्ति केवल अभ्यास नहीं पूरा जीवन बन जाती है।
एक दुख वह है जब हमारी इच्छा पूरी नहीं होती प्रतिष्ठा को चोट लगती है या योजना बिगड़ जाती है। तब हम उदास होते हैं कभी नाराज भी पर भीतर कहीं भरोसा रहता है कि हम फिर से संभल लेंगे कुछ और कर लेंगे। यह दुख हमें ईश्वर से शिकायत की ओर तो ले जा सकता है पर समर्पण की ओर कम ही ले जाता है।
दूसरी पीड़ा वह है जब हम पहली बार यह मान लेते हैं कि अपनी समझ और शक्ति की भी सीमा है। जब बहुत संघर्ष के बाद भी परिणाम नहीं बदलते जब सबसे भरोसेमंद रिश्ते टूट जाते हैं जब शरीर या मन इतना थक जाता है कि आगे बढ़ने की इच्छा कम पड़ने लगती है तब भीतर की ज़मीन ही खिसकती है। यही वह चरण है जहां इंसान या तो कड़वाहट में डूब जाता है या फिर पहली बार ईमानदारी से किसी उच्च शक्ति के सामने झुक जाता है।
हनुमान की भक्ति इस दूसरे मार्ग को खोलती है। यहाँ पीड़ा को दबाया नहीं जाता सजाकर नहीं दिखाया जाता बल्कि जिस रूप में है उसी रूप में उनके सामने रखा जाता है। यह स्वीकार ही वह द्वार बन जाता है जिसके भीतर प्रवेश करके वे हमारे भय अपमान और अकेलेपन की परतों में हाथ डालते हैं।
नासै रोग हरै सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा इस चौपाई में दो शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं रोग और पीरा। रोग केवल देह की बीमारी नहीं आदतों चिंताओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों का भी रूप है। पीरा वह व्यापक कष्ट है जहाँ केवल दर्द नहीं बल्कि असुरक्षा शर्म हीनता और अर्थहीनता सब मिलते हैं।
जब कहा जाता है कि निरंतर जप से रोग और पीरा नष्ट हो जाते हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि केवल शब्द दोहराते ही सब समस्या गायब हो जाएँगी। इसका अर्थ यह है कि जब मन बार बार हनुमान के गुण साहस सेवा और समर्पण की स्मृति में लौटता है तो धीरे धीरे सोचने और महसूस करने का ढंग बदलने लगता है। भीतर जो धुन पहले भय और शिकायत की थी वह धीरे धीरे आभार और भरोसे की धुन में बदलने लगती है।
निरंतर जप का मर्म यह है कि दिन के छोटे छोटे क्षण भी ईश्वर की स्मृति से जुड़ें। सुबह आँख खुलते ही नाम दिन के काम के बीच छोटी सी स्मृति रात को सोने से पहले थोड़ी सी स्तुति इस क्रम में मन पुरानी धुनों से मुक्त होकर नई दिशा में ढलने लगता है। जब यह दिशा मजबूत हो जाती है तब वही हनुमान जो पहले केवल कथा के नायक थे भीतर के मित्र और सहारा की तरह महसूस होने लगते हैं।
बहुत बार हमें सिखाया जाता है कि जब हम पूरी तरह नियमों का पालन करेंगे मजबूत बनेंगे तब ही ईश्वर की कृपा के योग्य होंगे। यह धारणा भीतर बैठे अहंकार का ही एक और रूप है जिसमें हम ईश्वर के साथ भी सौदा करते हैं। हनुमान से जुड़ी कथाएँ बार बार बताती हैं कि उन्हें जिस बात से सबसे अधिक स्पर्श होता है वह बाहरी उपलब्धि नहीं बल्कि भीतर की सच्चाई है।
जब कोई व्यक्ति अपनी हार गलती कमजोरी और डर के साथ उनके सामने खड़ा होकर कहता है अब मुझे नहीं पता आगे क्या करना है बस तुम थाम लो तो ये शब्द ही उसकी सबसे सच्ची साधना बन जाते हैं। यहाँ न तर्क बचता है न बनावट केवल खुला हुआ हृदय बचता है। इस दशा में चाहे बाहर का दृश्य धीरे धीरे बदले पर मन के भीतर शोचनीयता की पकड़ ढीली पड़ने लगती है और एक नई शांति आकार लेने लगती है।
इसीलिए अनेक भक्त कथाओं में हनुमान की कृपा अक्सर उस क्षण प्रकट होती दिखती है जब इंसान सोचता है कि अब तो सब खत्म हो गया। उस टूटन के बीच से ही एक नई शुरुआत निकलती है जैसे बहुत पुरानी दीवार गिरने के बाद अचानक खुला आकाश दिखाई देता है।
जब कोई कवि या संत अपने ही दर्द के बीच हनुमान की स्तुति लिखता है तो वह केवल कविता नहीं एक जीवंत संवाद होता है। हर पंक्ति में अपनी पीड़ा की स्वीकृति भी होती है और हनुमान की महिमा का स्मरण भी। जैसे जैसे वह स्तुति आगे बढ़ती है लेखक की दृष्टि दर्द से हटकर धीरे धीरे उस शक्ति की ओर मुड़ने लगती है जो दर्द के पार भी मौजूद है।
इस प्रक्रिया में दो बातें साथ साथ घटती हैं। एक तरफ वह अपने कष्ट को सचमुच महसूस करता रहता है उसे झुठलाता नहीं। दूसरी तरफ वह उसे किसी बड़े प्रेम के हवाले करता चलता है। इस दोहरे गतिमान से दर्द केवल बोझ नहीं रहता वह भक्ति का ईंधन बन जाता है। हनुमान की उपस्थिति यहाँ केवल बाहरी सहायता नहीं भीतर की चेतना की नई ऊँचाई बन जाती है।
आज के समय में बहुत से लोग किसी युद्ध भूमि में नहीं बल्कि अपने दफ्तर घर मोबाइल स्क्रीन और भीतर की उलझनों में संघर्ष कर रहे हैं। असफलता तुलना अकेलापन मानसिक तनाव ये सब मिलकर मन को ऐसे घेरते हैं कि व्यक्ति मुस्कुराता तो दिखता है पर भीतर से खाली और टूटा हुआ महसूस करता है।
किसी के लिए यह दर्द करियर में बार बार लगे झटकों से आता है जहाँ वह खुद को बेकार समझने लगता है। किसी के लिए यह दर्द किसी टूटे हुए रिश्ते तलाक या परिवार की अनबन से जन्म लेता है। किसी और के लिए यह तनाव लंबे समय की बीमारी नौकरी की असुरक्षा या बचपन के घावों से जुड़ा हो सकता है जिन्हें कभी भरा ही नहीं गया।
ऐसे समय में जब व्यक्ति पहली बार स्वीकार करता है कि वह मदद चाहता है कि उसकी मुस्कान के पीछे सचमुच आँसू हैं तब हनुमान की स्मृति केवल परंपरा नहीं वास्तविक सहारा बन सकती है। नाम जप चालीसा या किसी छोटी स्तुति के साथ जब वह अपना दर्द व्यक्त करता है तो धीरे धीरे उसे भीतर से यह महसूस होने लगता है कि कोई है जो उसे समझता है उसे जज नहीं करता केवल थामता है।
यदि हम यह समझ लें कि गहरी पीड़ा हमें भीतर की ओर मोड़ सकती है तो बेहतर होगा कि पहले से ही मन को इस दिशा में थोड़ा थोड़ा तैयार रखा जाए ताकि संकट आने पर हम पूरी तरह ढहने के बजाय भीतर से संभल सकें।
एक सरल अभ्यास यह हो सकता है कि दिन में कुछ क्षण के लिए अपने आप से ईमानदार बातचीत करें। बिना किसी बनावट के यह कहना कि आज मैं थका हुआ हूँ डरा हुआ हूँ या खुश हूँ और इसे हनुमान के सामने रख देना चाहे शब्द में चाहे मौन में। इससे मन का बोझ हल्का होता है और एक भरोसे का रिश्ता बनने लगता है।
दूसरा रोज थोड़ा समय नाम स्मरण और चिंतन के लिए तय कर लेना चाहे कुछ पंक्तियाँ ही क्यों न हों। यह समय केवल किसी इच्छा पूरी कराने के लिए न हो बल्कि धन्यवाद स्वीकार और संवाद के लिए हो। तीसरा दिन में कोई एक छोटा काम ऐसा चुनना जिसे हम पूरी निष्ठा से केवल सेवा भाव से करें बिना धन्यवाद या प्रशंसा की अपेक्षा के। यह सब मिलकर मन को हनुमान के स्वभाव के करीब ले जाते हैं।
जब कोई व्यक्ति सचमुच हनुमान की उपस्थिति को अपने भीतर अनुभव करने लगता है तो वह पहले अपने को केवल पीड़ित की भूमिका में देखना छोड़ देता है। वह खुद को एक साधक के रूप में देखने लगता है जिसने दर्द के बीच भी सीखने सेवा करने और बढ़ने का अवसर पाया है।
उसकी भाषा बदलने लगती है पहले वह कहता था मेरे साथ यह अन्याय क्यों हुआ बाद में वह कहने लगता है इस घटना के बीच मैं कैसे सही रहूँ कैसे गलत की जगह सही को चुनूँ। पहले वह केवल अपने घाव दिखाता था अब वह दूसरों के घाव भी देख पाता है और उनके लिए भी कुछ करने की इच्छा महसूस करता है।
धीरे धीरे वह समझने लगता है कि टूटन अंत नहीं संक्रमण है एक पुराने ढाँचे से नए ढाँचे में प्रवेश का मार्ग है। हनुमान इस मार्ग के रक्षक और मार्गदर्शक दोनों बन जाते हैं जो यह सिखाते हैं कि गहरा दर्द भी उस पुल की तरह हो सकता है जिस पर चलकर हम अपनी सीमित पहचान से आगे किसी बड़े सहारे और प्रेम तक पहुँच सकें।
1 क्या हनुमान सच में केवल गहरे दुख वालों के पास ही आते हैं
वे हर समय सबके लिए उपस्थित रहते हैं लेकिन सामान्य दिनों में मन की भागदौड़ और अहंकार की दीवारें इतनी घनी होती हैं कि उनका सूक्ष्म स्पर्श पहचान में नहीं आता। गहरा दर्द इन दीवारों को तोड़ देता है इसलिए उनकी उपस्थिति अधिक स्पष्ट महसूस होती है।
2 यदि कोई व्यक्ति अभी बहुत सुखी और स्थिर जीवन जी रहा हो तो क्या वह हनुमान के उतना ही निकट हो सकता है
हाँ यदि वह ईमानदारी से भीतर झाँकने नियमित स्मरण और छोटी छोटी सेवा के माध्यम से अपने मन को नम्र और सजग बनाए रखे। निकटता केवल बाहरी संकट पर नहीं भीतर की सच्चाई और खुलापन पर निर्भर करती है।
3 क्या गहरी पीड़ा हमेशा भक्ति की ओर ले जाती है
नहीं वही पीड़ा किसी को कटु और नास्तिक भी बना सकती है। फर्क इस बात से पड़ता है कि व्यक्ति उस दर्द को छुपाता है या किसी ऊँची शक्ति के सामने रख देता है उसमें डूबकर खुद को खो देता है या उसे साधना का ईंधन बनाता है।
4 यदि मैं इस समय टूटन की स्थिति में हूँ तो पहला व्यावहारिक कदम क्या हो सकता है
एक अपने दर्द को साफ शब्दों में स्वीकार करना चाहे लिखकर चाहे मन ही मन हनुमान के सामने। दो दिन में कुछ पंक्तियाँ नाम स्मरण या स्तुति की जोड़ देना भले मन न भी लगे। तीन किसी एक छोटे काम को केवल सेवा भाव से करना ताकि मन खुद से बाहर भी देख सके।
5 कैसे समझूँ कि जो साहस और हल्कापन महसूस हो रहा है वह सच में हनुमान की कृपा है या केवल कल्पना
यदि समय के साथ यह परिवर्तन आपको अधिक ईमानदार अधिक करुणामय अधिक जिम्मेदार और भीतर से थोड़ी अधिक शांति की ओर ले जा रहा है यदि आप दूसरों के प्रति नरम और अपने प्रति सच्चे होते जा रहे हैं तो यह वही दिशा है जिसे हनुमान के मार्ग के रूप में समझा जाता है।
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