सच्चों की परीक्षा और दुखों का गीता रहस्य

By पं. सुव्रत शर्मा

श्रीमद्भगवद्गीता के तीक्ष्ण दर्शन से जानिए अच्छे लोगों के संघर्ष और आंतरिक न्याय का नियम।

सच्चों के दुःख का कारण: गीता का कड़ा सच

सामग्री तालिका

मानव चेतना के इतिहास में यह प्रश्न सदैव सबसे अधिक पीड़ादायक और अनुत्तरित रहा है कि जो व्यक्ति अत्यंत ईमानदारी, करुणा, निष्ठा और धार्मिकता के साथ जीवन व्यतीत करता है, अंततः उसी को सबसे अधिक मानसिक संताप, वियोग और कष्ट क्यों भोगना पड़ता है? लौकिक संसार में इस विसंगति को देखकर साधारण मनुष्य का ईश्वर पर से विश्वास डगमगाने लगता है और मन इस विचार से भर जाता है कि यह सृष्टि पूरी तरह से न्यायहीन है। परंतु श्रीमद्भगवद्गीता इस विषय पर केवल सतही सांत्वना नहीं देती बल्कि वह एक अत्यंत तीक्ष्ण और झकझोर देने वाला आध्यात्मिक यथार्थ प्रकट करती है। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में जब महाबाहु अर्जुन विषाद से घिरे हुए थर-थर कांप रहे थे, तो उनके मन में भी यही संशय था कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले पांडवों को जीवनभर वनवास, अपमान और संघर्ष क्यों मिला, जबकि अधर्म का आश्रय लेने वाले कौरव वैभव का भोग कर रहे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इन प्रश्नों का जो उत्तर दिया, वह मन को सुलाने के लिए नहीं बल्कि चेतना को गहरे प्रमाद से जगाने के लिए था। गीता यह सिद्ध करती है कि ब्रह्मांड अंधा नहीं है और सच्चों के जीवन में आने वाली परीक्षा कोई दैवीय अन्याय नहीं है।

काल चक्र और संचित कष्ट के विशेष ज्योतिषीय नियम

वैदिक ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार जीवन में मिलने वाले कष्टों का संबंध व्यक्ति के केवल इस जन्म के आचरण से नहीं होता बल्कि यह काल चक्र (Time Wheel) और संचित संस्कारों का एक अत्यंत गूढ़ गणित है। ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को न्यायकर्ता और प्रारब्ध के कठोर फलों का अधिपति माना गया है जबकि राहु व्यक्ति के भीतर अत्यधिक भ्रम और तात्कालिक अपेक्षाएं उत्पन्न करता है। जब किसी सात्विक व्यक्ति के जीवन में अचानक भयंकर कष्ट आते हैं, तो ज्योतिषीय गणना के अनुसार उसका सीधा संबंध उसके नवम (भाग्य), दशम (कर्म) और अष्टम (आयु व कष्ट) भाव के क्रूर गोचर से होता है। श्रीकृष्ण के अनुसार यह समय ईश्वर की क्रूरता नहीं बल्कि आत्मा के पूर्ण शुद्धिकरण का एक परम विधान है।

मानसिक एवं आत्मिक स्थिति लौकिक दृष्टिकोण और संशय ज्योतिषीय ग्रह प्रभाव गीता का वैदिक नियम दीर्घकालिक आत्मिक परिणाम
सच्चों का तीव्र कष्ट "मैंने कुछ गलत नहीं किया फिर यह दुःख क्यों" शनि देव का कठोर और न्यायकारी गोचर पीड़ा को दंड नहीं शुद्धि मानना संचित कर्मों का क्षय और मोक्ष पात्रता
अधर्मियों की बाह्य उन्नति "पापी लोग संसार में वैभव भोग रहे हैं" राहु का भ्रामक और तात्कालिक प्रभाव फलों के समय अंतराल का सिद्धांत पुण्य का क्षय और भविष्य का घोर बंधन
अपेक्षाओं के कारण अवसाद "मेरी भलाई का प्रतिफल मुझे बुरा मिला" निर्बल चंद्रमा और दूषित बुध का वेग अच्छाई के प्रति भी अनासक्त होना मिथ्या अहंकार का नाश और अखंड शांति

पीड़ा कोई दैवीय दंड नहीं अपितु आत्मा का शुद्धिकरण है

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार लौकिक जगत में जिसे हम अत्यंत कष्टकारी या दुर्भाग्यपूर्ण समय मानते हैं, वह वास्तव में परमात्मा द्वारा दिया गया कोई दंड नहीं है। यह तो जीवात्मा ( Atman ) के सूक्ष्म शरीर पर संचित जन्म-जन्मांतर के कर्म संस्कारों को भस्म करने की एक परम सात्विक प्रक्रिया है। जब एक अत्यंत भद्र और धार्मिक व्यक्ति कष्ट पाता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना के उन अंतिम और अत्यंत बारीक मैल को साफ कर रहा होता है जिससे सामान्य भलाई भी मुक्त नहीं हो पाती। भगवान श्रीकृष्ण गीता के चतुर्थ अध्याय के दसवें श्लोक में इस सत्य को बहुत ही सुदृढ़ ढंग से प्रकट करते हैं।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

इस श्लोक का पावन संदेश यही है कि आसक्ति, भय और क्रोध से पूरी तरह मुक्त होकर, मुझमें अनन्य भाव से स्थित और मेरी ही शरण में रहने वाले बहुत से लोग ज्ञान रूपी तपस्या से पवित्र होकर मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। श्रीकृष्ण यहाँ 'ज्ञानतपसा' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है ज्ञान की वह अग्नि जो केवल सैद्धांतिक नहीं होती बल्कि दुखों की भट्टी में तपने के बाद ही परिपक्व होती है। बाहरी संसार को जो परिस्थिति एक भीषण दुर्भाग्य या वज्रपात प्रतीत होती है, वह आंतरिक जगत में आत्मा का तीव्र उद्विकास ( Evolution ) होती है। यह उस नश्वर आवरण का अत्यंत दर्दनाक परित्याग है जो चेतना को उसकी सर्वोच्च आध्यात्मिक यात्रा पर बढ़ने से रोक रहा था।

कर्म का नियम तात्कालिक नहीं अपितु युगांतरकारी है

संसार में अविश्वास का सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य का सीमित अहंकार हमेशा तात्कालिक न्याय की मांग करता है। जब हम किसी कपटी और अन्यायी व्यक्ति को फलते-फूलते देखते हैं, तो हमारी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। परंतु गीता सिखाती है कि कर्म का सिद्धांत किसी मानवीय भावना या तात्कालिक क्रोध से संचालित नहीं होता। यह पूरी तरह से गणितीय, सटीक और निर्विकार है। प्रत्येक क्रिया का परिणाम निश्चित है, परंतु उसके प्रकट होने का समय इस एक जन्म की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है।

वर्तमान में जो सात्विक व्यक्ति अत्यधिक पीड़ा भोग रहा है, वह वास्तव में अपने पूर्व जन्मों के किसी अदृश्य ऋण ( Karmic Debt ) का भुगतान कर रहा है ताकि उसकी आत्मा पूरी तरह स्वतंत्र हो सके। इसके विपरीत जो दुराचारी व्यक्ति आज सुख भोग रहा है, वह केवल अपने पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों के अंतिम बचे हुए अंश को समाप्त कर रहा है। जैसे ही उसके पुण्यों का वह संचित कोष समाप्त होगा, उसका पतन अत्यंत भयंकर होगा। श्रीकृष्ण चतुर्थ अध्याय के सत्रहवें श्लोक में अर्जुन से कहते हैं कि कर्म की गति अत्यंत गहन और समझने में बहुत कठिन है। इसलिए जब जीवन किसी निष्पाप व्यक्ति को चोट पहुँचाता है, तो उसे विधाता का अन्याय मानने के स्थान पर उस व्यापक अदृश्य समीकरण का हिस्सा समझना चाहिए जो समय की अगाध गहराइयों में स्वयं को पूरी तरह संतुलित कर रहा है।

वेदना ही आध्यात्मिक जागृति का वास्तविक उत्प्रेरक है

  • श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में यह कभी नहीं कहा कि युद्धभूमि पर कदम रखते ही तुम्हारे सारे कष्ट स्वतः समाप्त हो जाएंगे।
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष तुम्हें भीतर से झकझोर कर पूरी तरह रूपांतरित कर देगा।
  • पीड़ा का सबसे बड़ा आध्यात्मिक गुण यह है कि वह मनुष्य के भीतर छिपे समस्त लौकिक भ्रमों को एक झटके में तोड़ देती है।
  • यह हमें इस झूठे अहंकार से मुक्त करती है कि बाहरी परिस्थितियों और जीवन पर हमारा कोई पूर्ण नियंत्रण है।
  • जब संसार के सारे कृत्रिम सहारे छिन जाते हैं, केवल तभी मनुष्य के भीतर उस शाश्वत आत्म-तत्व का बोध होता है जो सर्वथा अचल है।

द्वितीय अध्याय के पंद्रहवें श्लोक में श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन, जो बुद्धिमान मनुष्य सुख और दुःख दोनों में पूरी तरह एक समान रहता है और इन दोनों से कभी विचलित नहीं होता, वही वास्तव में मोक्ष और परम पद का अधिकारी बनता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो जीवन के ये कठिन आघात कोई अवरोध नहीं बल्कि अंतरात्मा की दीक्षा ( Initiation ) हैं। आत्मा जितनी अधिक सुदृढ़ और जाग्रत होती है, उसके सीखने के पाठ उतने ही गहरे और कठिन होते हैं क्योंकि केवल अग्नि की परीक्षा से गुजरकर ही सोने की शुद्धता प्रमाणित होती है।

सतही अच्छाई और गहरे आत्मिक विवेक का अंतर

श्रीमद्भगवद्गीता अच्छाई ( Goodness ) और वास्तविक आत्मिक विवेक ( Wisdom ) के बीच एक बहुत ही तीक्ष्ण और क्रांतिकारी अंतर रेखांकित करती है। लौकिक जगत में अच्छा होने का अर्थ केवल नैतिक नियमों का पालन करना, दयालु होना और धार्मिक बने रहना माना जाता है जिसे शास्त्रों में धर्म का व्यावहारिक रूप कहा गया है। परंतु आत्मिक विवेक इससे कहीं आगे की स्थिति है जहाँ मनुष्य यह समझता है कि उसे इस सात्विक मार्ग पर चलते हुए भी दुखों के चक्रव्यूह से क्यों गुजरना पड़ रहा है।

अर्जुन स्वभाव से अत्यंत भद्र, न्यायप्रिय और करुणा से भरे हुए श्रेष्ठ पुरुष थे परंतु उनकी यह अच्छाई उस समय अत्यंत निर्बल सिद्ध हुई जब जीवन ने उनके सामने एक अत्यंत विकट परिस्थिति खड़ी की। वे अपनी भावुक अच्छाई के कारण कर्तव्य पथ से पीछे हटने लगे थे। श्रीकृष्ण ने उनके इस मानसिक संताप को दूर करते हुए उन्हें भावुकता से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक स्पष्टता के उस शिखर पर स्थापित किया जहाँ परिणामों के प्रति आसक्ति को पूरी तरह त्याग कर केवल कर्तव्य के लिए कर्म करना ही एकमात्र सत्य बचता है। जब संसार में किसी अच्छे व्यक्ति को अत्यधिक पीड़ा होती है, तो उसका एक मुख्य कारण यह भी होता है कि वह अभी तक इस भ्रामक आग्रह से मुक्त नहीं हो पाया है कि इस नश्वर संसार को उसकी शर्तों पर न्यायप्रिय होना चाहिए। यह ब्रह्मांड मानवीय नैतिकताओं के संकुचित नियमों से नहीं बल्कि अपने शाश्वत अपरिवर्तनीय विधानों से संचालित होता है।

अच्छाई के अहंकार से उत्पन्न होने वाला सूक्ष्म बंधन

गीता हमें एक अत्यंत विस्मयकारी चेतावनी देती है कि मनुष्य को न केवल बुरे कर्मों से बल्कि अपनी सात्विक अच्छाई, परोपकार और त्याग की भावना के प्रति होने वाली आसक्ति से भी पूरी तरह बचना चाहिए। जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से इस विचार से चिपक जाता है कि "मैं बहुत अच्छा हूँ, मैं सबका भला करता हूँ, इसलिए मेरे जीवन में कोई दुःख नहीं आना चाहिए," तो वह अनजाने में ही अपने भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरे अहंकार ( Spiritual Ego ) का निर्माण कर रहा होता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (Bhagavad Gita 2.47)

इस अमर श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि तुम्हारा अधिकार केवल अपने निर्धारित कर्तव्य को पूरा करने पर है, उसके प्रतिफल या परिणाम पर कभी नहीं। जब एक भला मनुष्य अपने अच्छे कर्मों के बदले संसार से अनुकूलता, सम्मान या सुखद परिणामों की आकांक्षा रखता है, तो वह भी उसी व्यापारिक चक्रव्यूह में फंसा होता है जिसमें एक आम संसारी व्यक्ति। जैसे ही परिस्थितियां उसकी इस अपेक्षा के विपरीत होती हैं, उसका मन निराशा और गहरे अवसाद से भर जाता है।

पीड़ा हमें यह परम पाठ सिखाने आती है कि हमारी धार्मिकता या अच्छाई इस ब्रह्मांड के साथ किया गया कोई सौदा या कूटनीतिक समझौता नहीं है बल्कि यह तो बिना किसी शर्त के ईश्वर के चरणों में अर्पित किया गया एक पावन आहुति है। जब व्यक्ति प्रतिफल की लालसा से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तभी उसके जीवन से दुखों का अंत होता है।

दुःख ही मनुष्य के वास्तविक स्वरूप की साक्षात गवाही है

श्रीमद्भगवद्गीता का सबसे गहरा और प्राणवान दर्शन यही है कि जीवन में आने वाली गंभीर प्रतिकूलताएं मनुष्य के ऊपर से माया के सारे कृत्रिम आवरणों को पूरी तरह नोच देती हैं। जब संसार का प्रत्येक सहारा टूट जाता है, धन, पद और सगे संबंधी भी साथ छोड़ देते हैं, तो उस परम शून्य में केवल एक ही सत्य शेष बचता है और वह है आपकी अविनाशी आत्मा जो परम दिव्य और अचल है। श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के बीसवें श्लोक में आत्मा के इसी वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करते हैं।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्-नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

इस श्लोक का परम सत्य यही है कि यह आत्मा किसी भी काल में न तो जन्म लेती है और न ही कभी मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट हो जाने पर भी इस आत्मा का कभी वध नहीं किया जा सकता। कष्ट के इन भीषण क्षणों में मनुष्य का अहंकार अत्यंत तीव्र पीड़ा का अनुभव करता है परंतु उसकी अंतरात्मा इन सब से पूरी तरह अछूती और शांत बनी रहती है। जीवन की यह विनाशकारी परिस्थितियां आपके वास्तविक अस्तित्व को कभी नष्ट नहीं कर सकतीं, वे केवल अज्ञान की उन परतों को जलाकर भस्म करती हैं जो आपको यह बोध कराने से रोक रही थीं कि आप वास्तव में कौन हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य जीवन के इन भयंकर दुखों को भी एक परम शांत साक्षी भाव और ईश्वरीय इच्छा मानकर स्वीकार करते हैं, वे नियति के शिकार नहीं हैं बल्कि वे चेतना के उस सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हैं जहाँ सुख और दुःख, लाभ और हानि पूरी तरह विलीन हो जाते हैं और केवल शाश्वत आनंद का ही साम्राज्य शेष रहता है।

FAQ

यदि अच्छे लोगों का कष्ट उनके पूर्व जन्मों का फल है, तो इस जन्म में अच्छाई करने का क्या लाभ है?
इस जन्म में की गई अच्छाई और सात्विक कर्म आपके भविष्य के मार्ग को सुगम बनाते हैं और आपके अंतःकरण को शुद्ध करते हैं। यदि आप इस जन्म में भी अधर्म का मार्ग चुन लेंगे, तो आपके संचित कष्टों का बोझ कई गुना बढ़ जाएगा जिससे भविष्य में पतन पूरी तरह निश्चित हो जाएगा।

क्या श्रीकृष्ण के अनुसार हम प्रार्थना या भक्ति के माध्यम से अपनी परीक्षा के कष्ट को कम कर सकते हैं?
हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जब कोई जीवात्मा पूर्ण शरणागति प्राप्त कर लेती है, तो ईश्वर की असीम कृपा से उसके कष्टों की तीव्रता अत्यंत क्षीण हो जाती है। भक्ति मनुष्य के भीतर की चेतना और सहनशक्ति को इतना ऊंचा उठा देती है कि भयंकर दुःख भी उसे केवल एक सामान्य लहर के समान प्रतीत होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सच्चों के जीवन में आने वाले इस कड़े संघर्ष का मुख्य ग्रह कारक कौन सा है?
ज्योतिष में शनि देव को इस कड़े संघर्ष और परीक्षा का मुख्य कारक ग्रह माना गया है। शनि देव व्यक्ति के भीतर से तामसिक प्रवृत्तियों और अहंकार को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उसे संघर्षों की भट्टी में तपाते हैं, जिससे अंततः व्यक्ति का आभामंडल परम शुद्ध और सात्विक हो जाता है।

एक भला मनुष्य अपने जीवन में आने वाले अप्रत्याशित दुखों के समय अपने मानसिक संतुलन को कैसे बनाए रखे?
इसके लिए मनुष्य को श्रीकृष्ण प्रतिपादित 'साक्षी भाव' का आश्रय लेना चाहिए। उसे स्वयं को परिस्थितियों का कर्ता या भोक्ता मानने के स्थान पर केवल एक दृष्टा समझना चाहिए और यह दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि जो भी परिस्थिति आई है, वह उसकी आत्मिक उन्नति के लिए ब्रह्मांड का एक सुनिश्चित विधान है।

क्या गीता में यह कहा गया है कि अधर्मियों का बाह्य सुख वास्तव में उनके विनाश की शुरुआत है?
हाँ, गीता और उपनिषदों के अनुसार अधर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों को मिलने वाला तात्कालिक सुख केवल उनके पूर्व पुण्यों का क्षय है। जैसे ही उनके पुण्यों का वह संचित कोष समाप्त होता है, उनके भीतर का अहंकार और वासनाएं उन्हें एक ऐसे भयंकर विनाश और मानसिक नरक की ओर ले जाती हैं जहाँ से निकलना अत्यंत कठिन होता है।

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पं. सुव्रत शर्मा

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